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निबंध

ए अरियार का बरियार
श्रीधर दुबे


आज जिउतिया (जीवित्पुत्रिका) नामक एक देहाती पर्व है जिसमें माताएँ अपने संतान की मंगलकामाना के लिए निराजल व्रत रहने के बाद दोपहर में चिचिहड़ा की दातून कर स्नान करती हैं, फिर बरियार नामक पौधे के चारों ओर बैठकर उसकी पूजा-अर्चना कर उसे सिंदूर से टीककर जल चढ़ाते हुए एक गीत के माध्यम से माता सीता के पास अपने संतान की मंगल कामना का संदेश भेजती हैं...

ए अरियार का बरियार
सीता से कहिह भेंट अँकवार
मोर पुत्र मारि आवें, मराय न आवे।
(हे अरियार, का बरियार! तुम सीता को अपने अँकवार में भरकर कहना कि मेरा पुत्र
किसी भी विघ्न-वाधा को मारकर ही आवे खुद मर कर ना आवे।)

दरअसल मुझे यह गीत इसलिए भी याद रह गया क्योंकि भोजपुरी गीतों की गुरू रहीं बड़ी अम्मा हर साल जिउतिया के व्रत पर अपने और आस-पड़ोस की औरतों के लिए चिचिहड़ा की दातून जुटाने का काम मेरे जिम्मे सौंपती थी। मैं सारा दिन बड़ी अम्मा के ही साथ रहता फिर घर के बगल में बरियार के पेड़ की पूजा के लिए पड़ोस की औरतें जुटतीं और फिर इसी गीत के साथ बरियार पूजतीं। मै वहीं चुप-चाप खड़ा बरियार पूजने का सारा उपक्रम देखता रहता और मन ही मन इस गीत को दोहराता भी रहता।

लोक को और लोक की कला को उपेक्षा के भाव से देखने वाले लोगों को जिउतिया के इस गीत का या किसी भी लोक गीत का मर्म नहीं खुलेगा (समझ नहीं आएगा)। इस गीत को या लोक के किसी भी गीत का मर्म उसी को खुलेगा जो अपनी पार्थिव वासना और अहंकार का त्यागकर खुद को जीवन के हर एक रेशे रेशे से जोड़कर देखेगा। और इसी दृष्टि से देखने का भाव ही विराट भाव कहलाता है और इसी भाव जगत की चेतना का जीवंत होना ही तीसरी आँख का खुलना है। यही वजह है कि कला के देव शंकर के ही एक रूप नटराज हैं। कला चाहे किसी भी तरह की हो उसका प्रयोजन मानव संवेदना को बचाए रहना और मानव चेतना के स्तर को निरंतर ऊपर उठाना ही होता है।

बचपन से ही देखता आ रहा हूँ कि गाँव घर की स्त्रियाँ अपना हर काम गाते-बजाते हुए ही करती थीं इसिलिए हर मौके का एक गीत होता था। और उन्हीं गीतों में रमकर भले ही कुछ क्षणों के लिए क्यों न पर वो स्त्रियाँ मुक्त हो उठती थीं और जीवन की जटिलताओं में भी जीने का संकल्प नहीं छोड़ती थीं। वो अपनी हर बात को अपने हर दुख को इन्हीं गीतों में गा-गाकर गाहे-बे गाहे अपनी बात कहती रहतीं थीं।

मुझे आज भी याद है। पुराने वाले घर के भीतरी बारामदे में झीना आटा निकालने वाला जँतसार था। वहाँ आस-पड़ोस की काकी, दादी और भाभी लोग इकट्ठा होकर सुबह से ही अपनी सुरीली रागिनियों (गीतों) के साथ जाँते पर झीना आटा निकालने में जुट जाती थीं।

उन गीतों में अजीब सी वेदना और छटपटाहट थी। बहुतेरे गीत तो मुझे याद भी हो गए थे। उन्हीं गीतों में से किसी गीत की कड़ी यह भी थी।

"नौमन कुटली भैया नौमन पिसली ना।
अरे रामा नौमन सिझली रसोईया हो ना॥
पिछली टिकरिया भैया हमरी भोजनिया हो ना।
भैया ओहू में गोरू चरवहवा हो ना।
भैया ओहू में कुत्ता बिलरिया हो ना॥"
(हे भैया! नौ मन कूटा और नौमन पीसा। और नौ मन रसोई भी पकाई। लेकिन मेरे हिस्से
भोजन के तौर पर बची हुई आखिरी रोटी ही मिली। उस आखिरी रोटी में भी, घर के
जानवरों, चरवाहे और कुत्ते-बिल्ली का भी हिस्सा था।)

ठीक ऐसे ही सौभाग्यवती कुलवधू के आगमन पर सँझा के आह्वान का एक गीत है जिसमें श्रृंगार की रात का मोहक वर्णन मिलता है। जिसके महाभाव को क्षणिक इंद्रिय सुखों के लोभी शायद महसूस भी नही कर पाएँ।

"कथी कइ दियना कथी कइ बाती, कथी कइ तेलवा जरेला सारी-राती।
सोने कइ दियना रूपै कइ बाती सरसों के तेलवा जरेला सारी राती।
दीप जरिउ दीप सरिउ राती जबले दुलहा दुलहिन खेलेलैं चौपर।
जरि गइले तेलवा संपूरन भइली बाती जंघिया लगलि दुलहिन देइ गइली अलसाई।"
(किस चीज का दिया, किस चीज की बाती और कौन-सा तेल सारी रात जला करता है। सोने
का दिया, रूप की बाती और सरसों का तेल सारी रात जला करता है। जलो दीप, सारी
रात जलो, जब तक की दुलहा-दुलहिन का चौपर चलता रहे। चौपर खेल खतम होते-होते तेल
जल गया, बाती समाप्त हो गई और दुल्हे की जाँघ पर सिर लगा दुल्हन अलसा गई।)

इस गीत में यौवन के विषय भोग का मनोहर दृश्य उपस्थित है। जिसमें सोने का दिया कर्म के शाश्वत आधार का प्रतीक है। और रूप की बाती चंचल और भंगुर रूप का तथा सरसों का तेल स्नेह की तरलता का प्रतीक है।

भोजपुरी के लोक गीतों को केवल कैसट पर सुनने वाले लोग उन गीतों की आत्मा को क्या देह तक को भी पूरा पूरा नही छू पाते। भोजपुरी के लोक गीतों को उचित संदर्भ में रखकर सुनने पर ही उनका मर्म खुलता है। जिस तरह संस्कृत के वैदिक या लौकिक साहित्य में सुबह उठने से लेकर सोने तक के क्रिया-कलापों के अनुरूप श्लोक हैं ठीक उसी प्रकार से भोजपुरी में भी क्रिया-कलापों के अनुरूप गीत हैं।

बचपन से ही जिनकी नींद अलार्म घड़ी की करकराहट सुनकर खुली हो, वो भला देहाती नाम की "ठाकुर चिरईया" (एक चिड़िया जिसकी ठाकुर जी... ठाकुर जी... का अलाप सुनते ही लोग जान जाते थे कि सुबह हो गई) के बोल में जागृति का उद्बोध भला कहाँ सुन पाएँगे? उसी उद्बोध से उद्बोधित भोर के आवाहन का एक गीत है जिसमें हलधर किसानों को खेतों की ओर और घर की बहुओं को जँतसार की ओर जाने के लिए चेताया जा रहा है। जिस गीत को सुनकर यह ज्ञात हो जाता है कि भारतीय कला बोध यांत्रिक नही आनुभविक है (अनुभव से उपजा हुआ)। गीत के बोल कुछ ऐसे हैं।

"ए भोर रे भईले भिनुसार चिरइया एक बोलेले,
मिरुग बन चुगेले एक भोरे खेतवन हर लेके चल हरवहवा त बहुवर जाँते॥
(मृग वन चुगने चलें, हलधर खेतों की ओर चलें, बहुएँ जातें पर चलें। उठो जागो और
सोये हुए पितरों को जगाओ क्योंकि महान मंगल की वेला आई है।)

इतना ही नहीं गाँव की गँवार, अनपढ़ औरतें भी विवाह के लिए दुल्हन लाने जाते दुल्हे को भी अपने मंगल गीतों से ही अशीषती है।

"अमवा के नाई बाबू मउरें, महुआ कुचलागें,
पुरईन पात अस पसरें, कँवल अस विहसें"
(आम की तरह वर मँजरित हो, महुए की तरह पुष्पित हो, पुरई की तरह प्रसृत हो और
कमल की तरह विहँसित हो।)


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