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विमर्श

क्राइसिस का क्लीशे तैयार करती ज्ञान-मीमांसा
सुबोध शुक्ल


"जानेमन जानती हो मेरे पिता की एक फिलॉसफी थी - अमन। मतलब कि आपकी ताकत का दूसरे की ताकत से ज्यादा हो जाना..." (फिल्म 'आयरन मैन' का एक संवाद अंश)

"यह किस किस्म का दौर है जहाँ हमें किसी का शत्रु होने के लिए सिर्फ उसकी पीठ के सामने होने का इंतजार करना है..." (टॉमस पिंचन के उपन्यास 'वी.' (V.) से)

"राजनीति को सौंदर्यबोधी बनाने के सारे प्रयास एक ही चीज पर जाकर खत्म होते हैं - युद्ध पर..." (वॉल्टर बेंजामिन)

इतिहास फैसले नहीं देता। भूमिकाएँ भी नहीं बाँधता। वह समय और सभ्यता की अनिवार्य टकराहटों का एक घनीभूत पर्यावरण भर है। मनुष्य इसमें जितना समय की एक प्रौद्योगिकी की तरह दर्ज है, उतना ही सभ्यताओं के घोषणा पत्र की तरह भी। इतिहास की भी अपनी आयु होती है। कुछ निश्चित अंतराल और पड़ाव होते हैं। वह शर्तों, विश्वासों और निषेध के गहरे और तीखे रूपांतरणों से गुजरता है। बहुत हद तक वह भी मनुष्य की तरह जैविक, प्रत्याघाती, अप्रत्याशित और वैकल्पिक होता है। ऐसे में परिवर्तन की प्रक्रिया और मूल्यों की भागीदारी के सवाल, सैद्धांतिक स्तर पर जितने गोलबंद होते हैं अभ्यास और प्रभावों के तात्कालिक आग्रहों के आधार भी खेमेबंद होने लगते हैं। स्पष्ट रूप से इससे जीवन-दृष्टियों के समुदायगत संकल्पों और अवधारणाओं की तदर्थवादी परियोजनाओं के बीच, एक रणनीतिक ही सही पर पक्ष को तय करती हुई स्प्लिट तैयार होती है जो विचार की स्थापित व्यवस्थाओं में विचार के आगंतुक अनुशासनों के साथ जिरह करती है। यह स्प्लिट सामजिक-राजनीतिक चेतना को सार्वभौमिक हो जाने के तंत्रगत उत्पीड़न से बचाने की कोशिश है जिससे कि युग-सत्य को, अनुभवों के रैडिकल किस्म के बौद्धिक खिलवाड़ से दूर किया जा सके, संस्कृति के अतिरेकी विश्लेषणों को नजरंदाज किया जा सके और फिर रूपांतरित मूल्य-व्यवस्थाओं के इन असंबद्ध अंतरालों में समाज अपने को एक नई व्यवस्था के अंतर्गत अनुकूलित करने लगता है - अपनी विश्व-दृष्टि, उत्पादन-प्रणाली, राजनीतिक-आर्थिक खाँचों, कलाओं एवं अपनी मुख्य संस्थाओं के आधार पर। और ऐसे समय पर पैदा हुई पीढ़ी अपने वंशजों के दौर और दुनिया से बिलकुल अपरिचित और अनजान होती है। हम एक ऐसे ही रूपांतरण के दौर से गुजर रहे हैं।

संस्कृति के परिप्रेक्ष्यगत स्थानांतरण, आमतौर पर चिंताओं और अनिश्चितताओं को पैदा करते हैं। उत्तर-आधुनिकता के फलस्वरूप, धर्म-विश्वासों, इतिहास, अस्तित्व, भौतिकता एवं वैज्ञानिकता से जुड़े हुए नए तथा बहुआयामी सवालों ने, विचारधाराओं के चिरपरिचित मिजाज और बोध के आधुनिक प्रतिरूपों को संदेहास्पद और मूक सा बना दिया है। अकादमीय दस्तावेजों में ऐसे कम ही शब्द होंगे जो उत्तर आधुनिकता जैसे शब्द की तरह समकालीन सांस्कृतिक संदर्भों में सर्वाधिक दुरुपयोग और दुहराव से भरे कामचलाऊपन के शिकार रहे हों। इसीलिये परिणामस्वरूप इसके मायने और वजहों को लेकर नकारात्मक और विधेयात्मक दोनों ही तरह के दृष्टिकोणों का बाहुल्य रहा है। जिसने इस शब्द की अर्थ-छवियों को संभावनाओं का मनचाहा मंच भी दिया तो साथ ही मनमाने फितूरी प्रयोगों का अखाड़ा भी बनाया। कहने का मंतव्य यह है कि उत्तर आधुनिकता जैसी स्थिति किसी एक निश्चित समय में स्वयं को लागू भी कर रही होती है और स्वयं को खारिज भी। इतिहास के आयामों में यह एक ऐसी गुँथी हुई अवस्था है जो सुनिश्चित रूप से अंतर्विरोधी भी है और और अपरिहार्य रूप से राजनैतिक भी।

उत्तर-आधुनिकता स्वयं को तमाम सांस्कृतिक प्रयासों में रचनाधर्मी अनुशासनों के साथ देखने का एक प्रयास भी है (भवन-निर्माण, साहित्य, सिनेमा, संगीत, कला इत्यादि)। आम भाषा में कहा जाय तो यह एक साथ स्वयं को सजगता, विरोध और अवमूल्यन के साथ देखने-समझने की मुद्रा है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि उत्तर-आधुनिकता अपनी स्थापना और अवधारणा को समय की निरंतरता और बदलाव में अपने को रेखांकित करता चलती है - स्वयं अपने ही गवाह और प्रमाण की तरह। इस तरह इसका उल्लेखनीय चरित्र ज्ञान के कूट, किताबी और निरंकुश स्थापनाओं के विरुद्ध एक प्रतिरोधक की भूमिका की तरह है - बनावटीपन, दोहरेपन पर सवालिया निशान लगाते और लगभग धकियाते हुए। अनेक स्तरों पर यह विचारों की जमीन को समतल बनाने की योजना भी है क्योंकि उत्तर-आधुनिकता अपने चुनौती के रूप में खड़े होने वाले किसी भी पूर्वाग्रह और परंपरागत वर्चस्व को हाशिए पर धकेलती और उसकी मूल्य-व्यवस्था को नकारती आगे बढ़ती है। हालाँकि, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उत्तर-आधुनिकता का बुनियादी सरोकार हमारी जीवन-शैली के दबाव-समूहों की पड़ताल और शिनाख्त है, साथ ही इस बात की ओर इशारा भी कि बिना बूझे अनुभूत किए गए वे तत्व जिन्हें हम 'स्वाभाविक रूप से संचित' ( पूँजीवाद, पितृसत्तात्मकता और उदारवादी मानवतावाद आदि) मानते हैं दरअसल 'सांस्कृतिक रूप से उत्पादित तत्व' हैं। हमारे ही बनाए गए पर हमें दिए गए नहीं। यहाँ तक कि प्रकृति भी, उत्तर-आधुनिकों के अनुसार, पेड़ पर नहीं फलती।

इतने शुरुआती मौके पर ऐसी किसी भी तरह की मोटी और सरलीकृत परिभाषा से खास हासिल होने वाला नहीं है। असल में उत्तर-आधुनिकता की जड़ें उस विषय से गहरी जुडी हैं जहाँ से इसने अपने अपने लोकप्रिय पद-नाम को पाया - भवन-निर्माण। और यहाँ कुछ मूलभूत विरोधाभास देखने को मिलते हैं ये वे अंतर्विरोध हैं जो इतिहासधर्मी प्रतीकों और अंतर्बिम्बित जीवन धारणाओं को समान महत्व देते हुए एक दूसरे की सन्निधि में रहते हैं। यह निकटता दिशाओं और इरादों को सूचित करती है। अंतर्मुखी गति, 'कला' और बहिर्मुखी संकेत, 'यथार्थ' को पैदा करते हैं। ये स्पष्ट विलोम उतर-आधुनिकता के दुनियावी और उलझाव से भरे पाठ का एक छोटा किंतु जरूरी हिस्सा है - राजनीतिक आयामों में तो यह एक शक्तिशाली वास्तविक समझौते की तरह उभरता है। इसलिये राजनीति ऐसे समझौतों की सोहबत में अधिक नजदीक और जानी पहचानी लगती है।

एक दशक या उससे कुछ पहले एक जर्मन लेखक ने कहीं कहा था : मैं राजनीति के सवालों को उत्तर-आधुनिकता से अलग करके नहीं देख सकता (मुलर १९७९:५८)। इन मध्यवर्ती सालों में राजनीति और उत्तर-आधुनिकता के आपसी सरोकार अपरिहार्य रूप से हमकदम हुए हैं। इन समयों में हमें यह स्पष्ट रूप से देखने को मिला है कि उत्तर-आधुनिकता से जुड़ी हुई बहसों को विवेचित और विकसित करने में राजनीतिक चिंतनों का भरपूर योगदान रहा है।

अगर यह धारणा ज्यों कि त्यों मान ली जाय कि उत्तर-आधुनिकता का दार्शनिक आयाम प्रत्येक किस्म के मानकीकृत विचारों का उनके मौलिक रूप-गुण में विरोध करता है तो हमें सामाजिक चिंतन की शिनाख्त करने का एक नितांत ही नया और अपरंपरागत तरीका मिलता है जो उस विचारधारा की केंद्रीय ग्रंथि को खोलने का रास्ता सुझाता है। देरिदा और ल्योतार जैसे विचारकों ने, जोकि अपनी मूल और प्राथमिक चेतना में ज्ञान और विवेक की आलोचकीय क्षमता को शाश्वत (perpetual) सुधारवाद की धारणा के रूप में देखते रहे हैं, नैतिकता और न्याय के प्रश्नों को जाँचने-परखने के ऐसे प्रतिमानीकृत प्रयास किए हैं कि उनके लेखन की दिशा समाज-संस्कृति के अध्ययन और अन्वीक्षण को वेग देती दिखती है। आचारशास्त्री सिद्धांतों के क्षेत्र में भी उत्तर आधुनिकता के लगभग सभी प्रतिनिधियों ने जिसे परंपराधर्मी निर्जीव आधुनिकताबोध के वाह्यकारी सर्वजन हितवाद के रूप में समझाने का प्रयास किया उसी नैतिकता बोध को उत्तर-आधुनिक चिंतन के आगामी विकास हेतु एक सशक्त माध्यम भी माना जाने लगा है।

उत्तर-आधुनिकता एक पेचीदा बोध है। पेचीदा इस कारण नहीं कि वह समूची सांस्कृतिक प्रणाली को पूँजी की निरंकुश राज्य-व्यवस्था मानता है जिसमें आदर्श, स्वप्न और मीमांसाएँ सत्ता के निजी इंटरप्राइज की तरह काम करती हैं और मनुष्य को एक औद्योगिक यूनिट के बतौर इस्तेमाल करने लगती है और यह लाभ और कामनाओं की पारस्परिक सापेक्षता में, पूँजी के पाठ को प्रगति के औपनिवेशिक जुमलों में बदलने का काम भी करती है। बल्कि पेचीदा इसलिए कि वह समय और संस्कृति को उनकी पदार्थ-चेतना में खँगालते हुए जिस जिद्दी संदिग्धता और फलसफेदार डर का रैंडम क्रिटीक पेश करती है वह विचारधारा का एक आवारागर्द कोलाज तैयार करने लगता है जिसमें एक ही वक्त पर बातें आभासी और वास्तविक दोनों लगने लगती हैं और समय की पड़ताल खजाना-खोज में बदलने जैसी लगने लगती है।

उत्तर-आधुनिकता एक विस्तीर्ण प्रक्रिया है जो विभिन्न माध्यमों से व्यवस्था और सरंचना की विभिन्न पहचानों को सामाजिक संबंधों तथा लोक-चेतना के ऊपर पड़ने वाले प्रभावों के रूप में देखने की कोशिश करती है। परिणामस्वरूप इसलिए इसे किसी आसान और अकादमिक परिभाषा में बाँधना चुनौती भरा काम है। यह प्रक्रिया परंपरा से चले आ रहे अनुशासनों और अवधारणाओं के खिलाफ़ समय की स्वायत्तता का ऐलान ऐसी उभयपक्षीय कार्रवाई के रूप में करती है जो एक तरफ जहाँ संस्कृतियों की योजनाबद्ध छवियों को वर्तमान की वस्तुगत सत्ता में अनूदित कर रही होती है जिससे कि रोजमर्रापन एक सांगठनिक कलाकृति की भूमिका में आ जाता है और दूसरी ओर सामाजिक-विश्लेषण के चेतनागत संघर्षों में शक्ति और ज्ञान की विकास-प्रक्रिया के जटिल अंतर्संबंधों को सार्वजनिक मनोजगत में लोकेट करने लगती है जिससे सत्य का एब्सोल्यूट, उपयोगितावाद के एकआयामी व्यवसायीकरण में बदलने लगता है।

इसके अलावा, उत्तर-आधुनिकता विभिन्न मनोवैज्ञानिक-द्वंद्व से भी गुँथी रहती है जो लगातार जीवन के संस्थानीकरण और विचार के मध्यस्थ होने वाली स्थिति का जितना विरोध करती है उतना ही सार्वजनिक संवादों के मध्य उनकी भूमिका को एक पद्धतिगत श्रम की तरह स्वीकार भी करती है।

बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध, सर्वसमावेशी केंद्रपरकताओं और मुनाफाखोर उप-संस्कृतियों की अस्पष्ट और धूमिल दार्शनिकता का समय है। यही दौर अकादमीय अंतरानुशासनों के वर्चस्ववादी राजनीतिक चिह्न के तौर पर बदलने का भी है। कला और शिल्प, सत्ता के आत्म और पोजीशनिंग को रेखांकित करने वाले तत्व बनने लगे। व्यापारिक स्पर्द्धाओं के नीति-शास्त्र के तले मनुष्यता किसी थ्योरी के रूप में जानी जाने लगी और जीवन-मूल्य, पूँजी की मरीचिका को सिद्ध करने वाले एक स्वाभाविक घटक के तौर पर देखा जाने लगा। ऐसे वंचित और विभाजित चेतना के दौर में उत्तर-आधुनिकता एक सभ्यतामूलक ग्रंथि के बतौर उपस्थित होने वाला कार्यक्रम है। संपूर्णता के सार्वदेशिक तर्क और मुक्ति के आधुनिकतावादी नोस्टेलजिया की तीखी प्रतिक्रया के रूप में इसका उदय होता है। विशुद्धता और वैयक्तिक की सामंतवादी अमूर्तताएँ जो इतिहास-बोध को देखने-समझने का भावुक और संवेगपरक सिलसिला रचती रही थीं, उन्हें उत्तर-आधुनिकता कटघरे में खड़ा करती है।

इसे विश्वयुद्धोत्तर समय की एक वैचारिक जीवन-शैली के रूप में भी सोचा-समझा जा सकता है। अस्सी के दशक तक इस स्थिति का सबसे प्रौढ़ और स्पष्ट मानचित्र सामने आ जाता है और इस समूची गतिविधि को वैश्विक संस्कृति के तौर पर सार्वजनिकता के सबसे जाने-माने विमर्श के रूप में माना जाने लगता है। यहाँ यह ध्यान दिए जाने वाली बात है की उत्तर-आधुनिकता का 'क्षण' सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और इतिहासगत शक्तियों के पारस्परिक कटाव का क्षण है - देश-काल की विषम और सारूप्य स्थितियों के साथ। यह कटाव संक्रमण और संधि दोनों स्तर पर बारी-बारी से रूपांतरित होता रहता है जिससे यथार्थ और उसके समाजशास्त्र की मंशाएँ मनुष्यता के विराट सर्वेक्षण के रूप में खुलना शुरू कर दें। पर यह रूपांतरण ज्यादातर मिसफायर होता रहता है। क्योंकि खुद उत्तर-आधुनिकता, यथार्थ को आधुनिकता के उस हिस्टीरिक प्रतिनिधित्व की देन मानती है जिसमें साम्राज्य के 'विजन' को सामूहिकता के तर्क के द्वारा आनुभविक बना दिया जाता है। यथार्थ हाइपोथीसिस से अधिक और कुछ नहीं। और उसका किसी भी रूप में हस्तांतरण नहीं हो सकता। यही उत्तर आधुनिकता के दर्शन की मूल टेक है कि जिसे वह समाधान कह रही होती है उसे ही समस्या बना कर सामने ले आती है। तो अवधारणाएँ एक विराट बौद्धिक विलास का बायस बनकर सूचनाओं की नौकरशाही और विचारधाराओं की जिल्द मात्र बनकर रह जाती है जिससे कि यह रूपांतरण न सिर्फ मिसफायर होता है बल्कि बैकफायर भी होता है।

पर साक्षी होकर (विटनेस) क्षरण (डिजेनेरेशन) और संस्कृतियों के विलयनीकरण की प्रक्रिया को टटोलने में यह दर्शन मर्मज्ञ है। इसीलिये बौद्धिक सीमांकनों और सांस्कृतिक भाषा-व्यापार दोनों ही अर्थों में उत्तर आधुनिकता संवाद और प्रलाप की एक ही बिंदु पर व्याख्या तैयार करती है। यह अनुभवों की समूची प्रक्रिया को परंपरागत नियति और समकालिक संयोगों के बीच छवियों की नियामक सत्ता के रूप में प्रस्तुत करने लगती है जिससे कि ज्ञान और आदर्श के आधुनिकतावादी 'शाश्वत' यूटोपिया, उत्तर-आधुनिक हलकों के 'तात्कालिक' एक्सीडेंट में बदलने लगते हैं। आधुनिकता को लेकर यह दर्शन जितना असमंजस में है उतना ही हताश भी है। आधुनिकता के साथ उसकी कोई होड़ नहीं है। वह उसका त्रासद यहाँ तक कि मैनीपुलेटिव क्रिटीक तैयार करता है पर फिर भी आधुनिकता का कोई स्थानापन्न उसके पास नहीं है। कोई विकल्प तैयार नहीं है। उपचार के सारे टूल्स लगभग आधुनिकता के ही हैं।

शाश्वत और तात्कालिकता के द्वंद्व को उत्तर-आधुनिक, उपभोक्तावादी खिलवाड़ और सत्य के विश्रृंखलित वर्गों की क्रमिक राजनीति के रूप में देखता है। वह शाश्वत को वर्तमान की समाप्ति मानता है और तात्कालिकता को भविष्य का अंत। वह इस अंत पर दाँव लगाने को तैयार है। वर्तमान के संदर्भ में भी उत्तर आधुनिकता की तात्कालिकता, सापेक्षिक मीमांसाओं के परिप्रेक्ष्य में न तो किसी तरह का निदान पेश करती है और न ही कोई सवाल ही खड़ा करती है। वह सिर्फ एक शून्य है। क्योंकि तात्कालिकता इतिहास-विरोधी तो है ही समय को भी प्रतिलिपियों के सहारे देखने की कोशिश है। तात्कालिकता क्रियाओं का द्वितीयक श्रोत है। समय का ऑफ रिकॉर्ड। ध्यान रखना चाहिए कि उपभोग के तर्क को 'शाश्वत', वैज्ञानिकता का जामा पहनाकर सामने लाता है और तात्कालिकता, 'फैंटसी' का। तो यह फर्क जितना कामना और लिप्सा के बीच का है उतना ही तटस्थता और विभ्रम के बीच का भी है।

यह एक तरह से सार्वजनिक जीवन-तंत्र का निष्क्रिय प्रतिमानीकरण है जो वर्तमान को एक मध्यस्थ दृश्य में बदलकर उसकी आवाज से छेड़-छाड़ करता है। तो शाश्वत जिस प्रतीक को वास्तविकताओं के एब्सर्ड एक्सचेंज में बदलता रहता है तात्कालिकता उस प्रतीक को प्रतिक्रियाओं के असंख्य मनोजगत में तोड़ने लगती है। किसी भी आकस्मिक हिस्से को फितूराना तरह से चुन कर एक दृश्य की स्वाभाविक नियति बना कर पेश कर देती है। भले ही उसकी द्वंद्वात्मकता कितनी ही संदिग्ध हो और वह सामाजिक आयामों से कटा एक वक्तव्य भर रह जाय।

इन्हीं कारणों से उत्तर-आधुनिक, इकाइयों के प्रभुत्व की बात करते हैं। चूँकि संस्कृतियों के सांगठनिक वस्तु-जगत की जिस नियंत्रणवादी सत्ता को आधुनिकता ने सभ्यताओं के आदर्श के रूप में देखा वह कालांतर में निरंकुश एकरूपता का चेहरा बनता चला गया और समाज के औद्योगिक दर्शन के वैज्ञानिकतावादी मेटाफर की आड़ में चेतना और विचार की यथास्थितिवाद की वकालत करने लगा यहाँ तक कि उत्तर-आधुनिकों ने आधुनिकता के सांस्थानिक वैज्ञानिकवाद को दमन का ही एक नया उपकरण माना और तुरंत एक दूसरी अतिरेकी विलोम स्थिति को समाधान के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया जो खुद सांगठनिक कृत्रिमता के बरक्स अवधारणाओं और शास्त्रीयता के विकेन्द्रित औसतपन पर टिकी थी। यह औसतपन ही उत्तर-आधुनिकों की उस नैसर्गिक अस्मिता की आख्या है जिसे वे 'इकाई' कहते हैं।

इकाई भले ही विशेषाधिकारवादी पूर्वाग्रहों के पाखंडवाद से मुक्त हो सकती है पर वर्ग, संदर्भ और नैरेटिव का अवचेतन तो वहाँ भी सामान्य ज्ञान-मीमांसा के साथ ही काम करता है जिससे कि प्राथमिकताएँ चुनी जाती हैं। प्राथमिकताएँ श्रेणी-क्रम को निश्चित करती हैं और श्रेणी-क्रम उत्पीड़न की नई संरचनाओं को पैदा करने लगता है। यह कहना अन्याय नहीं होगा कि उत्तर-आधुनिकता बुनियादी रूप से, संदर्भ और कथ्य के इतिहास-बोध को लाँघकर अपने वक्त का हल बताने की कोशिश करती दिखती है पर वक्त का हश्र बताने में वह इसी इतिहास-बोध को अपनी जमीन बनाने की कोशिश करने में भी लग जाती है।

तो ऐसे हम देख सकते हैं कि उत्तर आधुनिकता, आधुनिक और समकालीन व्यवस्था-तकनीक के बीच अंतरालों और पूरकताओं के क्रम को खँगालती चलती है। यह कहीं न कहीं प्रतिमानों के आत्मसातीकरण और वर्चस्व के त्वरित सरलीकरण के समझौतापरस्त सरोकारों को रेखांकित करना भी है। यह सही है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के बीच के संदर्भ आमतौर पर द्विविभाजित सामजिक ज्ञान की श्रृंखला में देखे जाते हैं। इस तरह की मान्यता पर यकीन करना, सभ्यता के चरित्र पर ही सवाल खड़ा कर देना है जो कि यह बताने की कोशिश करती है कि प्रत्येक सत्ता निपट स्वतंत्र और अपनी ऐंद्रिकता में एकांतिक, स्थिर और अखंड है। जबकि विज्ञान और भाषा के अलग-अलग रूपाकारों में दोनों ही आकस्मिकताओं और सुधारात्मक अनुशासनों के द्वारा चिन्हित होते रहते हैं।

कुछ मीमांसकों ने उत्तर-आधुनिकता की बहुरूपताओं को वर्ग-बद्ध किया जो बदलती हुई स्थितियों के आधार पर उनके विभेदों, अवरोधों, समरूपताओं और भ्रमों की तर्क-प्रणाली पर आधारित है।

एक और वे हैं जो समय की रि-इंजीनियरिंग को उत्तर-आधुनिकता की तत्व-मीमांसा मानते हैं। इस तरह की टेक समाज के आभ्यंतरिक संवाद को वरीयताओं की संघर्षरत राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने की जिद रखती है और इससे समाज के सीमान्त-विमर्श मनुष्यता के केंद्रीय पाठ में बदलने लगते हैं। हालाँकि तयशुदा पक्षधरताओं के खतरे भी दूसरे तरह की तटस्थता ग्रंथि को पालने पोसने लगते हैं। और दूसरे वे हैं जो इस समूची दर्शन-प्रक्रिया को ही संदेह की नजर से देखते हैं जो आधुनिक तर्क के क्षरण की दिशा में ही प्रयासरत है। ऐसे में उत्तर-आधुनिकता को किसी आततायी कालखंड के बजाय वर्तमान और आधुनिकता के सातत्य में एक संघटक के तौर पर देखना अधिक सही होगा। क्योंकि जीवन की अंतःप्रकृति न तो स्वायत्त है और न ही संपूर्ण है। 'प्रत्येक' 'अन्य' के बीज तत्व और अवशिष्ट पर निर्भर होता है। 'अन्य' की निरंतरता और उसके अस्तित्व की मौजूदगी के क्रम में 'प्रत्येक', भले ही विपरीतताओं के ही माध्यम से ही सही, स्वयं को समूह और अवयव दोनों के ही रूप में व्यंजित करता है।

उत्तर-आधुनिक समाज का संक्रमण कुछ बुनियादी अभिलाषाओं और चुनौतियों से बंधा है जोकि युद्ध, शिक्षा और राजनीतिक प्रघटनाओं की केंद्रीय भूमिकाओं को ज्ञान के वैकल्पिक तौर-तरीकों के जरिये पारस्परिक उपभोग का अभ्यासी बनाता है। कार्य, संचार, मनोरंजन, दैनंदिन जीवन, सामाजिक संबंध, पहचान और यहाँ तक कि भौतिक उपस्थितियों और जीवन-रूपों तक इसका प्रसार और स्वीकृति है। (बेस्ट और केलनर, 2001)

इन आधारों पर वे कारण और अवस्थाएँ रेखांकित की जा सकती हैं जिनसे आधुनिकता के उत्तरजीवी बोध के सांस्कृतिक तर्क और उसके वैचारिक व्यूह की पड़ताल संभव हो जाय-

• साम्राज्यवादी राष्ट्र-राज्यों द्वारा नियंत्रित और संचालित उपनिवेशवादी ज्ञान-व्यवस्था और शक्ति-ढाँचे के क्षरण के साथ ही साथ वर्ग, संरचनाओं, अनुभवों, द्वंद्व और मनोदशाओं का अनुप्रस्थ फैलाव शुरू होता है। यह राजनीतिक भूगोल के साथ-साथ स्मृति तथा ऐंद्रिकता के सांकेतिक और नाटकीय भूगोल के क्षेत्रफल का भी बढ़ाव बनता चला जाता है। परिणामस्वरूप, साम्राज्य एक वैश्विक शिल्प में आकार लेने लगता है। केंद्रीयताएँ आक्रामक रूप से विभाजित कर दी जाती हैं और एक स्वतंत्र सैद्धांतिकी में कार्य करने लगती हैं। निगम ही व्यक्ति में तब्दील हो जाता है। नियंत्रण तरलतम होता जाता है एवं अधीनता बहुआयामी बनती जाती है।

• पूँजी के औद्योगिक अर्थशास्त्र के पतन के साथ-साथ, अंतर्राष्ट्रीय सूचना बाजार के धन-तंत्र का उदय होता है जो अवधारणाओं को प्रसारण और ज्ञान के कलारूपों को बिकाऊ माल की तरह देखना शुरू करता है। यह विमर्श के इतिहासगत रैशनेल को परस्पर विरोधी सांस्कृतिक आकांक्षाओं की रेडीमेड प्रतियोगिताधार्मिता में रिड्यूस करने की शुरुआत है। यह पूरा नेटवर्क बाजार के कठोर एकीकरण और विस्तार से बनता है जिसे कि व्यक्तिवाची मान्यताओं के दोहन और प्रतीकों के वस्तुकरण के जरिये हासिल किया जाना है। 

• वैश्विक मीडिया व्यवस्था का जन्म जो क्रमिक रूप से देश-काल की ऑर्गेनिक अन्विति को ध्वस्त करती है और ऐच्छिक वाचकों तथा दृश्यगत सीमांकनों के स्वेच्छाचार में, अकादमीयता की वर्ग-स्थिति को अबूझ करती चली जाती है। इसके कारण आधुनिक सांस्कृतिक पहचानों की काल-सापेक्ष संगति ढहने लगती है और संस्कृति के दो विपरीत पाठ एकमेक होने लगते हैं (सार्वजनिक और निजी, उच्च और लोकप्रिय, शास्त्र और सूचना, मिथक और लोक आदि) असंदर्भित और अप्रामाणिक डेटा से जुड़े ज्ञान-मीमांसाओं के छलावे भी इसी संचार कैओस की देन हैं जिसमें जन की भागीदारी भोक्ता से अधिक विटनेस के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यह संवेग किसी तरह की विचार-प्रक्रिया या भौतिक प्रत्याशाओं का प्रसार नहीं करता बल्कि बिना किसी आधिकारिक संभावनाओं के यथार्थ की अफवाह तैयार करता है। ऐसा पर्यावरण; पृथक्करण, विरूपण और आभासी कौशल से मिलकर बनता है जहाँ स्वत्व और समष्टि का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है

• नवीन सृजनधर्मी कलारूपों की व्याप्ति जो आधुनिकता की मिश्रित, रैखिक और चेतना के आभ्यंतरीकरण प्रक्रिया को खारिज करती है। ये परंपरा अथवा प्राक सांस्कृतिक बिंबों को अधूरे-अस्पष्ट छायाचरित्रों (पेस्टीच) में बदलने की कवायद है और साथ ही विभिन्न रचनाधर्मी प्रतिलिपियों को मिलाकर समकालीनता का एक सांयोगिक कथानक तैयार करने की भी।

• विशुद्धतावादी नैरेटिव के प्रति बढ़ता हुआ असंतोष और उसका एक वर्गीकृत निष्कासन सामने आता है जो आधुनिक यूरोपीय सभ्यता के प्रभुत्वशाली ज्ञान-अनुशासनों का अनिवार्य तत्व रहा है (ईश्वर, विज्ञान और महा-वृत्तांत)। साथ ही सार्वत्रिक, प्रतिनिधि, निर्धारण, निरपेक्ष से अलग स्थानिक, तात्कालिक स्वप्न और जैविक अनुभवों की उपस्थिति का स्वीकार। यह अनुभव पराजित अवचेतन और नकार दिए गए सांस्कृतिक मानस की उपस्थिति से पैदा होते हैं एवं व्यक्तिवादी समाज-दर्शनों तथा वर्चस्ववादी सत्य को चुनौती देते हैं। यह किसी रणनीतिक लक्ष्य को हासिल करने वाली राजनीति से अधिक नैमित्तिक पारस्परिकताओं की अनौपचारिकता के रूप में सामने आते हैं। ऐसे में प्रतिरोध के लंबवत, उत्तेजित और सामान्यीकृत टकरावों से बचने के लिए सत्ता को अपनी पोजीशनिंग बदलनी पड़ती है।

• प्रतिमानों के सामरिक इस्तेमाल और शक्ति-संचयन के एकांतिक पक्ष से निर्मित पहचानों का भी ध्वंस इसमें शामिल है जिसमें व्यक्ति का विलयन जीव में हो जाता है।

धरातल ज्यादा सख्त हो जाएँ तो ऊसर हो जाते हैं और ज्यादा आर्द्रता भी उन्हें जीवन-हीन बना देती है। यही हाल दृष्टिकोणों और प्रवृत्तियों का भी है वे ज्यादा समकालीन हो जाएँ तो एकाधिकारवादी होने लगते हैं, अतीतधर्मी होने की कोशिश करें तो यथास्थितिवादी बनने के खतरे पैदा होने लगते हैं और भविष्यगामी होने पर समझौतावादी होने के जोखिम। दृष्टिकोणों के तनाव दर्शन के भी तनाव होते हैं। परिकल्पनाओं का भी अपना श्रेणी-क्रम होता है। विचार के भी कुछ सांस्कृतिक अदब होते हैं। विचार देश और काल के संक्रमण से तो गुजर ही सकता है साथ ही अमुक देश-काल की आख्याओं का, समय के विभिन्न अवकाशों में स्थानांतरण भी कर सकता है चूँकि विचार बुनियादी रूप से एक स्वायत्तशाली तकनीक है इसलिए स्वभावतः ही वह मानकीकरण की सत्ता-संरचना के तो विरोध में है ही साथ ही चिंतन के औद्योगिक स्वचालन की प्रबंधकीय गतिविधि के भी विरोधी में होता है।

इस तरह हम देखते हैं कि किस तरह से उत्तर-आधुनिकता बौखलाहटों और खीझ से भरे दर्शन में बदलता जाता है। आधुनिकता के प्रकल्प की असफलता उसे एक हिंसक और विवादी प्रतिरोध की जटिल प्रक्रिया वाली विचारधारा में तब्दील कर देती है। यह अलग बात है कि यह स्थिति उसे जितना बेझिझक बनाती है उतनी ही मात्रा में शंकाग्रस्त भी करती जाती है।

आगे की कड़ी में हम देखेंगे कि उत्तर-आधुनिकता कैसे शून्यता, भविष्यहीनता और प्रतिवर्ती अवस्थाओं के उस अकादमिक व्याकरण को तैयार करती है जो अंतर्लीनता, अनुशासनात्मक वैमनस्य, पूँजीवादी आत्मघात और विज्ञान के सर्वग्रासी रूपांतरण के पुरातात्विक अध्ययन तक हमको पहुँचाता है।


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