डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

निबंध

महानगर और मॉल
शर्मिला बोहरा जालान


शनिवार और रविवार की शाम अगर आप किसी परिचित या मित्र या रिश्तेदार के यहाँ आमंत्रित नहीं हैं, और ना ही आपने किसी को आमंत्रित किया है, तो अपनी शाम गुजारने के लिए हो सकता है शायद आप या तो थोड़ी देर मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा चले जाएँ या किसी रम्य पार्क का चक्कर लगा लें या रेस्तराँ में चले जाएँ, पर संभावना महानगर में होने के कारण मॉल में जाने की ज्यादा है।

नित-नए खुलते-चमकते मॉल का यथार्थ भले ही यह हो कि वह घाटे में चल रहा हो पर वहाँ जाने वाले हर आयु के लोगों के लिए, स्त्री-पुरुष, बच्चों सभी के लिए वह एक ऐसे वातावरण और परिवेश की सृष्टि करता है, जहाँ ठंडक है, चमक है, जादू है, नए-नए ब्रांड के जूते-चप्पल, कपड़े-बैग, पुस्तकें, राशन के सामान, रसोई के सामान, खिलौने तमाम चीजें एक ही छत के नीचे उपलब्ध है। पढ़े-लिखे युवा वर्ग में जीवन के हर तरह के उपभोग के लिए अदम्य लालसा है। उसकी पूर्ति है। आवश्यकता का जहाँ अविष्कार किया जाता है। उन्हें लोगों की जरूरत बनाया जाता है।

मॉल महानगर के बाशिंदों को अपनी गिरफ्त में इस तरह लेता है कि लोग बाग चीजों को देखने, पसंद करने और खरीदने पहुँच जाते हैं। घर में आलमारियाँ लबालब सामानों से भरी हों, कपड़ों पर कपड़ें ठूँसे हों, जूतों पर जूते और घड़ियाँ, मेकअप के सामान व खिलौने भरे हों मॉल से लौटने वाला प्रायः अपने दोनों हाथों में पैकेट पकड़े हुए रहता है और इस बात से खुश तथा प्रसन्न कि उसने आफर में बहुत कुछ खरीदा है और यहाँ-यहाँ उसके पैसे बच गए हैं। यह एक अलग और अनकही व अदृश्य बात है कि कई लोग खरीदारी करने के बाद जितने प्रसन्न दिखते हैं घर लौटकर उतने ही अप्रसन्न दिखाई पड़ते हैं।

कहीं और ना जाने की रुचि ना होने के कारण और विकल्प ना ढूँढ़ पाने के कारण हर्बर्ट मारक्यूज के शब्दों में कदम 'समृद्धि के नरक' यानी मॉल की तरफ चले जाते हैं। मॉल ही एक ऐसी जगह मालूम पडती है जहाँ जाया जा सकता है। पर मध्यवर्ग पर झोंक में की गई इस खरीदारी का आर्थिक दबाव पड़ता है। वह खिन्न नजर आता है और वह झुँझलाहट उसके अपने लोगों पर घर आने पर निकलती है।

'मॉल' जाने के लिए विशेष तरह से तैयारी होती है। जो प्रायः जाते रहते हैं और अभ्यस्त होते हैं उनकी बात अलग है पर जो नए-नए जाने वाले हैं वे आलीशान मॉल के आभिजात्य वातावरण के अनुसार कपड़े, चप्पल-जूते, घड़ी पहनते हैं। पूरी तैयारी दिखती है। वस्त्रों से लेकर बोलने के अंदाज में और जेब की तैयारी तो अति आवश्यक धर्म है ही। वैसे इन तैयारियों के साथ 'मॉल' की यात्रा होती है और लौटने के बाद तमाम चीजें जैसे परिधान, घड़ी, सैंडल, जूते वगैरह मध्यवर्ग का व्यक्ति खोलकर एहतियात से रख देता है। प्रसन्नता-अप्रसन्नता के बीच झूलता अपनी शाम एक वातानुकूलित स्थल में बिता चुकने के बाद थक कर वह सो जाता है कि सुबह उसे काम पर लगना है।

मॉल में किस वर्ग के लोग ज्यादा जाते हैं यह अध्ययन का विषय है। जाहिर है जिसे समाजवादी चिंतक किशन पटनायक 'बुद्धिजीवी वर्ग' कहते हैं वह जाता है, और जाता है उच्च वर्ग। यह वह वर्ग है जिसका घर मॉल के ब्रांडेड सामानों से पहले ही लदा-फँदा है और वहाँ जाकर दो-तीन चीजें और वह ले ही आता है जो कि गैर जरूरी है। चीजें और सिर्फ चीजें। कपड़े और सिर्फ कपड़े। इन कपड़ों, जूतों, घड़ियों, बैगों इनकी सार-सँभाल घर की गृहिणी को ज्यादा करनी पडती है और कम-बेशी पुरुष और बच्चों को भी अपने में उलझाए रहती है।

देखा यह भी गया है कि पूरा-पूरा दिन इन सामानों की, कपड़ों की सार सँभाल में चला जाता है। कई बार होता यह है कि सामान की बहुतायत के कारण नए कपड़े जूते या तो आँखों से ओझल हो जाते हैं या उनका नंबर ही नहीं आता सो छोटे पड़ जाते हैं या पुराने।

पारंपरिक बाजारों और दुकानों में ना जाकर जहाँ चीजों का मोल-तोल किया जा सकता है, गली-गली घूमकर नई वस्तुओं को पाने की कोशिश न कर मॉल से कीमती व महँगे कपड़े तथा अन्य सामान खरीद जाते हैं। जहाँ सजावट और सेटिंग से जरूरी और गैर जरूरी सभी चीजें आकर्षित करती हैं। पहले लोगों में जैसा आकर्षण मेलों का होता था वैसा ही आकर्षण अब हर मौसम और हर महीने में मॉल का होता है, जहाँ जश्न भी है और हर किस्म का माल भी। मॉल में जाना लोगों के जीवन एक ऐसे संसार की सृष्टि कर रहा है जहाँ संवाद की जगह सामान ने ले ली है। लगाव, स्नेह, प्रेम की जगह अकेलेपन ने ले ली और ऐसा सुख प्राप्त हो रहा है जो भ्रम है। इसने अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाईं को और बढ़ाने में योगदान दिया है। आलीशान मॉल से बाहर निकलने पर जब भिखारी घेर लेते हैं तब इस विषम खाईं का अंदाजा हम और लगा सकते हैं।

यह एक अलग पक्ष भी है उन उच्च वर्ग के लोगों का, जो मॉल को एक ऐसा स्थल पाते हैं, जिसके परिसर में एक साथ एक छत के नीचे तरह-तरह के साधन उपलब्ध हैं। सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से इस वर्ग की एक माँ अपनी युवा बेटी को निर्भय होकर खरीदारी करने, या फिल्म देखने या जन्मदिन की दावत खाने छोड़ सकती है। ऐसे माता-पिता का यह तर्क भी है कि मॉल में बाउंसर होते है, जिससे सुरक्षा बनी रहती है। वही बाउंसर जो पहले सिर्फ बार और बड़े रेस्तराँ में ही देख जाते थे। बच्चों को खेलने की आधुनिक जगह 'टाइम जोन' कोने में छोड़ महिलाएँ अपनी पसंद की चीजें खरीद सकती है 'तफरीह' कर सकती हैं। एक ही परिसर में अलग-अलग फिल्में चलती हैं। फिल्मों का समय लचीला है। अलग-अलग समय पर देर रात फिल्म देख, उसी परिसर में खा-पीकर घर लौटा जा सकता है। स्टार-मार्क, क्रॉस वर्ल्ड आदि जगहों पर बच्चों, युवा को अकेले छोड़ा जा सकता है। इस वर्ग का यह कहना है कि मॉल कितने सारे लोगों को रोजगार दे रहा है। सिक्युरिटी गार्ड की फौज खड़ी होती है मॉलों में। तो निम्नवर्ग को रोजगार मुहैया करवा रहा है मॉल। पर सवाल यह उठता है कि मॉल संस्कृति ने क्या सामाजिक जीवन में जहाँ खुली अर्थव्यवस्था है, गरीब-अमीर वर्गों के बीच पहले से बहुत दूरी है उसे और नहीं बढ़ा दिया है।

विकास की भोग, उपभोग की, यह सामाजिक प्रक्रिया सामाजिक संघर्ष को और नहीं बढ़ा रही है और शीन काफ निजाम का शेर याद आता है - 'रास्ता ये कहीं नहीं जाता, आ गए तुम इधर किधर बाबा'।


End Text   End Text    End Text