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कविता

अभिशप्त
अशोक कुमार


अक्सर
मानस में पुरानी यादें
ऐसे बजबजाती हैं
जैसे निर्माल्य सड़ता हुआ किसी बंद सीवर में
- बदबू मारता हुआ !
जिसे साफ़ करने भी कोई बाहर से नहीं आ सकता !
और खुद
जब मैं इनसे भागना चाहता हूँ तो
हर एक दस-दस-सिरा हो कर
खड़ी हो जाती हैं लाल आँखें किए सामने
चीत्कारती हुई
जिनमें दब कर रह जाता हूँ
चुपचाप
बदबू के साथ जीने के लिए
अभिशप्त !


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