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लेख

नया मीडिया : नया विश्व, नया परिवेश
राकेश कुमार


परिवर्तन, प्रकृति का नियम है और यह नियम इस दुनिया के सभी विचारों, अवधारणाओं, वस्तुओं, स्थितियों, मनुष्य, पर्यावरण और स्वयं प्रकृति पर भी लागू होता है। यह परिवर्तन नई परिस्थितियों के प्रति नए मनुष्य की प्रतिक्रिया का परिणाम होता है। इतिहास साक्षी है कि नई परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ नई तकनीकों को जन्म देती है। नया मीडिया भी इसका अपवाद नहीं है। मीडिया या माध्यम प्राचीन काल से ही किसी न किसी रूप में मनुष्य सभ्यता का हिस्सा रहा है। नया मीडिया का गहरा संबंध सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ है। सूचना प्रौद्यौगिकी के विस्फोट ने दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया। दुनिया इंटरनेट और कंप्यूटर के माध्यम से इस प्रकार जुड़ गई है कि आज दुनिया का कोई भी कोना दूसरे कोने से अछूता नहीं रहा है।

नया मीडिया : अवधारणा और स्वरूप

सिनेमा से नए मीडिया की तुलना करते हुए लेव मेनोविच अपनी पुस्तक 'लैग्वेज ऑफ न्यू मीडिया' में लिखते हैं, " In contrast to cinema where most users are able to understand 'cinematic Language' but not 'speak' it ( ie. make films) the language of the interface"1 यानी सिनेमा देखकर उसका आनंद उठाना और उसके कथ्य को उसकी भाषा में समझ पाना एक बात है परंतु उसकी भाषा में जवाब दे पाना कठिन है। सिनेमा देखा-समझा तो जा सकता है परंतु उसे निर्मित कर पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए कठिन काम है। यहीं पर नया मीडिया पुराने सिनेमा-टीवी जैसे परंपरागत मीडिया से भिन्न हो जाता है। वास्तव में यह बड़ा फर्क इस नए माध्यम को बिलकुल ही नया चरित्र प्रदान करता है। इस माध्यम में संदेश निर्माण और संदेश प्राप्तकर्ता की बहुलता इसे विशिष्ट बनाती है। पुराने ढंग के माध्यमों में संदेश भेजने वाला एक तथा प्राप्तकर्ता अनेक होते थे वहीं इस माध्यम में संदेश भेजने और प्राप्त करने वाले अनेक हो सकते हैं। पाठ, दृश्य और ध्वनि के आधार पर यदि नए और पुराने मीडिया में अंतर किया जाए तो बात कुछ साफ हो जाती है। ऐसा नहीं है कि पुराने मीडिया में पाठ, दृश्य और ध्वनि का संचार संभव नहीं था वहाँ भी इनका संप्रेषण संभव था, परंतु नए मीडिया की संवादात्मकता इसे विशिष्टता प्रदान करती है। इसीलिए इसे 'कॉलेबोरेटिव मास मीडिया' भी कहा जाता है। जिसमें एक से अनेक तथा अनेक से एक की संवादात्मक अतंर्क्रियात्मकता शामिल रहती है। नया मीडिया मात्र तकनीक का ही नहीं बल्कि तकनीक के प्रयोग का भी नयापन लिए हुए है। यह व्यक्ति की सार्वजनिकता और सार्वजनिक की निजता का समीकरण है।

उन्नीसवीं और बीसवी शताब्दी में जितना परिवर्तन अभिव्यक्ति के क्षेत्र में आया उतना ही मानव सभ्यता का विकास हुआ। नया मीडिया इक्कीसवीं सदी का मीडिया है। नया मीडिया को उभरता हुआ मीडिया, या फिर डिजीटल मीडिया भी कहा गया। इस मीडिया ने अभी तक के चले आ रहे अभिव्यक्ति के तरीकों को पूरी तरह से बदल दिया है। संक्षेप में कहा जाए तो "नया मीडिया एक ऐसा मीडिया है जिसने फिल्म, छवियों, संगीत, बोले और लिखित शब्द जैसे पारंपरिक मीडिया को कंप्यूटर की इंटरैक्टिव शक्ति और संचार प्रौद्योगिकी विशेषकर इंटरनेट से जोड़ दिया है।"2 आज हम पूरी तरह से नए मीडिया से घिरे हुए हैं। नया मीडिया न केवल हमारे सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है बल्कि आज हम उसके बिना अपने निजी जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। आज हमारे जीवन का कौन सा ऐसा क्षेत्र है? जिसमें नया मीडिया न हो। शिक्षा, मनोरंजन, विज्ञान, पत्रकारिता, निजी व सरकारी कार्यालय, बैंकिंग, रक्षा, चिकित्सा, उद्योग, वैश्विक बाजार, कृषि, मौसम, पर्यावरण, खेल, तकनीक, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विविध और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नया मीडिया अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा है। आर. अनुराधा के शब्दों में, "नया मीडिया यानी आम आदमी की देश-काल की सीमाओं को तोड़ती हुई डिजिटल माध्यम से की गई इंटरएक्टिव अभिव्यक्ति" अनुराधा की इस परिभाषा में कुछ बातें महत्वपूर्ण हैं - पहला आम आदमी दूसरा देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण तीसरा डिजिटल और चौथा इंटरएक्टिव अभिव्यक्ति।"3 आम आदमी के हाथ में मीडिया के आने का सीधा अर्थ यही है कि नए मीडिया के आने से पहले आम आदमी मीडिया का सिर्फ उपभोक्ता था।

मीडिया के उत्पादन और प्रसारण का स्थान उसकी पहुँच से कहीं दूर स्थित होता था। वह मात्र देख-सुन-पढ़ सकता था। उसके विचारों, प्रतिक्रयाओं और उसकी समझ के लिए मीडिया में कोई स्थान नहीं था। वह अधिक से अधिक समाचार पत्रों या रेडियो टीवी के लिए पत्र लिख सकता था परंतु उसके पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि वह उसका प्रयोग कर अपने अनुसार कार्यक्रमों को बनवा सकता अथवा यदि कोई कार्यक्रम उसे पसंद नहीं आ रहा तो वह उस कार्यक्रम को हटा सकता। परंतु नए मीडिया के आने से यह स्थिति बदल गई। आज आम आदमी मीडिया का मात्र उपभोक्ता ही नहीं है अपितु वह मीडिया का उत्पादक भी है। वह अपने ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, वाट्सएप वैबसाइट के माध्यम से अपनी बात रख सकता है। अपने विचारों को लिख सकता है और अपने देखे समाज में चल रहे घटनाक्रम का वह अब मात्र साक्षी नहीं है वह एक पत्रकार की भाँति उसकी रिपोर्टिंग कर सकता है। दूसरी बात यह है कि परंपरागत मीडिया की भाँति वह अब सूचनाओं, समाचारों और मनोरंजन आदि के लिए किसी एक माध्यम का दास नहीं है बल्कि अब उसके सामने पूरी दुनिया खुल गई है। वह अब अपनी बात अपने क्षेत्र कस्बे तक ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया तक पहुँचा सकता है। इस तरह से वह अपने क्षेत्र-कस्बे को पूरी दुनिया से जोड़ रहा है। इतना ही नहीं पूरी दुनिया में जो कुछ भी घटित हो रहा है उससे अपने क्षेत्र-कस्बे के लोगों को अवगत करा सकता है। इसने आम आदमी की सोच मे बड़ा परिवर्तन कर दिया है। इसमें उसका सहारा बना है इंटरनेट से जुडाव। इंटरनेट ने आम आदमी को विविध प्रकार के विषयों और विविध प्रकार की समस्याओं से भी परिचित करा दिया है। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह आया है कि नया मीडिया एक अंतर्क्रियात्मक मीडिया है। इसमें दो तरफा ही बल्कि अनेक तरफा संवाद संभव है। उदाहरण के लिए जब आप अपनी कोई पोस्ट फेसबुक या फिर ट्विटर पर लिखते हैं तो उस पर न जाने कितने ही लोग एक साथ बात कर सकते हैं। इसे ही कुछ-कुछ मीडिया विशेषज्ञ नए प्रकार के जनतंत्र का नाम भी दे रहे हैं। इसका बहुत बड़ा आधार यह मुक्ति है जिसके कारण कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय पर अपने विचार रख सकता है। वह दूसरे के विचारों से अवगत भी हो सकता है और दूसरों को अपने विचारों से भी परिचित करा सकता है। जयप्रकाश मानस लिखते हैं, "नया मीडिया सच्चे अर्थों में मीडिया का जनतंत्रीकरण है और जनता का मीडियाकरण भी। कदाचित यही वह संदर्भ है जिसके कारण दुनिया भर के समाजशास्त्रियों का एक वर्ग इसे डिजिटल डेमोक्रसी - जैसे श्रेष्ठ विभूषण से नवाज रहा है। नया मीडिया एक साथ व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों हैं। इसमें संवाद, संचार, विचार-विमर्श, राजनीतिक प्रचार, सामाजिक लामबंदी, आदी सारी सम्भावनाएँ मौजूद हैं। पारंपरिक मीडिया के नाम यह अद्भुत ताकत नहीं थी, पर नए मीडिया के देह और हृदय में ऐसी डिजिटल वर्चुअल ताकत दर्ज हो चुकी है जो आपके संचार के साथ-साथ आपके ऊपर नजरदारी भी करता है। नया मीडिया सही मायने में किसी भी समय, कहीं से भी, किसी भी डिजिटल माध्यम से परस्पर संवादधर्मी उपयोगकर्ता या पाठक दर्शक, श्रोता के साथ मीडिया सामग्री के रचनात्मक उपयोग की प्रविधि है।"4 नया मीडिया अनेक उन लोगों को भी स्वर प्रदान कर रहा जिन्हें परंपरागत मीडिया में स्थान या तो नहीं मिलता था या फिर इतना कम मिलता था कि उनकी आवाज कहीं सुनी नहीं जाती थी। आज नए मीडिया की ही यह ताकत है कि तमाम राजनीतिक दल और व्यापारिक संस्थान जनता से संपर्क के लिए नए मीडिया का प्रयोग कर रहें। तमाम प्रशासनिक व्यवस्थाएँ भी ऑनलाइन होती जा रही हैं। इससे पारदर्शिता भी आई है और सहूलियात भी। इस माध्यम की एक विशेषता इसकी आर्काइव की है। आप अपना लिखा कई बरस बाद भी देख सकते हैं। आप ही नहीं अपितु दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हुआ व्यक्ति बरसों बाद भी आपके लिखे को पढ़ सकता है। टेक्स्ट ही नहीं बल्कि संगीत और वीडियो के कार्यक्रम भी वह देख सकता है। यह माध्यम गेटकीपिंग की व्यवस्था से मुक्त है। इसलिए इसे मुक्त माध्यम भी माना जाता है। जिसका परिणाम यह है कि अनेक बार पत्रकारिता के सामान्य नियमों से लेकर सामान्य शिष्टाचार तक की अनदेखी कर दी जाती है।

नया मीडिया : प्रमुख क्षेत्र

1. नया मीडिया और राजनीति - सूचना क्रांति के विस्फोट ने भारत समेत दुनिया के सभी देशों में इंटरनेट आधारित नए मीडिया को चुनावी प्रचार का एक प्रिय माध्यम बना दिया है। विशेषतः भारत जैसे देश में जहाँ की जनसंख्या का अधिकांश युवा है और अपने अनेक कामों के लिए इंटरनेट पर निर्भर है, वहाँ पर यह लाजिमी हो जाता है कि चुनावों में प्रत्येक स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप पर पार्टी का विज्ञापन पहुँचाया जाए। नए मीडिया की यह विशेषता है कि वह दुनिया भर में कहीं भी पहुँच सकता है। मीडिया के अन्य माध्यमों की तरह इसे किसी स्थानीय बंदिश में बाँधा नहीं जा सकता। आज राजनीतिक दल, वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, वेबसाइट विज्ञापन, एस.एम.एस., मिस्ड कॉल अभियान, ब्लॉग, ई-मेल आदि का प्रयोग बेधड़क होकर कर रहे हैं। वर्ष 2014 के राष्ट्रीय चुनावों में सोशल मीडिया का जमकर उपयोग किया गया। एक रिपोर्ट के अनुसार इन चुनावों में लगभग 30000 करोड़ रुपये का व्यय होने का अनुमान था। 'इनमें से राजनीतिक पार्टियों के प्रचार में कुल चार से पाँच हजार करोड़ रुपये के बजट में डिजिटल मीडिया पर कम से कम पाँच सौ करोड़ तो खर्च ही किए गए थे। चुनाव में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर भारत के मुख्य निर्वाचन आयोग को दिशा-निर्देश जारी करने पड़ गए। राजनैतिक दलों से कहा गया कि वो इंटरनेट पर अपने खातों और खर्चों को सार्वजनिक करें। अपने निर्देश में आयोग ने पाँच प्रकार के सोशल मीडिया की पहचान की 1. सहयोगपूर्ण प्रोजेक्ट (विकिपीडिया) 2. ब्लॉग और माइक्रोब्लॉग्स (ट्विटर) 3. कंटेट समुदाय (यू ट्यूब) 4. सोशल नेटवर्किंग साइटें (फेसबुक) 5. वर्चुअल गेम्स (एप्लीकेशन) इस अवसर पर जारी निर्वाचन आयोग की विज्ञप्ति में कहा गया कि - ''चुनाव प्रचार से जुड़े कानूनी प्रावधान सोशल मीडिया पर भी उसी प्रकार से लागू होते हैं जिस प्रकार से वो किसी अन्य मीडिया पर लागू होते हैं।''5

2. नया मीडिया और समाज - नए मीडिया के विकास का सामाजिक परिस्थितियों और राजनीतिक घटनाक्रम के साथ गहरा संबंध है। वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया को एक विश्व ग्राम में बदलने का प्रयास किया। वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था ने देशों की सीमाओं का अतिक्रमण कर दिया। जिसके कारण दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ गईं। इसी प्रकार संचार क्रांति ने भी दुनिया भर के देशों का एक-दूसरे से जोड़ दिया है। अब एक देश के समाज के बारे में दूसरे देश के समाज के लोग बेहतर जानते हैं। भारतीय समाज भी मीडिया के इस व्यापक विस्तार से प्रभावित हुआ है। आज सोशल मीडिया ने लोगों को एक-दूसरे के साथ जुड़ने और अपने समय और समाज की समस्याओं को एक-दूसरे से साझा करने के अनेक अवसर प्रदान कर दिए। वाट्सएप और फेसबुक भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इंटरनेट प्रयोग करने वाले 56 प्रतिशत लोग वाट्सएप और 51 प्रतिशत लोग फेसबुक का प्रयोग करते हैं। फेसबुक के स्वामित्व वाले वाट्सएप के पूरी दुनिया में 900 मिलियन प्रयोक्ता बताए जाते हैं जिसमें से अधिकांश भारत में हैं।"6 परंतु जहाँ एक ओर यह जुड़ाव आया है वहीं सामाजिक-रूढ़िवाद, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता स्त्रियों के प्रति अपराध, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति सामाजिक घृणा के प्रचार के लिए भी नए मीडिया का उपयोग किया जाने लगा है। "इसमें दो मत नहीं कि, सोशल मीडिया आज एक ताकतवर मीडिया के रूप में तेजी से फैलाव पा रहा है। लेकिन विचारों के आदान-प्रदान के साथ ही साथ समाज के अंदर एक सार्थक सोच दे पाने में यह असफल साबित हो रहा है।"7 दलितों के साथ-साथ अल्पसंख्यकों के प्रति भी अनेक बार भड़काऊ पोस्ट तथा वाट्सएप मैसेज भी साझा होते हैं। यह समाज के लिए घातक हो सकता है।

3. नया मीडिया और संस्कृति - संस्कृति किसी भी समाज की पहचान का महत्वपूर्ण चिह्न है। समाजशास्त्री भीखू पारेख मानते हैं कि संस्कृति एक इतिहास द्वारा निर्मित विश्वासों और प्रथाओं की व्यवस्था है जिसके संदर्भ में व्यक्ति और समूह अपने जीवन को समझता और व्यवस्थित करते है।"8 संस्कृति, व्यक्ति को जीने का सलीका और समाज को जीवन की व्यवस्था देती है। समाज की भाँति संस्कृति पर भी मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ता है। पुराने मीडिया में जहाँ व्यक्ति मात्र कंटेट का उपभोक्ता था वहीं अब वह कंटेट को निर्मित भी कर रहा है। संस्कृति को बचाए रखने के लिए अनेक संस्थाएँ व व्यक्ति अब लुप्त होते जा रहे संस्कृतिक चिह्नों, परंपराओं और बोलियों का डिजिटल दस्तावेजीकरण भी कर रहे हैं। परंतु नए मीडिया ने संस्कृति के नाम अनेक प्रकार की रूढ़ियों को भी प्रचारित किया है। संस्कृति के नाम आजकल धार्मिक कर्मकांडों को ही अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इसी प्रकार संस्कृतिक विरासत का विरूपीकरण करके आने वाली पीढ़ियों को गुमराह करने का प्रयास भी किया जाने लगा है। नया मीडिया चूँकि अधिकांशतः छन्नी रहित है इसलिए अनेक बार संस्कृति के स्थान पर अपसंस्कृति का प्रसार भी नए मीडिया के माध्यम से हो रहा है। इसके प्रति जागरूक और सावधान रहने की आवश्यकता है।

4. नया मीडिया और व्यापार - आज बड़े कॉरपोरेट घरानों से लेकर नए स्टार्टअप तक सभी आज नए मीडिया की शक्ति को पहचानते हैं। इसलिए अपने विज्ञापनों के माध्यम से नए उपभोक्ता बनाने से लेकर पुराने उपभोक्ताओं तक अपने नए उत्पादों को पहुँचाने के लिए नए मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। आज कंपनियाँ अपना आधिकारिक यूट्यूब अकांउट, फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल अवश्य बनाती हैं। उपभोक्ता किसी उत्पाद विशेष के पेज या हैंडल पर जाकर या फिर कंपनी के पेज या हैंडल पर जाकर अपनी बात रख सकता है। कंपनियाँ भी अपने उत्पादों के नए मॉडल को लेकर भी नए मीडिया के मंच पर आती हैं। यह माध्यम पुराने माध्यम की अपेक्षा कम खर्चे वाला है और पुराने माध्यम की तरह सभी को एक ही तरह का संदेश नहीं भेजता बल्कि यह उपभोक्ता को उसकी रुचि और समय के अनुसार संदेश भेज सकता है। इसके माध्यम कंपनियाँ एक लक्षित संदेश भेजती हैं। अतः यह नया मीडिया ने व्यापार करने के तरीके बदल डाले हैं। उदारीकरण और सूचना क्रांति ने ई-कॉमर्स जैसे नए व्यापार-विचार को जन्म दिया है। बाजार आज साक्षात ही नहीं बल्कि वर्चअल भी हो गए हैं। उपभोक्ता घर बैठे-बैठे दुनिया जहान से अपने काम की चीजें मँगा सकता है। आज भारत में अमेजॉन, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, आस्क मी बाजार जैसे मल्टी ब्रांड की ई-कॉमर्स साइट्स चल रही हैं जिनका सालाना टर्नओवर करोड़ों में पहुँच चुका है।

5. नया मीडिया और वैश्विक एक्टीविज्म - नया मीडिया सामाजिक एक्टीविज्म का एक बेहतरीन मंच है। इसके माध्यम से समाज-सुधार, पर्यावरण, युद्ध विरोध, भूमंडलीकरण विरोध तथा विश्व शांति के संदेश को बड़ी सहजता से विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया जा सकता है। आज विश्व स्तर पर काम करने वाली जितनी भी संस्थाएँ हैं या गैर सरकारी संगठन हैं वे नए मीडिया के विभिन्न रूपों का प्रयोग कर रही हैं। नए मीडिया का लाभ यह भी है कि सरकारी दबाव और दमन का सामना करते हुए भी इसके माध्यम से सरकारी नीतियों का लोकतांत्रिक विरोध किया जा सकता है। विशेषतः पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को सामने लाने के लिए यूट्यूब, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया नेटवर्कों का उपयोग किया जा रहा है।

6. नया मीडिया और हिंसा - नया मीडिया एक अबाधित माध्यम है। वह उपयोगकर्ता को एक निजता देता है। ऐसी निजता कि जिसमें उपयोगकर्ता पूरी दुनिया भर से कंटेट को देख सकता है। इंटरनेट के माध्यम से आज न केवल जनपक्षधर सामग्री और सूचनाएँ साझा हो रही हैं बल्कि लाखों की संख्या उन पृष्ठों की है जो हिंसा को बढ़ावा देते हैं। आज जहर बनाने से लेकर बम बनाने तक की तकनीक इंटरनेट पर मौजूद है। जिसे देखकर अनेक लोग बड़ी सहजता के साथ बम बना सकते हैं। यही नहीं वीडियो गेम्स के दुष्प्रभावों को लेकर भी बड़ी चिंताएँ जाहिर की जा रही हैं।

7. नया मीडिया और वैश्विक आंतकवाद - नया मीडिया का उपयोग वैश्विक आंतकवाद को बढ़ाने के लिए भी किया जाने लगा है। आंतकवादी संगठन यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग जैसे सामाजिक मीडिया मंचों और टेलीग्राम, हाइक और वाट्सएप जैसी संदेश सेवाओं के माध्यम से बेरोजगार, दिशा भ्रमित युवकों का ब्रेनवॉश करने के लिए कर रहे हैं। ये संगठन धर्म के नाम पर अनेक प्रकार की भ्रामक सामग्री को प्रसारित करते हैं जिसके प्रभाव में आकर अनेक नवयुवक आंतकवाद का रास्ता पकड़ लेते हैं, जिसके परिणाम अत्यंत भयानक हुए हैं। आंतकवाद की यह समस्या न तो किसी एक देश तक सीमित है और न ही किसी एक धर्म तक। यूनाइटेड नेशन के जनरल सैक्रेटर बान की मून ने कहा था "The Internet is a prime example of how terrorists can behave in a truly transnational way; in response, States need to think and function in an equally transnational manner."9 पूरी दुनिया के देश इससे प्रभावित हो रहे हैं। पूरी दुनिया इस वैश्विक आंतकवाद के दंश को झेल रही है। अमेरिका पर हुए 11 सितंबर के हमले के बाद से दुनिया भर में आंतकवाद का चेहरा निरंतर क्रूर ही हुआ है। मध्य एशिया में आइसिस का बढ़ता हुआ साम्राज्य एक चुनौती बन चुका है लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि दुनिया के समृद्ध देशों से हजारों की संख्या में शिक्षित नौजवान इस आंतकवादी संगठन की हिस्सा बनने के लिए अपने-अपने देशों से चोरी-छुपे सीरिया और इराक पहुँच रहे हैं। इन युवकों के विषय में जब छानबीन की गई तो यह पाया गया कि इनमें से अनेक इंटरनेट के माध्यम से मिल रही भड़काऊ सामग्री से प्रभावित होकर आंतक की राह पर चल पड़े।

8. नया मीडिया : नई चुनौतियाँ - जहाँ एक ओर नया मीडिया नए अवसर लेकर आया है वहीं नए मीडिया ने नई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत की हैं। जहाँ एक ओर अभिव्यक्ति के नए मंच उपलब्ध कराए हैं वहीं निर्बाध अभिव्यक्ति ने अपराध और आंतकवाद को भी बढ़ावा दिया है। पत्रकारिता को विस्तार दिया है वहीं झूठी खबरों को प्रसारित करने का माध्यम भी उपलब्ध करा दिया है। इसलिए नया मीडिया वरदान भी है और अभिशाप भी। नए मीडिया की कुछ चुनौतियाँ इस प्रकार हैं -

1. सत्यापन - यह नए मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती है। पत्रकारिता के पेशे में सत्यापन पहला आधार है जिस पर पत्रकारिता का पूरा अस्तित्व खड़ा होता है। पाठक या दर्शक मीडिया पर इसीलिए भरोसा करता है कि मीडिया सच ही दिखाएगा परंतु जिस प्रकार डिजिटल तकनीक का विकास हुआ उसके कारण झूठी खबरें, चित्र, वीडियोज और संदेश मीडिया दिखाने लगता है। इसे आज की भाषा में वायरल होना कहते हैं। अनेक बार बिना स्वायत्त सूत्र के सत्यापन के भी खबर जब ऑनलाइन मीडिया में फैल जाती है तब उसके परिणाम अत्यंत भयानक होते हैं। फोटोशॉप की तकनीक का सहारा लेकर अनेक ऐसे चित्र मीडिया में आ जाते हैं जिनकी सत्यता संदिग्ध होती है। ये चित्र किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म और जाति विशेष के खिलाफ जनमानस में भ्रम फैलाने के लिए कुछ असामाजिक तत्त्व करते हैं। इसलिए सोशल मीडिया, वाट्सएप, मैसेंजर, अथवा हाइक जैसे माध्यमों से प्राप्त संदेशों को जाँचना-परखना बहुत अधिक आवश्यक है।

2. नियामकता - नया मीडिया चूँकि एक नया माध्यम भी है इसलिए इसके उपयोग-दुरुपयोग को लेकर बहस होना लाजिमी है। इसके बरक्स पत्रकारिता, विचारों और सूचनाओं की अभिव्यक्ति का एक बहुत पुराना, संगठित और स्थापित माध्यम है। इस माध्यम में प्रत्येक स्तर पर इस प्रकार की व्यवस्था है कि यदि कोई तथ्यात्मक भूल जा रही है तो उसे रोका जा सके। स्ट्रिंगर रिपोर्टर से लेकर प्रधान संपादक तक अनेक स्तरों पर सूचनाओं की जाँच-परख हो सकती है परंतु अब बदले हुए परिदृश्य में संपादक के पद की वह शक्ति नहीं रह गई है जैसाकि पहले हुआ करती थी। अब प्रकाशन घराने का प्रबंधन और मार्केटिंग विभाग यह निर्णय लेता है कि किस प्रकार की खबरें लगाई जाएँगी। इसलिए यदि संपादन न हो तो बहुत सारा कचरा भी प्रकाशित हो सकता है जिसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। इसलिए एक आचार संहिता प्रयोक्ताओं को स्वयं बनानी होगी। गेटकीपिंग के न होने से सिर्फ नुकसान हुआ हो, ऐसा नहीं है। पूरी दुनिया में जो ब्लॉगिंग की क्रांति आई उसके पीछे इसी गेटकीपिंग का न होना ही एक बड़ा कारण था क्योंकि इसके अभाव में ब्लॉगर बिना किसी राजनीतिक-आर्थिक दबाव के अपनी बात रख सके। नए माध्यमों को वैकल्पिक मीडिया बनाने वाले कारकों में से एक बड़ा कारक यह भी है। इसलिए यह एक दोहरा माध्यम है क्योंकि Not only does the Internet give untrained individuals access to a huge audience for their art or opinions, but it also allows content creators to reach fans directly. Projects that may not have succeeded through traditional mass media may get a second chance through newer medias.10

3. डिजिटल डिवाइड - डिजिटल डिवाइड एक बड़ी समस्या और चुनौती के रूप में नए मीडिया के सामने आया है। भारत में यह डिजिटल डिवाइड बहुत अधिक बड़ा है। जिस देश की अधिकांश आबादी के पास स्वच्छ पेय जल और शौचालय की सुविधा नहीं है उस देश में 'डिजिटल डेमोक्रेसी' की बात करना अति आशावादी विचार होगा। वैसे तो भारत में अनेक क्षेत्रों में विभेद मौजूद है जैसे सामाजिक-विभेद, आर्थिक-विभेद, धार्मिक-विभेद, शैक्षणिक-विभेद आदि परंतु दूरसंचार और मीडिया के क्षेत्र में विभेद किसी अन्य विभेद से कमतर नहीं है। भारतीय समाज में डिजिटल डिवाइड के बावजूद अनेक लोग नैटीजन अथवा डिजिटल सिटिजनशिप या डिजिटल नागरिकता की बात कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय टेलिकॉम यूनियन के अनुसार11 - भारत में इसी डिजिटल डिवाइड को कम करने के लिए भारत सरकार ने डिजिटल इंडिया कैंपेन चलाया है। जिसके अंतर्गत वर्ष 2018 के अंत तक अधिकांश जनता तक इंटरनेट को पहुँचाया जाएगा। इसके लिए सरकार ने 1.13 लाख रुपये का प्रावधान किया है।"12 डिजिटल साक्षरता का एक अन्य कार्यक्रम भी चलाया जाएग जिसके अंतर्गत पूरे भारत में प्रत्येक घर के कम से कम एक व्यक्ति को डिजिटल साक्षर बनाया जाएगा। इकनॉमिक टाइम्स की एक खबर के अनुसार टेलीकॉम और आई टी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि Digital India, Prasad said, rests on three pillars that include architecture and utility, delivery of government services and digital empowerment of people, and with the mega initiative that aims to bridge the digital divide. He also said that Digital India offers an 'enabling platform for change' and that it would not be fulfilled without the indigenous manufacturing that requires Indian skills to be leveraged, and added that content in local language is necessary.13 वास्तविक लाभ तभी मिल सकेगा जब स्थानीय भाषाओं में जब कंटेट मिल सकेगा।

5. साइबर बाल्कनाइजेशन - कुछ विद्वानों ने साइबर बाल्कनाइजेशन की अवधारणा प्रयोग किया है। यह अवधारणा प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप की स्थिति से प्रभावित है। यूरोप उस समय ऑटोमन साम्राज्य की समाप्ति के बाद जिस तरह से छोटे-छोटे जातीय और राजनीतिक खंडों में बँट गया था उसी प्रकार आज इंटरनेट के माध्यम से नए मीडिया से जुड़ने वाला प्रयोक्ता भी सिर्फ अपने ही रुचि की सूचनाएँ पाता है। इससे नए मीडिया ने जो 'पब्लिक स्फीयर' तैयार किया था वह खंडित हो जाता है और प्रयोक्ता अन्य व्यापक विचारों से वंचित रह जाता है। इस प्रक्रिया में अनेक रूढ़िवादी विचार नए मीडिया के माध्यम से एक ही वृत्त में घूमने लगते हैं।"14 यह एक नए प्रकार के घेटोकरण (Ghetto) या पृथक्करण की प्रक्रिया को जन्म देता है। इसमें व्यक्ति के जानने-समझने और प्रतिक्रिया देने का बोध सीमित हो जाता है।

नए मीडिया का नयापन तकनीक, भाषा, अभिव्यक्ति के तरीके और विषयवस्तु सभी में हैं। नए मीडिया ने सामाजिक विमर्शों को गति और राजनीतिक सहभागिता को नए आयाम दिए। आज के समाज का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है जोकि नए मीडिया के प्रभाव से अछूता हो। यह एक शक्ति भी है तो चुनौती भी।

संदर्भ

1. Language of New Media - Lev Menovich , MIT Press Cambridge -2001 pg. 15

 

2. नया मीडिया अध्ययन और अभ्यास, शालिनी जोशी, शिवप्रसाद जोशी पेंगुइन प्रकाशन- 2013, पृष्ठ- 5

 

3. न्यू मीडिया : इंटरनेट की भाषाई चुनौतियाँ और संभावनाएँ, संपादक - आर.अनुराधा, राधाकृष्ण प्रकाशन-2012. पृष्ठ-15

 

4. नागरिक पत्रकारिता का प्रातःकाल, वागर्थ, अंक 203 जून 2012 पृष्ठ-78

 

5. नया मीडिया अध्ययन और अभ्यास, शालिनी जोशी, शिवप्रसाद जोशी पेंगुइन बुक्स, 2015 पृष्ठ-45

 

6. Among India's Internet users, WhatsApp tops the list of instant messaging (IM) apps and Facebook is the most popular social networking site, according to a study by the research firm TNS . While56% of Internet users in India use WhatsApp every day, 51% use Facebook, says the study titled Connected Life http://www.livemint.com/Industry/vU55FbKdlz9vIfkxUb0EoL/Facebook-tops-networking-WhatsApp-in-message-apps-in-India.html

 

7. वेब मीडिया और हिंदी का वैश्विक परिदृश्य, संपादक-मनीष कुमार मिश्रा, हिंदी युग्म- 2013, पृष्ठ-315

 

8. "Culture is a historically created system of meaning and significance or what comes to the same thing, a system of belief and practice in terms of which a group of human beings understand, regulate and structure their invidual and collective lives. It is of both understanding and organizing human life, - Rethinking Multiculturism-Cultural Diversity and Political Theory. Bhikhu Parekh, Palgrave-2000 page- 143

 

9. ttps://www.unodc.org/documents/frontpage/Use_of_Internet_for_Terrorist_Purposes.pdf

10. UNDERSTANDING MEDIA AND CULTURE: AN INTRODUCTION TO MASS COMMUNICATION- pg. 37

11. https://itunews.itu.int/En/5896-History-of-the-ITU-Telecommunication-Development-Bureau.note.aspx

12. The government's ambitious Digital India plan, which is an umbrella initiative with an initial outlay of Rs 1.13lakh crore, covers nine programmes that include broadband highways, 100% mobile density, electronic manufacturing and eKranti or electronic delivery of services by 2018. Bridging digital divide, with focus on rural India: Ravi Shankar Prasad http://articles.economictimes.indiatimes.com/20150205/ news/58838257_1_digitalindiadigitalliteracyrssharmaET Bureau Feb 5, 2015, 04.17AM IST ET Bureau Feb 5, 2015, 04.17AM IST

 

13. Bridging digital divide, with focus on rural India: Ravi Shankar Prasad http://articles.economictimes.indiatimes.com/20150205/ news/58838257_1_digitalindiadigitalliteracyrssharmaET Bureau Feb 5, 2015, 04.17AM IST

14. "Another important development in the media's approach to information is its increasing subjectivity. Some analysts have used the term cyberbalkanization to describe the way media consumers filter information. Balkanization is an allusion to the political fragmentation of Eastern Europe's Balkan states following World War I, when the Ottoman Empire disintegrated into a number of ethnic and political fragments. Customized news feeds allow individuals to receive only the kinds of news and information they want and thus block out sources that report unwanted stories or perspectives. Many cultural critics have pointed to this kind of information filtering as the source of increasing political division and resulting loss of civic discourse. When media consumers hear only the information they want to, the common ground of public discourse that stems from general agreement on certain principles inevitably grows smaller"

UNDERSTANDING MEDIA AND CULTURE: AN INTRODUCTION TO MASS COMMUNICATION- Joseph B. McFadden pg. 55-56, University of Minnesota Libraries Publishing


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हिंदी समय में राकेश कुमार की रचनाएँ