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कविता

अनवांटेड 72
निशांत


वह शुरू से ही इसके खिलाफ थी

पहले थप्पड़ मारती
फिर रोते हुए कहती
- क्यों करते हो ऐसा ?
- अभी इस काबिल नहीं हुए हो
कि मेरे बच्चे को अपना नाम दे सको
- प्लीज, ऐसा मत किया करो
और मेरे गले से लटक कर
फिर रोने लगती

मैं अपनी नजरों मे ही गिरने लगता
इतना गिरता, इतना गिरता
की गलीज होने लगता
उसी तरह पिचपिचा और गंधाता हुआ

समय इतना काला है
की किसी को कुछ नहीं दिखता
हत्या जीवहत्या आत्महत्या परहत्या भी नहीं

इस समय
अभिशप्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं हम
समय की गोद मे ऐंठती है हमारी देह
दम तोड़ देता है हमारा भविष्य

यह अनवांटेड-72 टैबलेट नहीं
दैवीय फल है
इसे मुँह में रखकर
हर बार मौत के मुँह से बाहर निकलते हैं हम
हमारी पीढ़ी को बतला दिया गया है
सत्तर रुपये में
बहत्तर घंटे जीवन जीना असंभव है
असंभव है सत्रह हजार की नौकरी का फार्म भरना
संभव है अनवांटेड-72 पाना
इस काले समय में
इस उम्र में।


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