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कविता

कश्मीर
अशोक कुमार


१.

हरी वर्दी में
नीले लोग
पीली मानसिकता
अंजाम देने के लिए
छुटाते हैं बारूद
लुटाते हैं रंग
उड़ाते हैं धुआँ
फहराते हैं झंडे -
सफ़ेद टोपी के लिए
लाल होली में
हरे पेड़ का जश्न !

२.

इक्का दुक्का फूलों की खुशबुओं में
मिली जुली सड़ांध
उसी खून की है
जो चार दीवारी से ऊब कर
डल के किनारे
चिनारों की खुली हवा में
साँस लेने आया था
कल उन्होंने
उसे भी मार डाला !

३.

क़ुदरत के हरे रंग
खून के धब्बों से मिल कर
धुँधले पड़ गए हैं
कायनात पीली पड़ गई है
आँखों में दहशत बढ़ गई है
रात तो रात
अब लोग दिन में भी
बग़ैर ज़रूरत बाहर नहीं निकलते

बाहर अब सनसनाती फिरती हैं गोलियाँ !


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