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कहानी

आँगन की चिड़िया
चित्रा मुद्गल


कुइयाँ के थिर जल से टकराई कलसी-सा भकभकाया जी डूबने को हो रहा - भक्क्, भक्क्, भक्क्---

कार्तिक पूर्णिमा का नहान अभी शेष है, मगर उतरती दोपहरी अचानक अरराते घटाटोप से सँवलाई कसैली मनहूसियत छींटती, दबे पाँव घर में दाखिल हो चुकी है।

ऋतुएँ भी छुट्टा छोर-सी जब चाहें भेष बदल लेती हैं कि आँखें आसमान से टिका उनकी नब्ज ढूँढ़ते रहो। ऐसे रंग बदलते महीने उन्होंने पहले तो न देखे थे।

बिजली का बिल भरने जाना था, सो यही कहकर घर से गए हैं पाठक जी, कि वापसी में नया बाजार, मोहरकर की गली में मेजर अवताड़े के घर से होते हुए आएँगे। दो-चार बाजी उनके संग जमाएँगे ब्रिज की। कैंटीन से सामान मँगाने वाली लिस्ट जो बनाई है उन्होंने, उसे भी मेजर साहब को पकड़ाते आएँगे। कैंटीन में जरूरत की चीजें किफायती दामों में मिल जाती हैं। अवकाश प्राप्ति के साथ ही यह सब भी सोचना पड़ रहा है। वैसे छठा पे कमीशन आ रहा है। लागू होते ही हाथ सिकोड़ने से खासी राहत मिलेगी। पाठक जी उत्साह से भरे हुए हैं। गुणा-भाग में लगे रहते हैं। जब से लागू होगा, पिछले बकाए की तगड़ी रकम हाथ आएगी। दीवू के ब्याह-लगुन की चिंता से मुक्त हैं।

पाठक जी के घर से निकलते ही दीवू यानी उनकी दिव्या का फोन आया था गुड़गाँव से।

स्वर उलझन में डूबा हुआ सा महसूस हुआ और बोल असमंजस से घिरे हुए।

कह रही थी कि जिन तीन लड़कियों के साथ वह साझे का फ्लैट लेकर रह रही है, उनके साथ अब उसका निबाह संभव नहीं। देखा नहीं था उन्होंने आने पर उन कामचोरों को? कल रात तो हद ही कर दी शांभवी ने।

''मैं, मैं क्यों उसकी ऐश ट्रे से सिगरेट के टोंटे और राख झाड़ती फिरूँ? क्यों सहूँ उसकी ज्यादतियाँ? क्यों, क्यों झेलूँ उसके ऐब।''

''छह हजार अपने हिस्से का दे रही हूँ हर महीने, दस हजार और मिलाकर अपना अलग घर न ले लूँ?''

सुर के उखड़ेपन ने उन्हें सतर्क किया।

दबी जबान से उन्होंने अपनी असहमति दर्ज करवाई।

''अकेले रहने और तीन के संग-साथ रहने में फर्क है दीवू! रही ऐब की बात, तो सुन लो, जब चार जनें मिलकर रहते हैं तो उन्हें एक-दूसरे के छोटे-मोटे ऐब झेलने ही पड़ते हैं। हमने भी झेलें हैं। जब मैं इलाहाबाद में पढ़ रही थी और होस्टल में रह रही थी, तो मेरी रूम पार्टनर थी, बानी। बानी को पान खाने का शौक था। पान और पनडिब्बे भर का ही शौक होता, तब भी गनीमत थी। एक सौ बीस नंबर तमाखू के ऊपर लगाती थी राजरतन किमाम! सिरधना से लेकर ओढ़ने वाली चादरों तक में किमाम गमकता रहता। मैं परेशान। हफ्तों अगरबत्ती के पैकेट फूँक डाले। कमरा बदलवाने की धमकी दी। हाँ, पढ़ाई में अव्वल थी बानी।''

''तुम और कर ही क्या सकती थी, माँ! बाहर किराए का मकान लेकर रहना तुम्हारे लिए संभव नहीं था। नानाजी की हैसियत तो नहीं थी।''

सनाका खा गईं, ''यह कैसी भाषा बोल रही हो तुम - ?''

''रात वह चुड़ैल मेरे बिस्तर में घुस आई - घुसने की कोशिश तो उसने पहले भी की थी - ''

फोन काट दिया गया।

अकबकाई सी वह कुछ समझ नहीं पाई।

कुछ देर तक उसके फोन के दुबारा आने का इंतजार करती रहीं। रोज वही फोन करती है। कट जाने के बाद या काट दिए जाने के बाद भी वही दोबारा मिलाती है। कह रखा है उसने। दफ्तर ने उसे मोबाइल दे रखा है।

इतनी हिम्मत कैसे कर सकती है, शांभवी!

'जब तक आंटी है, घर में बाजार से मछली नहीं आएगी।'

बंगाली लड़की के लिए मछली और भात के बिना खाना खा पाना संभव नहीं। उन्होंने समझाने की कोशिश की थी, शांभवी को। वे लोग निश्चय ही घोर शाकाहारी हैं खानपान में, मगर कोई उनके साथ बैठकर जो चाहे, सो खाए, उन्हें कोई आपत्ति नहीं।

सिगरेट भी शांभवी को कभी अपने सामने पीते हुए नहीं देखा। अलबत्ता ऐश ट्रे खूबसूरत सी उसके कमरे में रखी हुई अवश्य देखी थी उन्होंने।

तब यही महसूस किया था। घर की टूटन से छीजी हुई बच्ची है। महानगर का अकेलापन कब कौन-सा रूप धर लत सा चिपक जाएगा, कहना मुश्किल है।

रही बात दीवू की, तो उनकी और पाठकजी की निरंतर यही कोशिश बनी हुई है कि वह दोनों अपनी इकलौती संतान को ग्वालियर और दिल्ली की दूरी कभी महसूस न होने दें। आई.एम.टी. गाजियाबाद में एम.बी.ए. कर रही थी, तब भी उनकी भागदौड़ बदस्तूर जारी थी। मायके और ससुराल वालों ने यहाँ तक चेतावनी दे डाली, बच्ची को अकेले दिल्ली काहे भेज रहे हो? नौकरी वहीं करवानी है तो यहाँ की रिहाइश छोड़ दिल्ली ही मकान क्यों नहीं खरीद लेते? अनिरुद्ध तो अब रहा नहीं।

- किस-किस से तर्क-वितर्क करते और बताते कि बेटे के लिए बुने गए सपने भी अब बच्ची की उठान में सलमे से टँक गए हैं।

वैसे भी वे लोग जीवन भर दीवू के संग चिपके रहने से रहे। ग्वालियर क्यों छोड़ें। चार कदम है बाजार और अटारी की मुंडेर लाँघ भर भरे हैं अपने। गुहार लगाओ कि मर-मरा के देहरी पर सब हाजिर।

पलटकर फोन नहीं आया दीवू का तो उन्होंने स्वयं फोन कर लेना मुनासिब समझा।

टेका पाने के लिए आँधर सा दीवार टटोल रहा है मन -

''हाँऽऽऽ माँ! बोलो!''

व्यस्त भाव ने टोह दी। घिरी हुई है शायद दीवू।

उन्हें कौन लंबी बात करनी है। सींक से उठा कनखजूरे को उनकी ओर उसने ही तो उछाला है!

''सुन, तूने जो कहा, गलतफहमी भी तो हो सकती है तेरी?''

''गलतफहमी!''

''माने, सहेली के संग गलबहियाँ डाल के सोया नहीं जा सकता?''

उनकी नादानी पर तरस खाती 'चप्प' सी ध्वनि उनके कान में सरकी।

''छोड़ो माँ, अब इतनी भी नादान नहीं मैं कि - मकसद न भाँप सकूँ।''

छत्तीस साल पुराना है उनके निवाड़ के पलंग का गद्दा। ब्याह के समय धुनकवा के भरवाया गया था। रुई गठिया रही। धुनकवाना जरूरी है। कब से टल रहा है मामला। खोल के लिए मोटा पटरी वाला कपड़ा खरीदना होगा, तब ही तो धुनकवाया जा सकेगा गद्दा।

उनकी तरफ कुछ अधिक ही पठारी हो रहा। पीठ में दर्द उठने लगता है। वैसे गद्दा इतना भी बुरा नहीं जितना अभी चुभ रहा है। कल दोपहर चैन की नींद सोई हैं इसी गद्दे पर।

उठीं बिस्तर पर से और बिजली का स्विच ऑन कर दिया। अँधेरा रात के अलावा बरदाश्त नहीं उन्हें।

बाहर बरामदे में आकर खड़ी हो गईं। कहीं बूँदा-बाँदी न शुरू हो जाए। आसार तो कब से डराए हुए हैं।

भीतर मुड़ने को हुईं मगर अगले ही पल पलटकर रेलिंग से आ टिकीं। रेलिंग हिलाने से हिलती है। ठोंका-ठोंकी से दुरुस्त नहीं होने वाली। नए सिरे से उखड़वा कर लगवाना होगा। अभी इधर ही ढीली हो आई है। अनिरुद्ध और दीवू छुटपन में इसी पर घुड़सवारी किया करते थे।

'चलो, कुल्छनों से दूर है दीवू!' अपने को सुनाया उन्होंने। उनके बेचैन होने से क्या होगा! अपनी परेशानियों का समाधान बच्चे अब स्वयं खोजने लगे हैं। समझना तो बड़ों को है। जरूरत न होते हुए भी अपनी परेशानियों का गुणा-भाग क्यों करते रहते हैं।

अनमनाहट को घूँटना होगा। आएँगे, जब आएँगे पाठकजी। अपने लिए तो वह चाय चढ़ा ही दें।

बुरी आदत है पाठक जी की। मोबाइल जेब में रखने के लिए तैयार नहीं होते। दीवू ने जबरन खरीदवा दिया है, तब भी। वही पर्स में डाले घूमती हैं।

भरोसा नहीं पाठक जी का। आते ही पकोड़ों की फरमाइश न कर दें। घिरे कसैले मौसम में उन्हें अक्सर पकौड़ों की सूझती है।

बाप के दाहिने है दीवू। पकौड़ों की शौकीन, शिकायत करती है। दिल्ली में बेसन फेंटने की जहमत नहीं उठाते लोग। सोडा डालकर पकौड़े तल लेते हैं। उसे फिंटे बेसन के पकौड़े पसंद हैं।

दिल्ली में भी घटाटोप छाया हुआ होगा क्या!

डेढ़ महीने बाद दीवू ने उन्हें मोबाइल पर सूचित किया।

उसी कालोनी से लगी दूसरी कालोनी में उसने दो शयनकक्षों वाला एक छोटा-सा फ्लैट किराए पर ले लिया है। अग्रिम दे चुकी है वह।

किराए की रकम अट्ठारह हजार प्रतिमाह सुनकर उनके मुँह के बोल चुक गए।

महीने भर पहले उसने इत्तिला दी थी उन्हें कि उसने पुराने मकान मालिक को सूचित कर दिया है कि वह इस व्यवस्था में रहने की इच्छुक नहीं है अब। चौथी लड़की बतौर किराएदार वह चाहें तो स्वयं तलाश लें या उन तीनों के जिम्मे छोड़ दें, वह जानें। परेशानी यह थी कि मकान उसे इफको चौक के आस-पास ही चाहिए था। दफ्तर की गाड़ी सुबह वहीं से उसे लेती है और वापसी में ठीक उसी ठियाँ उसे उतार देती है, दो अन्य सहयोगियों के साथ।

"फिर उद्दंडता तो नहीं की शांभवी ने?" पूछे बिने नहीं रह पाई थीं उससे।

"सबक सीखने से डर गई होगी।"

"कैसा सबक?"

"वही जो मैं सिखाती उसे।"

"जाने क्यों परसों लगा था ऐसा कि हैलो के बाद कट गया फोन शांभवी का था -"

"हो सकता है उसी ने किया हो अभी, परसों ही तो उसने कहा था घर से निकलने से पहले, आंटी की याद आ रही है।"

"मन में आया था कि फोन कर लूँ उसे - "

"माँऽऽ, क्यों बात करोगी उससे? इडियट प्रपंची है।"

तर्क मुखर होने से पहले पाया उस ओर दीवू है ही नहीं। उसकी इस आदत से उन्हें तकलीफ पहुँचती है। किसी के सामने आने पर फोन बंद कर देना और उसकी न सुनना और बात है किंतु अपनी टिप्पणी के विरुद्ध तर्कों का सामना करने से मुँह मोड़ना, उद्दंडता।

"उद्दंडता कैसी?" पाठक जी सुनकर हँस पड़े थे। कन्नी काटने वाली हँसी।

"सयानी हो गई है बच्ची, सीखों के पुलिंदे पकड़ाना बंद करो। शांभवी को प्रपंची कह रही है तो लगी होगी उसे प्रपंची।"

"मुझे तो नहीं लगी - "

"तब नहीं रही होगी, अब हो गई होगी।"

खीझ हो आई उन्हें। समझ नहीं रहे।

स्वर उग्र हो आया, 'चार बच्चों की माँ तक दिल्ली में अकेले घर से निकलने में डरती है। ऊपर से यह जिद्दन मानने को तैयार नहीं। साथ नहीं रहना उन लड़कियों के, तो न रहे। पेइंग गेस्ट होकर रह ले किसी भले घर।'

"नहीं झेलना होगा उसे औरों को। उसकी मर्जी। उसका सोचना गलत भी नहीं लग रहा कि हम लोग आते-जाते रहेंगे उसके पास।"

"वह तो अब भी आते-जाते रहते हैं।"

"अब और तब में फर्क होगा न! तब हम जब तक जी चाहें, बेटी के पास रह सकते हैं।"

उन्हें याद आया।

एम.बी.ए. पास करते ही होस्टल से सामान उठाया नहीं था कि सूचना मिली कि एक अमरीकन साफ्टवेयर कंपनी में दीवू की साढ़े तीन लाख रुपये सालाना की नौकरी लग गई है। हालाँकि साल भर का प्रोबेशन पीरियड है।

पाठक जी के पर लग गए।

दिनभर डायरी खोले बैठे रिश्तेदारों और अजीजों को फोन लगाते रहे। अपना छलछलाता गर्व बाँटने को। गर्व में ऊभ-चूभ होते सभी से कह रहे थे, 'भाई साहब, लड़का दीवू से इक्कीस हो, तभी बताएँ हमें।'

दूसरे रोज नया बाजार के चौक पर स्थित, 'हनुमान लड्डू भंडार' से असली घी के आधा-आधा किलो के डिब्बे तुलवाए गए और चिलचिलाती धूप की परवाह न कर रिक्शे में लद कंपू तक बँटे।

उनके लिए विशेष रूप से गरमागरम तुलवा लाए दीवू की पसंद के बरईवाले गुलाब जामुन। विशेष छूट चाही अपने खाने के लिए। उन्होंने हँसते हुए छूट दे दी। पानी में धोकर खा सकते हैं। पिछले हफ्ते ही पाठकजी की मधुमेह की जाँच करवाई थी। नाश्ते से पहले और तगड़े नाश्ते के बाद। आश्वस्ति हुई। रक्त में चीनी नियंत्रण में थी।

पलटकर तसल्ली थमाई खुद को। अट्ठारह हजार कौन ज्यादा है दीवू के लिए? दीवू का खर्च सुनते ही बिरझा उठती हैं, मानो स्वयं उनके पाँव चादर से झाँकने लगे हों। अपने को खूँद रही हैं तो यह भी महसूस हो रहा है। इन ऊपरी बातों के बहाने असल में निरंतर चुभ रही है उसके अकेले रहने की जिद्द।

दीवू ने आगे यह भी बताया कि उसके लिए यह प्यारा-सा फ्लैट तलाश करने में उसके आई.एम.टी. के सहपाठी विकी यानी कि विवेक साहनी ने बहुत मदद की, वरना दलालों के चक्कर खासी मुसीबत होते हैं। विकी भी गुड़गाँव में ही एक जर्मन फर्म में है। प्रोबेशन पीरियड पूरा कर चुका है। विकी का पैकेज उसके अनुबंध से कम है।

उसके बारे में तुम्हें बताया था न माँ।

उन्होंने दिमाग पर जोर देकर याद करने की कोशिश की। कब दीवू ने उन्हें विकी उर्फ विवेक साहनी के विषय में बताया था! भूलने की बीमारी उन्हें नहीं, पाठक जी को जरूर है। उनके प्रसन्न रहने का राज भी शायद यही है।

"पिछली बार दिल्ली आने पर विकी से मिलवाया क्यों नहीं?"

आवाज के उखड़ेपन को भरसक दबाने की कोशिश की थी उन्होंने।

दरदरी हँसी खनकी थी, "डर लगा था।"

"किस बात से?"

"तुम मुझे उन भूतनियों जैसा न समझ लो।"

"अब नहीं समझ सकती?"

"समझने जैसा, ऐसा कुछ नहीं है हमारे बीच!"

"फिर, डर क्यों लगा?"

हमेशा की भाँति वह छलाँग भर उनकी पकड़ से छू हो गई, 'सुनिए माँ, पापा हैं न पास, तनिक उन्हें फोन दीजिए।'

पाठकजी को फोन नहीं पकड़ाया तो फोन रख दिया जाएगा।

गनीमत है डर है लड़की को, डर का नैतिकता से गहरा ताल्लुक है। जब भी उसे डरा हुआ देखती हैं, आश्वस्ति से भर उठती हैं।

मोबाइल कान से सटा पाठक जी चौखट से बाहर हो बरामदे में टहलने लगे। रसोई में पलट वे प्लेटफार्म की बिखराहट सरियाने लगीं।

बर्तन आहिस्ता समेटती हैं। टकराने की झन्नाहट उन्हें खटकती है। बर्तनों की टकराहट को सास घर की अशांति से जोड़ती थीं और बरक्कत में रोड़ा। काम निपटाते हाथ उलझे हुए जरूर हैं मगर भीतर चंबल का बीहड़ भाँय-भाँय करता उग आया।

प्लेटफार्म पोंछते पोंछा को वह बुलडोजर में बदलने की कोशिश करती हैं। उगते डूह कद काढ़ें, इससे पहले ढहा उन्हें समतल कर देना चाहती हैं। न चाहते हुए भी क्यों दाखिल हो जाता बीहड़ उनके भीतर! डर कौन रहा है?

छोटे में दीवू डरकर सच बोलने लगती थी और अनिरुद्ध झूठ।

दबिश बढ़ते ही अनिरुद्ध को भी पटरी पर आते समय नहीं लगता था।

बच्चों को डराकर शायद वह स्वयं भयमुक्त होना चाहती थी।

डर उन्हें अनावश्यक भी तो डराता रहता है बार्रइयों-सा उनके भीतर भिनकता - भूऊँऊऽऽऽ -

दीवू ने नहीं किया मनुहार इस बार कि माँ, तुम्हारे आए बिना गृह प्रवेश कैसे करूँगी! पापा और तुम अगले हफ्ते का दिल्ली का टिकट आरक्षित करवा लो। घर सुव्यवस्थित कौन करेगा? मुझे कहाँ समय है? चुड़ैलों वाले इस घर की सारी जरूरत की चीजें तुम देख ही गई हो कि मकान मालिक ने दे रखी हैं। हो सकता है पाठक जी से इस बाबत बात की हो उसने।

पूछने पर पाठक जी ने इनकार में सिर हिला दिया। हमें तो चिबिल्ली संता-बंता के जोक्स सुना रही थी। कुछ नए जोक्स एस.एम.एस. करेगी। कह रही थी कि पापा उन्हें मैं सुना नहीं सकती।

अनमनाहट में पत्नी का नमकीन लंबा चेहरा सूखी बेल पर लटकी तुरई-सा लटक आता है। अनमनाहट साड़ी-सी हरदम लपेटे रहने की आदत इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ गई उनमें।

पाठक जी ने स्वर में धैर्य की मात्रा बढ़ाई, 'भई, दीवू ने नहीं कहा आने के लिए तो खुद क्यों नहीं कह देतीं कि मैं दिल्ली आ रही हूँ?'

आगे जोड़ा उन्होंने। उनके कुछ बोलने की उतावली को खामोश रहने पर विवश करते हुए, 'यह भी कह रही थी मुन्नो, पापा अपना और ममी का पासपोर्ट बनवा लें, भोपाल जाना पड़े तो हो आएँ।' (लाड़ में पाठक जी दीवू को अनेक संबोधनों से पुकारते हैं।)

पाँचवें रोज फोन पर वह उन्हें कुछ फुरसत में लगी जबकि 'हलो, हाय' लगभग रोज ही होती रहती है।

"सुन दीवू, मैं आती हूँ - नए घर की जमा-जमाई अकेले तेरे बूते की नहीं।"

उन्होंने यह भी बता दिया कि उसके कहे मुताबिक मखमल की डबल बेड की रजाई का फर्द लेकर भरवा लिया है उन्होंने। रंग भी उसकी पसंद का मिल गया है। लोहिया बाजार से लोहे की छोटी कढ़ाई और तवा भी वजनदार ले आई हैं। टेंटी का किलो भर अचार उसके पापा ले आए हैं। परात, पतीले, आटा, दाल, चावल के डिब्बे, मिर्च-मसाले, पापड़ मुंगोड़ी, बड़ी और नया बाजार से क्रास स्टिच वाले चादर, तकिए के खोल आदि सब जोड़ लिए हैं। अन्य किसी चीज की जरूरत हो तो फोन पर नोट करवा दे उन्हें। साथ आ जाएगा। टिकट ताज से ही बुक करवाएँगी। शताब्दी से इतना सामान आना मुश्किल है। रुकना पड़ा उन्हें।

दीवू ने सकुचाते हुए उन्हें बीच में टोका। अभी थोड़ा रुक जाएँ। कारण? कारण ही तो गले का फंदा हो रहे हैं। भयंकर मारामारी है। घर की रंगाई-पुताई होनी है। अगले हफ्ते वह एक अन्य विदेशी कंपनी ज्वाइन करने जा रही है। साढ़े बारह लाख साल की पैकेज डील हुई है। पिछली कंपनी उसने पिछले महीने ही छोड़ दी थी। उन्हें और पापा को नहीं बताया तो सिर्फ यही सोचकर कि खामख्वाह उनके चैन में खलल क्यों डाले। नई कंपनी जे.जे.जे. को ज्वाइन करते ही उसे फौरन जिनेवा जाना है, कंपनी की एक प्रशिक्षण योजना के तहत। जिनेवा से सवा महीने बाद लौटना होगा। इसी बीच वीजा आदि की औपचारिकताएँ पूरी होनी हैं। आने की कोशिश होगी उसकी ग्वालियर लेकिन गुंजाइश निकलती नहीं दिख रही। उसके जिनेवा से लौट आने पर ही वे दिल्ली आने का कार्यक्रम बनाएँ। संभव है तब तक लोन आदि का प्रबंध कर वह अपनी गाड़ी खरीद ले। गाड़ी के बिना दिल्ली में आवाजाही कठिन है।

गाड़ी चलाना सीख रही है। बाकायदा ड्राइविंग स्कूल ज्वाइन किया हुआ है। पापा से जिक्र न करें। उन्हें चौंका देना चाहती है। स्टेशन से घर ले जाकर।

उन लोगों की कमी उठते-बैठते निरंतर महसूस हो रही है। छोटा शहर अकेला नहीं करता। बड़ा निगल लेता है।

कल रात उनकी और पापा की इतनी जोर से याद आई, उनकी गोद की हुड़क जो मचती है।

जिनेवा जाने से पहले फोन कर उनका आशीर्वाद लेगी। एयरपोर्ट से उन्हें फोन करेगी।

अब उससे यह न कहने लगें कि वह ग्वालियर से उसके रास्ते के लिए खस्ता बनाकर भेज रही हैं - कोई आने वाला न मिला तो कूरियर से सुरक्षित भिजवाने का जतन करेंगी।

"माँ, क्यूँ याद आ रही हो इस वक्त इतनी ज्यादा - "

सुनते ही भड़भड़ाया मन आँखों में उमड़ आया। हास्यास्पद लगने वाले उसके पापा के तमाम संबोधन उसे पुकारने के, पिघलने को बेचैन हो आए उनके होंठों पर। मुन्ना, मोंटू, मोरी बिल्लरिया, चुनमुन, पुत्ती, पिड़कुल, पीपीलिका, बंदरिया, गुलबुल और बछिया -

सिर पर भरे बादलों-सा वक्त गुजरने लगा। वक्त बहने के लिए ही तो होता है। ऐसे बहता है कि कब उम्र गुजर गई, अंदाजा ही नहीं लगता।

जिनेवा से प्रशिक्षण लेकर लौटी दीवू हांगकांग, आस्ट्रेलिया और अमेरिका की यात्रा पर निकल गई।

पाठक जी बात होने पर अपनी बिल्लरिया को समझाते। नित्य प्रति सोने से पूर्व डायरी लिखना न भूलें। अलग-अलग जगहों के अलग-अलग अलबम बनाना न भूलें। यह करना न भूलें, वह करना न भूलें। उधर से, "हाँ पापा", "हाँ पापा!" में ही जवाब मिलता रहा होगा, बिना सुने, उन्हें अंदाजा है।

पिछली किसी शाम पाठकजी हुलस के मित्र मेजर अवताड़े को फोन पर बता रहे थे। एक वे हैं कि एक ही शहर में घर घुसरू से बने हुए कभी बाहर निकलने की ही नहीं सोची।

ग्वालियर न छोड़ने के चक्कर में उन्होंने अपने कई महत्वपूर्ण तबादले भोपाल जाकर राजनीतिज्ञों के दरवाजे खटखटाकर निरस्त करवाए। पदोन्नति का मोह छोड़।

देश ही नहीं घूम पाए वह और उनकी दीवू का एक पाँव - हवाई जहाज में ही बना रहता है!

शादी, हाँ, उसकी शादी की चिंता बराबर बनी हुई है उन्हें। वे भी तो परिचित हैं उनके रायबरेली वाले बड़े मामा प्रोफेसर रामबचन तिवारी से।

आई.ए.एस. में इसी साल चुन लिए गए सर्वेश मिश्रा के मामा के माध्यम से उन्होंने दीवू और सर्वेश के ब्याह और लेन-देन के संदर्भ में बात चलाई है। तसवीरें माँगी गई थीं दीवू की तो अनुराधा ने भेज दी हैं बडे़ मामा जी को। बात लड़का-लड़की की पसंद पर टिकी हुई है।

न, न, न, आप ठीक कह रहे हैं मेजर साहब! पसंद के बावजूद टीम टाम में लाखों ढीले करने पड़ सकते हैं।

हाऽऽ हमने भी तय कर लिया, कौन दो-चार औलादों को लग्गे लगाना है - हमें, ले-दे के एक दीवू ही तो है।

कपड़े तह अलमारी में सरियाते हुए चिंहुक कर खयाल आया, गैस पर चाय का पानी चढ़ा कर आई थी।

काम से हाथ खींच दौड़ी तो पाया पतीले की पेंदी अंगारा हो रही है।

अलमारी जब-जब कपड़े रखने-निकालने के लिए खोलती हैं, बीच के कोने में हैंगर पर टँगे अनिरुद्ध के स्कूल के कोट को छूना नहीं भूलती।

पलटी और शेष कपड़ों को यथा स्थान रख कोट को छूने लगी।

उसाँस गहरा आई।

कितना रुके और? रुका जाए, तब न! मुँह देखे बिना सब्र नहीं बँधता जैसे विदा कर दिया हो दीवू को।

मकर संक्रांति से पहले ही अड़ गईं। खिचड़ी वहीं मनाएँगी और यहाँ निकालकर रख जाएँगी ताकि पाठक जी हाथ लगाकर भिजवा दें नया बाजार द्विवेदी पंडित जी के घर।

मोबाइल पर दीवू को सूचित कर दिया। बारह जनवरी को वह ताज से दिल्ली आने की टिकट बुक कराने जा रही है। कोई हील-हुज्जत नहीं सुननी उन्हें। काम-धंधों की व्यस्तता सभी पर लदी होती है। उसके बाहर आने-जाने से उन्हें कौन दिक्कत। घर है न रहने के लिए।

पाठक जी ने पहले ही साथ चलने से मना कर दिया था। पेड़ई पर हर्निया गुमटे-सा बाहर निकल आया है। बाड़े के डाक्टर मित्रल से निरंतर परामर्श कर रहे हैं। हर्निया के लिए बने विशेष बेल्ट को उन्होंने बाँधे रखने का सुझाव दिया हैं। दर्द मामूली-सा उठता है, उनके लौटने तक आपरेशन टालेंगे। प्रोस्टेट की नई समस्या शुरू हो गई है। दीवू से उनके कष्ट का रोना न रोएँ। समय पर बताना जरूरी होगा, तब बता दिया जाएगा। मामूली ऑपरेशन है। नौकरी उसकी बड़ी है, बड़ी नौकरी की समस्याएँ दम-चुसनी होती हैं। उन्होंने सरकारी नौकरी की है। सरकारी नौकरी ताजी बियाई भैंस-सी दरवाजे बँधी सदैव निश्चिंत किए रहती है।

सुनकर दीवू ने अबकी कोई ना-नुकर नहीं की। कहा कि वह गुड़गाँव से निजामुद्दीन स्टेशन पहुँच कर उन्हें ले लेगी। चिंता न करें।

मौसम ने उनकी अधीरता को अनुकूलता से सहलाए रखा।

आशंकाओं को परे ढकेल दो रोज से चमकीले सुनहरे घाम की चढ़त ने कोहरे को ठिठकाए रखा था। उम्मीद थी कि ताज निर्धारित समय पर निजामुद्दीन पहुँच जाएगी।

गाड़ी की रफ्तार जहाँ कहीं भी धीमी पड़ती, उनका जी बेलगाम होने लगता, पन्हाई गाय-सा बछिया से लिपटने को व्याकुल।

उनकी आँखों पर जैसे भरोसा नहीं था। व्याकुलता ने अपनी आँखें खोल ली थीं। अँधेरे और दूर उजाले में उगती और पीछे छूटती बस्तियों को खिड़की के मोटे काँच को भेद पहचान लेना चाहती थीं वे आँखें कि दिल्ली कितनी दूर है!

दीवू की गृहस्थी ढोकर ले जा रही हैं। देखते ही आँखें चमकाती अपने चिरपरिचित चिलिबले अंदाज में खुशी से उछल पड़ेगी बावली।

उसकी खुशी बाड़े तोड़ती है तो वह आसमान में उड़ते गुब्बारे-सी उड़ने लगती है और उसके पाँवों को हथेलियों से कस, वह भी उसके संग उड़ान भरने लगती हैं।

उड़ानें कल रात भी भरी थीं उन्होंने।

पिछले दस वर्षों से वह पाठकजी को मनाने की कोशिश कर रही हैं कि अन्य व्यावहारिकता छोड़ वे तनिक दुनियादार हो जाएँ, मगर बात उठाते ही उनकी वही पुरानी तोतारटंत शुरू हो जाती। कोई कमी है हम लोगों को? ग्वालियर जैसी ऐतिहासिक नगरी में अपनी छत के नीचे बैठे हुए हैं। गुजारे को खासी पेंशन है। खासी इसीलिए कि हमारे खर्च ही क्या हैं। हारी-बीमारी के लिए सी.जी.एच.एस. की सुविधा मामूली नहीं। तो फिर सांगीपुर की बित्ता भर की जमीन बँटवाकर कौन कारूँ का खजाना झोली में आ गिरेगा! बड़े भैया के बड़के ने अपना वर्तमान-भविष्य सब कुछ झोंक दिया हरहों की सानी-पानी और खेत-खलिहानों की गोड़ाई-बोवाई में।

'बोलो, क्या चाहती हो तुम?' तन आए थे पाठकजी।

बोलने में निर्लज्ज हो आई। ध्यान से उनकी सुने। अपने इधर बीस बिसुआ का बीघा होता है और डेढ़ लाख प्रति बीघे का हिसाब चल रहा है। उनके हिस्से के छह बीघे के नौ लाख बनते हैं। नौ लाख की रकम छोटी नहीं होती। जमीन की कीमत और सिक्स्थ पे कमीशन के बकाये की रकम हाथ आएगी तो दीवू की भाँवरों की चिंता से उन्हें मुक्ति मिलेगी। आई.ए.एस. दामाद का सपना निर्विघ्न साकार हो सकेगा। जहाँ तक लड़की के पसंद आने का प्रश्न है, बेटी देख मजाल कोई मुँह फेर ले!

तंग हो आए पाठक जी ने पिंड छुड़ाया।

इसी हफ्ते वह बड़े भैया को गाँव चिट्ठी भेज देंगे।

उन्हें स्पष्ट लिख देंगे अपने हिस्से के छह बीघा खेत वे बेचने की सोच रहे हैं। बड़े भैया चाहें तो उनके खेत स्वयं खरीद लें। उन्हें भी अच्छा लगेगा अगर घर की जमीन घर में ही बनी रहे। आँगन, दुआर बँटवाने का उनका कोई इरादा नहीं है। वैसे भी उन्हें नहीं लगता कि बड़के के तीनों बेटे स्कूली शिक्षा पूरी कर गाँव में बने रहेंगे और उच्च शिक्षा ग्रहण कर गाँव लौटने की सोचेंगे। बड़के को भी आगे चलकर छोटकवू से बँटवारा कर गाँव-देहरी का खाता बंदकर बच्चों के संग रहने को मजबूर होना पड़ेगा।

बड़े भैया का छोटा बेटा छोटकवू, यानी की एडवोकेट बीरेंद्र पाठक इलाहाबाद में वकालत कर रहा है। बता रहा था उनसे तगड़े आसामियों के झूठे-सच्चे मुकदमे हाथ में न लेता वह तो वास्तविकता तो यह है कि वकालत का काला कोट खूँटी पर टाँग नगर निगम की क्लर्की करने की नौबत आ चुकी होती उसकी।

"पिछले महीने ही नैनी में हजार गज का प्लाट खरीदा है छोटकवू ने!"

"खरीदा होगा, हमसे तो उधार नहीं माँगा उसने!" घिसे रेकार्ड-सी सूचना की दोहराहट ने पाठक जी में गुर्राहट पैदा कर दी।

आगे इस विषय पर चुप रहना ही बेहतर लगा उन्हें।

गाड़ी तुगलकाबाद छू रही है।

तुगलकाबाद पार करते ही पहियों की रफ्तार धीमी होने लगी।

घंटे भर विलंब से पहुँच रही निजामुद्दीन। प्लेटफार्म पर प्रतीक्षा करती दीवू परेशान हो रही होगी।

तेज हुई दिल की धक, धक उन्हें दिल के दिन-ब-दिन कमजोर होने की आशंका से भर देती है। प्लेटफार्म की सीढ़ियाँ चढ़ने में भी दम फूलने लगा है। पाठक जी को नहीं बतातीं इस भय से कि उनकी देह की चूलें कौन कम हिली हुई हैं।

गाड़ी यही खत्म होती है, उन्हें हड़बड़ाने की कतई जरूरत नहीं। सोचा उन्होंने।

रास्ते भर सामान पर नजर गड़ाए हुए आई हैं। उतर जाएगा आराम से। अलबत्ता कुलियों का बखेड़ा जरूर है। ग्वालियर के कुली दिल्ली से फर्क हैं। दिल्ली के कुलियों की मनमानी से भय लगता है उन्हें। पाठक जी ने चेतावनी देकर भेजा है उन्हें। उठवाई जो माँगें, सो चुपचाप दे देना।

खिड़की से झाँकते ही दीवू ठीक डिब्बे के सामने खड़ी दिखी। लंबे से काले कोट में। कुछ लंबी हो आई सी लगी।

पागल ने कानों को ढकने के लिए स्कार्फ क्यों नहीं बाँध रखा? इतनी रात में बालों के लहराते कट कौन देखेगा!

वे अपनी सीट पर ही बैठी रहीं। सीट नंबर दीवू को पता है। डिब्बे में कुली घुसते नजर नहीं आए। मिल जाएँगे। जाड़े के दिन हैं।

उतरती सवारियों से बचती दीवू, 'माँऽऽऽऽ' की गुहार लगाती उनकी बाँहों में भर कर सिमट गई और वे गौरैया हो आईं।

विह्वलता को आँखों में छलकने से बरजा उन्होंने।

उन्होंने महसूस किया, सीने से आ लगी बेटी संयत है।

"माँ, सामान?"

उन्होंने सीट के नीचे इशारा करते हुए उससे नीचे उतर कुली देख लेने का आग्रह किया।

"जरूरत नहीं है कुली की। विकी है न साथ!"

दीवू की मुड़ती नजर के साथ उसके ठीक पीछे आ खड़े हुए लड़के की ओर देखा उन्होंने, जो उनकी नजर अपने ऊपर पड़ते ही उनके पाँव छूने नीचे झुक गया। शालीन सकुचाहट से सरोबार।

"आंटी, आप चलकर प्लेटफार्म पर खड़ी हो जाएँ, मैं सामान उतारता हूँ।"

"येऽऽ सारा अपना सामान है?"

"तो ये हैं विकी उर्फ विवेक साहनी उर्फ' सहपाठी मददगार। जे.जे.जे. की सहायक प्रोजेक्ट मैनेजर को घर दिलवाने वाला!"

प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो गईं वे उनके निर्देशानुसार।

होशियार है लड़की उनकी। सर्दी की ठिठुरती रात में जे.जे.जे. की सहायक प्रोजेक्ट मैनेजर होने के बावजूद गुड़गाँव से निजामुद्दीन उन्हें अकेले लेने आना, सुविधाओं से भरे शहर के जोखिमों का सामना करते हुए आसान नहीं था। सामान उतरवाने से लेकर कुली आदि के प्रबंध का जिम्मा आगे बढ़ विकी ने ले लिया अपने कंधों पर। अच्छी मैनेजर है दीवू। सोचा उनके मन ने।

मन ने मन को आश्वस्त भी किया। स्कूल, कॉलेज की दोस्तियाँ ही असली दोस्तियाँ होती हैं। उसकी जगह न रिश्तेदार ले सकते हैं, न कार्यालयीन सहकर्मी क्योंकि बीच में उनके न कोई स्वार्थ होता है, न प्रतिस्पर्धा।

ऐसा नहीं है कि दिल्ली में उनके गाँव-जवार के लोग नहीं रहते, मगर उनसे उन्होंने सदैव दूरी बरती है। वरना बच्चों को आगरे का ताजमहल दिखाने के बहाने वे ग्वालियर का किला देखने उनके घर आ टपकते। इस मुद्दे पर पाठक जी भी उनसे सहमत हैं कि पढ़ने वाले बच्चों को भूलकर भी रिश्तेदारों को देहरी नहीं डकानी चाहिए। किताबें खोलने की बजाय बच्चे वहाँ घर का आटा माँडते नजर आएँगे।

गाड़ी विकी चला रहा है। पीछे बैठे हुए इच्छा हुई कि विकी की बगल में बैठी हुई दीवू से पूछ ही लें, 'गाड़ी अच्छी है, तुमने खरीदी, वही है न!'

बिना बोले हुए जाने दीवू ने कैसे सुन ली उनके मन की बात, ''यह गाड़ी विकी की है माँ! सेंट्रो में स्टील ग्रे रंग उपलब्ध नहीं था। शोरूम वालों ने कहा है कि पंद्रह-बीस रोज लग जाएँगे गाड़ी की डिलीवरी में।''

"दिल्ली तुम मेरी उसी गाड़ी में घूमोगी।"

"बरई वाले गुलाब जामुन लेकर आई हो न माँ।"

"लाई हूँ न," प्रफुल्लित हो आया जी - "दुकान से ताजे बनवा कर लाए हैं तेरे पापा।" आवाज मचली, "कहाँ रखे हैं?"

"तेरे पाँवों के आगे जो लाल रंग वाला एयर बैग रखा हुआ है न, उसी में हैं सेलम वाले स्टील के बड़े कटोरदाने में।"

सब दरका।

सावधानीपूर्वक एयर बैग उठाकर गोद में रख लिया गया। गाड़ी चला रहे विकी से अँग्रेजी में पूछा गया, "गुलाब जामुन खाओगे?"

जानें विकी ने क्या जवाब दिया कि उचटकर एयर बैग खोले बिना ही सघनाते कोहरे की नमी को पोंछने लगी।

दीवू का उचटना उन्हें रुचा नहीं।

आँखें फेर उन्होंने खिड़की से सटा लीं। रूमाल निकाल खिड़की का शीशा पोंछा।

पिघली चाँदनी सी सघनाती धुंध की झीनी परत के आरपार सड़कों के किनारे खुदे हुए मिले।

बड़ी तेजी से मैट्रो दिल्ली को ढोने के लिए कमर कस रही है।

कभी सिर के ऊपर से फ्लाई ओवर गुजरते हैं तो कभी गाड़ी फ्लाई ओवर की सर्पीली छाती पर फर्राटे भरने लगती है।

दिल्ली केंचुल बदल रही है। ऊँची-ऊँची हैलोजिन के सुनहरे आलोक में स्वप्नलोक सिरजती।

आदमी पहले बदलता है या शहर!

कुछ आदमी शहर को बदलते हैं, शेष आदमी शहर के बदलते ही स्वयं को बदल लेते हैं -

"सुनो माँ", पीछे तिरछे हो मुड़ते हुए दीवू ने चेहरा उसकी ओर घुमाया - मैंने तुम्हें बताया था न फ्लैट सातवें माले पर है?

"बताया होता तो मुझे याद होता न! परेशान हो रहे थे सामान ऊपर कैसे चढ़ेगा, घर ऊपर हुआ अगर - "

"वो, हुआ ऐसे कि इसी कालोनी में छोटी वाली बिल्डिंग में से एक तीसरे माले वाला फ्लैट पसंद किया था पहले। लिफ्ट न होने की वजह से उसे छोड़ दिया।"

अपनी सीट पर सीधी हो गई दीवू।

इधर व्यापी खामोशी उनके भीतर चटखने लगी।

हो सकता है उन्हें भ्रम हुआ हो। विकी को डिब्बे से सामान ढोता देख दीवू खीझी लगी थी उन्हें। प्लेटफार्म पर सामान उतार लेने के बाद ही जाकर कुली मिला था। पाठकजी की पुरानी पैंटों से सिले गए झोलों का सदुपयोग भी अखरा होगा उसे। अल्यूमिनियम का पुराना ट्रंक देख बिदकी होगी। भारी-भरकम डबल बेड की रजाई सुरक्षित लाने का और क्या तरीका हो सकता था? पिछले महीने ही कैंटीन से दो बढ़िया एयर बैग मँगवाए हैं पाठक जी ने लेकिन उन्हें हाथ नहीं लगाया खरोंच पड़ने के अंदेशे से। कड़ाही, तवा, चिमटा पुराने झोलों में ही भले। यह क्या जानें गृहस्थी के झंझट। घर ले लेने भर से घर नहीं बस जाता। वे तो अपने संग नींबू निचोड़ने की नींबूदानी तक लेकर आई हैं। कब किस चीज की जरूरत आन लगे, कौन जाने। उसके ब्याह के लिए उसके पैदा होते ही चीज-बस्त जोड़ने-सँजोने लगी थीं।

उन्हें तो अपनी अड़तीस साल पुरानी गृहस्थी में भी लगता रहता है कि वे अब तक अपनी बैठक को उस तरह नहीं सजा पाईं जिस तरह सजाना चाह रही थीं।

"बस, आ गए माँ! वह रहा सामने इफको चौक। हम यहीं से मुड़ेंगे। मालूम है - पिछली बार यहीं किसी मॉल में ले गई थीं।"

इफ्को चौक से गाड़ी बाएँ मुड़ गई।

पहुँच भी गए। रास्ते भर दोनों अँग्रेजी में लगातार बतियाते रहे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने भी अँग्रेजी में एम.ए. किया है, मगर एक बात उनके पल्ले नहीं पड़ी। पड़ती कैसे। खुसुर-पुसुर गलबहियाँ डाले कानों को ही समझ में आती है।

कालोनी बड़ी शानदार लगी उन्हें। सजावटी पेड़-पौधों से सजे-धजे गुलमोहर अभी कद काढ़ रहे हैं। दो-चार वर्षों के भीतर ही रिहाइश के लिए तैयार हुई लगती है।

दीवू ने घर का लैच खोला। ठिठक गई दरवाजे पर। दोनों ओर क्रिसमस ट्री के दो गमले रखे हुए थे और चौखट के ऊपर लटक रहा था कच्छी तोरण। यहाँ कैसे आया? पिछली बार दीवू, शांभवी, अनिमा और शुभ्रा के साथ मयूर विहार के निकट 'अक्षरधाम' गई थी तो ग्वालियर के लिए हूबहू तोरण खरीदा था उन्होंने। कौड़ियों की झालर में गुँथे-गदराए रंग-बिरंगे गेंदों के फूलों जैसे फुँदनों से अलंकृत। छोटा, पर ठीक वैसी ही धज के लटके हुए नन्हे चोटीले।

देहरी के भीतर पाँव देते ही एक सुरुचिपूर्ण बैठक चढ़े बसंत-सी आँखों में अँज गई।

उदास हो आईं। उम्र की दीवार पर दरकनें मुँह काढ़ने लगी हैं और उनके सपनों की बैठक सपनों में ही जड़ी जमीन पर पाँव तक नहीं दे पाई।

दीवू ने उन्हें रसोई दिखाई। 'यह माड्यूलर किचन है माँ!'

"बस फ्रिज, माइक्रोवेव अवन और वाटरप्यूरीफायर भर खरीदे हैं - " गेरुए परदे खींच दरवाजे के कोनों में समेट उनकी कोहनी पकड़ उसने उन्हें अपना शयनकक्ष दिखाया, 'हमारा बेडरूम - ।'

हमारा माने, उन्हें भी वह अपने साथ ही सुलाएगी।

मोटे गद्दे से सजा हुआ पीतल का शाहाना भारी-भरकम पलंग, पाठक जी के साथ मुंबई के जुहू होटल में एक बार ऐसे ही शाहाना पलंग पर सोने की कोशिश में रात भर पलक नहीं झपकी थी!

उनके चेहरे पर नजर टिकाए दीवू ने उनके गालों को हल्के से छुआ -

''माँऽऽऽऽ - ''

अचकचाई। ''बहुत कलात्मक है, बहुत सुंदर!''

"मैं तेरे लिए धानी रंग पर कत्थई फूलों वाली मखमल की डबल बेड की बहुत प्यारी-सी रजाई भरवा कर लाई हूँ। अभी निकालकर लाई।"

उमग कर वे मुड़ीं।

"रुई की?"

"रुई की।"

"कौन ओढ़ेगा रुई की रजाई माँ?" रुई की गद्दे-रजाइयों में डस्ट माइट्स हो जाते हैं। मैंने फोम की खरीद ली हैं।

"पर, तूने ही तो कहा था भरवाने के लिए?"

"कहा होगा। तब तुम्हारी पसंद, मेरी पसंद रही होगी।" दोनों हाथ नचा कंधे उचकाए दीवू ने।

हतप्रभ हो उठीं। सीने में अचानक चंबल के डूह भरभरा आए। कैसे बरदाश्त कर ले कुतरती उपेक्षा!

अगले ही पल सँभली। पराए बच्चे के सामने नादानी उचित नहीं। भले विकी दीवू का सहपाठी रहा है। जो कुछ अपनी बच्ची से निपटना है, उसके जाने के बाद निपटा जा सकता है। सामान जहाँ पड़ा है, वहीं पड़ा रहेगा। ठौर-ठिकाने सुबह रखा जाएगा। जल्दी क्या है।

वह मुड़कर शयनकक्ष से बाहर निकल आईं।

बैठक में रखे हुए सामान में से लाल रंग वाला मिठाई का एयर बैग ढूँढ़ने लगीं। एक अन्य एयरबैग के नीचे रखा हुआ दिख गया।

उन्हें ऊपर वाला बैग उठाते देख विकी उनकी मदद को लपक आया। एयर बैग भी खोल दिया उसने।

बैग से उन्होंने मुरैना की गजक वाले किलो-किलो भर के दो डिब्बे बाहर निकाले। गुड़ और चीनी, दोनों के। इतने सामान की उठवाई ही कुली सौ से ऊपर धरा लेता। बहुत मदद की लड़के ने।

खड़े हो डिब्बे उन्होंने विकी की ओर बढ़ाए।

"एक से ऊपर हो रहा बेटा। अब तुम घर के लिए निकल लो। घर वाले परेशान हो रहे होंगे तुम्हारे लिए।"

तभी सकुचाए से ठिठके खड़े विकी के हाथों से गजक के दोनों डिब्बे अपने हाथ में लेते हुए दीवू ने तनिक विनीत हो आए स्वर में उन्हें संबोधित किया, "माँऽऽ - मैं - "

''मैं तुम्हें और पापा को बताने की अब तक हिम्मत नहीं सँजो पाई। कई बार कोशिश की मगर -

सच तो यह है इतने बड़े शहर में अकेले रहना मुश्किल है किसी भी लड़की के लिए।

हमने और विकी ने बिना फेरों के साथ रहने का निश्चय किया है - हम इस इंतजार में थे - अब तुम आ गई हो तो हमारे संबंधों पर स्वीकृति की मुहर लग जाएगी।''

वे ढहती-सी पास वाले सोफे के हत्थे से टिक, सोफे में निढ़ाल हो धँस गईं।

"आइए माँ, मैं आपको बगल वाला कमरा दिखा दूँ। आपका दीवान वहीं बिछा हुआ है। पहले कुछ खाएँगी?"

बड़ी कठिनाई से अपने स्वर को बटोरकर होंठों तक खींचा।

"रास्ते में दवा खानी थी, साथ लाई कचौड़ियों में से एक निकालकर खाली थी।"

कुछ अबोले पल उनके निकट अन्यमनस्क से ठिठके हुए से खड़े रहे। उन्हें उनका कमरा दिखाने के लिए। फिर शायद उन्हें भी महसूस हुआ होगा। उन्हें उनकी मनःस्थिति में ही इस जटिल समय में छोड़ देना मुनासिब होगा। उनके कमरे का दरवाजा उनसे ज्यादा दूर नहीं है।

उनके बेडरूम का दरवाजा बंद होते ही उनकी नींद भी वहीं बंद हो गई।


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