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विमर्श

अपाहिज आबादी
नवल अल सादवी

अनुवाद - सुबोध शुक्ल


प्राक्कथन

चिकित्सा-क्षेत्र में ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में लंबे समय से काम करते रहने, और दिन-ब-दिन मेरे घर की घंटियाँ बजाते, मेरी दहलीज पर आते-जाते स्त्री-पुरुषों के मनोवैज्ञानिक और यौन समस्याओं के बोझ से भरे चेहरों ने, मुझे यह किताब लिखने के लिए प्रेरित किया।

बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि यह अध्ययन सिर्फ औरतों, उनके परिवारों, बच्चों और पतियों तथा उनके अपने निजी जीवन की भावनात्मक तथा यौन उलझनों से संबंधित है। स्त्रियों से जुड़े हुए परंपरागत अध्ययन सबसे नगण्य और तुच्छ विषय माने जाते हैं क्योंकि इन्हें बड़ी सीमित प्रकृति वाला, एक खास समूह से संबंधित और बड़ी संकीर्ण संभावनाओं से भरी समस्याओं वाला माना जाता रहा है। क्या औरतों का संसार, परिवार और बच्चों तक ही सीमित नहीं मान लिया गया है? और कैसे यह छोटी सी दुनिया हमारे वक्त के बड़े मानवीय और राजनीतिक मुद्दों से सामने खड़े हो सकने की हिम्मत कर सकती है जो आजादी, न्याय और समाजवाद के भविष्य से जुड़े हुए हैं और जो हमारे जूनून और विचारों को हिम्मत देते हैं; उन्हें आगे लाते हैं।

और फिर समाज में महिलाओं की दशा का गहराई से अध्ययन का कोई भी प्रयास, यदि उसे मात्र प्रजनन का साधन मानने के रवैये से मुक्त कर देखा जाएगा, तो मनुष्य जीवन से जुड़े तमाम मामलातों के वृहत्तर परिप्रेक्ष्य को लेकर आगे बढ़ेगा। यह अध्ययन हमें राजनीति से संबंधित सामान्य चिंताओं की ओर ले जाएगा जोकि आजादी और सत्य के अनंत संघर्षों के साथ गुँथी होती है।

क्योंकि किसी भी देश की 'उच्चतर' राजनीति बहुत सारे छोटे-छोटे पत्थरों की निर्मिति होती है, साथ ही उन वृत्तांतों की भी जो जीवन के सामान्य ढाँचों में घुले-मिले होते हैं। ये वृत्तांत व्यक्ति की निजी जरूरतें, समस्याएँ और कामनाएँ हैं। व्यक्तियों की निजी जिंदगियाँ और उनकी जरूरतें ही वे निर्देशात्मक और उत्प्रेरक शक्तियाँ हैं जो राजनीतिक इच्छा, नीतियों एवं देश की राजनीति की विवेचना में रूपांतरित होती हैं। इस निजी जीवन में ही यौनाचार की जटिलताएँ, स्त्री-पुरुष संबंध और श्रम-विभाजन तथा उत्पादन के संबंध शामिल हैं। वे जो स्त्रियों की समस्याओं और यौनाचार को बात करने के लिए नाकाबिल मुद्दा मानते हैं, राजनीति के सिद्धांत को या तो समझते नहीं या उसकी उपेक्षा करते हैं। इस तथ्य से अधिक समय तक मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि स्त्रियों की हीन दशा, आपेक्षिक पिछड़ापन, समाज को भी पूरी तरह से एक अपरिहार्य पिछड़ेपन की ओर धकेलता है। इसी वजह से स्त्री-मुक्ति को, उत्पीड़न के सभी रूपों के खिलाफ संघर्ष, और साथ ही समाज के सभी शोषित वर्गों एवं समूहों की मुक्ति, जो निश्चित ही राजनीतिक और यौन भी है ही, का आभ्यंतरिक हिस्सा माने जाने की जरूरत है।

कुछ ऐसे हैं जो अभी भी इस बात से इनकार करते हैं कि अरब औरतें हमारे क्षेत्र की सामाजिक प्रगति में पीछे हैं और इस सिलसिले में अपनी हो रही आलोचना से भी मुँह मोड़ लेते हैं। ऐसा रवैया, अपनी बुनियादी बेईमानी के अलावा, अरब देशों के विकास के रास्तों में बड़ी बाधा है। इस वजह को निर्मूल करने के लिए जिस निष्ठा की आवश्यकता है वह यह कि हम अपनी कमजोरियों को छिपाने के बजाय उन्हें उजागर करें। यह जरूरी है अगर हमें उन पर विजय पानी है।

विगत सालों में बहुत सारे गंभीर अध्ययन प्रकाशित हुए हैं जिन्होंने सामाजिक बुराइयों को बेनकाब करने में बड़ा योगदान दिया है। अगर अरब समाज सभी क्षेत्रों में अपना विकास चाहता है तो उसे इन्हें निदान के तौर पर अपनाना चाहिए - वह आर्थिक, राजनीतिक, मानवीय या नैतिक कोई भी हों। अरब विद्वानों के बहुत से अध्ययनों में मैं हलीम बराकत की किताब The River With No Embankments का जिक्र करना चाहूँगी। उन्होंने बताया कि कैसे १९४८ से १९६७ के बीच लड़े गए क्रमिक युद्धों के दौरान, इजरायलियों ने प्रवास को बौखला देने के लिए, पारंपरिक फिलिस्तीनी अरबों की 'यौन संवेदनशीलता' का फायदा उठाया। १९६७ के युद्ध में अरबियों के जौर्डन के पश्चिमी तट को छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर देने वाले कारणों में से एक था - अपनी औरतों की इज्जत को बचाने की चाह। अब यह समझना आसान होगा की क्यों कुछ अरब चरमपंथी A'ard (इज्जत) शब्द को शब्दकोष में Ard (जमीन) शब्द से बदले जाने की वकालत करते हैं।

इस तरह से हम निजी मामलों जैसे स्त्री-कौमार्य और खास राजनीतिक घटनाओं जैसे अरब शरणार्थियों के विशाल समूह के प्रवास के अंतर्संबंध को विवेचित कर सकते हैं, जिसकी वजह से इजरायल अरबियों की जमीन पर कब्जा कर सका। बहुत सारे उदाहरणों में से यह एक है जो बताता है कि लड़कियों और स्त्रियों की समस्याओं के अध्ययन के जरिये, समाज में यौन और नैतिक संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर, उन सभी लोगों द्वारा पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो हमारे देश के भविष्य को लेकर वाजिब चिंता रखते हैं।

कुछ सालों में अरब देशों में मेरी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं, जो इन सवालों से जूझती हैं। लेकिन इन सभी किताबों में Women And Sex वह किताब है जिसने वृहत्तर रूप में आम जीवन को बेहद प्रभावित किया। इसका पहला संस्करण बहुत तेजी से बिक गया पर बढ़ती हुई माँग के कारण आगामी संस्करणों की जरूरत महसूस होने लगी। जैसे ही यह आया मुझे लगा कि मैं ज्वालामुखी के कगार पर बैठी हुई हूँ और लगातार इसकी गर्जना को अपने पास आते सुन रही हूँ। दिन ब दिन चिट्ठियों की खेप, टेलीफोन की आवाज, जवान और बुजुर्ग स्त्री-पुरुषों की आवाजाही धीरे-धीरे बढ़ने लगी। इनमें से सबसे ज्यादा वे थे जो समस्याओं का निदान चाहते थे। इसके बाद कुछ थे जो निराश थे और मैत्रीपूर्ण माहौल में बतियाना चाहते थे, बहुत कम ही थे जो शरारती किस्म के और धमकाने वाले थे।

मैं दरवाजे पर बार-बार बजने वाली घंटियों, डाक-पेटी में दिखती चिट्ठियों के बंडलों, फोन की घंटियों और मेरे कस्बाई छोटे से घर के हॉल में अथवा मेरे ऑफिस के फर्श पर चलते हिचक भरे कदमों की आदी हो चली थी। यहाँ तक कि कुछ लोग तो पड़ोसी अरब मुल्कों से भी आने लगे थे।

आने वालों के लिए मेरे दरवाजे, दिल और दिमाग सब खुले थे। पर जैसे-जैसे वक्त बीतता गया मुझे लगने लगा कि यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और तमाम अड़चनों से भरी है। क्योंकि हमारे समाज में औरत और मर्दों की समस्याओं का कोई अंत नहीं है और तब तक कोई समाधान भी नहीं है जब तक एक पुख्ता और व्यापक प्रयास अपनी कमजोरियों को समझने और उनको जड़ समेत सामने लाने का नहीं किया जाएगा। वे जड़ें जो असल में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, यौनिक और इतिहासगत संरचनाओं में निहित हैं, जिस पर हमारी जिंदगी खड़ी है। बहुत सारे पत्रों ने मुझसे इस जिम्मेदारी को लेने और इस पर आगे बढ़ने को कहा। मेरे लिए एक ही साथ यह चिंता और खुशी का विषय था। पहले की अपेक्षा मैं इस बात को लेकर और आश्वस्त हो चली थी कि हमारे समाज में औरतों और मर्दों की एक बड़ी संख्या ज्ञान की प्यास और विकास की भूख को सँजोए है।

हालाँकि, यह भी बड़ा स्वाभाविक था कि एक बहुत ही अल्पसंख्यक वर्ग मेरे इस काम से आतंकित और डरा हुआ था। कलम से लिखे गए शब्द नश्तर की तरह मांसपेशियों में घुसकर स्पंदनशील नसों और गहरी धँसी धमनियों को उभारकर कर सामने ले आते हैं। यह अँधेरे में रहने के आदी लोगों का भय था जो एकाएक रोशनी पड़ने से बौखला गए थे। कुछ चिट्ठियों में मुझे उन तमाम तथ्यों और सूचनाओं को प्रकाशित करने से मना किया गया जो मैंने सालों के धैर्य से अर्जित किए थे। उनकी बातें बिलकुल वैसी थीं जैसे एकाएक प्रकाश पड़ने से आँखों को हाथों से बंद करने का प्रयास किया जाय। और एक दूसरा अल्पसंख्यक वर्ग जो सत्ता और अधिकार संपन्न था उसने मुझे मिस्र के जन-स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य-शिक्षा के निदेशक पद से हटाने का फैसला सुना दिया; साथ ही Health पत्रिका के अधिकार से भी जिसके बोर्ड ने मुझे प्रबंध संपादक के तौर पर चुना था।

पर ऐसी घटनाओं ने भी, जो बेहद दर्दनाक थीं, मेरे प्रयासों को धीमा या मेरे उत्साह को हल्का नहीं किया। मेरी कलम तथ्यों और मामलों के खुलासे, निपटारे करती रही और जिस सच पर मुझे भरोसा था उसको रेखांकित भी।

क्योंकि मैं अच्छे तरह से जानती थी कि असल नुकसान Women And Sex के बारे में सच को छिपाने से होगा बजाय इसकी खोज या इसके बारे में बताने के। सत्य बहुत बार तयशुदा विचारों की जड़ शांति को हिलाता-झिंझोड़ता है; पर कई बार एक सटीक हलचल दिमाग को जगा सकती है और आँखें खोल सकती है यह देखने के लिए कि आस-पास क्या हो रहा है।

इसमें कोई शक नहीं कि अरब समाज की औरतों के बारे में लिखना और जबकि लेखक स्वयं एक स्त्री हो, बीहड़ और संवेदनशील क्षेत्र में पाने पाँव रखने जैसा है। यह कुछ-कुछ दिखाई पड़ने वाली और न दिखने वाली बारूदी सुरंगों के बीच अपना रास्ता बनाने जैसा काम है। लगभग हर कदम किसी पवित्रता से भरे और दिव्य तार को छेड़ सकता है जिसे छूने से मना किया गया है और ऐसी मान्यताएँ को भी भी जिन पर कोई सवाल नहीं उठाए जा सकते क्योंकि वे धार्मिक और नैतिक स्थापत्य का हिस्सा हैं। और जब सवाल स्त्री के संबंध में हों और कोई हाथ उन्हें आजाद कराने के लिए आगे बढ़े तो यह मूल्य लोहे की छड़ों की तरह बाधा बन कर सामने आ जाते हैं।

आमतौर पर धर्म, सत्य के शोधकों और खोजियों के प्रयासों को कमतर करने या समाप्त कर डालने का एक हथियार है। मैंने इसे बहुत साफ तरीके से महसूस किया है कि धर्म आज के समय ज्यादातर आर्थिक और राजनीतिक ताकतों का औजार बनाकर काम में लाया जा रहा है। यह एक ऐसी संस्था है जो शासकों द्वारा शासन करने के लिए न्यायिक, प्रशासनिक और यहाँ तक कि मनोवैज्ञानिक तंत्र के रूप में स्त्री, बच्चों और गुलामों के दमन के द्वारा ऐतिहासिक रूप से पैदा पितृसत्तात्मक परिवार को बनाए और जारी रखने के लिए काम में लाई जाती है। अतः किसी भी समाज में धर्म को राजनीतिक व्यवस्था से और यौनाचार को राजनीति से अलगा कर नहीं देखा जा सकता।

समाज में सबसे अधिक संवेदनशील; राजनीति, धर्म और यौनाचार का त्रिक है। यह संवेदनशीलता अपने चरम पर ग्रामीण पृष्ठभूमि और संस्कृतियों वाले विकासशील देशों में पहुँचती है जहाँ सामंती रिश्ते प्रचंड रूप से प्रभावी होते हैं। यूरोप की औद्योगिक, तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति ने वहाँ की जन-संस्कृति को धर्म और यौनाचार के जीर्ण-शीर्ण मूल्यों और सामंतवाद के ताकतवर प्रभाव से आजादी दिलाने में बड़ा योगदान दिया है। यह प्रक्रिया चर्च के खिलाफ बड़े कठोर संघर्षों के जरिये संभव हो सकी। यह संघर्ष दो पारस्परिक विपरीत मान्यताओं का प्रतिफलन था - पूँजीवाद के बढ़ते प्रभाव और मध्यकालीन सामंती बोध का। और सभी सामजिक संघर्षों की तरह संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी ही इसका सबसे ज्यादा शिकार हुए। उनमें से कुछ जिन्होंने चर्च की प्रभुता मानने से इनकार कर दिया उन्हें जिंदा जला डाला गया। Giordano Bruno जैसे पुरुष जिसने घोषणा की कि पृथ्वी आकाश में निरंतरता के साथ सूर्य का चक्कर लगा रही है या फिर मशहूर Joan of Arc। पर एक दिन आया जब संघर्ष समाप्त हुआ और नई पूँजीवादी ताकतों ने चर्च और धर्म-गुरुओं पर विजय हासिल की। यह मानवीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ है जहाँ आर्थिक कारण सबसे ऊपर उठ गए यहाँ तक कि धर्म से भी ऊपर।

क्योंकि मनुष्य का जीवन और उसकी जरूरतें अर्थ पर निर्भर होती हैं, धर्म पर नहीं। समूचे मानव-इतिहास में धर्म के मानदंड और मान्यताएँ अर्थ द्वारा ही बदले और संचालित किए गए हैं। किसी भी समाज में स्त्री का दमन, आर्थिक निर्मितियों का ही प्रतिफलन होता है जो भूमि-स्वामित्व, उत्तराधिकार और अभिभावकत्व के तंत्र तथा पितृसत्ता के रूप में अंतर्निहित एक सामाजिक इकाई के तौर पर दिखता है। हालाँकि मानव-इतिहास ने समय-समय पर यह सिद्ध किया है कि औरतों की हीन स्थिति और उत्पीड़न का कारण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था ही है फिर भी बहते सारे लेखक-विश्लेषक आज भी समस्या की जड़ धर्म ही मानते हैं। इसके पीछे एक वजह है, वह यह कि पश्चिमी स्रोत जब अरबी औरतों की स्थितियों की बात करते हैं तो यह जतलाने की कोशिश करते हैं कि अन्य धर्मों की तुलना में इस्लाम का रवैया उन्हें सताने वाला अधिक रहा है। यह विश्वास संभवतः इस्लाम से जुड़े पूर्वाग्रहों और अधूरी समझ के कारण बना है और साथ ही सामाजिक बदलावों में निभाई गई उसकी भूमिका के कारण भी। यह इस्लामी ज्ञान और व्यवस्था की नासमझी का परिणाम है साथ ही शासक-वर्ग के निहित आर्थिक स्वार्थों को ढकने-मूँदने, जो नव-उपनिवेशवादी शक्तियों से गठजोड़ बनाते हैं, और असल तथ्यों को छिपाने के प्रयास से भी पैदा होता है।

कुछ देशों, जिसमें अरब मुल्क भी शामिल हैं और तीसरा विश्व भी, में बहुत सारे स्थानीय स्वार्थ, नव-उपनिवेशवादी ताकतों के साथ सहयोग बनाकर सावधानी से निरंतर चलते रहने वाले अभियनों में शामिल होते हैं जो धर्म की शिक्षाओं और उपदेशों से मनुष्य को भ्रमित, दिशाहीन बनाकर गलतबयानी करते रहते हैं। धर्म को झंडे की तरह लहराकर तमाम रास्तों पर उसका इस्तेमाल किया गया है - सऊदी अरब से ज्यादा से ज्यादा तेल निकालने के लिए, Mossadeq की सत्ता को उखाड़कर ईरान में तेल एकाधिपत्य वाली सरकार को पुनर्स्थापित करने के लिए, सुकर्णो को कैद कर इंडोनेशिया में बड़े पैमाने पर जन-संहार कराने के लिए, चिली में सल्वाडोर अलांद को बर्बाद कर सैन्य शासन स्थापित करने के लिए जहाँ तोपों, मशीनगनों, जेलों के साथ ही सड़कें गश्त लगाते फौजियों के बूटों की थाप से गूँजती रहती हैं। साथ ही बांग्लादेश में मुजीब अब्दुल रहमान की हत्या में, लेबनान में भ्रातृ-हत्या के बाद महीनों चलने वाले युद्ध जो और कुछ नहीं बल्कि राष्ट्रवाद, जम्हूरियत और विकास की उभरती हुई ताकतों को जमींदोज कर देने का षड्यंत्र था में भी धर्म ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। धर्म के नाम पर अरबी देशों में हजारों लोग भयावह मौतों को झेल चुके हैं और झेल रहे हैं। और मिस्र में धर्म की सरपरस्ती में रूढ़िवादी, कट्टरवादी और शोषणकारी ताकतें जनता को रोजी-रोटी और रोजमर्रा की आवश्यकता से वंचित करने के लिए आपस में गठजोड़ बनाती रही हैं। यह चंद लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए घोषणा करती हैं कि औरतों का स्थान घर में है और साथ ही हरम का एक आधुनिक ढाँचा स्थापित करना चाहती हैं। यही वे ताकतें हैं जो औरतों के खतने की बर्बर पद्धति को प्रचलित किए हुए हैं जिसे कुछ अरब देशों में आज भी लड़कियाँ झेल रही हैं। बड़े नपे-तुले और क्रूर अभियानों के जरिये भगनासा-विच्छेद और कभी-कभी समूल बाहरी यौनांगों की सफाई को लड़कियों के ब्रेनवाश के साथ काम में लाया जाता है जिससे उनकी सोचने समझने की शक्ति को पंगु बना दिया जाता है। सदियों से ऐसा ही तंत्र निर्मित किया गया है जिसमें औरतों की अपने ऊपर हो रहे शोषण को देख सकने की और उनके कारणों को समझ सकने की काबिलियत को मार डाला जाता है। ऐसी व्यवस्था स्त्री-दशा को इस तरह चिन्हित करती हैं जैसे उसका स्त्री होना नियंता के हाथों की तैयार एक नियति है और इसलिए वे मानव नस्ल में निम्न प्रजाति की हैं।

धर्म पर कोई भी गंभीर अध्ययन यह साफ बता देगा कि अपनी मौलिकता में इस्लाम में स्त्रियों की अवस्था यहूदी और ईसाई धर्म को देखते हुए अधिक खराब नहीं है। वस्तुतः स्त्रियों का दमन यहूदी और ईसाई धर्म में अधिक चटक कर सामने आता है। परदा, इस्लाम के बहुत पहले यहूदियों की ही देन है। ओल्ड टेस्टामेंट में कहा गया कि Jehova की प्रार्थना करते समय स्त्रियाँ अपने मस्तक को ढका करती थीं, जबकि पुरुष खुले मस्तक से प्रार्थना कर सकते थे क्योंकि वे ईश्वर की छवि से बने थे। यह विश्वास यहीं से पैदा हुआ कि औरतें अधूरी हैं, बिना मस्तक की देह हैं, एक देह जो पुरुष के साथ पूरी होती है जो उसका पति है क्योंकि मस्तक उसके ही पास है। यहीं से गैर-इस्लामी समाजों में सर्जिकल और मानसिक खतने के रूप में स्त्री के लिए शुचिता-पेटी (chastity Belt) की शुरुआत हुई - धातु का एक कवच पेट के निचले हिस्से में बाँध दिया जाता था। इनके अलावा और भी उत्पीड़न और दमन के रूप पितृसत्तात्मक परिवारों के अस्तित्व में आने के साथ प्रकाश में आते गए।

पितृसत्तात्मक परिवार, जो भूमि-अधिग्रहण, उत्तराधिकार, पैत्रिक संबंध स्त्री और गुलामों के दमन पर आधारित था के बहुत पहले मनुष्य स्त्री और पुरुष दोनों देवताओं की पूजा करता था। बहुत सारी पुरानी सभ्यताओं में, प्राचीन मिस्र भी जिसमें शामिल है, औरतों की समाज में विशेष स्थिति थी एवं देवियों का बहुत सारी जगहों पर शासन माना जाता था। पर जैसे ही नई आर्थिक व्यवस्था और पितृसत्ता ने मोर्चाबंदी की, पुरुष ईश्वरों ने एकेश्वरवादी धर्मों पर एकाधिकार कर लिया। देवियाँ गायब हो गईं और उपदेशकों और पुजारियों का पूरा काम पुरुषों के अधिकार-क्षेत्र में आ गया।

अरबी औरतों की आजादी तब तक संभव नहीं है जब तक दमन की जड़ों और उसके बढ़ते प्रभावों को खत्म नहीं किया जाता। असल मुक्ति सब तरह के शोषणों से ही मुक्ति है वह चाहे आर्थिक, यौनिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हो। आर्थिक आजादी मात्र भी पर्याप्त नहीं है। एक समाजवादी व्यवस्था जहाँ स्त्री को पुरुषों के बराबर वेतन मिलता है जरूरी नहीं कि पूर्ण मुक्ति की और ले जाय। जब तक पितृसत्तात्मक परिवार हावी रहेंगे, स्त्री-पुरुष संबंधों के सफल परिणाम नहीं निकलने वाले। इसमें कोई शक नहीं कि आर्थिक-मुक्ति, स्त्री-मुक्ति की दिशा में एक बड़ा योगदान रखती है। पर इसे उत्पीड़न के अन्य रूपों के साथ भी जुड़ना चाहिए चाहे वह सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक हो तभी स्त्री और पुरुष सही मायनों में मुक्त हो सकेंगे। (नवल अल सादवी, काहिरा, १९७७)

एक सवाल जिसका कोई जवाब नहीं

मैं छः साल की थी उस रात, जब एक बेहद सुकून से भरे माहौल में जागने और सोने की हालत के बीच कहीं अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। मासूम परियों की तरह, बचपन के गुलाबी सपने साथ में मँडरा रहे थे। इसी बीच मैंने अपने कंबल के नीचे एक हलचल सी महसूस की। मेरे शरीर को टटोलता वह एक बड़ा सा हाथ था - ठंडा और रूखा, जैसे कुछ तलाश रहा हो। लगभग उसी समय एक दूसरा हाथ जो पहले वाले की ही तरह ठंडा, कठोर और उतना ही बड़ा था, ने मेरा मुँह भींच लिया ताकि मैं चिल्ला न सकूँ।

वे मुझे गुसलखाने की ओर ले गए। मुझे पता नहीं कि वहाँ और कितने लोग मौजूद थे, न मुझे उनके चेहरे दिख रहे थे न मैं यह कह सकती थी कि वे मर्द हैं या औरतें। दुनिया मुझे एक अँधेरे कुहरे में लिपटी हुई महसूस दे रही थी जिसके कारण मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था या हो सकता है उन्होंने मेरी आँख पर किसी तरह का कपड़ा बाँध दिया था। जो मुझे याद है वो यह कि मैं बेहद डरी हुई थी और वहाँ बहुत सारे लोग जमा थे। और एक मजबूत चंगुल ने मेरी बाजुओं और जाँघों को जकड़ रखा था, ताकि मैं विरोध करने या यहाँ तक कि हिलने में भी असमर्थ हो जाऊँ। अपने नग्न शरीर के नीचे मुझे गुसलखाने के फर्श का ठंडा अहसास अभी भी याद है। अजनबी बोलियाँ, भिनभिनाहट के स्वर जब-तब, एक कर्कश धातु की आवाज के साथ, बीच में सुनाई पड़ रहे थे जो मुझे उस कसाई की दिला रहे थे जो अपने चाकू की धार, ईद के मौके पर भेड़ को जिबह करने के लिए तेज किया करता था

मेरा खून मेरी धमनियों में जम सा गया था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ चोरों ने कमरे का दरवाजा तोड़ कर मुझे बिस्तर से ही उठा लिया था और वे मेरा गला काटने की तैयारी कर रहे थे जैसा हमेशा उन लड़कियों के साथ किया जाता था जो मेरी तरह बात न मानने वाली होती थीं - ऐसा मैंने अपनी पुराने गाँव वाली दादी की चाव से सुनाई जाने वाली कहानियों में सुन रखा था।

मैंने अपने कानों पर बहुत जोर लगाकर किसी धातु के रगड़ने की आवाज को पकड़ने की कोशिश की। जिस वक्त यह आवाज रुकी मुझे लगा जैसे मेरे दिल ने धड़कना बंद कर दिया है। मैं कुछ देख नहीं पा रही थी और मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी साँस भी बंद हो गई है। फिर भी मैंने महसूस किया कि जो चीज रगड़ की आवाज पैदा कर रही थी वह लगातार मेरे नजदीक आती जा रही थी। हालाँकि, जैसी मैंने उम्मीद की थी वो मेरे गले के पास नहीं आई बल्कि शरीर के किसी दूसरे हिस्से पर चली गई - कहीं मेरे पेट के नीचे मेरी जाँघों के बीच दबी हुई कोई चीज तलाश रही थी। उसी वक्त मैंने महसूस किया कि मेरी जाँघें और नीचे के शरीर का हर हिस्सा जितना संभव हो सकता था फैला दिया गया है जिन्हें बेहद मजबूती से पकड़े रखा गया था। मुझे लगा कि कोई धारदार चाकू या ब्लेड मेरे गले की ओर बढ़ता हुआ एकाएक मेरी जाँघों के बीच आ गया और वहाँ से मेरे शरीर के मांस का एक हिस्सा काट लिया।

मेरे मुँह को भींच रखा गया था उसके बावजूद मैं कराह कर बुरी तरह से चीखी क्योंकि यह दर्द सिर्फ दर्द न होकर बेहद तेज आँच की तरह था जो मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया था। कुछ ही देर बाद मैंने अपने कूल्हे के चारों ओर खून ही खून लगा देखा।

मुझे पता नहीं था कि मेरे शरीर से उन्होंने क्या काट कर अलग किया था और मैंने जानने की कोशिश भी नहीं की। मैं सिर्फ रो रही थी और अपनी माँ को मदद के लिए पुकार रही थी। और ऐसे वक्त पर जो सबसे धक्का लगने वाली बात थी वह यह थी कि जब मैंने चारों और देखा तो उन्हें अपने ही पास खड़े पाया। हाँ, यह वही थीं। मैं गलत नहीं थी। अपनी पूरी मौजूदगी के साथ उन अनजान लोगों के ठीक बीच में खड़ी हुई, उनके साथ बतियाती, मुस्कुराती जैसे अपनी बच्ची को जिबह करने वालों में वो खुद भागीदार रही हों।

वे वापस मुझे मेरे बिस्तर पर ले गए। मैंने उन्हें अपने से दो साल छोटी बहन को भी ठीक वैसे ही पकड़ते हुए देखा जैसे वे थोड़ी देर पहले मुझे पकड़े हुए थे। मैं अपनी पूरी ताकत के साथ चिल्लाई - नहीं ! नहीं !! मैं उनके कठोर हाथों के बीच में फँसा अपनी बहन का चेहरा देख सकती थी। यह मृत्यु का पीलापन था। उसकी बड़ी काली आँखें, मुझसे थोड़े वक्त के लिए मिलीं, उस अँधेरे दर्द से भरी दृष्टि को मैं कभी नहीं भूल सकती। थोड़ी ही देर में वह उसी गुसलखाने में ले जाई गई जहाँ मुझे ले जाया गया था। थोड़ी देर के लिए मिली उस नजर में जैसे हमने आपस में कहा हो 'हम जानते हैं कि यह सब क्या है? हम जानते हैं कि हमारी त्रासदी कहाँ मौजूद है? हम एक विशेष लिंग में पैदा हुई थीं - स्त्रीलिंग। हमारी नियति इस यातना को झेलने के लिए और हमारे शरीर के हिस्से को जड़, संवेदनहीन और क्रूर हाथों द्वारा काटकर फेंक दिए जाने के लिए पहले से ही तय कर दी गई है।'

मेरा परिवार कोई अशिक्षित मिस्री परिवार नहीं था। इसके उलट मेरे माँ-बाप उन दिनों के हालात को देखते हुए, एक अच्छी शिक्षा हासिल करने के मामले में पर्याप्त किस्मतवाले थे। मेरे पिता विश्वविद्यालय से स्नातक थे। और उस साल (1937) में दक्षिण काहिरा के डेल्टा क्षेत्र में Menoufia प्रांत के शिक्षा नियंत्रक के पद पर नियुक्त किए गए थे। मेरी माँ को उनके पिता ने फ्रांसीसी स्कूलों में पढ़ाया था जो सैन्य भर्ती के महानिदेशक हुआ करते थे। इसके बावजूद लड़कियों के खतने का रिवाज उन दिनों बहुत आम था और कोई भी लड़की इससे बच नहीं सकती थी - चाहे वह परिवार ग्रामीण हो या शहरी। जब कुछ दिनों बाद घर पर आराम कर, ठीक होकर मैं स्कूल लौटी तो मैंने अपने सहपाठियों/मित्रों को अपने साथ हुए इस वाकये के बारे में बताया और यह जाना कि सभी लड़कियाँ बिना अपवाद समान अनुभव से गुजर चुकी थीं। और वे किस सामाजिक वर्ग से आती थीं इसका कोई मतलब नहीं होता था (उच्च, मध्य अथवा निम्न-मध्यवर्ग) ग्रामीण इलाकों में, गरीब किसान परिवारों के बीच सभी लड़कियों का खतना किया जाता है जो बाद में मुझे Kafr Tahla के अपने रिश्तेदारों से पता चला। यह रिवाज अभी भी गाँवों में बड़ा सामान्य है; यहाँ तक कि शहरों में रहने वाले परिवारों का बड़ा हिस्सा इसकी जरूरत पर भरोसा करता है। हालाँकि, शिक्षा के प्रसार और अभिभावकों के बीच की समझदारी के भाव ने ऐसे माता-पिता की संख्याओं को बढ़ाया है जो अपनी लड़कियों के खतने से परहेज करते हैं।

खतने की याद एक बुरे सपने की तरह मेरा पीछा करती रही। मैं एक असुरक्षा के भाव से घिरी रहती थी जैसे भविष्य की ओर बढ़ते हर कदम पर कुछ 'अनजाना' सा मेरा इंतजार कर रहा है। मैं नहीं जानती थी कि मेरी माँ, पिता, दादी और आसपास के लोगों द्वारा बहुत कुछ अनोखी और अपरिचित सी घटनाएँ मेरे लिए इकट्ठी की जा रही हैं। समाज ने मुझे महसूस करा दिया था कि जिस दिन मैंने अपनी आँखें खोलीं मैं एक लड़की थी और जब भी कोई इस शब्द Bint (लड़की) का संबोधन करता तो त्यौरी और नाक-भौं चढ़ाकर ही करता।

तब भी जब मैं बड़ी हुई और एक चिकित्सक के रूप में 1955 में स्नातक हुई, मैं उस दहशतजदा घटना को कभी भूल न सकी जिसने मेरे बचपन को हमेशा के लिए छीन लिया था, साथ ही जिसने मेरी जवानी के समय और शादीशुदा जिंदगी में लंबे अरसे तक अपनी यौनिकता की पूर्णता का आनंद लेने से तथा जीवन की समग्रता से वंचित रखा जोकि केवल चौतरफा मनोवैज्ञानिक संतुलन से ही पाया जा सकता है। तमाम तरह के दुःस्वप्न सालों तक मेरा पीछा करते रहे विशेषकर उस दौर में जब मैं ग्रामीण इलाकों में चिकित्सक के रूप में काम कर रही थी। वहाँ मुझे आमतौर पर उन लड़कियों की देखभाल करनी होती थी जो खतने के बाद विपुल रक्तस्राव के कारण आपात उपचार केंद्रों में लाई जाती थीं। उनमें से बहुत सारी सर्जरी के अमानवीय और आदिम तरीकों के फलस्वरूप जो अपने आप में पर्याप्त बर्बर थे, अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठती थीं। कुछ थीं जो दीर्घकालीन और तीव्र संक्रमण से पीड़ित रहती थीं जिसे उन्हें अपनी बाकी बची जिंदगी में झेलना था और उनमें से बहुत, अपने इन अनुभवों के कारण बाद में यौनगत और मानसिक विकृतियों का शिकार हो गई थीं।

मेरे रोजगार ने विभिन्न अरब देशों से आए मरीजों का परीक्षण किया। उनमें सूडानी औरतें भी थीं। मैं यह देखकर खौफजदा थी की सूडानी लड़की खतने की जिस प्रक्रिया से गुजरती है वह मिस्री लड़कियों की प्रक्रिया से दस गुना क्रूर प्रक्रिया है। मिस्र में सिर्फ भगनासा को ही काटा जाता है वह भी पूर्णतया नहीं, लेकिन सूडान में सर्जरी के जरिये समूची बाहरी जननेंद्रिय को पूरी तरह से हटा दिया जाता है। वे पहले भगनासा को काटते हैं और फिर दोनों वृहद् भगोष्ठों और दोनों लघु भगोष्ठों को अलग कर देते हैं। बाद में घाव का उपचार किया जाता है। योनि का बाहरी मुख ही बचे हुए हिस्से के बतौर छोड़ दिया जाता है, बिना इस बात को जाँचे कि सर्जरी के दौरान मुख को कुछ अतिरिक्त टाँकों के साथ ज्यादा ही छोटा कर दिया गया है। फलस्वरूप शादी की रात में छुरे या उस्तरे से बाकी मुख को चौड़ा करने के लिए एक या दोनों छोरों को काटा जाता है ताकि पुरुष अंग उसमें प्रवेश कर सके। और तो और जब सूडानी औरत का तलाक होता है तो फिर उसके योनि-मुख को छोटा किया जाता है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह अब यौन-संबंध नहीं बना सकती है। और जब वह पुनः शादी करती है तो यही प्रक्रिया फिर से दुहराई जाती है।

गुस्से और विद्रोह का मेरा अहसास उत्तरोत्तर बढ़ता चला गया जब मैंने इन औरतों को मुझे, एक सूडानी लड़की के साथ खतने में क्या-क्या होता है, बताते हुए सुना। मेरा गुस्सा तब कई गुना बढ़ गया जब १९६९ में सूडान की यात्रा के दौरान मुझे पता चला कि खतने की यह कुरीति अब भी बदस्तूर जारी है चाहे वह ग्रामीण इलाके हों या शहरी कस्बे।

मेरे चिकित्सकीय लालन-पालन और शिक्षा के बावजूद उन दिनों मैं यह समझ सकने में असहाय थी कि लड़कियों को इस बर्बर प्रक्रिया से क्यों गुजारा जाता है। लगातार मैं स्वयं से यह सवाल पूछती - क्यों ? क्यों ?? लेकिन कभी मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिलता जो उस दिन से मुझे लगातार मथ रहा था जिस दिन मेरा और मेरी बहन का खतना हुआ था। मैं इस सवाल का जवाब खोज पाने में नाकाम थी जो लगातार मेरे दिमाग में चक्कर लगा रहा था।

यह सवाल बहुतेरी दूसरी चीजों से भी जुड़ा हुआ महसूस होता था जो मुझे अक्सर उलझन में डाले रहते थे। जैसे खाने और घर से बाहर जाने की आजादी के मामले में क्यों वे मेरे भाई को तरजीह देते थे? इन सारे मामलों में उसके साथ मुझसे बेहतर सुलूक क्यों होता था? क्यों मेरा भाई खुल कर हँस सकता था जबकि मैं लोगों की आँखों में भी सीधे नहीं देख सकती थी? ऐसी दशा में जब किसी से मेरा सामना हो तो मुझे अपनी नजरें नीची करनी होती थीं। जब मैं हँसती तो मुझसे आवाज को धीमा रखने की उम्मीद की जाती ताकि लोग मुझे शायद ही सुन सकें या फिर इससे बेहतर होता कि मैं बहुत धीरे से सकुचाते हुए मुस्कराकर चुप हो जाऊँ। जब मैं खेलती तो मेरे पाँवों को बेतरतीबी से हिलाने की इजाजत नहीं थी और उन्हें एक साथ एक-दूसरे से जुड़ा रहना था। पढ़ाई और स्कूल के साथ-साथ मेरा बुनियादी काम घर की सफाई और खाना बनाना था। जबकि लड़कों से पढ़ाई के अलावा और कोई उम्मीद नहीं की जाती है।

चूँकि मेरा परिवार पढ़ा-लिखा था और मेरे पिता स्वयं एक अध्यापक थे, इसलिए लड़के और लड़कियों के बीच का फर्क उस सीमा तक नहीं था जो आमतौर पर परिवारों में होता था। मुझे अपने रिश्ते की उन छोटी बहनों के लिए बहुत अफसोस होता था जब या तो जमीन के एक छोटे से टुकड़े के लिए उनका स्कूल छुड़वाकर उन्हें किसी बूढ़े आदमी से ब्याह दिया जाता था या फिर जब उनके छोटे भाई सिर्फ इसलिए, क्योंकि लड़के होने के कारण वे अपनी बहनों पर अधिकार जमा सकते थे, उन्हें बेवजह पीटते और परेशान करते थे।

मेरे भाई ने भी मुझ पर हुक्म चलाने की कोशिश की पर मेरे पिता एक उदार हृदय के व्यक्ति थे और उन्होंने पूरी कोशिश की कि लड़के और लड़कियों के बीच के फर्क के बगैर बच्चों के साथ व्यवहार हो। मेरी माँ का भी यही मानना था पर पर मैंने महसूस किया कि असल में ऐसा होता नहीं है।

जब-जब ऐसी असमानता हुआ करती मैं विरोध किया करती कभी-कभी हिंसक रूप से भी और और अपने माता-पिता से पूछती कि क्यों बावजूद इसके कि स्कूल में मैं उससे बेहतर कर रही हूँ मेरे भाई को विशेष अधिकार मिले हुए हैं जो मुझे नहीं दिए गए हैं। 'ऐसा ही होता है', मेरे माँ-बाप के पास हालाँकि इसके सिवाय कोई उत्तर नहीं हुआ करता था; मैं बदले में पूछती, 'लेकिन ऐसा होता ही क्यों है?' और फिर से वैसा ही एक तरह का जवाब मिलता, 'क्योंकि ऐसा ही है?' और अगर मैं जिद पकड़ लेती तो इस सवाल को दुहराती रहती, तब अपना आपा खोने की हालत में पहुँचते हुए वे दोनों एक समान स्वर में कहते, 'क्योंकि वह लड़का है और तुम लड़की हो'।

शायद उनको लगता होगा कि मुझे चुप कराने के लिए या विश्वास दिलाने के लिए यह जवाब काफी था, लेकिन इसके उलट यह जवाब मुझे और चिढ़ाता और अधिक जिद्दी होने के लिए उकसाता और मैं पूछती, 'लड़का और लड़की में क्या फर्क होता है'?

इस मौके पर हमारी दादी, जो हमारे घर अक्सर आती थीं, बातचीत को बीच में रोक देती थीं, जिसे वे हमेशा 'अच्छे आचरण का उल्लंघन' कहती थीं, मुझे तेजी से फटकारतीं। 'मैंने जीवन में ऐसी लंबी जबान वाली कोई लड़की नहीं देखी, हाँ, तुम अपने भाई की तरह नहीं हो। तुम्हारा भाई एक लड़का है, एक लड़का, सुना तुमने ! कितना अच्छा होता कि तुम उसकी तरह एक लड़का पैदा हुई होतीं।'

परिवार में कोई भी ऐसा नहीं था जो मेरे सवालों का भरोसे लायक जवाब दे सके। इसलिए सवाल बेचैनी के साथ मेरे जेहन में घूमना जारी रहते और हर बार कुछ भी घटित होने पर आगे बढ़कर पहलकदमी करते जो इस बात को और मजबूत करता कि पुरुष के साथ हर वक्त ऐसा सुलूक इसलिए किया जाता था कि वे उस वर्ग से आए हैं जिनके पास ताकत और अधिकार हैं।

जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया तो ध्यान दिया कि अध्यापक कॉपी में मेरे पिता का नाम लिखते थे मेरी माँ का नहीं। 'क्यों', मैंने माँ से पूछा तो उसने फिर से वही जवाब दिया, 'ऐसा ही होता है' पिता ने हालाँकि बताया कि बच्चों का नाम उनके पिता के नाम पर रखा जाता है और जब मैंने इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने उसी घिसे-पिटे जुमले को दुहरा दिया जो मैं अच्छी तरह जानती थी कि ऐसा ही होता है। मैं अपने पूरे साहस को जगाकर पूछा 'ऐसा क्यों होता है?' और तब मैं अपने पिता के चेहरे को ध्यान से देखा। उन्हें सच में उसका जवाब पता नहीं था। बाद में मैंने उनसे दुबारा वह सवाल नहीं पूछा सिवाय तबके जब मेरी सच की खोज मुझे बहुत सारे सवालों की ओर ले गई और मैंने बहुत से विषयों पर उनसे बात की जो मैं अपने रास्ते में खोज रही थी।

हालाँकि, उस दिन के बाद से मैं समझ गई थी कि मुझे अपने सवाल का जवाब खुद पाना होगा जिसका कोई जवाब नहीं देता था। उस दिन से मेरा रास्ता और लंबा हो गया जो इस किताब तक चला आया।

स्त्री-संतति के प्रति यौन दुराचार

सभी बच्चे जो सामान्य और स्वस्थ पैदा होते हैं खुद को संपूर्ण मनुष्य के रूप में महसूसते हैं। पर, स्त्री संतान के साथ ऐसा नहीं है।

जिस वक्त से वह पैदा और कुछ बोल सकने में सक्षम होने को होती है, आस-पास की आँखों का भाव और उनका लहजा यह दर्शाने लगता है कि वह कुछ 'अधूरी' या फिर 'कुछ कमी के साथ' पैदा हुई है। पैदा होने के दिन से लेकर मौत के समय तक एक सवाल लगातार उसका पीछा करता है कि क्यों? उसके भाई को हमेशा तरजीह मिलती है इसके बावजूद कि वे बराबर हैं, यहाँ तक कि बहुत सारे मामलों में वह उससे बेहतर हो सकती है या फिर कम से कम कुछ पहलुओं में तो निश्चित ही ?

पहला आघात जो स्त्री-संतान महसूस करती है वह यह भाव है कि लोग उसके दुनिया में आने से खुश नहीं हैं, उसका स्वागत नहीं करते। कुछ परिवारों में और खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में यह 'ठंडापन' थोड़ा और आगे बढ़ सकता है और मातम तथा अवसाद के माहौल तक पहुँच जाता है; यहाँ तक कि माँ की सजा अपमान, मार-पीट या फिर तलाक तक पहुँच सकती है। जब मैं बच्ची थी तो मैंने अपनी एक चाची को गाल पर थप्पड़ खाते देखा क्योंकि उसने तीसरी बार लड़के के बजाय लड़की को जन्म दिया था। संयोगवश उनके पति को यह धमकी देते हुए भी सुना कि अगर उसने अगली बार लड़के के बजाय फिर लड़की जनी तो वह उसे तलाक दे देगा। पिता को अपनी इस नवजात बच्ची से इस हद तक घृणा थी कि वह तब भी अपनी पत्नी को सताया करता था जब वह उसकी देखभाल करती थी या उसे दूध पिलाया करती थी। बच्ची अपनी जिंदगी के चालीस दिन पूरा करने के पहले ही मर गई। मुझे नहीं पता कि उसे उपेक्षा ने मार डाला या फिर माँ ने ही गला दबाकर - 'शांत रहो और शांति दो' की हमारे मुल्क की कहन के आधार पर।

ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु-दर बहुत ऊँची है। कुल मिलाकर अरबी देशों में, रहन-सहन और शिक्षा के निम्न स्तर के परिणामस्वरूप यह अनुपात स्त्री-संतान के लिए, पुरुष-संतान से कहीं अधिक है। और अक्सर यह उपेक्षा के कारण होता है हालाँकि यह स्थिति बेहतर आर्थिक और शैक्षणिक मानदंडों के फलस्वरूप बेहतर हो रही है और स्त्री तथा पुरुषों के बीच शिशु मृत्यु- दर का अंतर गायब हो रहा है।

एक स्त्री-संतान अगर वह शहर में एक शिक्षित अरब परिवार में पैदा हुई है ज्यादा से ज्यादा मानवीय अहसासों और कम से कम निराशाजनक माहौल को पाती है। इसके बावजूद उस पल से जब वह घुटनों के बल चलना या अपने दो पैरों पर खड़ा होना शुरू करती है, उसे सिखाया जाने लगता है कि उसका यौन अंग 'डर' का सबब है और बड़ी सावधानी के साथ उसकी सँभाल उसे करनी है; विशेषतः वह हिस्सा जिसे जीवन के बहुत बाद में वह योनिच्छद (Hymen) के नाम से जानने लगती है।

स्त्री-संतानें, इसीलिए एक ऐसे माहौल में पाली-पोसी जाती हैं जो उनके यौन-अंगों के प्रदर्शन और स्पर्श के आगाहों और डरों से जुड़ा है। जैसे ही किसी स्त्री-संतान का हाथ अपने यौन-अंग को टटोलने की मुद्रा में पहुँचता है जोकि सभी बच्चों के लिए बड़ा सामान्य और स्वाभाविक जरिया है अपने शरीर की जानकारी का, तुरंत माँ की निगरानी भरी अँगुलियों या हाथों के जरिये चपत या घूँसों के द्वारा उसे सबक सिखाया जाता है, कभी-कभी पिता के द्वारा भी। किसी भी बच्चे को अचानक कभी भी थप्पड़ जड़ा जा सकता है; पर ज्यादा सावधान और तार्किक अभिभावक अविलंब चेतावनी या कड़े शब्दों में घुड़ककर इस काम को अंजाम दे सकते हैं।

अरब समाज में स्त्री-संतान को मिलने वाली शिक्षा, निरंतर चेतावनियों की श्रृंखला है उन चीजों के बारे में जिन्हें धर्म द्वारा हानिकारक, निषेधयोग्य, निंदनीय अथवा गैर-कानूनी माना जाता है। बच्चे को अपनी इच्छा को दबाने के लिए, खुद से जुड़ी हुई असल, मौलिक चाहनाओं और इच्छाओं से खाली करने के लिए और उस खालीपन को दूसरों की कामनाओं के अनुसार भरने के लिए सब कुछ करना पड़ता है। स्त्री-संतान की शिक्षा इसलिए, एक धीमे विध्वंस की प्रक्रिया में रूपांतरित हो जाती है - उसके व्यक्तित्व और मस्तिष्क के क्रमिक मरण के तौर पर जहाँ सिर्फ उसका बाहरी खोल चिपका रह जाता है। शरीर, हड्डियों, मांसपेशियों और खून का जीवन-रहित साँचा जो एक तनावपूर्ण रबर की गुड़िया में दौड़ रहा है।

एक लड़की जिसका कोई व्यक्तित्व नहीं रह गया है। आजाद होकर सोचने की ताकत और दिमाग का इस्तेमाल भी वह नहीं कर सकती, वह वही करेगी जो दूसरे उससे करने के लिए कहेंगे। इसी तरह से वह उनके हाथों का खिलौना और उनके फैसलों का शिकार बनती जाती है।

फिर वे दूसरे कौन हैं जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं? ये परिवार के या कभी-कभी परिवार से बाहर के पुरुष हैं जो जीवन के अलग-अलग मौकों पर उससे संबधित होते रहते हैं। ये पुरुष जो अलग-अलग उम्र के होते हैं और बच्चे से लेकर बूढ़े तक फैले होते हैं। सब अलग-अलग पृष्ठभूमियों से होते हैं। पर सबमें एक बात सामान्य होती है कि वे खुद उस समाज के शिकार होते हैं जो लिंगों को बाँटता है, और यौनाचार को पाप तथा निंदनीय मानता है और जिसे सिर्फ आधिकारिक विवाह-अनुबंध के दायरे में ही मंजूरी मिली होती है। यौन संबंधों के इस अनुमतिपूर्ण मार्ग के अलावा समाज किशोरों और युवा पुरुषों को किसी भी रूप में यौनाचार से मना करता है सिवाय स्वप्न-दोष के। मिस्री माध्यमिक विद्यालयों में किशोरों को 'रिवाज और परंपराएँ' नामक पाठ के अंतर्गत ऐसा शब्द दर शब्द पढ़ाया जाता है। यह भी वर्णित है कि हस्तमैथुन वर्जित है क्योंकि यह नुकसानदेह है और उतना ही खतरनाक है जितना किसी वेश्या से यौन संबंध बनाना। इसलिए जवान पुरुषों के पास तब तक इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता जब तक अल्लाह और पैगंबर के निर्देशानुसार शादी के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे न इकट्ठे हो जाएँ।

राशि चाहे छोटी हो या बड़ी, काम-काज और शिक्षा में खर्च होते-होते, खासतौर पर शहर में, जवान पुरुष को सालों लग जाते हैं। इसलिए ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरी युवक की शादी की उम्र अनुपात में बढ़ जाती है। अधिक दौलतमंद वर्ग के बेटों और बेटियों की शादी बहुत जल्दी हो सकती है लेकिन ऐसा बड़ा कम होता है। दूसरों के लिए शिक्षा और रोजगार के अलावा शादी में अटकाव वाला मामला - रहन-सहन की कीमत में जबरदस्त उछाल, घरों का बहुत महँगा होना और हद से ज्यादा किराया है। तो परिणामस्वरूप ऐसे जवान लड़कों की तादाद बढ़ती जाती है जो आर्थिक वजहों से शादी करने में अक्षम हो जाते हैं और लगातार बढ़ता हुआ अंतराल जहाँ एक ओर जैविक प्रौढ़ता और यौन आवश्यकताओं के बीच पैदा होता है वहीं आर्थिक संपन्नता और शादी के अवसर के बीच भी पैदा होता है। यह अंतराल औसतन, दस साल से कम की अवधि का नहीं होता। इसीलिए एक सवाल उठता है कि कैसे एक युवा अपनी स्वाभाविक यौन जरूरतों को इस अवधि के दौरान संतुष्ट करे, एक ऐसे समाज में जो हस्तमैथुन के खिलाफ है उसके शारीरिक और मानसिक रूप से हानिकारक होने के कारण और जो वेश्याओं के साथ, स्वास्थ्य के खतरे को देखते हुए, यौन संबंधों को बनाने की अनुमति भी नहीं देता। यौन रोगों के द्रुत प्रसार की वजह से वेश्यावृत्ति को बहुत सारे अरब देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके साथ ही वेश्या के साथ समय बिताने की कीमत भी बड़ी संख्या में जवान पुरुषों के लिए अब संभव नहीं रह गई है। शादी के बाहर यौन-संबंध और समलैंगिकता दोनों पूरी तरह से समाज द्वारा प्रतिबंधित हैं। जवान पुरुष बिना किसी समाधान के असहाय छोड़ दिए गए हैं।

तो ऐसे हालातों में, एकमात्र स्त्री, जो एक जवान लड़का या पुरुष आसानी से अपनी पहुँच में पा सकता है वह उसकी छोटी बहन है। बहुतेरे घरों में वह साथ लगे बिस्तर पर सो रही होती है या फिर एक ही बिस्तर पर एक किनारे। वह सो रही हो या जगी हो उसके हाथ उसे छूना शुरू करते हैं। किसी भी मामले में अधिक फर्क नहीं पड़ता वह जगी भी हो तो अपने बड़े भाई के खिलाफ उसकी हैसियत के कारण नहीं जा सकती जो रिवाजों और कानून के द्वारा उसे दी जाती हैं। अथवा परिवार के भय के कारण या फिर अपराध-बोध के बहुत गहरे जमे हुए अहसास की वजह से जो इस तथ्य से पैदा होता है कि वह भी उसके छूने से आनंद का अनुभव करती है या फिर बहुत छोटी होने के कारण जो यह समझने में असमर्थ है कि उसके साथ क्या हो रहा है?

बहुत सारी स्त्री-संततियाँ ऐसी घटनाओं से जूझती रहती हैं। परिस्थितियों के अनुसार वे समान या अलग हो सकती हैं। इस मामले में पुरुष कोई भी हो सकता है - भाई, चचेरा भाई, चाचा, मामा, दादा यहाँ तक कि पिता। यदि परिवार का सदस्य नहीं तो घर का चौकीदार, संरक्षक, अध्यापक, पड़ोसी का लड़का या कोई भी दूसरा पुरुष।

इस किस्म के यौन हमले बिना किसी ताकत के इस्तेमाल के घटित होते हैं। यदि लड़की बढ़ती उम्र की है और विरोध करती है तो फिर हमलावर कोमलता और चालाकी के मिश्रण के जरिये अथवा शारीरिक ताकत के जरिये उस पर काबू पाता है। अधिकांश मामलों में लड़की समर्पण कर देती है और किसी से भी शिकायत करने में डरती है। और अगर किसी तरह की कोई सजा मिलनी भी होती है तो वह लड़की पर आकर ही खत्म होती है। वह अकेली है जो अपनी इज्जत और कुँवारेपन को खोती है। पुरुष का कुछ नहीं बिगड़ता-खोता, जो कड़े से कड़ा दंड उसे मिल सकता है (अगर वह परिवार का सदस्य नहीं है तो) वह यह है कि वह लड़की से शादी कर उस पर अहसान कर दे।

बहुत लोग ऐसा सोचते हैं कि ऐसी घटनाएँ इक्का-दुक्का हैं, गिनी-चुनी हैं। पर इस मामले की असलियत यह है कि यह सब कुछ बहुत आम है और छुपा रहता है - बच्ची के अस्तित्व की रहस्यात्मक खोह के भीतर। न वह किसी को बताने का दुस्साहस करती है कि उसके साथ क्या हुआ और न ही पुरुष कभी यह स्वीकार करता है कि उसने क्या किया।

बच्चों अथवा जवान लड़कियों के साथ घटने वाले ये सभी यौन दुराचरण, शैशव-स्मृति विस्मरण (infantile amnesia) की प्रक्रिया के द्वारा भुला दिए जाते हैं। मानवीय स्मृति के पास एक प्राकृतिक क्षमता होती है कि जो बात वह भूल जाना चाहे वह भूल सके, खासतौर पर तब जब वह दर्दनाक घटनाओं, क्षोभ और अपराध-बोध की भावना से संबंधित हो। यह उन तयशुदा घटनाओं का एक बड़ा सत्य है जो बचपन में घटित हुई होती हैं और जिसकी जानकारी किसी को भी नहीं है; पर यह विस्मरण बहुत सारे मामलों में कभी पूरा नहीं होता क्योंकि इसका कुछ हिस्सा अवचेतन में दबा रह रह जाता है और वह सतह पर किसी भी मानसिक और नैतिक संकटग्रस्तता के समय उभर के ऊपर आ सकता है।

बीमार बुजुर्ग

अनगिनत मामले जो मैंने अपनी क्लीनिक में देखे, उन्होंने मुझे अपने जीवन के एक बड़े हिस्से को, समाज के दोगले चेहरे को उजागर करने में समर्पित कर देने के लिए प्रेरित किया, जिसमें हम रहते हैं - एक समाज जो खुले में मूल्यों और नैतिकता के उपदेश देता है पर चोरी-छिपे बिलकुल भिन्न आचरण करता है।

एक चिकित्सक होने के नाते मेरा काम मरीज की परीक्षा करने के पहले, यदि बीमारी शारीरिक है तो उसे निर्वस्त्र करना था और यदि बीमारी मानसिक है तो उन मुखौटों को हटाना था जिसमें लोग अपना स्वत्व, अपनी आत्मा ढके रहते हैं।

दोनों स्थितियों में, जब शरीर नग्न होता है अथवा स्वत्व नकाबहीन तो संबंधित व्यक्ति, भयंकर यातना और भय के कब्जे में होता है। यही कारण है कि बहुत सारे लोग शारीरिक या मानसिक रूप से खुद को आवरणहीन करने से इनकार कर देते हैं और तेजी से बिस्तर की चादरों को खींचकर अपना शरीर ढकने लगते हैं या फिर अपना सार्वजनिक मुखौटा व्यवस्थित करने लगते हैं; और यह सब करके वे लोगों को वह देखने से रोकने की कोशिश करते हैं जो असल में वे हैं और अपनी असलियत, निजता और स्व को अपने अचेतन की गहरी भूल-भुलैया से भरे खोह में छिपाए रहते हैं। क्योंकि सच कितना भी गहरा दफना दिया जाय वो हमेशा जीवित रहता है। जब तक मनुष्य जीवित है और साँस ले रहा वह छिपा सच भी साँस ले रहा होता है। जैसे धरती के अंदर गहरा दबा कीड़ा अचानक बाहर निकल आता है वैसे ही सत्य भी मनुष्य के दिमाग से उस वक्त बाहर आ जाता है जब उस पर किसी भी किस्म की चौकसी या पहरा नहीं रह जाता। मनुष्य भले ही कितना भी सजग रहे वह ज्यादातर बिना पहरे के ही होता है - गुस्से, वासना और डर के मौकों पर। ऐसे मौकों पर वे जल्दबाजी में अपने मुखौटे को पहनना भूल जाते हैं और समझदार आँखें आसानी से ताड़ लेती हैं कि अंदर क्या-कुछ भरा पड़ा है।

खासतौर पर ऐसे समय में यह अधिक घटित होता है जब व्यक्ति बीमार होता है। क्योंकि तब वह मुखौटे को अपनी जगह पर बनाए रखने में अक्षम हो जाता है। यह गिर जाता है और शरीर तथा आत्मा नग्न हो जाती है। कपड़ों, मुखौटों, नकाब, शर्म छिपाने की आड़ के गिरने से आत्मा और शरीर की नग्नता, अब बीमारी के खतरे के बनिस्बत कहीं कम भयोत्पादक होती है, क्योंकि स्वास्थ्य और जीवन को किसी भी कीमत पर बचाया जाना चाहिए।

ऐसे मामलों में मुझे आज भी वह शरारती, गहरी आँखों वाली एक लंबी सी लड़की याद आती है। वह बहुत सारी दिमागी और शारीरिक तकलीफों की शिकायत कर रही थी। मैं उसकी बीमारी के ब्यौरों में नहीं जाऊँगी लेकिन उसकी कहानी मेरी स्मृति में आज भी ताजा है। जाड़े की एक सर्द रात, मेरी बैठक में हीटर चल रहा था और जब हम शटर गिरा कर बैठे हुए थे, उसने मुझे बताया -

'मुझे याद है कि मैं पाँच साल की थी जब मेरी माँ मुझे अपने मायके साथ ले जाया करती थी। उनका परिवार एक बड़े से घर में Helislopolis (काहिरा) के नजदीक Zeitoun जिले में रहता था।

मेरी माँ अपनी माँ और बहनों से हँसती बतियाती रहती थी जबकि मैं परिवार के बच्चों के साथ खेलती रहती थी। घर खुशदिल आवाजों से चहकता रहता था, जब तक कि दरवाजे की घंटी नहीं बजती थी। यह मेरे नाना के आने की खबर होती थी। तुरंत ही सारी आवाजें दब जाती थीं। मेरी माँ बहुत धीमी आवाज में बात करने लगतीं और बच्चे सामने से गायब हो जाते। मेरी नानी दबे पाँव नाना के कमरे में जातीं जहाँ उन्हें नाना के कपड़े और जूते उतारने में मदद करनी होती थी, उनके सामने चुपचाप सर झुकाए हुए खड़े होकर।

बाकी परिवार की तरह बड़े हों या बच्चे, मैं भी अपने नाना से डरती थी और कभी भी उनकी मौजूदगी में खेलती-हँसती नहीं थी। पर, दोपहर के खाने के बाद जब घर के और बुजुर्ग आराम कर रहे होते तब वह मुझे थोड़ी कम कठोर आवाज में बुलाते - 'आओ, बगीचे से कुछ फूल चुन लेते हैं।'

जब हम बगीचे के एक कोने में पहुँच जाते तो उनकी आवाज मेरी नानी की तरह कोमल हो जाती और वह मुझे अपने बगल में लकड़ी की बेंच पर बैठने के लिए कहते जिसके सामने गुलाबों की क्यारी थी। वह मुझे कुछ लाल और पीले फूल पकड़ा देते और जब मैं उन रंगों और पंखुड़ियों में डूब जाती तो वे मुझे अपनी गोद में बिठाकर दुलराने और गाने लगते जब तक कि मैं आँखें बंद कर सोने की हालत में न पहुँच जाऊँ। लेकिन मैं कभी सोती नहीं थी क्योंकि मैं हर वक्त उनके हाथ को महसूस कर सकती थी जो बड़े चुपके से मेरे कपड़ों के अंदर रेंगता था और उनकी उँगली मेरे निक्कर के अंदरूनी हिस्सों में चली जाती।

मैं केवल पाँच साल की थी लेकिन जाने कैसे मुझे यह पता था कि नाना जो कर रहे हैं वह गलत और अनैतिक था। और अगर मेरी माँ को यह पता चला तो वह मुझ पर ही गुस्सा होंगी और फटकारेंगी। मैंने सोचा कि मुझे अपने नाना की गोद से उतर जाना चाहिए और अब जब वह मुझे बुलाएँ तो उनके साथ बगीचे में आने से इनकार कर देना चाहिए।

पर कुछ दूसरी बातें भी साथ में ही चल रही थीं। सिर्फ पाँच साल का होने के बावजूद मुझे यह महसूस हुआ कि मैं अच्छी बच्ची नहीं हूँ क्योंकि मैं नाना की गोद से उतरने के बजाय वहीं बैठी रही। और उससे भी अधिक ग्लानि इस बात की थी कि उनके हाथों की हरकत से मुझे भी अच्छा लग रहा था। और इसी बीच जब वह मेरी माँ को मेरा नाम पुकारते सुनते तो झट अपना हाथ वापस खींच लेते। मुझे हिलाते जैसे वह मुझे नींद से जगा रहे हों और कहते, 'तुम्हारी माँ बुला रही है'। मैं अपनी आँखें ऐसे खोलती जैसे नींद से जगी हों और सपाट सा चेहरा लिए माँ की ओर भागती जो किसी पाँच साल के बच्चे का नहीं हो सकता था। वह मुझसे पूछतीं, 'कहाँ थीं तुम?' और मैं बड़ी मासूमियत भरी आवाज में उन्हें कहती, 'बगीचे में नाना जी के साथ'।

यह जानकार कि मैं बगीचे में नाना के साथ हूँ वह बड़े सुकून और सुरक्षा का अनुभव करतीं। वह हमेशा मुझे बगीचे में अकेले आने के लिए आगाह किया करतीं और 'उस आदमी' माली के बारे में अपनी चेतावनी को दोहराना कभी नहीं भूलती थीं जो चिकना सा लबादा पहने रहता था और फूलों पर पानी का छिड़काव किया करता था। ऐसे में मुझे केवल माली से ही नहीं बल्कि पाइप से निकलने वाली पानी की बूँदों से भी डर लगता था।

फिर जब-जब नाना घर की सीढ़ियाँ चढ़ते, अपने रुआब के साथ जिससे सब डरते थे, तस्बीह उनके हाथों में चलती रहती थी। मैं यह सोचने लगी थी कि नाना जो मुझे बगीचे में दुलराते-सहलाते हैं वो वह नाना नहीं हैं जो अपनी मेज पर बैठते हैं और जिनसे मैं डरती थी। कभी-कभी मुझे लगता था कि मेरे दो नाना हैं।

जब मैं दस साल की हुई नाना गुजर गए। मैं उनकी मौत से दुखी नहीं थी। इसके उलट एक अजब सी धुँधली खुशी का अहसास था और मैं बच्चों के साथ हँसती खेलती कूद-भाग रही थी। लेकिन माँ ने मुझे फटकार लगाई और यह कहकर घर में बंद कर दिया कि क्या तुम्हें पता नहीं की नाना नहीं रहे? जरा भी सलीका नहीं है तुम्हें?

मैं उनसे पूछने को हुई, क्या नाना को पता था कि सलीका किसे कहते हैं? पर यह पूछ सकने का मेरे पास साहस नहीं था सो मैं चुप रही और यह बात मेरे दिल में ही रही। यह पहला मौका है डॉक्टर जब मैं किसी को अपनी आपबीती सूना रही हूँ।'

मैंने वह पूरा ब्यौरा नहीं दिया है जो उस महिला ने कई साल पहले उस रात मुझे बताया था। उसने तभी अपना दिल मेरे सामने खोला जब उसे यकीन हो गया कि मैं उसके बारे में कोई नैतिक निर्णय कायम नहीं करूँगी। बहुत सारी लड़कियाँ और औरतें जो मेरी क्लीनिक में आती थीं, अपने दिल के अंदर छिपे हुए रहस्यों को उघाड़ने में बड़ी हिचक से भरी होती थीं। पर एक बार आत्मविश्वास और भरोसा कायम हो जाने पर वे कितनी ही दर्दनाक बातों को साझा करने लगती थीं जो वे सालों से ढोती आ रही थीं।

अन्याय से भरी व्यवस्था

ऐसी घटनाओं की संख्या जो प्रकाश में आती हैं वे असल में घटित होने वाली संख्या से अनुपात में बेहद कम हैं। बच्ची या छोटी लड़की डर या शर्म के मारे सारे राज भीतर ही रखती है। चाहे वह कुछ भी बोले या पुरुष किसी यौन-दुराचार में सरेआम धर भी लिया जाय तो भी परिवार वास्तविकता को छिपाता है और अपने सम्मान तथा प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए कानून की मदद लेने से परहेज करता है।

परिवार की इज्जत और रुतबा बिला शक खत्म हो सकता है अगर किसी बेटी का योनिच्छद समय से पहले टूट जाय भले ही वह बलात्कार की शिकार ही क्यों न हो गई हो। ऐसा इसलिए क्योंकि एक बलात्कार की घटना को पूरी तरह से दबा कर रखा जाता है जो बमुश्किल ही सामने आती है और इसीलिए किसी हमलावर के बच निकलने की पूरी गुंजाइश होती है। असल अपराधी बचे घूमते हैं, पहुँच से दूर और कानून के हाथों से सुरक्षित। वहीं पीड़िता जिसने किसी भी वजह से, बलात्कार के कारण किसी भी उम्र में यहाँ तक कि बहुत छुटपन में, अपनी मासूमियत और कुँवारेपन को खो दिया - अपनी इज्जत को जीवन भर के लिए खो देने को अभिशप्त रहती है। उसका कुँवारापन उसका गर्व है और अगर वह एक बार चला गया तो फिर लौटाए न लौटेगा।

यह आम फहम तथ्य है कि हमारे समाज में, बच्चियाँ अक्सर बलात्कार के विभिन्न दर्जों से गुजरती हैं। यहाँ तक कि सात साल से कम उम्र की बच्चियाँ, बड़े-बुजुर्गों और जवान मर्दों के द्वारा अप्रत्याशित और बेबूझ हमलों का अमूमन शिकार बनती रहती हैं जोकि ज्यादातर परिवार के सदस्य ही होते हैं जैसे कि भाई, चाचा, यहाँ तक कि पिता या फिर घर में रहने वाले नौकर और चौकीदार।

यह त्रासदी इस बात से और बढ़ जाती है कि जब एक पुरुष हमलावर न केवल पीड़िता की रक्षा करने से खुद को अलगा लेता है बल्कि कुछ मौकों पर तो उसके प्रति हो रहे अत्याचार में सहभागी भी होता है और उसकी हत्या तक कर डालने में मुख्य भूमिका भी अदा करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह शक के घेरे से बच निकलने की कोशिश करता है और परिवार की इज्जत को बचाने वाले तारणहार के रूप में खुद को पेश करता है। ऐसी दुखद घटनाएँ धड़ल्ले से मौजूद हैं और शोधकर्ताओं तथा लेखकों द्वारा, उन्हें चुप कराने की पूरी कोशिशों के बावजूद, संज्ञान में लाई जाती रही हैं।

मैं निजी रूप से ऐसी कुछ हृदयविदारक घटनाओं से रू-ब-रू हो चुकी हूँ। उनमें से सबसे भयावह है उस चाचा के बारे में जो पूरी तरह से अपने भाई की बेटी के साथ यौन-संबंध में था। और जब मामला खुला दोनों भाइयों ने मिलकर, अपने परिवार की इज्जत दाँव पर लग जाने के खतरे का अंदाजा लगाते हुए, उस लड़की को जहर दे दिया और खबर फैला दी कि वह अपने कुँवारेपन को खो चुकी थी।

ऐसे मामलों से जुड़े अपराध बहुत छिपा कर रखे जाते हैं और बड़ी कम संख्या में पुलिस या अदालत के संज्ञान में आते हैं। यहाँ तक कि जब मामला अदालत में पेश होता है तो जज ज्यादातर पीड़िता और उसके परिवार की इज्जत को बचाने का प्रयास कर मुकदमे को बंद करने का फैसला देते हैं। परिणामस्वरूप हमलावर बरी हो जाता है। कुछ मामलों में 'नाजुक हालातों के मद्देनजर' लड़की से शादी करवाने का भी प्रचलन है। इसी तरह के मिलते-जुलते मामले स्कूलों में भी देखने को मिलते हैं जो खासतौर पर लड़कियों से जुड़े हैं, जहाँ अपराधी पुरुष, अध्यापकों में से एक है और बतौर सजा उसका तबादला कर दिया जाता है किसी दूसरे स्कूल में या फिर किसी दूर-दराज इलाके में।

मुझे एक घटना याद है जिसमें एक स्कूल टीचर ने सात साल से लेकर बारह साल तक की नौ छात्राओं को अपनी हवस का शिकार बनाया। मामला अदालत तक पहुँचा और जज ने पूरी प्रक्रिया को, बहुत सारे परिवारों को बदनामी से बचाने के लिए रोक दिया। मुल्जिम का दूसरे किस्म की नौकरी में तबादला कर दिया गया।

मुकदमा बंद करने का फैसला कुछ इस तरह था -

इस तथ्य के बावजूद कि सभी सबूत, मुल्जिम को मुजरिम ठहराते हैं। हम इस बात को कबूल करते हैं कि उस पर बहुत सारी बच्चियों के साथ दुष्कर्म का दोष लगना चाहिए और सजा भी मिलनी चाहिए; अदालत ने इस मुकदमे को बंद करने का फैसला लिया है। पीड़िताओं में अधिक संख्या बहुत कम उम्र की बच्चियों की है और उन्हें आपराधिक अधिकरण में बतौर गवाह बुलाया जाना सही नहीं है। अभियोजन पक्ष का वकील क्षमाप्रार्थी है और मुल्जिम के खिलाफ मुकदमा बंद करने की सिफारिश करता है और उसका लड़कियों को पढ़ाने वाले रोजगार से किसी दूसरे काम में तबादला करने की माँग करता है।

बलात्कार के मामले में, ट्यूनीशिया अपने कानूनों में अन्य अरब मुल्कों की अपेक्षा तेजी से आगे बढ़ा है। बलात्कार से जुड़े कानून बड़े पैमाने पर बदले गए हैं। हालाँकि मुल्जिम के खिलाफ प्रक्रिया वहाँ भी रोक दी जाती है अगर वह पीड़िता से शादी करने के लिए तैयार हो जाय।

1973 में मैंने Ein shams विश्वविद्यालय, काहिरा के चिकित्सा विभाग में एक शोध-कार्य शुरू किया। इस अध्ययन में समाज की विभिन्न श्रेणियों की शिक्षित तथा अशिक्षित परिवारों की 160 मिस्री लड़कियों तथा औरतों को शामिल किया गया। अध्ययन के परिणामों में से एक यह था कि बड़े-बूढ़ों का छोटी बच्चियों पर किया जाने वाला यौन हमला सामान्य घटना है। इसका प्रतिशत अशिक्षित परिवारों में ४५ फीसदी है जबकि शिक्षित परिवारों में ३३.७ प्रतिशत है जोकि बहुत कम भी नहीं है। इसका अर्थ है कि लगभग एक तिहाई लड़कियाँ इस किस्म के अनुभव से गुजर चुकी हैं। यह अनुपात १९५३ में अमेरिका में kinsey द्वारा कराए गए ऐसे ही एक अध्ययन के मुकाबले जहाँ आँकड़ा २४ फीसदी था, से कहीं अधिक है।

इन दोनों अध्ययनों की तुलना कुछ कारणों से बड़ी जटिल है क्योंकि पचीस वर्षों का समयांतराल भी है और मिस्र और अमेरिका में किए गए अध्ययन में दोनों समाजों, समूहों के पर्यावरण, दृष्टिकोणों और कार्यप्रणालियों में पर्याप्त अंतर है।

पर एक बात जो बिना झिझक के इन दोनों अध्ययनों के आँकड़ों के आधार पर कही जा सकती है वह यह कि इस तरह की घटनाएँ चारों ओर फैली हुई हैं। यह उन लोगों द्वारा फैलाए जा रहे उस सामान्य नजरिए के बिलकुल खिलाफ जाती हैं जो अपनी गर्दनें रेत में दबाकर यह कहते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है और अगर है भी तो यदा-कदा है। मैं इस तरह के नजरिए के बिलकुल खिलाफ हूँ और उलट इस बात की हिमायती हूँ कि ऐसी घटनाएँ हर समाज में मौजूद हैं जिसमें अरब समाज भी शामिल है। ये कभी-कभी की घटनाएँ नहीं हैं जैसा बहुत लोग कहते हैं बल्कि बहुत सारे मुद्दों में जो कुछ भी होता है वह सभी संबंधित लोगों द्वारा गुप्त रखा जाता है।

एक औरत के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर जो लोगों की समस्याओं को खुले दिल-दिमाग सुनती-समझती है, मैं बिना किसी अतिशयोक्ति के यह कहने का जोखिम उठा सकती हूँ कि हमारे समाज की बहुसंख्यक लड़कियाँ अपने छुटपन में ही विभिन्न तरह के यौन हमलों से वाकिफ हो जाती हैं, जोकि हाथ से दुलराने और इधर-उधर शरीर को छूने से लेकर मैथुन तक पहुँचते हैं। एक बच्ची बिना वाकिफ हुए अपने कुँवारेपन से वंचित हो सकती है, वह इसे भूल कर खत्म कर सकती है या फिर इसे एक डरावने सपने की तरह याद रख सकती है जो जीवन भर के लिए उसके मानसिक स्वास्थ्य को तहस-नहस कर सकता है। ऐसे वक्त जिस सजा से बचने के लिए वह सारा प्रयास करती है, वही सजा बड़े होने पर उस पर झपट कर वार करती है जब उसके पति अथवा माँ-बाप को यह पता चलता है कि वह शादी की रात कुँवारी नहीं है।

शोध के दौरान मैंने कुछ वक्त, विधि मंत्रालय के विधि-चिकित्सा शास्त्र विभाग में बिताए। एक शोध-छात्र ने उस रजिस्टर के कुछ हिस्से पढ़कर सुनाए जो बच्चियों और लड़कियों के विरुद्ध होने वाले विभिन्न तरह के यौन दुराचारों से संबंधित थे। उदाहरण के तौर पर, छात्राओं के एक स्कूल में एक अध्यापक एक तथा दूसरे तरह के यौन संबंधों में अपनी कक्षा की सभी लड़कियों के साथ लिप्त था। कुछ के साथ उसका संबंध मात्र सहलाने, दुलराने तक सीमित था और कुछ के साथ मैथुन तक। इस बात ने मेरा ध्यान उस माँ की कहानी की ओर भी खींचा जो एक दिन उस शोधकर्ता के पास बौखलाई हुई पहुँची और बताया कि उसकी तीन साल की लड़की को अपार्टमेंट बिल्डिंग के चौकीदार ने यौन-रूप से उत्पीड़ित किया जिसमें वे रहते थे। वह बच्ची को पकड़कर पुचकार रहा था और उसके गुप्तांगों को छू रहा था।

काहिरा के पागलखानों में घूमने के दौरान, मैंने बलात्कार से जुड़े उन रिकॉर्ड्स को देखने की इच्छा जाहिर की जहाँ मरीज मानसिक बीमार घोषित कर दिया गया था। रिकॉर्ड्स को देखने पर एक खास किस्म की मानसिकता का पता चला। ढेरों मरीज या तो धार्मिक संस्थानों में पढ़ रहे थे या फिर पढ़ा रहे थे। उनमें से एक ने जो वार्तालाप के दौरान पूरे वक्त आँखों में आँसू भरे रहा, मुझे बताया -

मैं पूरी तरह से धार्मिक और एक इज्जतदार आदमी हूँ। मैंने जिंदगी में कभी हस्तमैथुन नहीं किया; मैं अपना मुँह छिपा लेता था जब स्त्री से सामना होता था ताकि मेरी पवित्रता बरकरार रहे। यह मेरे जीवन की पहली गलती थी और यह मेरी बदकिस्मती भी थी कि सबके सामने खुल भी गई। सभी इनसान गलतियाँ करते हैं। अल्लाह ही है जिसे पूजा जाता है और जिसका पाक नाम जन्नत तक फैला है। उसके अलावा कोई सच्चा और पूरा नहीं।

वार्ड के तमाम मरीजों में से, जिनसे घिरी हुई मैं बैठी थी, एक जवान लड़का मेरे कान में फुसफुसाया -

अल्लाह दयालु और रहमदिल है। पर इनसानों में दया नहीं है। जैसे मेरा मामला है। मैं एक मैदान में पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। एक छोटी लड़की मेरे पास आई और मेरे साथ खेलने लगी। खेलते हुए मैंने अपनी उँगली उसके 'वहाँ' रख दी। मेरा उसे नुकसान पहुँचाने का इरादा नहीं था। वह चिल्लाई नहीं, बल्कि जो मैंने किया उससे वह खुश दिखाई दे रही थी। पर लोगों ने मुझे देख लिया। उन्होंने मुझे घेर कर मारना शुरू कर दिया। मुझ पर बलात्कार का आरोप लगाया गया और मैं यहाँ आ गया।

इन तमाम मामलों में से एक, जो औरतों और विकृतियों पर अपने अध्ययन के दौरान मैंने देखे-परखे थे, युवा महिला चिकित्सक का था जिसकी अपने ही एक सहपाठी से सगाई हुई। शादी की रात उसके पति को पता चला की वह कुँवारी नहीं थी। उसने उसे बताया कि बचपन में ही उसका कुँवारापन खत्म हो गया था जिसका दोषी उसका पिता था। पर उसका पति इस धक्के को झेल न सका और उसने उसे तलाक दे दिया। वह लड़की अपने माँ-बाप के घर लौट आई। अपने पिता के डर के कारण वह सच अपनी माँ को न बता सकी। वह जानती कि वह भली औरत उसे पागल करार देती और पिता पूरे उत्साह के साथ माँ का साथ देकर सारा दोष उस (लड़की) पर ही मढ़ देता। लड़की ने जी भर कर खुद को रोका, रोती रही और अंत में माँ के सामने सब उगल दिया जो कुछ हुआ था। बदले में वह अभागी औरत, इस भयंकर खुलासे से कि उसके पति ने क्या कर डाला, सदमे में आ गई और लगभग ढेर हो गई। हालाँकि, पिता ने बेटी पर झूठ बोलने का आरोप लगाया और उसे जानवरों की तरह पीटा। वह बुरी तरह से दहशत में चली गई जिसका उसके पिता ने लाभ उठाया। उसने उसको पागल करार दिया और इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया। जो मनोचिकित्सक उस लड़की को देख रहा था, उसने लड़की की बात न मानकर, पिता की बात पर यकीन किया। परिणाम यह हुआ कि न केवल उस लड़की ने अपनी इज्जत और आबरू खोई, अपना पति, पूरा भविष्य और अपने अस्तित्व को ही समाप्त कर लिया। औरों की तरह अब वह खुद को भी मानसिक रूप से विक्षिप्त समझने लगी थी।

घटनाओं, कहानियों और मामलों के अंतहीन सिलसिले सालों मेरे सामने आते रहे। उनमें से कुछ समय के साथ धुँधला गए और कुछ आज भी जीवंत हैं। अभी भी बहुत सारे रिकॉर्ड्स और फाइल मेरे पास हैं। जैसे एक महिला जब वह बच्ची थी अपने चाचा के द्वारा यौन दुराचार का शिकार हुई। उसने उसे, घर में छत के ऊपरी भाग में बने मुर्गी के दड़बे के पास दबोच लिया और डर के मारे काँपते हुए लड़की ने उसके वहशीपन के सामने समर्पण कर दिया। यह घटना जीवन भर के लिए रहस्य बन कर रह गई। जब वह पुरुष मरा तो वह बड़ी हो चुकी थी। किसी भी तरह का शोक उसके चेहरे पर नहीं था।उसने बावजूद अपनी माँ की हिदायत और फटकार के मातम में जाने से और काले कपडे पहनने से इनकार कर दिया। उसकी माँ ने उसे मारा और कहा कि वह पगला गई है। पिता ने भी माँ का साथ देते हुए उसे पागल करार दिया। हालाँकि वह ऐसे मामले में दूसरी औरतों से अधिक किस्मत वाली साबित हुई। उसे पागलखाने नहीं भेजा गया और न ही उसके पति को शादी की पहली रात यह पता चला कि वह कुँवारी नहीं है। वह इतनी बुद्धिमान तो निकली कि उसने अपनी शारीरिक दिक्कत का निदान पहले ही ले लिया था।

जब जवान लड़कियों और बच्चियों पर हमले इस कदर तेज हैं तो कुँवारेपन के खोने को छिपाने के लिए तमाम तरह की तिकड़में इस्तेमाल में लाना स्वाभाविक हो जाता है। विधियाँ जो इसके लिए काम में लाई जाती हैं वे या तो योनिच्छद (Hymen) का ऑपरेशन है या कौमार्यभंग के समय आने वाले खून की छद्म झलक। वे लड़कियाँ सबसे दुर्भाग्यशाली होती हैं जो ऑपरेशन को भौतिक संसाधनों की कमी के कारण नहीं करा सकतीं या शादी की रात स्वाँग करने में पर्याप्त अनुभवी नहीं होतीं। गरीब बेचारी लड़कियों की सबसे अधिक पाई जाने वाली श्रेणियों में से एक है - घरेलू नौकरानियों की, जो आमतौर पर ग्रामीण इलाकों से आती हैं। ये शहर-कस्बों में नौकरी करने के लिए अपने पुश्तैनी गाँव को छोड़ देती हैं और मध्य या अमीर परिवारों में नौकरानी के बतौर काम करती हैं। ये लड़कियाँ परिवार के जवान लड़कों या कभी-कभी बड़े-बूढ़ों के लिए एकमात्र यौन-वस्तु की उपलब्धता के बतौर काम करती हैं। एक किशोर लड़का अपनी जरूरतों के लिए बहन, चचेरी बहन, स्कूल-कॉलेज की लड़कियों से कहीं ज्यादा ऐसी लड़कियों को उपयुक्त पाता है। यदि यौनाचार नौकरानी के साथ हो तो ऐसे में वे अपराध-बोध के लिए कम से कम जिम्मेदार होते हैं। और साथ ही यह अहसास भी कि वह अपने वर्ग की किसी लड़की के साथ ऐसा नहीं कर रहे हैं बल्कि एक ऐसे प्राणी के साथ कर रहे हैं जो हैसियत में उनसे बेहद नीचे है। और वह किसी वेश्या से अधिक बेहतर होती है क्योंकि उसके साथ यौन-संबंध मुफ्त में बनाया जा सकता है और यौन-रोगों का भी कोई खतरा नहीं होता।

पत्नी की बीमारी के वक्त, उसके घर में न होने के समय, माहवारी या गर्भावस्था के दौरान परिवार का इज्जतदार मुखिया - पति या पिता, नौकरानी को बिस्तर पर खींच ले आते हैं। तब भी जब उनकी पत्नी यौन-अरुचि का शिकार हो। वस्तुतः ज्यादातर पत्नियाँ ठंडी ही होती हैं, क्योंकि बचपन से ही उनका पालन-पोषण इस ढंग से होता है कि वे यौन और शारीरिक रूप से दमित हो जाती हैं या फिर सच्चे प्रेम एवं आकर्षण की कमी के कारण भी अथवा पति-पत्नी के बीच स्वस्थ और सहज समझ की कमी के कारण। बहुत सारी शादियाँ आर्थिक कारणों से भी त्रस्त रहती हैं जो अपने आप में ही पति पत्नी के वास्तविक संबंध को न पनपने देने के लिए पर्याप्त होती हैं। यदि हम इसीमें परिवार की पितृसतात्मक प्रवृत्ति को जोड़ दें जहाँ पुरुष प्रधान-सत्ता के रूप में काम करता है और अपना प्रभुत्व स्थापित करता है, तो वहाँ भावनात्मक और शारीरिक संबंधों के विकास के बड़े कम मौके होते हैं।

इसलिए छोटी नौकरानियाँ, भूखे पुरुषों के लिए यौन चरागाह की तरह होती हैं जो यौन कुंठाओं की प्यास से तड़प रहे होते हैं। और इसकी पूर्ति की आशा और मौके के लिए हमेशा ताक में रहते हैं।

जब मैं पहले Benha और फिर Giza में एक डॉक्टर की हैसियत से अपनी क्लीनिक में काम कर रही थी या अलग-अलग सामान्य अस्पतालों में जहाँ मैंने अपने काम के लिए सालों बिताए। मैं ऐसी कई छोटी नौकरानियों से मिली जिनकी उम्र पंद्रह-सोलह साल से अधिक की नहीं थी और फिर भी अवैध गर्भ के कारण जिनका पेट फूला हुआ था।

अवैध गर्भ लिए, अविवाहित लड़की समाज की निगाह में एक बदचलन स्त्री मानी जाती है जिसकी कोई इज्जत और आबरू नहीं है। वह जमाने का अकेले सामना करती है और उसकी जिंदगी या तो आत्महत्या पर खत्म होती है या हत्या पर जोकि उसका पिता या परिवार का अन्य पुरुष सदस्य कर सकता है। या इसके अलावा वह गर्भपात के दौरान मारी जाती है जहाँ पुराने तरह के गँवई तौर-तरीकों से इसे अंजाम दिया जाता है क्योंकि तमाम खतरों के बावजूद स्त्री के पास यही एकमात्र शरण-स्थली बचती है। और तो और अगर गर्भपात के बाद वह बच जाती है तो कानून की निगाह में गुनहगार बनती है क्योंकि कानूनी रूप से गर्भपात अवैध माना जाता है। यदि वह बच्चे को रखती है तो जिंदगी अपमान और प्रताड़ना का एक लंबा और अनंत सिलसिला हो जाती है।

दूसरी ओर घर का मुखिया, परिवार का इज्जतदार बेटा, सम्मानित पति सबकी निगाह में भले और प्रशंसा के पात्र होते हैं। वे समाज के नगीने हैं जो रात के अँधेरे में निरीह देह पर धावा बोलते हैं, उसके साथ हमबिस्तर होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुष बेदाग होता है, अपनी जिंदगी को इज्जत और रुतबे के साथ जीना जारी रखता है और उस कानून के हाथों से बाहर रहता है जोकि वास्तव में गैर-कानून है और उस न्याय से जोकि अन्याय है। यह माना जाता रहा है कि ऐसी घटनाएँ यदा-कदा हैं। लेकिन शोधकर्ता और विशेषज्ञ जो औरतों तथा बच्चियों के जीवन से संबंधित अध्ययन में रुचि रखते हैं वे जानते हैं कि ऐसी बातें सच से कोसों दूर हैं। क्योंकि पृथक्कृत समाज, लैंगिकता के कठोर अलगावों से बनता है और यौन-निराशा तथा दमन के माहौल को पैदा करता है। लड़के एवं लड़कियों, स्त्री और पुरुषों के बीच सहज संबंध की गैरमौजूदगी दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति के तमाम रास्तों को खोलती है और परिवार के भीतर ही, जहाँ ऐसे अवसर प्रतिबंधित माने जाते हैं, परिवार के सदस्यों में सबसे आसान शिकार छोटी बच्चियाँ और लड़कियाँ हो जाती हैं जो अज्ञानता, डर और वर्चस्व के सामने घुटने टेक देने के कारण, प्रतिरोध करने का साहस नहीं करतीं, इस बात से बेखबर कि उन पर क्या बीत रहा है। ज्यादातर, यह निर्धन सामाजिक वर्गों का बड़ा सत्य है जहाँ स्वच्छंद मैथुन बड़ी सामान्य प्रघटना है क्योंकि भीड़ बहुत होती है। आमतौर पर आठ से दस सदस्यों का परिवार एक ही कमरे में रहता है। माँ, बाप, भाई, बहन और परिवार के अन्य सदस्य लगभग शरीर से सटे हुए सोते हैं। और यह स्थिति विभिन्न तरह की यौन-समस्याओं को सामने लाती है।


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हिंदी समय में नवल अल सादवी की रचनाएँ