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कहानी

हरा इंद्रधनुष
वीरेंद्र प्रताप यादव


ध्वनि आगे-आगे दौड़ती जाती है और पीछे अर्थ लटक लेते हैं। सभी अपना अर्थ लिए ध्वनि को जकड़ने में लगे रहते हैं। हरी भी अपने झोले में पिछले कुछ वर्षों से एक अर्थ लिए ननिहाल आने का मौका खोज रहा है। दो वर्ष पूर्व तक उसे ननिहाल आने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। ननिहाल उसके ददिहाल से अच्छी खासी दूरी पर था इसलिए माँ को जब भी मायके आना होता वह अपनी सुविधा के लिए हरी को साथ ले आती थी। न चाहते हुए भी उसे साथ आना पड़ता था। इधर पिछले दो वर्षों से वह ननिहाल आने के बहाने खोज रहा है।

दो वर्ष पूर्व हरी माँ के साथ आम का मौसम समाप्त होते समय ननिहाल आया था। यह वह समय था जब बाग से आम लगभग समाप्त हो चुके होते हैं तथा सावन अपना दस्तक देने लगता है। फिर भी यदा कदा कुछ आम जो सही समय पर नहीं पक पाए होते हैं वे भोर के तारे की तरह बाग में जगमगाते रहते हैं। पक्षी और कीड़े इन आमों को पकने से पहले ही खाना शुरू कर देते हैं। गाँव के बच्चों की पैनी नजर इन्हें खोजती रहती है। इस समय बच्चों के पास मनोरंजन के बहुत साधन नहीं होते हैं। जिन बागों में वे पिछले दो-ढ़ाई महीनों से डेरा डाले थे वहाँ अब पानी की पहली बौछार के बाद चकवड़ और अन्य खर-पतवार उग आते हैं। हरी अपनी उम्र के बच्चों के साथ इन्हीं आमों की खोज में दिन भर बाग में घूमता था। उसका इस तरह बाग में घूमना आम के लिए लगता था लेकिन वह सिर्फ घूमने के लिए बाग में घूमता था।

बरसात के कारण बाग के आसमान की ही नहीं उसकी जमीन की भी काया बदल गई थी। जहाँ आसमान हल्के काले धब्बे लिए धूसर रंग का हो गया था वहीं जमीन भी भूरी से चकवड़ और हरे खर-पतवार रूपी जलकुंभी से भरी हरी झील लगती थी जिसपर सिर्फ पगडंडियाँ ही शेष थीं जो उसके अतीत पर वर्तमान को हावी नहीं होने देती थीं। बाग का पूरा का पूरा तल हरे रंग के मखमली कालीन की तरह लगने लगता है। जिस पर अमोले लाल-बैंगनी रंग के छोटे-छोटे द्वीपों की तरह यहाँ वहाँ नजर आते हैं। बच्चे अमोलों से आम की गुठली अलग करके उसके एक सिरे को पत्थर पर रगड़ कर पिपिहरी बनाते थे। अमोलों को इस तरह उखाड़ा जाना हरी को बिलकुल भी पसंद नहीं था। उसे तो उनकी मखमली पत्तियों का चटक रंग और तेज महक पसंद थी। पौधों जैसे कि धनिया, टमाटर एवं लहसुन की पत्तियों की महक उसे बेहद प्रिय थी। वह उन्हें घंटों सूँघता रहता। जैसे वह उस महक से जुड़ जाना चाहता हो। स्वयं को उसका हिस्सा बना लेना चाहता हो। महक उसे माँ के करीब ले जाती थी। महक उस झील की तरह थी जिसमें वह घंटों गोते लगाता। जितना उसे पौधों की महक से प्रेम था उतना ही उसे उन्हें निहारना अच्छा लगता था। किसी पेड़ की हवा से हिलती डाल को वह एक टक देखता रहता। यहाँ तक कि बाग के बगल से गुजरने वाली नदी की तरंगों से भी वह मन ही मन बातें करता। ऐसे ही एक बार गर्मियों में वह अपने गाँव आया था। गाँव के युवा दोपहर में महुआ के पेड़ के नीचे दो चारपाई आपस में जोड़कर उसपर लुंगी बिछाकर दहला पकड़ खेल रहे थे। बच्चे उन्हें घेरे हुए थे। हरी भी वहीं था लेकिन उसकी आँखें न तो ताश पर थी। न ही ताश खेलने वालों और ताश खेलने वालों पर नजरें डालें बच्चों पर थी। उसकी नजर महुआ की एक डाल के साथ झूल रही थी बिलकुल सावन के झूले की तरह। वह डाल के अग्र भाग की पत्तियों को आसमान में उड़ते रुइया बादलों के साथ मिलाकर तरह-तरह की आकृतियों की कल्पना करता। आकृतियाँ उसके लिए सिर्फ कल्पना नहीं थी बल्कि प्रत्यक्ष यथार्थ था। रुइया बादल उसे कभी जुता हुआ खेत लगता और महुआ का पत्ता उसमें उगा ताजा अंकुर। तो कभी बादल उसे चूजों के साथ दाना चुगती मुर्गी लगती। लोग ताश के खेल में खोए रहते और वह अपने स्वनिर्मित यथार्थ में खोया रहता।

दो वर्ष पूर्व उसे ग्रीष्म और सावन के मध्य जब ग्रीष्म के क्षेत्र में सावन घुसपैठ कर रहा होता है बच्चों के साथ बाग में घूमते हुए एक अमोला मिला। अमोला अन्य अमोलों से भिन्न था। उसकी कोंपल चटक तो थी किंतु औसत से कम और पत्तियाँ भी कुछ अलग थीं। पौधा अन्य पौधों से कुछ कमजोर भी था। इसी भिन्नता ने उसे कुछ ज्यादा ही आकर्षित कर दिया था। वह झुककर पौधे को सिर्फ आँखों से स्पर्श नहीं कर रहा था। स्पर्श सिर्फ हाथों द्वारा भी नहीं था। स्पर्श आँखों और हाथों के अलावा उसकी आत्मा, उसके हृदय से था। उसने गौर किया कि पौधे से जुडी हुई गुठली भी अलग थी। वह हरी, पतली और गठीली थी। उसने साथ के बच्चों में से बंसू को बुलाया और पूछा "यह अमोला इतना कमजोर क्यों है?" बंसू कुछ जवाब देता उसने सवाल को आगे बढ़ाते हुए स्वयं संभावित उत्तर खोजते हुए कहा "अमोला किस पेड़ का है? 'मिठऊआ' का तो नहीं है, 'खटलाहे' का भी नहीं लग रहा, 'हरखूवाले' के आम भी इतने छोटे नहीं होते।" बंसू ने पौधे पर एक नजर डाली और हरी को खिझाते हुए जवाब दिया "तुम परदेस वाले भी गधे हो... महुआ और आम के पौधे में अंतर ही नहीं पता।" हरी के सवाल खींचने के अंदाज में उसने जवाब का आगे खींचते हुए कहा "तुम लोगों को तो ऊख और सरपत में ही अंतर नहीं पता तो अमोला और महुआ के पौधे में क्या खाक अंतर कर पाओगे।" हरी जानता था कि वह आगे कुछ बोलेगा तो बंसू किसी न किसी बहाने फिर उसकी खिल्ली उड़ाएगा इसलिए वह चुप हो गया। बंसू को लगा कि हरी चुप है क्योंकि उसे उसके मुँह से निकली कोई ध्वनि नहीं सुनाई दी। उसे कोई ध्वनि नहीं सुनाई दी क्योंकि हरी ने अपने मुँह से कोई ध्वनि नहीं निकाली थी। लेकिन वह चुप नहीं था। उसके मन में बिना ध्वनि के शब्द मिलकर वाक्यों की श्रृंखला बना प्रश्नोत्तर कर रहे थे। एक ही वाक्य "महुआ का पौधा ऐसा होता है" उसके मन में बार-बार घूम रहा था। अंतर यह था कि वाक्य के अंत में एक बार वह प्रश्नचिह्न लगता और अगले पल पूर्णविराम। हरी को गाँव के बच्चों द्वारा सिर्फ इसलिए कि वह शहर में रहता है उसकी खिंचाई करना बिलकुल भी पसंद नहीं था। फिर भी वह उन्हीं का साथ चाहता था। वह उनका साथ चाहता था क्योंकि वे ही थे जिनके साथ वह बाग, खेतों, चरागाह और नदी तक जा सकता था। वे छोटी-छोटी पारदर्शी बूँदों की तरह थे जिनसे उसके हरे इंद्रधनुष का निर्माण होता था।

हरी अपने माता-पिता और बहन के साथ शहर में रहता था। उसके पिता किसी सरकारी दफ्तर में नौकरी में थे। पहले तो वह अपनी माँ और बहन के साथ गाँव में ही रहता था। गाँव किसी अंतहीन रंगीन चित्र की तरह था जिसमें हर नए दिन वह एक नया रंग भरता था। किंतु रंगों का यह साथ ज्यादा दिन न चला। पाँच वर्ष का होते ही उसके पिता पत्नी और बच्चों को भी शहर ले आए थे। शहर में वे सरकारी क्वार्टर में रहते थे और उसके पिता ने उसका और उसकी बहन का सरकारी विद्यालय में दाखिला करा दिया था। उसका क्वार्टर और विद्यालय दोनों ही मटमैले-पीले रंग के थे जिनसे हमेशा पपड़ी गिरती रहती थी। पपड़ी गिरने बाद उस स्थान पर सफेद रंग का धब्बा रह जाता था जिसमें वह स्मृतियों के रंग भरने की कोशिश करता रहता। जहाँ गाँव के खुले आसमान में वह उड़ती किसी चिड़िया की तरह था और हर घर एक पेड़ की तरह था जिसमें बे-रोकटोक वह फुदकता था किंतु शहर में वह पिंजरे में कैद हो गया था जिसकी सलाखें काले जंग लगे कंक्रीट से बनी थीं। उसका अबोध मन उड़ान भरने का जितना भी यत्न करता किसी न किसी ईमारत से टकरा कर औंधे मुँह सड़क पर गिर जाता। गर्मियों की छुट्टियाँ सलाखों के मध्य का खली स्थान थीं जहाँ से अभी भी वह हरे रंग के सपने चुरा लाता था।

इसी तरह दो वर्ष पूर्व वह माँ के साथ गर्मियों की छुट्टिओं में अपने गाँव आया था जहाँ से उसकी माँ उसे अपने मायके ले आई थीं और वह ननिहाल बिलकुल अनमने आया था। बारिश लगभग दस्तक दे चुकी थी और उसे बाग में एक महुआ का पौधा दिखा। बारिश के आगमन से ही गाँव के बच्चों में एक नया जुनून आ जाता है। वे तरह-तरह पेड़-पौधे खासतौर पर आम के पौधों को बाग से उखाड़ कर घर के पीछे, पगडंडी और खेत के किनारे आदि स्थानों पर लगाने लगते हैं। अमोला रोपते हुए उनमें तय हो जाता है कि जब वह पेड़ में परिवर्तित हो जाएगा तो उसके आम किसे-किसे खाने की अनुमति होगी। यह काम वे बिना किसे के आदेश अथवा निवेदन के सहज प्रवृत्ति से करते हैं। जीव जगत के अस्तित्व को बनाए रखने में जीवों में सहज प्रवृत्ति होती है। सहज प्रवृत्ति मन से नहीं चलती है। वह विवेक से भी नहीं चलती। वह प्रकृति से चलती है। बच्चों द्वारा लगाए गए पौधों में से शायद ही कोई एक वर्ष का चक्र पूर्ण कर पाता है। कभी बकरी, कभी गाय, तो कभी अवहेलना इन पौधों को समाप्त कर देते हैं। फिर भी बच्चे किसी ढीठ लता की तरह अगले वर्ष यही काम दोहराते हैं। बच्चे जब तक बच्चे रहते हैं तब तक वे बरसात आरंभ होते ही बाग से अमोले उखाड़ कर इधर-उधर लगाते हैं। जब वे बड़े हो जाते हैं तो अगली पीढ़ी के बच्चे इसी काम को दोहराते हैं। इसीलिए बच्चों को देने के लिए वृक्ष अपने फलों में मीठापन लिए होते हैं। बच्चे उसी तरह अमोला रोपते हैं जैसे घास के मैदान में कोई हिरणी बच्चा जनती है। हर जीव में ममता होती है जिसके नशे में वह किसी को भी जाहे वह कोई दूसरा जीव यहाँ तक की निर्जीव वस्तु ही क्यों न हो उसे पूरे मातृत्व से समेटे रहता है। बड़ों के मुकाबले यह ममता बच्चों में अधिक होती है। बच्चे अपनी पसंद के अमोले खोदकर इधर-उधर लगा रहे थे। हरी ने महुआ के पौधे को पूरी एहतियात से खोदा और अपने नाना के ट्यूबवेल से निकलने वाले बरहा से सटी मेड़ पर लगा दिया। माँ दो सप्ताह के लिए मायके आई थी। जब तक वह वापस नहीं लौटी हरी हर रोज महुआ के उस पौधे में पानी डालता। सुबह उठते ही सबसे पहले देखने जाता कि कहीं उसकी पत्तियाँ तो नहीं लटक गई हैं। वह यह भी देखता कि उसमें नई कोपल आ रही है की नहीं। वह महुआ के पौधे की माँ बन गया था और पौधा उसकी संतान। सिर्फ गर्भ से पैदा होने से ही माँ-संतान का संबंध नहीं बनता। न ही माँ-संतान होने के लिए एक ही जीव होना आवश्यक है। महुआ का यही पौधा ममता और वात्सल्य का वह संबंध था जो हरी को ननिहाल से बाँधे हुआ था।

चूँकि छुट्टियाँ समाप्त हो चुकी थीं अतः वह माँ के साथ वापस शहर लौट आया था। शहर उसे मटमैले रंग का ही लगता था। रंग महुआ के पौधे के रूप में उसकी स्मृतियों में ही शेष था। रात में आसमान में चाँद को देखकर वह सोचता कि चाँद की ठंडी रोशनी जिस तरह उस पर पड़ रही है ठीक वैसे ही वह महुआ के पौधे पर भी पड़ रही होगी। सर्दी में धूप की गरमाहट उसे इत्मिनान देती कि धूप की यही गरमाहट महुआ के पौधे पर भी ठीक इसी समय पड़ रही होगी। चाँदनी और धूप उस कंबल की तरह थे जिसमें दोनों एक दूसरे से स्नेह से लिपटे हुए थे। शहर लौटते हुए वह महुआ के पौधे का झड़ा हुआ एक पत्ता साथ ले आया था। पत्ते को उसने अपनी सबसे मोटी किताब में रख दिया था। समय के साथ पत्ते का रंग भी शहर की तरह मटमैला फिर भूरा हो गया। लेकिन उसकी स्मृति अभी भी पत्ते को हरा बनाए हुए थी। वह अक्सर किताब से पत्ते को निकलकर आँखें बंद कर इस तरह स्पर्श करता जैसे माँ बच्चे के बालों में प्रेम से उँगलियों से कंघी करती है। पत्ता भी उसकी हथेली में इस तरह टिका रहता जैसे कोई बच्चा सोते समय अपनी माँ की ऊँगली मुट्ठी में जकड़े रहता है। यूँ ही एक बार वह पत्ते को हाथ में लिए उसे स्नेह कर रहा था। वह सोचने लगा कि अब जब वह वापस ननिहाल जाएगा तो वह पौधा काफी बड़ा हो चुका होगा। हो सकता है कि उससे भी ऊँचा हो चुका होगा। उसमें बहुत से चौड़े-चौड़े पत्ते आ गए होंगे। पत्तों की कल्पना करते हुए उसे महुआ के वे पत्ते याद आ गए जिसमें उसके पिता पनवाड़ी के यहाँ से पान का बीड़ा पैक करवा के लाते थे। वह बुदबुदाया, नहीं उसके पेड़ के पत्ते इतने कमजोर और हलके रंग के नहीं होंगे। वे तो खूब चौड़े, मोटे और गाढ़े रंग के होंगे। बिलकुल उसकी पिता की हथेली की तरह। पौधा अब पेड़ बन चुका होगा। उससे कई डालियाँ भी फूट चुकी होंगी। उसके नीचे अच्छी खासी छाया भी रहती होगी। हो सकता है कि गर्मियों में उसके नाना पेड़ के नीचे अपनी गाय भी बाँधते हों। राह चलते मुसाफिर गर्मी से बचने के लिए उसके नीचे पल दो पल के लिए सोहताते भी हों। हाँ ये हो सकता है क्योंकि बगल में ही ट्यूबवेल भी तो है जहाँ से एक लोटा पानी भी उन्हें मिल जाता होगा। उसके नाना सीना फुला कर गर्व से कहते होंगे कि यह पेड़ मेरे नाती ने लगाया है। वह आगे सोचने लगा कि इस बार जब वह ननिहाल जाएगा तो क्या वह पेड़ उसे पहचान जाएगा? वह जैसे ही पेड़ के भूरे तने को छुएगा। जिसमें से मिट्टी की महक आती होगी और उसकी उँगलियों के स्पर्श से पेड़ उसे जरूर पहचान जाएगा। वह आगे सोचने लगा कि पेड़-पौधे तो ताउम्र एक ही जगह रहते हैं। क्या वे ऊब नहीं जाते। अगर मुझे जिंदगी बार एक ही जगह रहना हो मैं तो नहीं रह पाऊँगा। पेड़ एक ही जगह कैसे रह लेते हैं? क्या वे भी ऊबते होंगे? उनका समय कैसे कटता होगा? अरे हाँ उनके पास तो चिड़िया आती हैं। तितलियाँ और मधुमक्खियाँ आती हैं। हवा उन्हें झूला झुलाती है। इसलिए वे नहीं ऊबते होंगे। सोचते-सोचते महुआ के पत्ते को लिए वह सो गया।

हर वर्ष की तरह ग्रीष्कालीन परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं। किंतु इस वर्ष उसकी गाँव जाने की योजना मुश्किल में पड़ रही थी। उसका परिवार इन छुट्टियों में उसके मौसा-मौसी के घर रानीखेत जाने की योजना बना रहा था। उसके मौसा सेना में थे और इन दिनों उनका स्थानांतरण रानीखेत में हुआ था। पिछले कई महीनों से उसकी मौसी उसकी माँ से पहाड़ पर घूमने आने का आग्रह कर रही थीं। अब तक तो उसकी माँ इस आग्रह को टालती आ रही थीं किंतु इस बार तय हुआ था की रानीखेत के साथ हरिद्वार और फिर ऋषिकेश भी जाया जाएगा। धर्म घरेलू जिम्मेदारियों पर हावी होने लगा था। उसके परिवार में वही सब परेशानियाँ थी जोकि किसी भी आम निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों में होती हैं। सब ठीक चल रहा था फिर भी उसकी माँ को लगता था कि तीर्थ स्थानों के दर्शन से उनकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी। जबकि देखा जाए तो उनके जीवन में ऐसी कोई गंभीर परेशानी थी ही नहीं। अतः इस बार पहाड़ पर जाने की योजना बन गई। साथ ही उसके मौसा की कभी भी रानीखेत से बदली हो सकती थी। अतः वहाँ जाना तय हो गया। हरी का परिवार अपनी उम्र के हिसाब से रानीखेत जाने की योजनाएँ बनाने लगा। हरी भी बेहद प्रसन्न था। उसने किताबों और टेलीविजन में पहाड़ के मनोरम दृश्य देखे थे। उसके मन में पहाड़ को लेकर एक छवि बनी थी जिसमें बड़े-बड़े पेड़ों से ढकी खड़ी घाटियाँ जिनकी चोटियाँ साफ आसमान पर सीढ़ियों की तरह टेक लगाए थीं। उसकी बहन पड़ोस के बच्चों को रानीखेत जाने की योजना बताते न थकती थी। वह भी अपने विचारों में पहाड़ पर पहुँच जाया करता था। बैठे-बैठे सोच में डूब जाता और खुद को एक हरे-भरे पहाड़ पर पाता। अपनी कल्पना में वह जब भी पहाड़ पर होता बिना किसी कारण उसे वहाँ बरसात का मौसम मिलता। वह देखता कि घने बादल जैसे ही पहाड़ को छूते तो वहाँ के पेड़ों की पत्तियों का रंग हरे से गाढ़ा हरा हो जाता। जबकि पगडंडियों के किनारे उगी घास घनी और सुग्गए रंग की होती। हवा में वनस्पतियों की कसैली गंध एवं नमी उसके नथुनों से न केवल टकराती बल्कि पहाड़ से गिरता बारिश का पानी उसके पैरों और पतलून को भिगोता हुआ आगे बढ़ जाता। ठंड हौले-हौले उसके बदन से ठीक वैसे ही लिपटती जैसे शाम से समय कच्ची बखरी के आँगन से उठता चूल्हे का धुआँ आसमान से धीरे-धीरे लिपटते हुए उसी में विलीन हो जाता है। कल्पना से निकलते ही वह स्वयं को जेठ की दोपहर में शहर के कमरे में पाता जो भट्टी की तरह तप रहा होता।

जैसे-जैसे रानीखेत जाने का समय करीब आता जा रहा था हरी का पूरा ध्यान पहाड़ पर ही बना था। परिवार के लोग अपनी-अपनी पसंद के धागे से एक ही रेशमी कपड़े पर तरह-तरह की नक्काशी उकेर रहे थे। उसकी माँ रोटी बेलते-बेलते अनायास ही मुस्कराने लगती। वह मन ही मन सूजी, बेसन, मेवे, गोंद आदि की सूची बनाती तो उसके पिता कार्यालय में पहाड़ की चर्चा छेड़ देते और गरम कपड़ों आदि की सूची बनाने के साथ यात्रा के दौरान संभावित खर्चे का अनुमान लगाते। उसकी बहन दिन में दसियों बार माँ से पूछती कि रानीखेत जाने में कितने दिन और बाकी हैं। उसका परिवार एक नए आसमान में गोते लगा रहा था। उसकी परीक्षा समाप्त हो चुकी थीं। उसके बहुत मित्र भी न थे। जो थे वे छुट्टियों में जा चुके थे। वह अपने कमरे में अकेला बैठा खिड़की से आसमान को ताकता रहता। आसमान में एक चील बहुत देर मँडरा रही थी। हरी उसी को निहार रहा था। चील को निहारते हुए वह कब स्वयं चील बन गया उसे पता ही नहीं चला। जेठ की लू भरी दोपहर में वह आसमान में मँडरा रहा था। गरम लू का एक थपेड़ा उससे टकराया और उसकी आँच से उसके पंख पिघल कर चूने लगे। आँच से बचने के लिए वह उड़ते हुए शहर के आसमान से बाहर जाने लगा। तभी धूल भरे एक बवंडर ने उसे जकड़ लिया। उसकी आँखों में धूल और शीशे के कण भर गए जिससे बहुत तेज जलन होने लगी। उससे बचने के लिए वह तेजी से अपने अधजले पंख फड़फड़ाते हुए शहर से सटे गाँव और उसके खेत के आसमान पर उड़ने लगा। गाँव और उसके खेत से शीतल हवा ऊपर आ रही थी जिससे उसके नए पंख उग आए। तभी एक आँधी आई जो उसे वापस शहर की और ले जाने लगी। वह पूरी शक्ति से गाँव और उसके खेतों, पेड़ों के आसमान में बने रहने की कोशिश कर रहा था। किंतु आँधी उससे अधिक शक्तिशाली थी और उसे धकेलते हुए शहर ले जाने लगी। जिससे उसके पंख झड़कर नीचे गिरने लगे और जमीन पर पहुँचने से पहले ही पिघल गए। वह पंखों के जलने की बू को महसूस कर रहा था। वह असहाय आँधी में बहता हुआ शहर के आसमान में पहुँच गया। अंत में आँधी ने उसे पटककर उसकी खिड़की के अंदर धकेल दिया।

रानीखेत की कल्पना ने महुआ की स्मृति को दबा दिया था। लेकिन यह ज्यादा दिन न चला। सुबह वह सो कर उठा तो उसे बैठके में नई लेकिन जानी पहचानी आवाज सुनाई दी। परदे की आड़ से उसने झाँका तो उसे मामा नजर आए। वह अंदर गया और मामा के पैर छुए। मामा ने टोकते हुए कि भांजे से पैर नहीं छुआए जाते हैं हरी के सर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए अपने बगल में खाट पर बैठा लिया। बातचीत का विषय चल रहा था कि गाँव में सड़क बन गई है। वह भी उनके ट्यूबवेल तक। अब गाड़ी मोटर इत्यादि उनके दुआरे तक आ जाती है। मामा अपने किसी मित्र की शादी में शरीक होने आए थे। माँ-पिता की मामा के साथ शिष्टाचार भरी बातों का दौर समाप्त होते ही आगामी रानीखेत की यात्रा पर चर्चा आरंभ हो गई। मामा जोकि मसूरी घूम चुके थे, पूरे आत्मविश्वास से पहाड़ के अपने तजुर्बे के आधार पर रानीखेत की व्याख्या ऐसे करने लगे जैसे वे वहीं के निवासी हों। किंतु हरी पर रानीखेत का इतना असर न रहा। मामा को देखते ही वह ननिहाल में लगाए महुआ के पौधे की स्मृतियों और विचारों में पुनः खो गया। महुए के पौधे से जुड़ी उसकी पुरानी जिज्ञासा वापस उसके अंदर सक्रिय हो गई। उसका रानीखेत की चर्चा से एकाएक मोहभंग होने लगा। वह धीरे से वहाँ से उठा और वापस अपने बिस्तर पर आकर लेट गया। वह अंदाजा लगा रहा था कि अब तो महुआ का पौधा काफी बड़ा हो गया होगा। उसका तना भी भूरा हो गया होगा जिसकी चइली से मिट्टी की महक भी आती होगी। उसने अपने आप से कहा कि हो सकता है उससे महुआ भी चूता होगा। लेकिन उसे अपनी माँ की बात याद आई कि महुआ का पेड़ पच्चीस वर्ष में तैयार होता है। उसके मन में महुआ के पौधे की तमाम कल्पनाएँ घूम रहीं थी। अपने खयालों में खोया वह कब सो गया उसे भी पता न चला। जब उसकी नींद खुली तब तक उसके मामा जा चुके थे।

अगले दिन घर में एक अजीब सी मायूसी थी। सभी दुखी थे। दरअसल ननिहाल से सूचना आई थी कि उसके नाना के भाई की मृत्यु हो गई है। उन्हें वह बड़के नाना शब्द से पुकारता था। वे वृद्धावस्था के कारण जर्जर हो चुके थे। उनके पत्नी-बच्चे नहीं थे तथा वे हरी के नाना के परिवार के साथ ही रहते थे। चूँकि पिताजी को दफ्तर से छुट्टी लेनी थी और इत्तफाक से उसके मामा भी शहर में ही थे। अतः पिता को छोड़कर बाकी लोग मामा के साथ गाँव के लिए बस पकड़कर निकल गए। पिताजी भी छुट्टी मिलते ही सीधे ननिहाल आ जाएँगे। सबसे ज्यादा दुखी हरी की बहन थी। उसका छोटा सा मन इसलिए दुखी था कि अब वह रानीखेत नहीं जा पाएगी। हरी दुख और उत्सुकता के मिलेजुले चरण में था। वह बस की खिड़की से बाहर देख रहा था। उसे दो चीजें ही दिख रहीं थी। एक तो उसके बड़के नाना का चेहरा और सड़क के किनारे लगे पेड़। बड़के नाना कुछ चिड़चिड़े स्वभाव के थे। उसने सुना था कि उनकी शादी हुई थी। गुस्सैल स्वभाव के कारण वे अपनी पत्नी पर अक्सर हाथ उठाया करते थे। एक दिन दोनों में किसी बात पर कहासुनी हो गई और उन्होंने उसे खूब पीटा था। रात में ही वह गायब हो गई थी। अगले दिन उसकी लाश कुएँ में तैरती हुई मिली थी। उस समय वह गर्भवती थी। उसके बाद से बड़के नाना का व्यवहार बदल गया था। वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे। अधिकतर समय वे गायों के साथ बिताते थे। सुबह होते ही गायों को दुहने के बाद वे उन्हें चराने निकल जाते थे। शाम को जब अँधेरा हो रहा होता था तभी वे बाल्टी में दूध लेकर घर आते थे। लगभग सात बजे के आसपास ही खाना खाकर वे वापस गोरुआरे चले जाते थे। खाने में भी वे सिर्फ दूध रोटी ही खाते थे। कई बार उनका धरऊआ कराने की कोशिश की गई लेकिन वे कभी तैयार नहीं हुए। गर्भवती पत्नी के वियोग और उसकी मृत्यु के अपराधबोध के तले उन्होंने स्वयं को आजीवन कारावास दे दिया था। ननिहाल के बच्चे उन्हें पगला बाबा कह कर खिझाते थे। वे भी बच्चों को पास नहीं फटकने देते थे। गालियाँ उनके मुँह से ऐसे झरती थी जैसे सावन में बरखा की बूँदें। उन्हें देखते ही बच्चे या तो वहाँ से चंपत हो जाते थे या उन्हें उकसाने के लिए उन्हें छेड़ते थे। हरी ने जब पहली बार उन्हें बड़का नाना कह कर उनका पैर छुआ था तो उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। गंधैले गमछे से अपने आंसुओं को पोछते हुए हरी को पुचकारते हुए वे बस इतना ही बोल पाए थे कि फलनिया उस दिन बउरा कर कुएँ में न कूदी होती तो आज मेरे भी तुम्हारे जितने बड़े नाती-पोते होते।

तभी बस एक बाग के बगल से होते हुए गुजरी। बाग में बच्चे बड़ी सी लग्गी से आम से लदी हुई डाली को हिला रहे थे। उसका ध्यान बड़के नाना से हटकर वापस खिड़की के बाहर के दृश्यों में खो गया। बस उसके ननिहाल के पास के कस्बे में रुकी। वे सभी वहाँ उतर गए। कस्बा हरी का जाना पहचाना था। लेकिन उसे वहाँ कुछ बदलाव नजर आ रहा था। पहले जहाँ छप्पर की दुकानें हुआ करती थीं जिनमें खाझा, इमिरती और बताशे खुली टोकरियों में रखे होते थे और उन्हें मधुमक्खियाँ और बड़े-बड़े नारंगी-भूरे बर्रईए घेरे रहते थे। अब मिठाइयाँ शीशे के केस में सुरक्षित रहती थीं तथा छप्पर का स्थान टीन के शेड ने ले लिया था। मिठाइओं में ज्यादातर पेड़े, बर्फी और गुलाबजामुन ही नजर आ रहे थे। दुकानों में अब छोले और समोसे भी बिकने लगे थे। रंग बिरंगी साड़ी पहनी एक साँवली और पतली महिला अपने छोटे बच्चे को थर्माकोल से बने दोने में से लकड़ी के चम्मच से छोला खिला रही थी। बच्चे के बाल बिखरे हुए थे और उसका काजल सर से चू रहे तेल में घुल कर गालों पर फैल गया था। बगल में ही एक आदमी जो सफेद शर्ट पहने हुआ था और गले पर ललछऊँ गमछा लपेटे था शायद वह उसका पति था वह बड़ा सा मुँह बाए पान का बीड़ा डाल रहा था। कस्बे में पहले के मुकाबले भीड़ ज्यादा हो गई थी। सड़क पर चलने वाली गाड़ियों के धुएँ से वहाँ की हर चीज कुछ धूसर सी दिख रही थी। सड़क जोकि मिट्टी में घुल गई थी उसका रंग किसी पुरानी नाली के कीचड़ सा था। बाजार से पेड़ लगभग समाप्त हो चुके थे। जो थे उनका हरा रंग भी अतीत हो चुका था। लग रहा था कि पेड़ हैं ही नहीं उनकी जगह आसमान की ओर तकती परछाइयाँ खड़ी हैं। काली और स्थिर। उसके मामा ने कुछ मोलभाव करके एक जीप घर तक जाने के लिए तय कर ली। जीप ननिहाल की ओर जाने लगी। वैसे तो वह कई बार माँ के साथ कस्बे से रिक्शे पर बैठ कर ननिहाल आया था। लेकिन यह ननिहाल जाने वाला यह रास्ता नया था। इस रास्ते से वह पहली बार जा रहा था। कुछ ही देर में जीप कस्बे को छोड़ते हुए खेतों के किनारे तेजी से बढ़ने लगी। सड़क गाँव से गुजर रही थी। उसके मामा बताने लगे कि यही नई सड़क बनी है। सड़क पतली थी लेकिन उसमे बहुत घुमाव थे। किसी नागिन की तरह। उससे अभी भी डाबर की गंध आ रही थी। सड़क के एक घुमाव पर कुछ गायें बँधी थीं। जैसे ही जीप उनके बगल से गुजरी वे भड़क कर कूदने लगीं। एक बछड़े ने अपना खूँटा उखाड़ लिया और पूँछ उठाकर सड़क पर दौड़ता हुआ खेत में धूल उड़ाता गायब हो गया। मामा सड़क बन जाने के फायदे गिना रहे थे और माँ सड़क द्वारा मायके पहुँचने की सहूलियत से आश्वस्त दिख रहीं थीं। कुछ देर बाद ही जीप एक बड़े कोल्हू के बगल से गुजरी। वहाँ सड़क पर घुमाव था जिसके कारण जीप की रफ्तार काम हो गई थी। कोल्हू पर साँप, बिच्छू, मोर, चाँद आदि की नक्काशी थी। हरी कोल्हू को पहचान गया। वह चौकस हो गया कोल्हू उसके नाना के ट्यूबवेल के करीब ही था। छुट्टियों में वह बंसू और अन्य लड़कों के साथ उसी पर बैठ कर ऊख चुहा करता था। जोकि उसके नाना के ट्यूबवेल से सौ-डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर ही था। हरी को अंदाजा हो गया था कि सड़क उसके नाना के ट्यूबवेल से निकलने वाले बरहा से सट कर बनी है जहाँ उसने महुआ का पौधा लगाया था। वह चौकन्ना हो गया कि उसका महुआ का पेड़ कभी भी नजर आने वाला है। उसे अंदाजा था कि पेड़ इतना बड़ा हो गया होगा कि दूर से नजर आ जाएगा। उसने सोचा कि हो सकता है कुछ मुसाफिर उसके पेड़ के नीचे धूप से बचने के लिए सोहता भी कर रहे हों। कुछ ही देर में उसे ट्यूबवेल की टंकी और उसके बगल में लगा कटहल का पुराना पेड़ नजर आने लगा। वह जीप में बाईं ओर बैठा था और बरहा दाहिनी ओर था। उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था कि जीप में गलत ओर क्यों बैठा है। वह उचक कर महुआ के पौधे को खोज रहा था। उसने सोचा काश वह जीप को रुकने के लिए कह दे लेकिन संकोचवश हिम्मत नहीं हुई। जीप ठीक उस स्थान से गुजरी जहाँ मेड़ पर उसने महुआ का पौधा लगाया था। वहाँ पौधा नहीं था। बरहा तो था लेकिन उसके बगल में जहाँ उसने पौधा लगाया था वहाँ सड़क थी। सड़क बनाने के लिए मेड़ पर लगे अन्य पेड़ों को भी काट दिया गया था। सड़क ने पौधे को लील लिया था। जीप दुआरे आकर रुक गई। हरी को छोड़ सब उससे उतर गए। उसकी आँखों में उदासी थी। उसे आघात लगा था। उसके हरे इंद्रधनुष पर डाबर की कालिमा चढ़ गई थी। उसे औरतों की दहाड़-दहाड़ कर रोने की हलकी सी आवाज सुनाई दे रही थी। उसके पास अर्थ शेष रह गया था जिसके लिए कोई ध्वनि नहीं थी।


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हिंदी समय में वीरेंद्र प्रताप यादव की रचनाएँ