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कविता

कार-ए-नौ
अशोक कुमार


कुछ इंतज़ार और करो, सब्र-ए-नागवार और करो,
कुछ अपने सरों को क़लम, गिरेबाँ को चाक और करो,
अपने अंदर की गर्मी-ए-खून सँभाल कर रखो,
अंधेरों में, सख्त पहरों में, ज़रा ये जौर और सहो,
फ़ज़ा पलटने में, जौर थमने में वक़्त है शायद !

सुबह होने में वक़्त है या सिर्फ ऐसा लगता है,
दर्द सीने में उठ उठ के नाकामियों को रोता है,
साँस बर्फ बन कर के धमनियों में बहती है,
अपनी क़िस्मत पे, हालत पे दम निकलता है,
वो घड़ी है कि आओ सोचें के क्यों हुआ ऐसा !

ये भी मुमकिन है के फ़ज़ा पलट न सके,
सुबह जो होती दिखती है कभी भी हो न सके,
हमारी मौत से पहले हमारी सूरत बदल न सके,
हिना जो पत्थरों पे खिलती थी खिल न सके,
अगर ये यूँ है तो क्या इसकी ज़िम्मेदारी अपनी है ?

हम देवता का, दानव का फ़र्क़ भूल चुके हैं,
कड़ी दवा का, मीठे ज़हर का फ़र्क़ भूल चुके हैं,
हम भूल चुके हैं दग़ा के मुस्कुराते चेहरे को,
हम अपनी ज़ात के तहज़ीब ओ संस्कार भूल चुके हैं,
हमीं जो हम नहीं हैं तो ग़ैरों से क्या गिला करना !

उठो कि खुद को पहचानो, अपना हौसला जोड़ो,
ये सलाखें, ये बेड़ियाँ, ये हथकड़ी तोड़ो,
ये बुज़दिली, ये नाकामियाँ ये नालः छोडो,
उठो औ सब साथ मिल के यलग़ार छेड़ो,
ज़माना देखना तुमको फिर से सलाम ठोकेगा !

फिर उसके बाद सुबह खुद ब खुद तुलू होगी,
ये दुनिया तुम्हारे सामने फिर से निगूँ होगी,
फ़ज़ा में चार सू फिर तैरने लगेगी खुशहाली,
औ नए सिरे से तारीख-ए-हिंद फिर शुरू होगी,
अभी भी वक़्त है उट्ठो, कार-ए-नौ की इब्तिदा कर दें !


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