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कविता

समुद्र के सामने जाने पर
निशांत


समुद्र के पास पहुचकर पता चला
कितना ?
कितना बड़ा है आसमान !

कितना ?
कितना बड़ा है समुद्र !

और
कितने ?
कितने छोटे है हम
घर के एक पानी के नल से भी छोटे
सच्चाई क्या है ?
किसे सच माने बैठे हैं हम !
पानी के लिए
चपरासी पर हुक्म चलाते हुए

समुद्र के सामने जाने पर
चपरासी के सामने
शर्म से झुक जाता है मेरा सर


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