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कविता

रोशनी से भरा शहर
अशोक कुमार


रोशनी से भरा इक शहर देखिए
दिल में सारे अँधेरे छुपाये हुए

कोने में कुतरे में कचरे के ढेरे,
सड़ी तंग गलियों में बदबू के डेरे,
धसकती दिवारों के पुरखौफ़ घेरे,
थकी ज़र्द आँखों के बीमार चेहरे -
जिनको सदियाँ हुईं मुस्कुराए हुए !
रोशनी से भरा इक शहर...

जहाँ नौनिहालों में बचपन नहीं है,
जवानी जहाँ खिलखिलाती नहीं है,
जहाँ आदमी आदमी सा नहीं है,
जहाँ ज़िंदगी ज़िंदगी ही नहीं है.
ख़ुशी छुप गई मुँह चुराए हुए !
रोशनी से भरा इक शहर...

इरादों से ऊँची इमारत जहाँ पे,
सदियों से लंबी हैं सड़कें जहाँ पे,
भटकते हुए फिर भी हैं सब यहाँ पे,
ये किसका शहर है,हैं क्यों सब यहाँ पे,
के हौसले सबके हैं चरमराए हुए !
रोशनी से भरा इक शहर...

ये हीरे का ब्योपार शीशे से कर दें,
ये माँओं को बीबी को नीलम कर दें,
मिलाते हुए हाथ कब वार कर दें,
दो टके में ये बस्ती को बर्बाद कर दें,
साहिब ए दहर बन के फिरते हैं ये जो,
ख़ज़ाने हैं सबके चुराए हुए !

रोशनी से भरा इक शहर...
रोशनी के तले इन अँधेरों में गुम,
सहते हुए लाख ज़ुल्म ओ सितम,
सही लोग भी हैं वले हैं ये कम,
जो कोशिश में हैं के मिटा दें ये तम,
उमीदें सभी उनसे हैं लगाए हुए !
रोशनी से भरा इक शहर...


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