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कविता

कृष्णकली का एकालाप
निशांत


नंगे पाँव चलकर आई हूँ तुम्हारे पास

अँजुरी में भरकर लाई हूँ
एक नाम
नयनों में भरकर एक देवता
देह में लेकर आई हूँ एक प्राण

वेणी बहुत करीने से गूँथी है
पर नहीं है उस पर कोई अलंकार

ये कपड़े अपने से ज्यादा
राहगीरों की आँखों की लज्जा है
नहीं तो माँ की तरह आती
आती प्रिया की तरह
बच्ची की तरह आती जो आती है पिता के पास
आती पलाश की तरह
मृगी की तरह आती कुलाँचें भरते हुए
अपने ही भार से दबी हुई यक्षिणी की तरह आती
आती तारा की तरह पास

सबकुछ छोड़कर
सबकुछ कहा छोड़ पाई
तुम तो पुरुष हो
कैसे रह लेते हो ऐसे जल की तरह
सब में आकार लेते हुए
वायु के जैसे सबके पास विद्यमान साँस की तरह
स्त्री की तरह सबकुछ सहते हुए
अपने पुरुषत्व को कैसे तजते हो प्रिय
मैं अपना स्तृत्व नहीं तज पा रही

पिता में है एक पुरुष
माँ में एक स्त्री
गुरु में चारुता
सहेलियों में ईर्ष्या
तुम में क्या है, बोलो?
तुम्हारी आँखों में ओ क्या है, बोलो?

इतनी दूर आते हो
बिना कुछ माँगे चले जाते हो, क्यों?
कोई चाह का न होना
क्या चाह का होना नहीं है?

नंगे पाँव आई हूँ
कुछ नहीं लेकर आई हूँ आज, तुम्हारे पास।

दरवाजे से हटकर मेरे लिए जगह बना देना, बस।


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