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कविता

बद्दल न होंहिं दल दच्छिन घमंड उमंडिआयो
भूषण


बद्दल न होंहिं दल दच्छिन घमंड उमंडिआयो,
घटा ये नहोय इभ सिवाजी हँकारी के।
दामिनी दमंक नहिं खुले खग्ग बीरन के,
इंद्रधनु नाहिं ये निसान हैं सवारी के।
देखि देखि मुगलों की हरमैं भवन त्यागैं,
उझकि उझकि उठैं बहत बयारी के।
दिल्लीपति भूलमति गाजत न घोरघन,
बाजत नगारे ये सितारे गढ़धारी के।।


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