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कविता

तुम्हारी क़सम तुम बहुत याद आए
अशोक कुमार


अटारी से हमको बजरिया में तकना
अगर हम न देखें तो ज़ुल्फ़ें झटकना
औ फिर भौं तरेरे हुए हमको तकना
अगर देख लेवें तो झिंझरी से हटना
वो मासूम सूरत वो प्यारी सी आँखें
वो तस्वीर जैसे है दिल में जड़ाए !
तुम्हारी क़सम...

बज़ाजे में गर इत्तेफ़ाक़न दिखे तुम
लटें मुँह से पीछे हटाते हुए तुम
सहेली को कुछ यों दिखाते हुए तुम
हमारी तरफ हमको तकते हुए तुम
निगाहों में चाहत, वो तेवर तुम्हारे
नहीं मैंने देखे तुम्हारे सिवाए !
तुम्हारी क़सम...

जो मंदिर की सीढ़ी पे चढ़ते उतरते
पड़े सामने इत्तेफ़ाक़न अगरचे
मुझे याद है फूल मै ने गिराए
तुम्हारे लिए, औ तुम मुस्कुराये
वो खुशबू अभी तक ज़हन में बसी है
वो मंदिर की सीढ़ी न यादों से जाए !
तुम्हारी क़सम...

फिर एक मुद्दत नज़र तुम न आए
बज़ारों में गलियों में हम घूम आए,
जो लौटे तो तुम मुद्दतों बाद आए
गदराये गदराये सेंदुर सजाए
तो नज़रें मिलीं तुम जो मेले में आए
तुम्हारी नज़र भी हटी ना हटाए !
तुम्हारी क़सम...

वो बिछिये के काँटे से साड़ी अटकना
वो पाओं के झटके से पायल छनकना
वो हाथों की जुंबिश से चूड़ी खनकना
निगाहों में फिर हमको ग़ुस्से से तकना
उसी इक लम्हे रुक गई ज़िंदगी
ये पल भर की बातें न भूलीं भुलाये !
तुम्हारी क़सम तुम बहुत याद आये !!


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