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विमर्श

संस्कृति की खोई चाभियाँ ram
अवधेश मिश्र


हमें बात उत्तर प्रदेश के मौखिक साहित्य पर करनी है। इधर के वर्षो में मौखिक और लोक साहित्य की ओर विमर्श बहुत गंभीरता से मुखातिब हुआ है। हम इस अभिमुखीकरण को समझने का प्रयास करेगें। लोक अपना विमर्श अपनी विधाओं में भी रचता है। हम भी आपको एक छोटी सी दक्षिण भारतीय लोककथा सुनाते है। कितना अजीब है। उत्तर प्रदेश के लोक साहित्य पर चर्चा का आरंभ दक्षिण भारतीय लोक कथा से, यह छूट हमने सचेत एवं सायास ली है। हमारा ऐसे किसी विभाजन पर कोई यकीन ही नहीं है और न ही लोक साहित्य के किसी रसिया को ऐसा विश्वास या भरम पालना चाहिए। वैसे मेरी जानकारी की भी सीमा है क्या पता अभी इसी वक्त प्रदेश के किसी सुदूर अंचल में कोई नानी, कोई दादी अपने नातियों को इससे मिलती जुलती कोई कथा सुना रही हों। ...तो हम अपनी अध्ययन यात्रा आरंभ करते हैं -

"एक अँधेरी रात में एक बूढ़ी औरत रास्ते में कुछ ढूँढ़ रही थी। एक राहगीर ने उससे पूछा - 'माँ तुम्हारा कुछ खो गया है।'

बुढ़िया ने कहा - 'हाँ। मेरी कुछ चाभियाँ खो गई हैं। मैं साँझ से ही उन्हें ढूँढ़ रही हूँ।'

'तुमने उन्हें कहाँ खोया था।'

'नहीं मालूम, शायद घर में।'

'तब तुम उन्हें यहाँ क्यों ढूँढ़ रही हो?'

'क्योंकि वहाँ घर में अँधेरा है। और मेरी लालटेन में तेल नहीं है। यहाँ रास्ते की रोशनी में मैं ठीक तरह से देख सकती हूँ।' - बुढ़िया ने कहा।"

इस लोककथा का उल्लेख प्रसिद्ध लोकविद ए.के. रामानुजन ने अपने एक आलेख में करते हुए कहा था 'हम अब भीतर की ओर आ रहे हैं, दीपक को घर के अँधेरे कमरे की ओर ले जा रहे हैं। अपनी खोई चाभी खोजने। जैसा कि प्रायः होता है हमें वे चाभियाँ न मिलें हमें नई बनानी पड़े किंतु हमें इस प्रक्रिया में ऐसी चीजें मिलेंगी जिन्हें हम जानते ही नहीं थे कि हमने खो दिया है या कभी हमारे पास थीं। 1

तो हमें इस प्रक्रिया में कुछ न कुछ नया ऐसा जरूर मिलेगा जो हमारा होगा हमारे उपयोग का होगा। सड़क या बाहरी रोशनी में चाभियों की तलाश करना औपनिवेशिक अतीत का अभिशाप है। इसमें कई बार चाभी की ऐसी प्रतिकृतियाँ मिल सकती है जिन्हें ताले में लगाने से पहले किन्हीं आकाओं की अनुज्ञा लेनी पड़े, जो हमारे पास रहें तो किंतु उनका नियमन एवं नियंत्रण किसी मेट्रापोल से हो।

दूसरी बात हमें लिखित एवं मौखिक साहित्य के अंतर्संबंध पर कर लेनी चाहिए। लिखित एवं मौखिक सर्वधा द्विपद विरुद्ध श्रेणियाँ नहीं हैं। खास कर जब हम किंचित पूर्व आधुनिक समकालीन उपस्थितियों पर गौर करें। लोक साहित्य ऐसा ही क्षेत्र है। सस्ते कागज एवं त्रुटिपूर्ण छपाई के साथ प्रकाशित एवं वितरित लोकप्रिय पुस्तिकाएँ भिन्न प्रकार की द्वितीयक मौखिकता की वाहक भी होती है। इनका उपभोक्ता समुदाय आधुनिक जीवन की एकांत पहचान विधि से पूरी तरह परिचित नहीं है। पठन की अपेक्षा यहाँ वाचन अधिक महत्वपूर्ण है जहाँ एक दो श्रोताओं अथवा समूह की उपस्थिति होती है। परंपरागत किस्से नौटंकी संगीत, जातीय गीत, व्रत कथाएँ लोकप्रिय पुस्तिकाओं के रूप में छपकर प्रायः लिखित एवं मौखिक के सीमांत पर अपनी कोठरी बनाते हैं। यह भी स्पष्ट है कि लोक साहित्य मूलतः मौखिक साहित्य ही है जो कभी कभी मुद्रित या लिखित रूप में संकलित तो किया जाना है किंतु उसका स्वाभाविक झुकाव मौखिकता की ओर ही रहता है।

तो अब हम उत्तर प्रदेश के लोक साहित्य पर अपनी बातचीत शुरू करें।

सन् 1989 में जब उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के लिए पं विद्यानिवास मिश्र ने लोकगीतों का संग्रह 'चंदन चौक' संपादित किया तब उसमें प्रदेश की तत्कालीन राजनीतिक सीमा के अनुरूप गढवाली एवं कुमाऊँनी लोकगीत भी संग्रहीत थे। उसके पश्चात एक लंबे एवं सफल जनांदोलन के फलस्वरूप उत्तर प्रदेश का पर्वतीय हिस्सा 'उत्तराखंड' नाम से एक अलग इकाई बन गया, तो अब जो बचा हुआ उत्तर प्रदेश है उसमें अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, ब्रज और कौरवी (खड़ी बोली) बोली जाती है। इनमें बहुत सी बोलियाँ ऐसी है जिनका प्रसार उत्तर प्रदेश की राजनीतिक सीमा का अतिक्रमण करता है। मसलन भोजपुरी भाषी जन समुदाय बिहार प्रांत में भी रहता हैं, बुंदेलखंड का अच्छा खासा हिस्सा मध्य प्रदेश में भी है।

प्रदेश के मिर्जापुर एवं सोनभद्र जनपदों में अच्छी-खासी आदिवासी आबादी रहती है। 'मीरजापुर के जनजातियों के गीतों की भाषा स्थानीय बोलियों से प्रभावित है। यह मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश की बहुत सी बोलियों का सम्मिश्रण है। इसका मूल कारण यह है कि मीरजापुर का दक्षिणांचल मध्य प्रदेश एवं बिहार की सीमा पर स्थित हैं और प्रदेश त्रय की भाषा एवं संस्कृति का आदान प्रदान होता रहता है। यहाँ लगभग बासठ प्रतिशत बिहारी बोली जाती है जिस पर पश्चिमी भोजपुरी का प्रभाव अधिक है। सोन-पार के जनजाति के लोग अधिकतर पश्चिमी हिंदी से प्रभावित बोली बोलते हैं परंतु सुदूर दक्षिण में 'कोलवरिया परिवार के मुंडाओं की कोरवारी भी बोली जाती है।2

चर्चा आगे बढ़ाने से पहले हम ए.के. रामानुजन से भी अपनी सहमति दर्ज कराना चाहते है कि मिली-जुली सीमाओं वाली भाषाओं का लोक-साहित्य भी साझा होता है। 3 हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि देशकाल की सामान्य अवधारणा से लोकमानस परिचालित नहीं होता, इसलिए लोकसाहित्य का अध्ययन करते समय बहुत ज्यादा तथ्याधारित होने की आवश्यकता नहीं है। राम की बहन के लिए यदि सुभद्रा का संबोधन सुनाई पड़े तो हमे यह मान लेना चाहिए कि पारिवारिक संबंधों के ये कुछ मानक हैं जो लोकजीवन ने स्वीकार कर रखे हैं।

सीता द्वारा रावण का चित्रांकन एवं सीता-निष्कासन -

उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख भाषाओं 'अवधी' एवं 'भोजपुरी' में इस गीत के रूपांतर
मिलते है। हम फिलहाल सुल्तानपुर जनपद से प्राप्त पाठ का आधार लेते है -

'मचिअई बइठी सुभद्रा त भउजी अरज करई हो,
भउजी जौन रावना तोहरा बइरी, बनाई के देखावहु हो।4
(मचिया पर बैठी सुभद्रा (शांता) भाभी सीता से प्रार्थना करती हैं कि जो रावण
तुम्हारा बैरी (दुश्मन) था उसका चित्र बनाकर दिखाओ)।

चित्र पूरा होते ही रावण फुँफकारने लगता है। राम भोजन करने आए है और सीता की ननद राम से चुगली करती है - ''जौन रावना तोर बइरी तौ भौजी उरेहे हों।''

राम सीता द्वारा रावण का चित्रांकन बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि वे सीता को वन में छोड़ आएँ। यूँ तो सीता वनवास के अनेक कारण बताए गए हैं किंतु स्त्रियों के लोकगीतों में इसी प्रसंग को स्थान मिला है। अन्य कारणों की व्याख्या - आध्यात्मिक एवं सामाजिक मर्यादा के दायरे में की जा सकती है, किंतु इस चित्र प्रसंग में राम एक शंकालु पति ही नजर आते हैं जो अपनी बहन की बात पर विश्वास करके गर्भवती पत्नी को निष्कासित कर देते हैं जिसकी एक परीक्षा वे स्वयं ले चुके हैं।

राम चरित के मानक व्याख्यान में इस चित्र प्रसंग को स्थान नहीं मिला है किंतु महिला लोकगीतों में इसकी व्याप्ति बांग्ला, तेलगू, कन्नड़, मलयालम सहित कई अन्य भाषाओं में हैं। हम यहाँ स्पष्ट करना चाहते है कि बड़े एवं मानक आख्यान जहाँ एक क्षेत्र विशेष की संस्कृति से आबद्ध होते है। वहीं लोक गीत एवं लोक कथाओं के अभिप्राय एक वैश्विक कुटुंब के सदस्य होते हैं। इस चित्र प्रसंग की उपस्थिति श्री लंका, थाईलैंड आदि देशों की राम कथाओं में भी है।

एक भाई जो अपनी बहन से ब्याह करना चाहता था - <

एक थी सोना बहिनी, जिसके बाल सोने के थे। एक दिन उसके भाई ने उसके बालों को देख लिया, और माई से कहा कि हम तो इसी सोने के बालों वाली लड़की से ब्याह करेंगे। माई ने कहा यह तो तुम्हारी बहन है लेकिन भाई नहीं माना। हार कर माई ने ब्याह की तैयारी शुरू कर दी, उधर सोना बहिनी को जब यह पता चला तो वह एक पेड़ पर चढ़कर छिप गई। माई खोजते-खोजते वहाँ पहुँची बोली -

उतरो न उतरो मोरी सोना बहिनिया
तुम्हरो तो रचा है बियाह।

सोना बहिनी ने जवाब दिया -

'अब लग मोरी माई रही मोरी माई
तुमका कहब कैसे सास जी।'

यह किस्सा रायबरेली जिले के सरेनी गाँव की एक महिला महालक्ष्मी पांडेय अपने दौहित्र को सुना रहीं थी। आगे इस किस्से में सभी संबंधी पिता, बड़ा भाई, एवं स्वयं विवाहार्थी भाई सोना बहिनी को मनाने जाता है किंतु सोना बहिनी नहीं उतरती। महालक्ष्मी पांडेय द्वारा सुनाए गए किस्से के अनुसार पेड़ कटवा दिया जाता है और सोना बहिनियाँ का ब्याह उसके भाई से करवा दिया जाता है।

मुझे उसे गाँव की एक अन्य महिला मंदिर वाली आजी से इस किस्से का जो रूपांतरण मिला उसके दो भाग थे। यहाँ सोना बहिनियाँ अपनी बहन चंदिया के सहयोग से भाग निकलती है। अपने को छिपाने के लिए वह एक चमार से खाल का लबादा बनवाती है और पहन लेती है और अब उसका नया नाम खल्लर पड़ जाता है। अंततः वह अपने भाई से बचकर इच्छित विवाह करने में सफल हो जाती है।

हम पहले लोक अभिप्रायों के वैश्विक कुटुंब की बात कर आए हैं। इस 'सोना बहिनी' या 'खल्लर' कथा के रूपांतर कई अन्य भारतीय भाषाओं एवं यूरोपीय लोक साहित्य मे मौजूद हैं।5 कन्नड़ भाषा में यह कथा 'हाँची' नाम से प्रचलित है। हाँची का अर्थ है मिट्टी का बना मुखौटा (खपरैल)। यहाँ नायिका इसी मुखौटे में अपना चेहरा छिपाती है। खाल का लबादा या मिट्टी का मुखौटा - इन दोनों अभ्रिप्रायों का प्रकार्य समान है यानि नायिका की असली पहचान छुपाना एवं इच्छित वर प्राप्ति तक सुरक्षित रखना। हिंदी एवं कन्नड़ दोनों रूपांतरों में आवरणविहीन नायिका को प्रथम बार भावी वर ही देखता है। यूरोपीय लोक साहित्य में 'प्रिंसेज डंकी स्किन' की कथा भी कौटुंबिक व्यभिचार की समस्या से ही संबंध रखती हैं यहाँ राजकुमारी से उसका पिता ही विवाह करना चाहता है।

हमें एक अवधी लोकगीत भी प्राप्त होता हैं जिसमें एक पिता अपनी पुत्री से ही विवाह करना चाहता है एवं अपने दामाद का कत्ल कर देता हैं। यह एक निरवाही गीत है यानी फसलों में अवांछित खर-पतवार निकालते समय मजदूर स्त्रियाँ इसे गाती हैं -

''अपने ओसारे वसमति मुड़वा जे मीजै
बाबू क परिगे नजरिया रे ना।
की वसुमति तू संचवा के ढारी,
की गढ़ै सुधरा सुनरवा रे ना।
जनम दिहिन मोर माई बाबा,
सूरति दिहिनि भगवान।
जरई न बाबू तोर जंघिया जबनिया
जंघिया की जनमी बिटियवा न चीन्हा।।6
(अपने ओसारे में वसुमति बाल धो रही थी, तभी पिता की नजर उस पर पड़ गई। क्या
बसुमति तुम साँचे में ढाली गई हो या तुम्हें कुशल सुनार ने गढ़ा है? मेरे माता
पिता ने मुझे जनम दिया है और सूरत भगवान की दी हुई है। पिता तुम्हारी जाँघ एवं
जबान में आग लगे तुम अपनी बेटी को ही नहीं पहचानते।)

इस गीत में आगे वसुमति पिता से बचने के लिए ननिहाल चली जाती है इधर पिता अपने दामाद ईदल की हत्या कर सिर भुसौले में छिपा देता है। वसुमति स्वप्न में ही घटना को देखकर चौंक पड़ती है। मायके आकर पति ईदल का सिर भुसौले से निकाल लेती है -

ईंदल के मुड़वा लिंहिं, अचरवा
झझकि के चढ़ी मोहकवा रे ना
भल किया बाबू तू भल किया
अपने दुआरे किया रँड़वा रे ना।।
(ईंदल का सिर आँचल में लेकर, धड़धड़ा कर दरवाजे से बाहर निकल गई। पिता तूने बहुत
अच्छा किया अपने द्वार पर ही मुझे विधवा बना दिया।)

सोना बहिनी या वसुमति ये दोनों लोक चरित्र अपने रक्त संबंधियों से ही पीड़ित है। लोक में इन किस्सों-कहानियों एवं गीतों की उपस्थिति किसी वर्ज्य विषय पर विचार-विमर्श एवं निष्कर्ष की लोक प्रविधि का एक चरण है। लोक कथाओं एवं गीतों के सुनने एवं गाने के दौरान गायकों, वक्ताओं एवं श्रोताओं की सक्रिय भूमिकाओं से जो साझा स्थान बनता है वह ऐसे प्रसंगों एवं खतरों से परिचित होने का सुलभ अवसर भी है।

हम ए.के. रामानुजन के कथन को भी देखते चलें - 'इन कहानियों में माँ बाप की अपनी संतानों के प्रति, या भाई बहन की एक दूसरे के प्रति कौटुंबिक व्यभिचार की वर्जित भावना का सामना किया जाता है, और उनका अनावरण किया जाता है, उनके तमाम निहितार्थों के साथ ऐसी कहानियाँ अक्सर घरों में बच्चों को सुनाई जाती है, ये बच्चों की मनोवैज्ञानिक शिक्षा का हिस्सा हैं, ताकि वे वर्जित भावना का सामना कर सकें। साथ ही बातपोश एवं युवा श्रोता दोनों के लिए दृष्टांत प्रस्तुत करती है, जो चाहे समाधान प्रस्तुत न करें, पर जो विशय पर खुलकर बात करती है और संयम रखने की सलाह देती हैं।7

कामी लोलुप निजी संबंधी एवं दगाबाज बभना -

एक भोजपुरी कजली का यह उदाहरण देखें-

सासु के दाँते रे बतीसिया
बहू के गाले गोदना।
ससुर जेवना ना जेवे, नीहारे गोदना
जहु हम जनितो ससुर, होइबो दगाबाजवा,
ससुर नाही रे गोदइती, आपन गाले गोदना।8

बहू एवं ससुर का संबंध पर्दे का होता है किंतु यहाँ ससुर बहु के गाल का गोदना निहार रहा है। कहा यह जाता है कि भारतीय खासकर ग्रामीण संयुक्त परिवारों में ससुर, जेठ, एवं देवर से संबंध सुपरिभाषित एवं मर्यादित हैं। तो यह गीत कौन सी चुगली कर रहा है। समाजशास्त्रीय विमर्शों में इसे परदा एवं परिहास की तकनीकी शब्दावली में समझने की कोशिश की जाती रही है। यह गीत जिस यथार्थ से हमारा साक्षात्कार करा रहा है वह सहज स्वीकार्य न होकर भी एक वास्तविकता है। कजली गीतों के कार्निवाल के आवरण में हमारे सामने आई इस अभिव्यक्ति को ध्यान से सुनने की आवश्यकता है।

यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है अवध में गाए जाने वाले एक निरवाही गीत में भी ऐसी ही समस्या का जिक्र है। यहाँ एक जेठ-पति का बड़ा भाई, छोटी भावज द्वारा द्वार पर बनाए गए एक चित्र को देख कर रीझ गया है एवं उससे ही विवाह करना चाहता है।

ऐतनी बतिया सुने पुतऊ बढ़इते रे ना
माई लहुरी पतोहिया हमका ब्यावहु रे ना।
लहुरी पतोहिया तोरी भयहुवा रे ना
पूता तु तौ जेठ उ तौ लहुरी रे ना।।9
(इतनी बात सुन कर बड़े पुत्र ने कहा कि माँ छोटी बहू का ब्याह मुझसे करा दो।
छोटी बहू तो तुम्हारी छोटी भावज है तुम बड़े हो वह छोटी है।

संबंधों का यही तनाव एक जांतसार गीत में भी देखने को मिलता है -

जौन सेजरिया भयहू छोट भइया दिहयू
उन्हें सेजरिया हम चाही हो राम।10
(जो सेज तुमने छोटे भाई को दी है वही सेज मुझे भी चाहिए)

इन दोनों गीतों में भातृवध का प्रसंग है यानी बड़ा भाई छोटे भाई को मार कर उसकी पत्नी को प्राप्त करना चाहता है किंतु बहू अपने सती धर्म का पालन करते हुए पति की चिता में जल जाती है।

किसी एक स्त्री को प्राप्त करने के लिए दो पुरुषों में संघर्ष होना लोकायन की एक बहु-आवर्ती रूढ़ि है। यहाँ यह घटना पारिवारिक संदर्भ में घट रही है। मीरजापुर के एक आदिवासी गीत में राम लक्ष्मण शिकार पर जा रहे है और लक्ष्मण के तीर से राम की मृत्यु हो गई है,11 यहाँ तनाव सीता को लेकर नहीं है किंतु कुछ आख्यानों में यह तनाव स्पष्ट देखा जा सकता है।12 लक्ष्मण धरती, सूरज एवं चील को मनौती करते है कि मृतक राम का शरीर बिगड़ने न पाए। राम के शरीर को नए पत्तों से ढक कर घर लाते है और सीता अपने पतिव्रत से राम को जीवित कर देती हैं।

इन गीतों में गैर रक्त संबंधों के यौनिक तनाव को देखा जा सकता है जो यहाँ तो अभिलिखित से है किंतु शास्त्र मर्यादा एवं मानकों की सुचिंतित राजनीति के माध्यम से इन पर परदा डाले रहता है।

श्रम गीतों में जातीय पदानुक्रम पर भी टिप्पणियाँ होती हैं। यहाँ पानी भरने गई सवर्ण स्त्री डोम पुरुष के चमकते दाँतों को देखकर मोहित हो जाती है। वहीं खेतों से खर-पतवार निकालती श्रमिक स्त्री मेड़ पर बैठे हुए खेत के मालिक को इंगित करते हुए गाने लगती है -

मेरी बेंदिया निहारे दगाबाज बभना।।
मोरी चारिउ बखरिया कै एक अँगना
मैं तो कजरा देवाबो बइठी अँगना
मोर कजरा निहारे दगाबाज बभना।।
मोरी चारिउ बखरिया के एक अँगना
मैं तो मुड़वा गुहावौ बइठी अँगना
मोर सेंदुरा निहारै दगाबाज बभना।।13
(दगाबाज ब्राह्मण मेरी बिंदी निहार रहा है, मेरी चार कोठरी के बीच एक आँगन है,
जिसमें बैठकर मैं काजल लगा रही हूँ, दगाबाज ब्राह्मण मेरा काजल निहार रहा
है... दगाबाज ब्राह्मण मेरा सिंदूर निहार रहा है।)

यह श्रमजन्य आत्मविश्वास है या गीतों की अपेक्षाकृत मुक्त भावभूमि या दोनों का सहमेल। जो भी हास-परिहास के आवरण में यह गीत कुछ निम्न जाति की श्रमिक स्त्रियों की उपलब्ध यौनिकता की ओर इंगित भी करता है।

बारह लात सोलह झाड़ू और माँ की गाली -

ब्रज मंडल में राधा और कृष्ण का कलेऊ गाने का प्रचलन हुआ करता था। ऐसा विश्वास था कि प्रभात समय इसको गाने से घर में कभी अन्न वस्त्र का अभाव नहीं रहता। ऐसे ही एक कलेऊ में राधा को कृष्ण की विवाहिता पत्नी माना गया है। इस गीत में कृष्ण की माँ यशोदा राधा को सुबह से ही कामों में उलझाए रहती हैं एवं कलेऊ माँगने पर बारह लात सोलह झाड़ू मारती हैं और माँ की गाली देती हैं।

भोर भई चिरिया चहचहाइ, देउन सास कलेऊ ओ राम
कै सुंदर राम हरी
खिरकन में राधा गोबर फैलो पड़ों पड़ेहरे पानी
राधे कैसी कलेऊ की टेब, कै सुंदर श्याम हरी।।
थपथप तौ राधा गोबर करि आई, छम-छम भर आई पानी
सासुल आव तौ कलेऊ हमे देऊ कै सुंदर श्याम हरी।।
बरह तौ बिनने दिये लात भभूका सोलह मारी बुहारी
और दई मइया की गारी सुंदर श्याम हरी।।14

यहाँ सास के हाथों प्रताड़ित होने वाली राधिका भक्ति आख्यानों में ब्रजेश्वरी है एवं कृष्ण की आह्लादिका शक्ति हैं। यह गीत ग्राम जीवन में घटने वाली ऐसी घटना का चित्र है जिसका शिष्ट साहित्य से कोई संबंध नहीं जुड़ता है। पर ऐसे गीत कृष्ण कथाओं को ग्राम जीवन से जोड़ने का उपक्रम करते हैं।15

मिथकीय चरित्रों/घटनाओं की वैकल्पिक व्याख्या भी लोक साहित्य में प्राप्त होती है। गौरीगंज सुल्तानपुर निवासी श्री शिवशंकर यादव ने एक अवसर पर मुझे एक बिरहा सुनाया जिसमें समुद्रमंथन की घटना का एक सर्वथा नवीन कारण बताया गया था। कहने की आवश्यकता नहीं है कि 'बिरहा' अहीरों का जातीय गीत है, अहीरों के अतिरिक्त गड़रिया, धोबी आदि जातियों के लोग भी बिरहा गाते हैं।

'शंकर जी के स्नान के लिए जल लेने पार्वती समुद्र के पास जाती थीं। एक दिन अवसर पाकर समुद्र ने उनसे कहा - क्यों इस निर्धन योगी के साथ रह रही हो। इसे छोड़ कर मेरे पास आ जाओ, मेरे पास चौदह रतन है, जो मैं तुम्हें दे दूँगा, रानी की तरह रखूँगा। 'पार्वती ने यह बात शंकर भगवान को बताई। भगवान शंकर क्रुद्ध हो गए। देवताओं और दैत्यों को साथ लेकर समुद्र को मथ डाला और चौदह रतन उससे छीन लिए।'

यहाँ पार्वती से समुद्र की छेड़छाड़ मिथकीय चरित्रों की अवशिष्ट लौकिकता का एक उदाहरण है। मिथक अपनी मूल प्रकृति में लौकिक ही होते हैं। समुद्र का पार्वती के प्रति यह व्यवहार ग्रामीण समाजों में निचली जाति की स्त्रियों के प्रति उच्चजातीय पुरुषों की सोच का प्रकटीकरण भी है।

लोक साहित्य के फ्रेम में आकर आकर राम-दशरथ सीता आदि अपने दैवी आवरण उतार कर पारिवारिक एवं आत्मीय जन बन जाते है। दशरथ यहाँ एक सामान्य ग्रामीण जन जैसा व्यवहार करते हैं जो अपने पुत्र के विवाह हेतु मांड़व (मंडप) बनाने के लिए स्वयं ही बाँस काटने जाते हैं।

बंसवा कटावे चले राजा दसरथ,
गड़िगे अँगुरिया में काँट
अँगुरी के पीर मरे राजा दशरथ
कैकही का बेगि बलाऊ।16

(राजा दशरथ बाँस कटाने चले हैं, अँगुली में बाँस का काँटा गड़ गया है, राजा पीड़ा से मरे जा रहे है, जल्दी से कैकई को बुलावो)।

इस गीत में कैकेई राजा दशरथ की पीड़ा हरने के बदले दो वर माँगती है, राम को वनवास एवं भरत को राजगद्दी।

यहाँ शास्त्रीय संदर्भों में देवासुर संग्राम, राजा दशरथ की रथ का निकलता पहिया एवं कील के स्थान पर कैकेई का स्वयं अपनी उँगली लगा देना, सर्वथा अनुपस्थित है। यहाँ उँगली तो राजा दशरथ की घायल हुई है और कैकेई उसकी पीड़ा हरने का प्रतिदान माँग रही है। वैसे युद्ध आदि में लोकमानस कम ही रम पाता है। इसलिए पूरी घटना का विकल्प एक पारिवारिक उत्सव के संदर्भ फ्रेम में दे दिया गया है।

एक अवधी लोकगीत में राम की अनुपस्थिति में सीता की चिंता है कि राम के बिना कौन बाँस कटवाएगा और पलंग बनवाएगा।

राम चले हैं मधुबन सितल खड़ी रोवैं।
रामा बारह बरस की अवधिया,
अवधि कैसे बितिहैं।

***

कौन मोर बँसवा कटइहैं पलंगा सलइहैं।
केकरी पलंग चढ़ि बैठव रनीयवा के गोहराई।17
(राम मधुबन को चले गए है सीता रो रही है। यह बारह बरस की अवधि कैसे बीतेगी।
कौन मेरे लिए बाँस कटवाएगा, पलंग बनवाएगा। किसके पलंग पर चढ़ूँगी, कौन मुझे
रानी बुलाएगा)

यहाँ सीता के दुख अवध की किसान स्त्री के दुख से अलग नहीं हैं। अवध की संस्कृति में रचे-बसे जायसी भी इस लोक की इस शक्ति एवं तादात्म्य को सहज स्वीकार करते हैं। पद्मावत में रानी नागमती के मुख से 'हौ' बिनु नाँह मँदिर को छावा' कहलवाकर वे इसी किसान स्त्री की पीड़ा को व्यक्त कर रहे थे।

आमना बीबी के घर पैदा हुए नंदलाल -

छुटपन में किसी समाचार पत्र के साप्ताहिक परिशिष्ट में ये पक्तियाँ पढ़ी थीं। शायद मुस्लिम घरानों में गाए जाने वाले लोकगीतों पर कोई लेख छपा रहा होगा। अब बहुत कोशिश करने पर भी इस गीत को पूरा सुनाने वाले नहीं मिले। हाँ कुछ मुसलमान मित्रों ने इस बात की तस्दीक जरूर की, कि कुछ अरसा पहले तक इस तरह के गीत उनके घरानों में गाए जाते थे। अली सरदार जाफरी भी लिखते हैं - 'दिल्ली या उत्तर प्रदेश के मुसलमान घरानों में जब बच्चा पैदा होता है तो गीत कृष्ण जी के गाए जाते है। जैसे ''अलबेली जच्चा मान करे नंदलाल से, सुहागन जच्चा मान करे नंदलाल से' या 'अलबेले ने मुझे दर्द दिया, साँवलिया ने मुझे दर्द दिया'। नंदलाल और साँवलिया दोनों का अभिप्राय कृष्ण ही है। (प्रमाण के लिए देखिए, रसूमे देहली, मौलाना सैयद अहमद देहलवी)। भारत के बँटवारे के बाद यह गीत पाकिस्तान पहुँच गए हैं।'18

यही नहीं मुसलमान घरानों में गाए जाने वाले विवाह गीत भी स्थानीय संस्कृति में पूरी तरह रचे बसे हैं। गंगा और जमुना जैसी नदियाँ समान आदर भाव से इन गीतों में भी उल्लेखित हैं-

अल्लाह मोरे अइहै, मुहम्मद मोरे अइहैं
आगे गंगा थामली, जमुना हिलोरे लेय
बीचे मा खड़ी बीबी फातिमा, सारी उम्मत बलैया लेय।
उतरा पसीना नूर का हुइगै चमेली फूल
मलिनिया गूथै सेहरा दुलहा बने रसूल।19

अवध क्षेत्र में मुहर्रम के अवसर पर ताजिए के जुलूस के साथ एक शोकगीत गाया जाता है जिसे दाहा कहते है। इसमें कर्बला की लड़ाई एवं हसन हुसैन को शहादत का बड़ा मार्मिक जिक्र रहता है। ये गीत निचले वर्ग की हिंदू स्त्रियाँ भी पूरी श्रद्धा से गाती थीं। अरब में हुए इस पारिवारिक संघर्ष का वर्णन अवधी गीतों में पूरे स्थानीय आस्वाद के साथ आता है-

गलिया कि गलिया फिरई रावल जोगिया
केक देय जोगिया के भिखिया रे हाय हाय

***

हथवा के मिखिया मितर धरक अम्मा, तोरे हसन
जूझै, लड़इया रे हाय हाय।
कँहवा छिपाओ बहु की सुरतिया, कँहवा छिपाऊँ
सिर सेंदुर रे हाय हाय।
पर्दा छिपाती अम्मा धन की सुरतियाँ
गरद मिलाओ सिर सेंदुर रे हाय हाय

***

जेहि दिन हसन लिहिन जनमवा,
होइगै सोने के रतिया रे हाय हाय
जेहि दिन हसन चले है लड़इया
होइगे बजरवा कि रतिया रे हाय हाय
जो मोरे हसन रइन जीति अइहै कफर मार अइहैं
घियना का दियना जरउबै रे हाय-हाय।20
(एक रावल जोगी गली गली भीख माँग रहा है...। हाथ की भीख भीतर रखो (हसन की)
अम्मा-तुम्हारे हसन लड़ाई में जूझ रहे है। कहाँ मैं बहू की सूरत छिपाऊँ कहाँ
उसके सिर का सिंदूर छिपाऊँ। बहू को पर्दे में कर लो उसका सिंदूर धूल में मिल
गया है। ...जिस दिन हसन का जन्म हुआ था मेरी रात सोने की हो गई थी। जिस दिन
हसन युद्ध पर चले गए मेरी राते बज्र जैसी कठोर हो गई। यदि मेरे हसन काफिरों को
मार कर युद्ध जीत आएँगे मैं घी का दिया जलाऊँगी)

यह दोहा कई ऐसे रीति-रिवाजों का स्पष्ट उल्लेख करता है जिनका संबंध अवध की स्थानीय संस्कृति से ही है। जोगी, सिंदूर, घी का दिया जलाना यह सब इस बात के सूचक है कि कर्बला का संग्राम अवध में कितना स्थानिकीकृत हो चुका है।

घोड़वा चढ़ा आवै मिरजा सिपहिया -

'तुरुक लड़ै सौ साठ जने, मोर भइया अकेले ठाढ़
तुरुकिन रोवैं सौ साठ जनी, मोरी भऊजी हसै ठठाय।।'

ये पंक्तियाँ मैंने अपनी नानी के मुख से सुनी थी। यह सावन के मास में झूला झूलते समय गाया जाने वाला गीत है। वैसे सावन प्रेम का महीना है एवं प्रेम तथा शौर्य एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं। किंतु एक विधर्मी (तुर्क) से भाई की लड़ाई और भाभी का हँसना, तुर्क स्त्रियों का विलाप इतिहास में घटी किसी घटना की स्मृति तो नहीं। उत्तर प्रदेश में कई बोलियों में 'चंद्रावली का पँवाड़ा' गया जाता है। इसमें एक स्त्री 'चद्रावली' को मुसलमान सरदार अपहृत कर लेता है। चंद्रावली के ससुर जेठ एवं पति किसी के भी अनुनय-विनय पर सरदार नहीं पसीजता। अंत में चंद्रावली अपने तंबू में आग लगा कर मर जाती है। राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी के अनुसार यह गीत श्रावण की किसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में ब्रजमंडल में ही नहीं, अन्य जनपदों में भी गाया जाता है। बुंदेलखंड में यह चंद्रावली न होकर मथुरावली है। बृज में इसके तीन पाठ तो हमने ही सुने हैं। इसका एक रूप यों है -

सात सखिया के झुंड में सुंदरी पनिया कूँ जाय,
बीच मिलौ है पठान कौ सुंदरि लई है छुड़ाय
लाल सिपाही जालिमा।

इसका एक अन्य रूप यों है -

गलिन गलिन मुगला फिरे, छज्जेन फिरें पठान
घेरि लई चंद्रावली जैसी राजकुमारि।

कुरूप्रदेश में यही गीत इस रूप में चलता है -

अब रुत आई बाबा बीजणे की
सास्सु बरजै-बऊरी, पाणीया मत जाय,
डेरा पडा है मोगल का देव लेगा तमुआ के बीच।21

इस गीत का प्रसार राजस्थानी, मारवाड़ी आदि भाषाओं में भी है। राजस्थानी चंद्रावली से मालूम होता है जिस मुगल ने चंद्रावली को पकड़ा था वह हाड़ा राव की फौज का एक अफसर था, जैसे -

सात सैयाँ के झूमखे, चंदा पाणी नै जाय
आई फौज हाड़ा राव की, ज्याँ में मुगल पठान।।22

अवध में स्त्रियों को पानी लाने दूर नहीं जाना पड़ता। अवधी 'चंद्रावली' में उसका अपहरण तब हुआ है जब वह सींक चीर रही थी। सींक चीरना अभी हाल तक ग्रामीण स्त्रियों का एक प्रिय कर्म हुआ करता था। कास घास से सींक निकाली जाती थी जिसे सींक चीरना कहते है। इस सींक से झाड़ू, पंखा इत्यादि बनाए जाते है।

'सात बहिनि चंदा सिंकिया जे चीरें,
सिंकिया चिरै ए रे सदौली घाट जी
आइगे लस्कर मुगल कै, चंदा परि बंदिखानि जी।

और अंत में,

चिता जारि चंदा जरि गयो, चंदा होई गई राखि जी
चंदा के चिता अस धधकें, धुँवा से भरि गा भंडार जी
जरि गै मोगला के दाढ़ी, ऊहो होइगा तमाम जी।23

अवध के जंतसार गीतों में एक 'कुसुमा का पँवाड़ा मिलना है। जिसमें मिरजा सिपाही द्वारा कुसुमा के अपहरण की कथा है।

देहू न मइया ककही कटोरवा दो ना
बाबा के सगड़वा मुड़वा धोइब हो ना।
घोड़वा चढ़ा आवे मिरजा सिपहिया हो ना
अरे केकरी बहिनिया मुड़वा धोवे हो ना।24

कुसुमा कंघी, कटोरा लेकर अपने पिता के तालाब में बाल धोने जाती है। वहीं घोड़े पर सवार होकर आ रहा मिर्जा सिपाही उस पर मोहित हो जाता है। उसके भाई जिउधन से कहता है अपनी बहिन मुझे दे दो। भाई मना करता है, जिससे मिर्जा क्रोधित हो जाता है। 'मिर्जा को क्रोधित जान कर, कुसुमा उसके साथ चलने को तैयार हो जाती है और मिर्जा से कहती है कि मेरे भाई एवं पिता के लिए घोड़े खरीद दो। मिर्जा ऐसा ही करता है।

कुसुमा डोली चढ़ती है। भाई, पिता, संगी-सहेली सब रोने लगते है। कुसुमा की ड़ोली जब दो वनों को वार कर तीसरे वन पहुँचती है तो वह मिर्जा से डोली रुकवाकर बाबा के तालाब का पानी पीने का आग्रह करती है। कुसुमा एक घूँट पीती, दूसरा घूँट पीती है और तीसरे घूँट मे तालाब में डूब जाती है। मिर्जा जाल डलवाता है किंतु कुसुमा नही मिलती। इधर भोजमल कुल की रक्षा करने वाली बहन की मृत्यु पर आँसू बहाता है।25

ध्यान देने की बात यह है कि हिंदू मुसलिम संघर्ष के से लोकगीत उसी जन समुदाय में प्रचलित हैं जो मोहर्रम आदि पर्वों को समान श्रद्धा के साथ मनाता है। इसे लोक चेतना के बहुस्तरीयता के तर्क से समझा जा सकता है, किंतु सांप्रदायिकता के समकालीन उभार में लोक चेतना में उपस्थित इन आख्यानों की भी क्या कोई भूमिका है? इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

माँ के दिल जैसा दुनिया में कोई दिल नहीं -

प्रदेश के छोटे कस्बे की पान सिगरेट की दुकानों या अन्य ऐसी ही जगहों पर एक कव्वालीनुमा गीत अक्सर बजता रहता है। 'माँ के दिल जैसा दुनिया में कोई दिल नहीं' की टेक के साथ यह गीत एक कहानी कहता है जिसमें एक प्रेमिका अपने प्रेमी से कहती है कि यदि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो अपनी माँ का दिल मुझे ला कर दो। प्रेमी अपने माँ का दिल लेकर जब प्रेमिका को देने चलता है तो उसे ठोकर लग जाती है, दिल हाथ से छिटक जाता है, लेकिन दिल से आवाज आती है 'बेटा चोट तो नही आई।' प्रेमी जब प्रेमिका के पास 'माँ का दिल' ले कर पहुँचता है तो प्रेमिका भी उससे किनारा कस लेती है 'जो अपनी माँ का ना हुआ वो मेरा क्या होगा।'

लोकगीतों के अध्ययन के दौरान मुझे एक निरवाही गीत मिला, जिसमें पुत्र का बहू के प्रति प्रेम देख कर माँ ही पुत्र से बहू के दिल की माँग कर देती है -

पटवा के ओटे सामी बेनिया डोलावैं रे ना,
रामा परिगै सासू की नजरिया रे ना।
मूँड़-मूँड़ कइकै पहुड़े ससुइया रे ना,
पूता आज मोरा मूँड़ पिराने रे ना।।
जउनी दवइया मइया तोर मूँड़ मिटिहै रे ना
मइया वही दवइया हम करिबे रे ना।।
लाऊ न मोरे पूता बहू कै करेजवा रे ना
पूता वही दवइया मूँड़ मिटिहै रे ना।।26
(दरवाजे की ओट में पति बहू को पंखा झल रहा था कि सास की नजर उस पड़ गई। सास
नाराज होकर सिर दर्द का बहाना कर के लेट गई। बेटे ने कहा - माँ जिस दवा से
तुम्हारा सिर दर्द ठीक हो वही दवा तुम्हारे लिए ला दें। हे पुत्र तुम मेरे लिए
अपनी बहू का कलेजा ला दो। मेरा सिर दर्द उसी से मिटेगा।)

पुत्र जंगल ले जाकर बहू का कत्ल कर देता है और बहू का कलेजा लाकर माँ को देता है। लेकिन माता अभी भी सशंक है -

अपनी तो रानी पूता नइहरे पहायो रे ना,
लें आई कुकुरी के करेजवा रे ना।
ऐसिन मइया तुरुक धै जाती रे ना,
मइया तुही मोर जोड़िया बिगाड़ेव रे ना।।
(अपनी रानी (पत्नी) को तो मैके भेज आए हो और मेरे लिए कुतिया का कलेजा ले आए
हो। बेटा कहता है कि ऐसी माता को तुर्क (मुसलमान) ले जाय, माता तुम्हीं ने
मेरी जोड़ी बिगाड़ दी)।

इन दोनों उदाहरणों पर कुछ ठहर कर बातचीत करने की आवश्यकता है। 'माँ' का दिल कव्वाली का प्रसार प्रमुखतः पुरुष क्षेत्र में है। इसका श्रोता-उपभोक्ता कस्बाई पुरुष ही है। तकनीक एवं बाजार का संबल भी इस गीत को प्रचलन में बनाए हुए है। दूसरी ओर निरवाही गीत का गायन खेतों में काम करने वाली स्त्रियाँ करती है यहाँ कोई सिर्फ श्रोता नहीं होता अपितु श्रोता एवं गायिका का अभेद होता है। इन गीतों की उपस्थिति भी बहुत दृश्यमान नहीं होती, फिर भी ये गीत जीवित हैं, परिवार के भीतर के शक्ति संघर्ष की कथा कहते हुए।

इन दोनों गीतों में एक दूसरे के कलेजे का माँग करने वाली स्त्रियाँ ही है, तो क्या इनसे इस लोकप्रिय तर्क को बल मिलता है, कि औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत होती है? वस्तुतः यह पितृकेंद्रित परिवारों का आंतरिक शक्ति संघर्ष है। ऐसे परिवारों में स्त्री की शक्ति का आधार पुरुष होते है जो पति अथवा पुत्र हुआ करते है। पुत्र जब किसी अन्य का पति, अथवा/पति जब किसी अन्य स्त्री के पुत्र को भूमिका को प्रमुखता देने लगता है तो एक शक्ति संघर्ष का आरंभ होता है। निरवाही गीत में जब पुरुष अपनी पत्नी के पंखा झल रहा था तब माँ के सिर में दर्द होने लगा। यह परिवार की दो स्त्रियों का शक्ति संघर्ष है। इसका कारण औरत का औरत का दुश्मन होना नही अपितु दोनों स्त्रियाँ की ऐसी परिस्थिति ऐसी संरचना में है जिसमें ऐसा संघर्ष अपरिहार्य है।

राजा बखानों में गोंडा कै / अवध में राना भया मरदाना -

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख क्रीड़ा भूमि उत्तर प्रदेश का अवध अंचल रहा है। मुगल साम्राज्य के अंतिम वर्षो में अवध उत्तर भारत का सबसे समृद्धशाली क्षेत्र था। 1857 के विद्रोह को अँग्रेजों ने सिपाही विद्रोह कहा था। ये सिपाही दरअसल अवध के किसान परिवारों के सदस्य थे एवं अँग्रेजों की नीतियों से दुष्प्रभावित भी थे। अवध में अँग्रेजों को काफी संघर्ष करना पड़ा था। अवध के अनेक रजवाड़ों ने इस संघर्ष में खुल कर भाग लिया। गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह, शंकरगढ़ रायबरेली के राजा बेनीमाधव, चहलारी नरेश बलभद्र सिंह इनमें प्रमुख थे। 1857 का संघर्ष तो अंततः असफल रहा। किंतु जनमानस ने अपने नायकों को हृदय से लगाए रखा। इनकी वीरता के गीत अब भी ग्रामीण अंचलों में सुने जाते हैं।

गोंडा जनपद के सोंहसा परसा गाँव के निवासी छब्बे आग्रह करने पर देवीबख्श सिंह की विरुदावली सुनाने लगते हैं-

राजा बखानों मैं गोंडा कै देवी बकस महराज रहे
असी चार चौरासी कोस मा जेकै डंका बाज रहे।
गोंडा कै पाती गै झाँसी, झाँसी क राजा राम लला।
साथ हमारा दीजै राजा, घरमा हमरे चोर हला।।

यहाँ जिस झाँसी का जिक्र है वह दरअसल बांसी राज है। झाँसी की अत्यधिक प्रसिद्धि के कारण यह तथ्यात्मक भूल हो गई है जो इस गीत के लिखित पाठों में भी दर्ज है। वैसे लोक गायक भौतिक तथ्यों के प्रति इतने सतर्क भी नहीं होते। इस गीत में अयोध्या के राजा मानसिंह की भी प्रशंसा की गई है-

फौज के मालिक मान सिंह और तोप कै पुरैया
दागै तोप दइउ अस गरजें फाटि झरारा नैया।।

अयोध्या के राजा मानसिंह की 1857 के संग्राम में दुहरी भूमिका थी ये कुछ समय तक तो विद्रोहियों के साथ थे, किंतु समय रहते उन्होंने अँग्रेजों का साथ पकड़ लिया।27 फिर भी लोक गायक इनकी वीरता के ही गीत गाते हैं।

गोंडा के राजा का स्मरण सिर्फ उसकी वीरता के लिए नहीं अपितु सुराज के लिए भी किया जाता रहा-

जब देबी बकस कै राज रहा,
साँवा कोदौं धान जोंधरिया
यक्कै भाव बिकात रहा।
हँसिया खुरपा का कौन गनै
तब पैसा फार बिकात रहा।
(जब देबीबख्श सिंह राजा थे तब सभी मोटा महीन अनाज एक की भाव बिकता था। हँसिया
या खुरपी जैसी छोटी चीज ही नहीं हल का फाल भी एक पैसे में मिल जाता था)।

राना बेनीमाधव ने भी 1857 में अँग्रेजों को खूब छकाया था -

करि के सबको बखाना चलिगे जग से राना।

***

साहेब लिखा परवाना, राना तुम मिल जाना
जल्दी हाजिर होउ बक्सर माँ, काहे फिरत दिवाना
राना पढ़िकै मुस्काना।।
राना बुलाइन आपन बिरादर सबको करत बखाना
तुम तो जाइ मिले गोरन माँ, हमका है भगवाना
करम अपने मन माना।।
मारि पीटि कै राना निकरि गे, गोरन मन खिसियाना।
भगवत दास कहै कर जोरे अमल करे भगवाना
भजो मन रामैं रामा।।

इसी प्रकार ठाकुर बलभद्र सिंह की वीरता की प्रशंसा भी गाई गई है -

भाजि गए इलंगी झिलंगी, भाजि गए गज के असवारा
हरदत्त कहै हम खेत लड़ब, उइ जाई लुकान नदी के किनारा,
एक जीवत है बलभद्र बली उइ जाय झपटि अंग्रेजन मारा।।28

अवध में एक लोक कथा सनमान तेवारी की भी चलती है। यह कथा 1857 के गदर से संबद्ध है।

'छितूनी गाँव मा एक बाभन रहे। वनकै नाव रहा सनमान तेवारी। सनमान तेवारी लखनऊ के नवाब के इहाँ नौकर रहे। वे जीनत महल के महल मा पहरा देत रहे। उहे वन के काम रहा।'29

यह लोक कथा जादुई तत्वों से भरपूर है। यहाँ लखनऊ में अँग्रेजों से मोर्चा लेने वाली बेगम का नाम जीनत महल हो गया है, जो कि ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है, किंतु लोककथाकार तथ्यों से एक सीमा तक ही प्रभावित एवं परिचालित होते हैं। बेगम जीनत महल और सनमान तेवारी जब अँग्रेजों से बच कर गोमती पार कर रहे होते हैं तो गोमती बेगम के सत से सूख जाती है। यह लोक कथात्मक रूढ़ि जन मानस में काफी प्रचलित है। नदियाँ अक्सर विपत्ति के मारों को रास्ता दे देती हैं। नवाब वाजिद अलीशाह के पास 'पारस पत्थर' होने का उल्लेख भी इस कथा में हैं। लखनऊ से अँग्रेजों से बचकर निकली बेगम जीनत महल एक बनवासी 'बन मानुस' के यहाँ आश्रय पाती है। इस कथा में बेगम और अँग्रेजों की किसी व्यवस्थित लड़ाई का जिक्र नहीं हैं। कथा में आए भौगोलिक नाम वास्तविक हैं। एवं लोक कथाकार कथा का अंत इस प्रकार करता है -सनमान तेवारी बेगम का साथ लैके भागत लुकात नैपाल मां पहुँचे। उहाँ बेगम का पहुँचाई कै तब घर का लौटे। लौटत कै बेगम रोइ दिहिस औ अपनी झोरी से एक हीरा निकारि के सनमान तेवारी का दिहिस औ कहिस लै जा एका सात पुस्ति ले खाब्या। सनमान तेवारी घरे लौटि आए मुला जिन्गी मैं जयनक अंगरेज यन के पीछा नाय छोड़िसि। हीरा सनमान के घर मां अब ही ले रहा कुछ दिन पहले चोरी भव ही मा भैका चोर उठाई लैगे। सनमान तेवारी के नाती कुंज बिहारी अबही जीवत आटे।

(सनमान तेवारी बेगम को लेकर छिपते छिपाते नेपाल पहुँचे। वहाँ बेगम को पहुँचा कर घर को लौट आए। लौटते समय बेगम रोने लगी अपने झोली से निकाल कर एक हीरा सनमान तेवारी को दिया और कहा ले जाओ, सात पीढ़ियों तक खाने पीने की कोई कमी नहीं रहेगी। सनमान तेवारी लौट आए लेकिन जब तक जीवित रहे अँग्रेजों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। हीरा सनमान तेवारी के घर में अब तक था। कुछ दिन पहले चोरी हुई उसमें उसे चोर उठा ले गए। सनमान तेवारी के नाती कुंज बिहारी अभी जीवित हैं।)

अंग्रेज बहादुर भइया रे कागद का गढ़ा रूपैया -

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भारत औपचारिक रूप से ब्रिटिश उपनिवेश बन गया। संघर्ष की स्मृतियाँ तो अब भी रहीं और लोक मानस उन्हें हृदय से लगाए भी रहा, किंतु उपनिवेश की कुछ उपलब्धियों ने उसे चकित भी किया इस प्रकार एक प्रेम-घृणा का संबंध साम्राज्य एवं उसके प्रतीकों से बना। ब्रज की लोक गायिका कह उठी -

'फिरंगी नल मत लगवावै रे
फिरंगी नल मत लगवावै
नल को पानी बहुत बुरौ
मेरो तबियत घबड़ावै।।30

मानिकपुर जिला बाँदा में पारिवारिक उत्सवों में पूड़ी बेलते समय एक गीत अब भी गाया जाता है जिसमें अँग्रेजों के प्रति शंका या संदेह नहीं अपितु प्रशंसा का भाव है -

'अंग्रेज बहादुर भइया रे कागद का गढ़ा रुपैया,
गाँवन-गाँवन चकिया चलत है, जांतन कौन पिसइया
गाँवन-गाँवन रेलै दउरै, पैदल कौन चलइया।।

बिजली से चलने वाली चक्की लग जाने से महिलाओं को जो मानवीय श्रम से मुक्ति मिली वह कम सुखद नहीं थी। इसी गाँव में वे रेलगाड़ी की भी प्रशंसा करती है जिसे अवधी-लोक गीतों में स्त्रियों ने अपनी सौत माना है और काफी भला बुरा कहा है -

पुरूब से आई रेलिया पछिउँ से जहजिया
पिया के लादि लेइ गई हो।
रेलिया होइ गई मोरि सवतिया, पिया के लादि लेइ गई हो।
रेलिया न बैठी जहजिया न बैरी, उई पइसवै बैरी हो
देसवा देसवा भरमावै उई पइसवै बैरी हो।31

'बैरी पैसे' का यह जुल्म औपनिवेशिक तंत्र का भी प्रतिफलन था। इस दौरान एक परिवर्तन यह भी हुआ कि जमींदार, पटवारी, कचहरी, पुलिया आदि के संजाल में खेती किसानी न तो फायदेमंद रही और न ही सम्मानित। दूसरी ओर जिन परिवारों के लोग छोटी मोटी नौकरियों में थे वे अपने आपको सीधे राज द्वारा संरक्षित मानते थे। खेती अब उत्तम नहीं थी और नौकरी निषिद्ध नही रही अपितु अँग्रेजी सरकार की नौकरी में होना प्रतिष्ठा की बात थी। ब्रज के एक लोकगीत में इसकी अभिव्यक्ति हुई है। जहाँ एक किशोरी चाकरिहा (नौकरी करने वाले) से ब्याह करने की इच्छा व्यक्त करती है -

हरजोता कूँ अब न बरूँगी मेरी वीर
हरजोता के अब न रहूँगी मेरी वीर।
चाकरिया बलम करूँगी।।32

इसी गीत का एक रूपांतर मानिकपुर बाँदा से भी प्राप्त हुआ है -

'हमको नोकरिहा संग ब्याह रे
हर जोता मनही न भावै।'

12वीं-13वीं शताब्दी के अपभ्रंश के कवि अद्दहमाण (अब्दुल रहमान) ने अपने ग्रंथ ''संदेश रासक'' के प्रथम प्रक्रम में यह छंद लिखा है।

तंतीवाय णिसुयं जइ किरि कर पल्लवेहि अइमहुरं।
ता मद्दलकरडिरवं मा सुम्मउ राम रणेसु।।33 (यदि पल्लव जैसे कोमल करों द्वारा बजाई जाने वाली अति मधुर वीणा को लोग सुनते है, तो क्या साधारण स्त्रियों के क्रीड़ा-विनोद में बजने वाले करट (ढोल) रव को न सुना जाए)

वीणा को सुनने के अभ्यस्त कान ढोल की थापो पर हमेशा आनंदित नहीं होते, किंतु आदिम संगीत तो ढोल एवं माँदल की थापों में ही बसता है जिसका एक आस्वादक भी होता है भले ही वह शास्त्र सम्मत सहृदय न हो जो शास्त्र की दृष्टि से ओझल उपेक्षित होकर भी उसकी सीमाओं को इंगित करता रहता हैं।

संदर्भ

1. विनय धारवाड़कर, संपादक, 2009, कलेक्टेड एसेज आफ ए.के. रामानुजन, नई दिल्ली, आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पृ 534

2. विद्यानिवास मिश्र, संपादक, 1989, चंदन चौक (उत्तर प्रदेश के लोकगीतों का संग्रह), उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, पृ 259

3. विनय धारवाड़कर, वही, पृष्ठ 536

4. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, 1990, अवधी लोकगीत हजारा, इलाहाबाद, भारतीय भाषा परिषद, पृ 5

5. अवधेश मिश्र, 2008, स्त्री जातीयता की लोक अभिव्यक्ति, तथा, प्रवेशांक, संपादक - मघु शुक्ला और नवल शुक्ल, भोपाल

6. सरोजनी रोहतगी, 1971, अवधी का लोक साहित्य, नई दिल्ली, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृ 210

7. ए.के. रामानुजन, संपादक, 2003, भारत की लोककथाएँ, नई दिल्ली, नेशनल बुक ट्रस्ट, पृ 20

8. हरि एस. उपाध्याय, 1988, भोजपुरी सांग्स फ्राम बलिया, अटलांटा, इंडिया इंटरप्राइजेज इंकार्पोरेटेड, पृ 199

9. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, पूर्वोक्त

10. विद्यानिवास मिश्र पूर्वोक्त

11. पूर्वोक्त

12. वाल्मीकि रामायण के स्वर्ण मृग प्रसंग में सीता द्वारा लक्ष्मण को कही गई कटूक्तियों में इस तनाव की रेखाएँ पहचानी जा सकती हैं।

13. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, पूर्वोक्त पृ 158

14. राम नारायण अग्रवाल, 1997, कृष्ण लीला गीत, भोपाल, आदिवासी कला परिषद, पृ 166

15. पूर्वोक्त, पृ 17

16. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, पूर्वोक्त पृ 33

17. सरोजनी रोहतगी, पूर्वोक्त पृ 464

18. अली सरदार जाफरी, 1998, कबीर बानी, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, पृ 150

19. सरोजनी रोहतगी, पूर्वोक्त पृ 465

20. पूर्वोक्त पृ 238

21. विद्यानिवास मिश्र पूर्वोक्त पृ 386

22. राहुल निबंधावली, 1983, नई दिल्ली, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, पृ 78

23. पूर्वोक्त पृ 79

24. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, पूर्वोक्त पृ 163

25. सूर्य प्रसाद दीक्षित, संपादक, 1995, ज्ञानशिखा-लोकगाथा विशेषांक, अंक 16, लखनऊ, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृ 16

26. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, पूर्वोक्त पृ 44-45

27. एस.एन. सिन्हा, संपादक, 1988, म्यूटिनी टेलीग्राम्स, राजा मानसिंह ज्वाइंड ब्रिटिश कैंप एट फैजाबाद आन थर्टी जुलाई, लखनऊ, पृ 16

28. महेश प्रताप नारायण अवस्थी, पूर्वोक्त पृ 231

29. सरोजनी रोहतगी पृ 79

30. विद्यानिवास मिश्र, पूर्वोक्त पृ 369

31. सरोजनी रोहतगी, पूर्वोक्त पृ 229

32. विद्यानिवास मिश्र, पूर्वोक्त पृ 395

33. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, विश्वनाथ त्रिपाठी, अब्दुल रहमान कृत संदेश रासक नई दिल्ली राजकमल प्रकाशन।


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