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लेख

हाउल : 'चीख' या आर्तनाद ?
देवेंद्र मोहन


हाउल महज़ एक 'चीख' है या कई सारी सम्मिलित आवाज़ों की 'चीखें' यह विवेचना का विषय रहा है। लगभग बासठ-तिरसठ वर्ष पूर्व लिखी गई यह कविता न केवल एलेन गिंसबर्ग (1926-1997) की बल्कि बीसवीं सदी की एक 'लैंडमार्क' रचना है, इतिहास बन चुकी है। 'हाउल चीख से ज़्यादा आर्तनाद है। आर्तनाद ही है। बीसवीं सदी के तमाम देशों, खास तौर पर अमेरिका को मद्देनज़र रखकर लिखी गई 'हाउल' वह सारा कुछ समेट लेती है जिससे अमेरिका जैसे देश को गढ़ा गया, अमेरिका अगर उद्यमियों और उद्योग की जननी है तो वह मोलोक जैसे देव-राक्षसों का भी प्रतीक है जिसकी वेदी पर न मालूम कितने मासूम बच्चों की बलि दी जाती है।

यह मोलोक ईंट-गारे, रेत, पत्थर, सीमेंट, लोहा, तेल, पेट्रोल, फैक्ट्रियों, धुआँ, बल, सैन्य शक्ति, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, दमन चक्र, अस्त्र-शस्त्र के अस्तबलों, विनाश, हिंसा, विरोध और विरोध के ख़िलाफ़ विरोध और विरोध के दमन, दादागिरी, और सबसे बड़ी ताक़त उस एक आँख वाले डॉलर (जिसका कविता में जिक्र है) को मिला-जुलाकर, खड़ा किया जाता है।

मोलोक की दानवी ताक़त से सब कुछ पस्त है। और उसकी यह ताक़त द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वाले सालों में और बढ़ी, है जिसके फलस्वरूप कुछ ऐसी विरोधी आवाजें पैदा हुई हैं जो एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर रही हैं जिसे जापान, कोरिया, वियतनाम और लाखों जगहों पर अमेरिका के होने पर कोफ़्त है, नाराज़गी है, कटुता है, एक ऐसी पीढ़ी है जिसने अमेरिका के हर बुरे पहलू को देखा है, झेला है और जिसे ध्वस्त करने के लिए वह प्रयत्नशील है।

इस पीढ़ी ने अच्छे कलाकार, कवि, लेखक, साहित्यकार, सिनेमा, मूर्तिकला, बीट पीढ़ी, एक मुख्तलिफ़ संस्कारों वाले युवजन, मादक नशे के मद्दाह, बीमारियाँ, पागल समझे जाने वाले बाहोश लोगों को भी पैदा किया है, और एड्स के भयावह परिणामों को भी भुगता है, और इसके बावजूद एक स्वतंत्र, स्वायत्त, सार्वभौमिक संसार, सत्ता की परिकल्पना भी की है। विश्व युद्ध के लगभग दस साल बाद शुरू की गई कविता उस दुनिया को उज़ागर करती है जिसे दुनिया ने टुकड़ों टुकड़ों में देखा तो था पर एक ही जगह पर इस तरह मुखरित होते नहीं देखा था।

इस कविता में सब तरह के इनसान और स्थितियाँ हैं और हर तरह से निजी या सामाजिक कारणों से त्रस्त-गरीब, भूखे, नशे पालने वाले, यौन प्रक्रिया के अभिलाषी, दिशाहीन, आत्म-पीड़ा/ग्लानि/आत्मश्लाघा से परिपूर्ण, कविता के कई किरदारों के बावजूद दो किरदार अलग से नज़र आते हैं। एक तो गिंसबर्ग की अपनी माँ नेओमी गिंसबर्ग, जिसकी मानसिक उपचार के दौरान मौत हुई थी और जिसने कवि को बुरी तरह झँझोड़कर रख दिया था; और दूसरे, कार्ल सॉलोमन जिससे गिंसबर्ग की ऐसी कोई खास पहचान न थी पर जिस तरह वह विक्षिप्तावस्था में मरा, गिंसबर्ग को और भी परेशान कर गया था। और इस सब की परिणति 'हाउल' की शक्ल में हुई।

उस समय ज़्यादातर लोगों ने समझा कि एलेन गिंसबर्ग की मानसिक स्थिति खराब है, और जो शायद थोड़े ही वक्त का मेहमान है, पिता लुइस गिंसबर्ग को तो लगने लगा था कि एलेन अपनी माँ की तरह ही खत्म हो जाएगा, किसी पागलखाने में। गिसंबर्ग के परम मित्र और पथ निर्देशक विलियम कार्लोस विलियम्स ने 'हाउल' के परिचय में लिखा : 'मैं तो सोचता था कि यह आदमी कविताएँ लिखने के लिए ज़िंदा नहीं बचेगा...'

लेकिन एलेन गिंसबर्ग ज़िंदा रहा और खूब रहा। अपनी यातनाओं से भरी युवावस्था से उबरकर उसने खूब लिखा यहाँ तक कि बीसवीं सदी के बेहतरीन लेखकों और दिमागवालों में उस का शुमार होने लगा। अपने काम के बारे में वह कहता : ''यह सब मेरे दिमाग का ग्राफ है।''

'हाउल' और उसकी बाद वाली अन्य कविताओं में उसके दिमागी विस्तार या मेंटल लैंडस्केप का परिचय मिलता है। उसे वॉल्ट व्हिटमैन की कविता शैली ने बेहद प्रभावित किया; उसे विलियम ब्लेक की दृष्टि से बहुत कुछ सीखने को मिला; उसने उपन्यासकार और कवि मित्र जैक केरुऑक के 'बॉप' गद्य को भी अख्तियार किया; उसने सुदूर पूर्व को करीब से देखा और भारत में लंबा प्रवास किया - बंगाल से बनारस और बनारस से दिल्ली के बीच में पड़ने वाले शहरों में कई कई महीने गुजारे; श्मशानों में अघोरी पूजा से लेकर भगवान बुद्ध में प्रश्रय लेते हुए ऐसी अनुभूतियाँ समेटीं जो दिन-ब-दिन उसे कवि और लेखक के रूप में निरंतर विकसित करती गईं।

इसी बीच उसे अमेरिका में 'हाउल' जैसी 'अश्लील' और 'भद्दी' रचना के लिए मुकदमों के साथ भी दो-चार होना पड़ा। लेकिन 'हाउल' के प्रकाशन के बाद - जिसे छापने और बड़े पैमाने पर प्रसारित करने का श्रेय कवि-प्रकाशक लॉरेंस फर्लिंघेटी को जाता है - एलेन गिंसबर्ग एक बहुत बड़ी हस्ती बन गया। उसकी अन्य महान कविताओं में 'कैडिश', 'ए सुपरमार्केट इन कैलिफोर्निया' और 'अमेरिका' का शुमार होता है, और जिन्हें करोड़ों पाठकों ने चाव से बार-बार पढ़ा है, और चमत्कृत, विस्मित और प्रभावित हुए हैं।

एलेन गिंसबर्ग ने कभी भी अपनी आत्मकथा नहीं लिखी। ''मेरी कविताएँ मेरी आत्मकथा हैं'', वह कहता था ढेर सारे पत्र और डायरियाँ ज़रूर लिखीं, जिनके छपने से उसे कोई एतराज़ न था। इनमें उसके निजी घनिष्ठतम वाकिए हैं, विचार हैं और सब कुछ बेलाग।

'हाउल' बेहद कठिन रचना है, अनुभूतियों और अनुभवों की - अनुवाद, रूपांतर से परे। इस कविता को केवल संदर्भों के सही ज्ञान या अनुमान से ही जाना जा सकता है। गलत या बुरे अनुवाद की जिम्मेदारी का दोष अनुवादक/रूपांतरकार का है, कवि या कविता का नहीं और इस कविता को समझने का दंभ भी वही भर सकता हैं जिसमें एक अच्छे अनुवादक/रूपांतरकार होने का दंभ न हो।


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