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कविता

शाम को लौटती चिड़िया
अशोक कुमार


शाम को चहचहाती
लौटती चिड़िया को
ये नहीं मालूम कि उसके बसेरे वाला पेड़
काट दिया गया है,
घोंसले में रखे उसके अंडे रौंद दिए गए हैं
पेड़ वाली जगह पर मॉल बनाने की प्रक्रिया जारी है

लौटते लौटते चिड़िया को अँधेरा हो जाएगा और
जब वह घर ढूँढ़ते ढूँढ़ते भटकेगी
तो अंदेशा ये है कि
खुले पड़े बिजली के तारों को
डालियाँ समझ कर
उनसे टकरा कर
कहीं वह भस्म न हो जाए
क्योंकि ऐसा अक्सर
दिहाड़ी मज़दूरों और अवैध कही जाने वाली चालों
के साथ भी होते देखा गया है


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