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लेख

नवजागरण में कलाएँ : एक संक्षिप्त यात्रा परिदृश्य
अमरेंद्र कुमार शर्मा


" कला में सत्य की धारणा सैद्धांतिक सत्य से एकदम भिन्न होती है। " (आर्नल्ड हाउजर - कला का इतिहास दर्शन , पृष्ठ 31 )

" कला मनुष्य को विखंडित अवस्था से ऊपर उठाकर पूर्णता की अवस्था में , एकीकृत अस्तित्व की अवस्था में ला सकती है। कला मनुष्य को यथार्थ समझने में समर्थ बनाती है , और न केवल यथार्थ को झेलने में उसकी सहायता करती है , बल्कि यथार्थ को अधिक मानवीय तथा मानवता के लिए अधिक उपयुक्त बनाने के उसके दृढ़ निश्चय को भी बढ़ाती है। कला स्वंय एक सामाजिक यथार्थ है। (अर्नेस्ट फिशर - कला की जरूरत , पृष्ठ 52 )

अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में प्राचीन धरोहरों की खोज और उसके उत्खनन का इतिहास भारतीय जनता की सांस्कृतिक चेतना की निर्मिति का सबसे बड़ा कारण है। भारत में ललित कलाओं का उत्कृष्ट इतिहास रहा है। इस दौर में एक ओर जहाँ प्राचीन, मध्यकालीन; मूर्तियों, चित्रों, स्थापत्य, लिपियों और संगीत की परंपरा का अनुसंधान किया जा रहा था वहीं दूसरी ओर उनके आधार पर इन सब में एक नए शिल्प को गढ़ने का तरीका आविष्कृत किए जाने की चेतना का भी निर्माण हो रहा था। जाहिर है नवजागरण की चेतना में प्राचीन, मध्यकालीन धरोहरों के वैभवशाली चरित्र की पहचान और नए शिल्पों की आविष्कृत चेतना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही थी जिसमें शिक्षा व्यवस्था सहित छापाखाना और परिवहन व्यवस्था अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं के साथ मौजूद था। हमें यहाँ नवजागरण में कलाओं की यात्रा पर बात करते हुए इस यात्रा में शामिल शिक्षा, प्रेस और परिवहन व्यवस्था पर थोड़ी बात कर लेनी चाहिए।

शिक्षा का पिछड़ापन दरअसल किसी देश के सांस्कृतिक पिछड़ेपन का प्रतीक बन जाता है। भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा में औनिवेशिक सत्ता के आने के बाद अठारहवीं सदी के लगभग आखिर में शिक्षा प्रणाली में बदलाव देखा जाता है। यह बदलाव अंग्रेजों से संपर्क में आने के कारण हुआ, यह बदलाव उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी की शिक्षा पद्धति को विभिन्न स्तर से प्रभावित करता रहा। कहा तो यह भी जाता है कि इक्कीसवीं सदी की शिक्षा व्यवस्था पर भी उनका असर है। हम जानते हैं कि भारतीय शिक्षा पद्धति में अंग्रेजों की शुरुआती दिलचस्पी अपने ईसाई मत के प्रचार-प्रसार के लिए थी। बाद में जाकर यह दिलचस्पी बदली, यह दिलचस्पी उनके अपनी सत्ता को भारत में कायम रखने और भारत के आर्थिक संसाधनों के दोहन के एजेंडे से जुड़ा हुआ था। अंग्रेजों की इन समस्त परियोजनाओं का लाभ भारतीयों के लिए यह हुआ कि वे ज्ञान-विज्ञान के नए विकास क्रम से परीचित हुए जिसका असर नवजागरण की चेतना पर हुआ, जिस चेतना से कलाएँ नए रूप और ढंग से सृजित होती हैं। बड़े पैमाने पर अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त वर्ग अँग्रेजी प्रशासन व्यस्था का हिस्सा होने लगे, उसकी सेवाओं में अपने आप को शामिल कर लाभ कमाने लगे, उन्हें वहाँ नौकरी मिलने लगी। इस कारण अन्य परिवर्तनों के अलावा जो सबसे बड़ा परिवर्तन भारतीय समाज में हुआ वह यह कि लोग परंपरागत रूढ़ियों, अंधविश्वासों से मुक्त होने लगे। स्त्रियों की शिक्षा का प्रसार जो मध्यकालीन दौर में खत्म हो गया था, बड़े पैमाने पर इसी दौर में अंग्रेजों के आने के बाद हुआ। अंग्रेजों द्वारा नए-नए स्कूल और कॉलेज खोले जाने का एक नया वातावरण निर्मित होने लगा। अंग्रेजों द्वारा प्रसिद्ध 'फोर्ट विलियम कॉलेज' की स्थापना कलकता (कोलकाता) में की गई। इस कॉलेज का उद्देश्य प्राच्य विद्याओं और भाषाओं के अध्ययन और अनुवाद कार्य का केंद्र निर्मित करना था। गद्य लेखन की शुरुआत इसी कॉलेज से हुई मानी जाती है। इसकी स्थापना 10 जुलाई सन् 1800 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने की थी। इस कॉलेज के खोले जाने से पूर्व 1780 ई. में 'कलकत्ता मदरसा' खोला गया था ठीक उसके बाद 1791 ई. में 'बनारस संस्कृत कॉलेज' खोले गए। 'फोर्ट विलियम कॉलेज' के बाद 1824 में 'कलकता एजुकेशन प्रेस' की गई जहाँ से अरबी और संस्कृत की कई पुस्तकों का प्रकाशन किया गया। अंग्रेजों ने भारत में शिक्षा में अपनी सत्ता-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई सुधार किए और इसके लिए कई आयोग निर्मित किए। शिक्षा नीति में बड़े बदलावों के लिए लार्ड मैकाले को बार-बार याद किया जाता है, आज की शिक्षा नीति के संदर्भ में भी उसकी चर्चा आलोच्य तरीके से की जाती है। संपूर्ण रूप से भारत में शिक्षा-पद्धति और शिक्षा-संस्थान के विकास ने जागरण का काम बड़े पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में किया जिससे नवजागरण की चेतना का फैलाव संपूर्ण भारत में हुआ।

किसी भी देश की अस्मिता उस देश की भाषा के सरंक्षण और भाषा के साहित्य में रचे गए विविध विषयों की प्रकृति उसकी संस्कृति में समाहित कलाओं के विन्यास के आधार पर निर्मित होता है। प्रसिद्ध कला चिंतक गिओर्गी प्लेखानोव ने अपनी किताब 'कला के सामाजिक उद्गम' में कहा है कि "मैं समझता हूँ कि कला तब जन्म लेती है जब मनुष्य अपने इर्द-गिर्द के यथार्थ के प्रभाव के अंतर्गत अनुभूत भावनाओं और विचारों को अपने भीतर पुनः जागृत करता है और उन्हें निश्चित बिंबों में अभिव्यक्त करता है।" (पृष्ठ 30) प्राचीन भारत में ज्ञान की मौखिक परंपरा रही है। भारत की ज्ञान-मीमांसा में प्रेस का आगमन सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम माना जाता है। भारत में प्रेस की स्थापना का समय 6 सितंबर 1556 को पुर्तगालियों के द्वारा माना जाता है। नागरी टाईप का प्रयोग सबसे पहले यूरोप में प्रकाशित पुस्तक अथानासी किर्चरी द्वारा रचित 'चाइना इलस्ट्रेटा' से माना जाता है। भारत में नागरी लिपि में टाईप हुगली जिले के विलिक्न्स और पंचानन कर्मकार के प्रयासों से निर्मित हुई। ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए प्रचारकों ने बंबई (मुंबई), तमिलनाडु, कलकत्ता (कोलकाता) आदि में प्रेस की स्थापना की गई, जो मुख्यतया धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन कार्य करते थे। 29 जनवरी 1780 को जेम्स आगस्ट हिक्की ने भारत की धरती पर पहला अँग्रेजी समाचार पत्र 'बंगाल गजट ऑफ कैलकटा जेनरल एडवरटाइजर' प्रकाशित किया। इसके बाद भारतीयों द्वारा 1819 ई. में बंगला में 'संवाद कौमुदी', हिंदी में 1826 ई. में 'उदंत मार्त्तण्ड' पत्रिका प्रकाशित हुई। भारत के नवजागरण में किताबों का प्रकाशन चाहे वह धार्मिक किस्म की रही हों या अनुवाद के माध्यम से अन्य श्रेणी की किताबें रही हो; इन सभी किताबों ने भारतीय जनमानस को झकझोरा और ज्ञान के प्रति एक लालसा, एक नए किस्म की चेतना का वातावरण निर्मित किया। वे अब कूप-मंडूक नहीं रह गए थे और न ही अपने आप को रूढ़ियों की न टूटने वाली गाँठ के प्रभाव में रहना चाहते थे बल्कि ज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नित नए परिवर्तनों से परीचित हो रहे थे। कहना न होगा कि इन सबमें तत्कालीन समय में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं ने बड़ी महत्पूर्ण भूमिका अदा की। भारत के लगभग हर क्षेत्र में अपनी स्थानीय विशेषताओं के साथ पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगी थी। ज्ञान का प्रसार और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में उसकी आवाजाही नवजागरण की चेतना को फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रही थी। कलाएँ इन्हीं पृष्टभूमि में अपना रूपाकार नए सिरे से तैयार कर रही थी।

किसी भी देश के सांस्कृतिक विकास में खासतौर से कला के रूपाकार के निर्माण में सुदृढ़ परिवहन-व्यवस्था की आवयश्कता होती है, जिसके माध्यम से कलाएँ अपनी यात्रा करती हैं और अपने रूपाकार को बदलती हैं। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में यातातात मुख्यतः पशुओं पर आधारित था। आम व्यक्ति पैदल या बैलगाड़ी से एक स्थान से दूसरे जगह जाता है, जिसे जाने में कई दिन, महीने लग जाते थे; राजाओं और सामंतों के लिए हाथी और घोड़े उपलब्ध हुआ करते थे, इसमें भी काफी समय व्यय होता था। इस कारण से भारत में सांस्कृतिक आदान-प्रदान की गति अति धीमी थी। यह स्थिति अठारहवीं सदी तक देखी जा सकती है। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों ने परिवहन व्यवस्था को सुधारने का काम किया। शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने लोगों के लिए सड़कों का सुधार करना आरंभ किया। लार्ड डलहौजी ने पहली बार परिवहन व्यवस्था को लेकर एक ठोस नीति बनाई। नई आर्थिक जरूरतें, राजनीतिक महत्वकांक्षा, सामाजिक दवाब आदि ने लार्ड डलहौजी के सामने नई चुनौती लेकर आई और उसने लंबी-लंबी सड़कों का निर्माण करवाया। पहली बार 1843-1844 ई. में रेल निर्माण की प्रस्तावना ईस्ट इंडिया ने रखी। ईस्ट इंडिया के एक कंपनी को बंबई और कलकता के लिए रेल बनाने का ठेका दिया गया। 1845 ई. में रेल बनाने का कार्य आरंभ हुआ। सन् 1855 ई. में कलकता और बंबई में पहली बार रेल पटरियों पर दौड़ी। सन् 1856 ई. में मद्रास (चेन्नई) में रेल लाइन का निर्माण हुआ। माना जाता है कि 1869 ई. तक भारत में रेल निर्माण का प्रथम चरण पूरा कर लिया गया था। इन रेल मार्गों के निर्माण के पीछे अंग्रेजो की नीति बहुत बहुत साफ थी। वे अपनी फौजों को जरूरत पड़ने पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर रेल मार्ग से शीघ्रता से तैनाती कर सकते थे। औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से इंग्लैंड को अपना विकास करने के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे माल की आपूर्ति भारत से की जानी थी। रेल मार्ग द्वारा वे भारत के अनेक स्थानों से शीघ्र कच्चा माल इकट्ठा कर अपने बड़े-बड़े बंदरगाहों तक पहुँचाने लगे थे। भारत के आर्थिक विकास के इतिहास में इसका विस्तार से वर्णन किया जाता है, अपने समय के हर चिंतक ने इस पर विचार किया है। लेकिन हम जानते हैं कोई भी अविष्कार या खोज अपने समय के स्थान और लोग को प्रभावित किए बिना नहीं रहता। भारत की जमीन पर रेल ने बदलाव लाने में क्रांतिकारी भूमिका अदा की; जबकि अंग्रेजों का ऐसा उद्देश्य नहीं था। रेल के अविष्कार ने भारतीय लोगों को एक-दूसरे से काफी करीब ला रहा था। वे अपने रीती-नीति के साथ मिल रहे थे। विचारों और अपने दुखों-सुखों का आदान-प्रदान करने लगे थे। अखबारों, पत्रिकाओं, किताबों आदि ज्ञान के अन्य साधनों का प्रसार एक जगह से दूसरे जगह पर सरलता से होने लगा था। लोग एक स्थान की कठिनाइयों, चिंताओं और उसकी जरूरतों को दूसरे स्थान पर जानने लगे थे। उनके रीती-रिवाज, शादी और अन्य धार्मिक, सांस्कृतिक मान्यताएँ आपस में जुड़ने लगी थी। कलाओं के शिल्प में एक-दूसरे से संपर्क के कारण बदलाव आने लगा था। धीरे-धीरे राष्ट्रीयता की भावना भी एक दूसरे में पनपने लगी थी, लोगों के आवागमन से साहित्य, संगीत पर उसका प्रभाव होने लगा था। रेल में आम लोगों के सफर करने से व्यक्ति का आपसी भाई-चारा बढ़ने लगा था। जाति-भेद, छुआछूत की भावना, धार्मिक कट्टरता और आपसी मतभेद आदि कुरीतियाँ कम होने लगी थी, आपसी मेल-जोल बढ़ने लगा था। प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़, महामारी आदि समय में लोगों के पास मदद शीघ्रता से पहुँचने लगी थी। खाद्य-सामग्री, दवाएँ, वस्त्र आदि की सुविधा में बढ़ोत्तरी हो रही थी। भारत के जिन हिस्सों में रेलों और सड़कों का विस्तार हो गया था, वहाँ के लोगों में नई चेतना पनपने लगी थी और नवजागरण का आधार तैयार होने लगा था, जहाँ कलाओं की पहचान नए सिरे से होने लगी थी। आइये अब हम सीधे कलाओं की यात्रा में सम्मिलित होते हैं।

कलाओं पर मध्य युग और बहुत हद तक आधुनिक युग में भी ईसाई धर्म का प्रभाव रहा है। माना जाता है कि शुरुआती समय में कला पर ईसाई धर्म का प्रभाव बहुत कठोर और आडंबरपूर्ण नहीं बल्कि मानवीय था। कालांतर में इन कलाओं पर धर्म अपनी रूढ़ियों के साथ धीरे-धीरे हावी होने लगा, एक खास तरह की सांप्रदायिक चेतना कला पर हावी होने लगी। चर्च, कला को अपने हिसाब से रूपांतरित कर रही थी, इस कारण कलाओं में एक खास तरह की कृत्रिमता आने लगी। नवजागरणकालीन आंदोलन ने कला माध्यमों को चर्च के चंगुल से आजाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस दौर में चित्रकला और मूर्तिकला के अधिकांश विषय चर्च और बाइबिल से लिए गए हैं, इनमें कुछ हमें यूनान की देवियों और कुछ तत्कालीन समय के जीवन से लिए गए हैं। हम यहाँ नवजागरणकालीन चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला और संगीत पर संक्षिप्त यात्रा आरंभ करेंगे जिसमें भारत सहित पश्चिमी दुनिया भी शामिल है।

नवजागरण काल में चित्रकारों ने अपनी मौलिक प्रतिभा के रास्ते से चित्रकला में प्रचलित मानदंडों से हटकर एक नवीन संकल्पना का सृजन किया। चित्रकारी में प्रगतिशील विचारों और नए सौंदर्य मानकों के आधार पर परिवर्तन होता हुआ दिखलाई देता है लेकिन इस तरह के चित्रों में विषय की विविधता न के बराबर दिखलाई देती है, अधिकांश चित्र ईसाई धर्म के आधार और उसके प्रभाव पर ही बनाए गए लगते हैं। इस दौर में चित्रकला में एक क्रांतिकारी परिवर्तन यह हुआ कि पहली बार तैलीय चित्रकारिता की शुरुआत हुई। भिति चित्रों का बड़े पैमाने पर प्रसार भी इसी अवधि में हुआ।

हम जानते हैं और यह सर्वविदित भी है कि इटली ही वह पहला देश है जहाँ नवजागरणकालीन चित्रकला का विकास हुआ। इटली में इससे पूर्व लोक-चित्रकलाओं का विकास देखा जाता है। नवजागरण के समय बड़े पैमाने पर परिवर्तकारी चित्रकार हुए जिनके व्यक्तित्व का असर इटली के समय पर था; जिनमें उल्लेखनीय हैं; मायकल एंजेलों (1475-1564), राफेल (1483-1520), तथा अपने समय का सबसे यशस्वी चित्रकार लियोनार्दो द विंशी (1452-1519)। सभी चित्रकार केवल चित्रकार ही नहीं थे बल्कि ये सभी बहुआयामी व्यक्तित्व के थे जिनका इटली के सांस्कृतिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव था। ये सभी अपने समय के वैज्ञानिक, संगीतज्ञ, कवि, शिल्पकार, मूर्तिकार, इंजीनियर थे और अपना योग नवजागरण की चेतना में दे रहे थे। इन सभी के चित्रों में एक अनोखा लालित्य, अनुभव, तर्क की व्यंजना शैली और अपने समय-समाज की गहरी समझ थी। चौदहवीं सदी के जिओतो की अबाध परंपरा से लेकर सोलहवीं सदी के राफेल तक इटली की चित्रकला का उद्दभव और उत्तरोत्तर विकास को देखा जा सकता है। इन चित्रों में धीरे-धीरे यथार्थवाद का विकास हमें दिखलाई पड़ता है। इस दौर के बारे में फेड्रिक एंगेल्स ने विस्तार से विचार किया है, "लियोनार्डो डा विंसी महान चित्रकार ही न थे, वह महान गणितज्ञ, यांत्रिकीविद और इंजीनियर भी थे। भौतिकविज्ञान की विविध शाखाएँ बड़ी-बड़ी खोजों के लिए उनकी आभारी हैं। अल्ब्रेख्त दुरेर चित्रकार, उत्कीर्णक, मूर्तिकार और वास्तुकार थे। इसके अलावा उन्होंने किलेबंदी की वह प्रणाली तैयार की जिसमें ऐसे अनेक विचार थे, जिनको आगे चलकर मोंताल्म्बेर एवं किलेबंदी के आधुनिक जर्मन विज्ञान ने अपनाया। मैकियावेली राजनेता, इतिहासकार, और कवि तो थे ही, साथ ही आधुनिक काल के प्रथम उल्लेखनीय सैनिक साहित्य के लेखक भी थे। लूथर ने न केवल चर्च की, बल्कि जर्मन भाषा की अवगी की घुड़सालों को भी साफ किया। वह आधुनिक जर्मन गद्य के जन्मदाता भी बने। साथ ही उन्होंने उस विजयगान का पाठ एवं राग तैयार किया, जो सोलहवीं शताब्दी का 'मार्सलेज' (मार्टिन लूथर का समवेत भजन eine feste burg ist unser Gott - प्रभु हमारा दुर्ग; 1524-1525 के महान किसान युद्ध के दौरान विद्रोही किसानों तथा अन्य गरीबों का युद्धगान।) बन गया।

मायकल एंजेलो ने फ्लोरेंस के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। उस आंदोलन के बाद एंजेलो के चित्र का प्रिय विषय आत्मबलिदान बन गया था। एंजेलो मनुष्य के देह के सौंदर्य का अद्भुत पारखी था। भिति चित्रांकन में 'लास्ट जजमेंट' चित्र उसकी प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण बना। एंजेलो मनुष्य की क्षमता, उसके साहस और संघर्ष, आस्था और यकीन को चित्रित करने वाले महान चित्रकार माने गए। राफेल नवजागरण काल का एक और महत्वपूर्ण चित्रकार था। कहते हैं कि माँ की ममता और मानव प्रेम जैसी भावनाओं का सबसे सफल चित्रकार राफेल था। नवजागरण चेतना में कोमलतम भाव जगाने वाले यह चित्रकार महत्वपूर्ण माना गया। स्पेन, नीदरलैंड, जर्मनी जैसे अन्य यूरोपीय देशों में भी नवजागरण के दौरान चित्रकला में महत्वपूर्ण परिवर्तन लक्षित किए जाते हैं। स्पेन का महान चित्रकार डिएगो वेलारिज (1599-1660) तत्कालीन राजा के दरबार में रहते थे लेकिन उनके चित्रों पर राजदरबार का कोई सामंती प्रभाव नई था बल्कि वे अपने चित्रों में राजा को एक सामान्य मनुष्य के रूप में चित्रित करते थे जो राजदरबार परंपरा के एकदम उलट था। स्पेन के ही मुरिल्लो, ग्रीको; हॉलैंड के स्पेन्स तथा वेन आदि नवजागरण के महत्वपूर्ण चित्रकार माने गए। जर्मनी का प्रसिद्ध चित्रकार डयुरर (1606-1669) चित्रकार के अलावा वास्तु शिल्पकार, कवि, शास्त्रीय भाषाओं का ज्ञाता, इंजीनियर था। इन्होंने तत्कालीन जर्मनी की स्थिति को अपने चित्रों के मध्याम से रूपायित किया और आम जनता तक उसे पहुँचाया। इसी प्रकार डेनमार्क का महान चित्रकार रेम्ब्रां वान रिज (1606-1669) था, जिनका जीवन गरीबी और संघर्ष में बीता। वे मनुष्य से प्रेम और मानवता जैसे सारभूत नियमों पर यकीन करते थे; उन्होंने मनुष्य के आंतरिक चरित्र और उसकी भावनाओं को सूक्ष्म तरीके से चित्रित किया। रोजमर्रा के जीवन से संबंधित विषयों पर चित्र बनाना उनका शौक था।

भारत में चित्रकला का एक वैभवपूर्ण इतिहास रहा है। इस इतिहास की शुरुआत ऋग्वेद में अग्नि के चित्र के उल्लेख से शुरू होता है जो चमड़े पर बनाया गया था। सिंधु-घाटी सभ्यता के मृदभांडों, मृदमूर्तियों पर उकेरे गए चित्रों और अजंता-एलोरा की गुफाओं में बुद्ध के संदर्भ से जातक दृश्यों के भिति चित्रों से लेकर संपूर्ण भारत में चित्रों का वैभव फैला हुआ है। भारत में सर्वप्रथम शैलचित्रों का परिचय 1867 और 1868 ई. में तब हुआ जब मिर्जापुर के निकट सोहगीघाट से प्रागैतिहासिक कालीन चित्रों की खोज अल्तमिरा अचिर्वाल्क कार्लाइल ने किया। मुगलिया दौर में अकबर, जहाँगीर के कला प्रेम को इतिहास आज भी याद करता है। भारतीय सामंती व्यवस्था में कला को सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त था। उन्नीसवीं सदी में बड़े पैमाने पर प्राचीन धरोहरों की खोज हुई। प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय गौरव के चिह्न की तलाश की इस सदी में भारतीय जनता नित नए ज्ञान के रास्तों से गुजर रहा था। यह सदी दरअसल एक स्तर पर खोजों के इतिहास का समय है। इन खोजों के आधार पर चित्रकला के संदर्भ में नई चेतना का उभार हो रहा था। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि इस नई चेतना में पाश्चात्य कला की प्रेरणा भी प्रभावी स्तर से मौजूद थी। पाश्चात्य चित्रकला के प्रभाव से भारत में नए सिरे से तैल चित्रों का विकास होना आरंभ हुआ; इन चित्रों के विषय पर भारत की प्राचीन, मध्यकालीन ललितकला की परंपरा मौजूद हुआ करती थी; यही कारण है कि अधिकांशतः तैल चित्रों में विषय धार्मिक और पौराणिक हुआ करते थे। तैल चित्रों में त्रावनकोर के राजा रवि वर्मा का नाम महत्वपूर्ण रूप से लिया जाता है। नवजागरण काल की महत्वपूर्ण पत्रिका 'सरस्वती' में राजा रवि वर्मा के चित्रों को प्रकाशित किया जाता था। इन चित्रों के प्रकाशन से हिंदी का एक बड़ा समुदाय जो ललित कला प्रेमी था, प्रभावित हो रहा था। 1854 में कलकता में 'आर्ट स्कूल' की स्थापना को उन्नीसवीं सदी की ललित कला विद्या में एक परिवर्तनकारी पड़ाव के रूप में जाना जाता है। भारतीय चित्रकला को एक नई दिशा देने का काम इस आर्ट स्कूल ने किया। इस दौर में चित्रकार के रूप में अवनींद्रनाथ ठाकुर, पर्सी ब्राउन, आनंद कुमार स्वामी आदि की प्रसिद्धि थी। इनके चित्रों में कहा जाता है, कि आधुनिक परिवर्तन से गुजरता हुआ भारतीय समाज अंगड़ाई लेता हुआ दिखलाई देता है। इन चित्रों के रेखांकन में नवजागरण की चेतना की दृष्टि मौजूद हैं। कहा जाता है, अवनींद्रनाथ ठाकुर ने अपने चित्रों में पश्चिम और पूरब की संस्कृति के मेल से एक नई शैली विकसित की। यह नई शैली आगे चलकर चित्रकला में 'बंगाल शैली' के रूप में जानी गई। 'बंगाल शैली' से प्रभावित और उसकी चेतना में नए भाव और सौंदर्य भरने वाले भी कई चित्रकार हुए। नंदलाल वसु, सुरेंद्र गांगुली, असित कुमार हालदार, के.एस. मजुमदार, जैमिनी राय आदि बंगाल शैली में नए रंग और नए अर्थ भरने वाले चित्रकार माने गए। ' इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट्स' की स्थापना 1907 में हुई। इस सोसायटी के आने से एक नई किस्म की भारतीय चित्रकला शैली का विकास होना आरंभ हुआ और धीरे-धीरे चित्रों की विषय-वस्तु में विविधता और प्रौढ़ता की दृष्टि विकसित होने लगी। तात्पर्य यह कि नवजागरण की परियोजना में हमें चित्रकला के विकास को भी एक उल्लेखनीय घटक के रूप में देखना चाहिए।

नवजागरण काल में एक ओर चित्रकला नई चाल में ढल रही थी ठीक उसी प्रकार मूर्तिकला भी अपना नया कैनवास तैयार कर रही था। नवजागरण के मूर्तिकार मनुष्य के शरीर का बारीकी से अध्ययन कर मूर्तियाँ बनाते थे जिस कारण यह बिलकुल सजीव दिखलाई देता था। इटली के फ्लोरेंस में सेंट जार्ज और यंग एंजेल्स की मूर्ति तो प्रसिद्ध थी ही लेकिन डोनोतेल्लो (1386-1466) की मूर्तियाँ खूब सराही गईं। वेनिस में सेंट मार्क की मूर्तियाँ भी विख्यात हुईं। माइकल एंजेलो चित्रकार के अलावा एक महत्वपूर्ण मूर्तिकार भी थे। एंजेलो की विश्व प्रसिद्ध मूर्ति जो साढ़े पाँच मीटर ऊँची संगमरमर की बनी है, यह बायबिल में उल्लिखित डेविड नामक एक चरवाहे की है। यह मूर्ति बहुउद्धृत, और बहु प्रसंसनीय रही है। इसी प्रकार एक और मूर्ति जो प्रसिद्ध हुई वह मोजेत नाम की मूर्ति थी। मायकल एंजेलो जैसे इटली के मूर्तिकार की प्रसंशा दूसरे देशों में भी खूब थी। इटली के मूर्तिकारों को स्पेन, फ्रांस जैसे देशों से बुलावा आया करता था। इस प्रकार मूर्तिकला के माध्यम से विभिन्न देशों में नवजागरण की चेतना जगाने का कार्य ये मूर्तिकार किया करते थे। कहना न होगा कि इस प्रकार की चेतना क्रमशः संपूर्ण यूरोप में धीरे-धीरे फैलती गई।

नवजागरणकालीन वास्तुकला गॉथिक जैसे मध्ययुगीन शैली से आगे की शैली के निर्माण का समय था। गॉथिक शैली का झुकाव मोटे तौर पर ईसाई धर्म पर था। नवजागरण के दौर में इस प्रकार के वास्तुकला में ग्रीक और रोमन साम्राज्य के मेहराब, गुंबद, स्तंभ जैसी क्लासिकल विशेषताओं को अपनाया गया। इन विशेषताओं को अपनाने के साथ इसके ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन लाने का काम हुआ, जैसे वास्तुकला के ढाँचे में अलंकरण की शैली पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा जो नवजागरण की अपनी विशेषता थी। नवजागरण से पहले अलंकरण की शैली विकसित नहीं हुई थी। कहा जाता है कि अलंकरण की शैली अपने चरम पर जाकर बाद में अति अलंकरण का शिकार हो गई थी जिसे 'बेरोक' कहा गया। फ्लोरेन्स के बुनेलेशी (1377-1446) और एल्बर्टा जैसे कई शिल्पकार नवजागरण के ख्यात शिल्पकार हुए। दुनिया में कुछ बेहतरीन शिल्प के नमूने देखे जा सकते हैं जैसे रोम का सेंट पीटर चर्च, इंग्लैंड (लंदन) का सेंट पाल, रोम का सेंट मार्क चर्च शिल्प के लिए विख्यात है। फ्लोरेंस और रोम के महल को वास्तु की अद्भुत शैली के रूप में देखा जा सकता है।

नवजागरण की चेतना में संगीत के महत्व को अलग से रेखांकित किया जाना चाहिए। इटली अपने तत्कालीन समय में कला के समस्त माध्यमों में निरंतर विकास कर रहा था। इटली संगीत का गढ़ था। नवजागरण आंदोलन के लिए संगीत का उपयोग बड़े पैमाने पर किया गया। शुरुआत में में केवल धर्म प्रचार के लिए संगीत का उपयोग किया जाता था जिसमें भावों की अभिव्यक्ति नितांत कृत्रिम हुआ करता था, उसमें उल्लास, आनंद का अभाव रहा करता था। इटली की अधिकांश जनसंख्या रोमन कैथोलिक थी, इसलिए धर्म प्रचार की संगीत परंपरा से अलग थी। इस कारण यूरोप को नवजागरण की चेतना निरंतर प्रभावित कर रही थी। नवजागरणकालीन संगीत में नए किस्म का लय, ताल का प्रादुर्भाव हो रहा था। संगीत के स्वर के विभिन्न अनुक्रमों को एवं स्वर संगीति की विविधता को सम्मिलित करने का मौलिक प्रयास इसी दौरान किया गया। संगीत को लिखने और छपाने की प्रक्रिया भारत में बीसवीं शताब्दी में आरंभ हुई थी। भारत में यूरोप की तुलना में संगीत शिक्षा की मौखिक परंपरा पर ज्यादा जोर रहा है। इटली का 'पैलेस्त्रिना' (1525-1594) नवजागरण काल का सबसे प्रसिद्ध संगीतकार हुआ। यह रोमन स्कूल के संगीतकारों में एक बड़ा नाम है। संगीत कंपोजिशन पर पैलेस्त्रिना की पहली प्रकाशित किताब 'मासेस' नाम की थी। फिलिप मेरी ने रोम में संगीत गायकों का एक संगठन बनाया, यही संगठन आगे चलकर गीतिनाट्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। गिओवंनी गाब्रिएली (1554/57-1612) और एड्रियार ये दोनों नवजागरण के दौर में वेनिस स्कूल के प्रमुख संगीतकार थे। यूरोप में गंभीर घोष के वाद्य यंत्र का चलन रहा है। जर्मनी में एक प्रमुख वादक बाख का नाम आता है। कहा जाता है कि बाख ने संगीत में एक नए युग का आरंभ किया, लेकिन इनको वह प्रसिद्धि नहीं मिली जो अन्य संगीतकारों को मिली। वाद्य यंत्रों के पारंपरिक स्वरूप में बदलाव लाने का भी यही दौर है। औद्योगिक क्रांति के बाद यह बदलाव बड़े पैमाने पर देखा जा सकता है। नवजागरण काल में वायलिन और पियानो सबसे अधिक प्रचलित और लोकप्रिय वाद्य यंत्र हुआ करते थे।

भारतीय संदर्भ में 'संगीतकला' एक व्यापक अर्थगर्भित पद है। 'संगीत' शब्द के अंतर्गत तीन कलाओं गायन, वादन, नृत्य के अर्थ का समावेश है। 'सामवेद' (कहा जाता है कि दुनिया की सबसे पुरानी स्वरलिपि इसमें मौजूद है) और भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' (जिसके छह अध्यायों में संगीत के बारे में लिखा गया है, जिसमें विभिन्न वाद्यों की उत्पति, उन्हें बजाने के तरीकों, स्वर, छंद और लय की विस्तृत चर्चा है।) से निसृत होती संगीत की लय का वर्णन है। संगीत की वह परंपरा जो सिंधु-घाटी सभ्यता की खुदाई (1922 में पहली बार खुदाई हुई) में मिली उन मृदमूर्तियों और कांस्य मूर्ति की मुद्राओं में संगीत का जो क्षण स्थिर हो गया था, वह रामायण और महाभारत में वर्णित कई मुद्राओं, तानसेन (मियाँ की तोड़ी, मियाँ मल्हार आदि रागों के निर्माता), बैजूबावरा (दोनों अकबर के दरबार में थे, कहा जाता है बैजूबावरा ने 'मानकुतूहल' नामक संगीत की पहली किताब लिखी थी।) आदि के माध्यम से भारतीय संगीत का एक उजास इतिहास रचता है। इस रचाव की ध्वनि उन्नीसवीं सदी के नवजागरण के दौर तक ध्वनित होती है। दरअसल ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में इस्लामी सभ्यता के बड़े पैमाने पर फैलाव ने उत्तर भारतीय संगीत की दुनिया का महत्वपूर्ण विस्तार किया। पहली बार गायिकी में ख्याल और वाद्ययंत्र में सरोद, सितार आदि भारतीय संगीत का हिस्सा बनते गए। भारतीय संगीत का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना माना जाता है, हालाँकि साक्ष्यों की इसमें भारी कमी है। बारहवीं सदी में जयदेव का 'गीतगोविंद' (कवि जयदेव ने विभिन्न रागों और तालों के प्रबंध भी लिखें हैं।), तेरहवीं सदी में शारंगदेव का 'संगीतरत्नाकर' चौदहवीं सदी में विद्यारान्य का 'संगीतसार', पंद्रहवीं सदी में कवि लोचन का 'राग तरंगिणी' सोलहवीं सदी में पुंडरीक विट्ठल का 'संद्रांग चंद्रोदय' सत्रहवीं सदी में हृदयनारायण देव का 'हृदय प्रकाश' अठारहवीं सदी में श्रीनिवास पंडित का 'राग तत्व विबोध' उन्नीसवीं सदी में बंगाल के राजा शौरिंद्र मोहन ठाकुर का 'यूनिवर्सल हिस्ट्री ऑफ म्यूजिक' संगीत की दुनिया को रेखांकित करता है जिसमें नवजागरण की कई अनुगूँजें हैं। बीसवीं सदी में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का 'हिंदुस्तानी संगीत पद्धति' संगीतशास्त्र के मानक ग्रंथ माने जाते हैं। यह सभी भारतीय संगीत की ऐतिहासिकता के प्रमाण हैं। मोटे तौर पर सत्रहवीं सदी से लेकर अठारहवीं सदी में संगीत सामंतों के दरबार में एक कृत्रिम दौर से गुजरा जिसमें मनोरंजन के अलावा संगीत की परंपरा को बढ़ाने वाली चेतना का अभाव दिखलाई देता है। कर्नाटक संगीत के क्षेत्र में अठारहवीं सदी काफी महत्वपूर्ण है, इस समय त्यागराज (1759-1847), मुत्तुस्वामी दीक्षितर (1775-1835), और श्याम शास्त्री (1763-1827) के त्रिमूर्ति का उद्भव संगीत के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घटना है। भारत की औपनिवेशिक सत्ता ने संगीत को अपना प्रश्रय नहीं प्रदान किया। इस कारण से संगीत में एक खास किस्म की व्यावसायिकता हमें इस दौर में मिलती है। इस दौर में संगीत कोठों पर बाइयों के कंठ से बड़े पैमाने पर निःसृत होता है। विभिन्न घरानों का अस्तित्व अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ भी मौजूद होता है। पहली बार उन्नीसवीं सदी में बंगाल के राजा शौरिंद्र मोहन ठाकुर का 'यूनिवर्सल हिस्ट्री ऑफ म्यूजिक' बीसवीं सदी में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का 'हिंदुस्तानी संगीत पद्धति' जैसी किताबों के आने से संगीत में एक नई भारतीय चेतना का उभार होता है, जिसमें नवजागरण के लक्षण होने की बात कही जाती है। संगीत में पं. विष्णु दिगंबर पनुस्कर का नाम भातखंडे के साथ प्रमुखता से लिया जाता है। उन्नीसवी सदी के शुरुआत में संगीत के नए-नए स्कूल खुलने लगे थे। 5 मई 1901 ई. को सबसे पहला स्कूल 'गांधर्व महाविद्यालय' लाहौर में पं. विष्णु दिगंबर पनुस्कर ने खोला। धीरे-धीरे इसकी शाखा संपूर्ण भारत में खुलने लगी। 1909 में इसकी साखा बंबई में खोली गई। 1917 में 'बड़ौदा म्यूजिक कॉलेज' खोली गई और उसके बाद उसकी साखा दिल्ली में 1940 में खोली गई। 1926 में एक संगीत स्कूल जिसका नाम आगे चलकर 'भातखंडे विश्वविद्यालय' नाम हुआ खुला। आगे चलकर संगीत के कई स्कूल खुले जिसमें ग्वालियर, लखनऊ, प्रयाग आदि के स्कूल महवपूर्ण माने गए। नवजागरण की चेतना के विस्तार में इन संगीत स्कूलों का महत्पूर्ण स्थान रहा। संगीत के माध्यम से कला में हो रहे नए विकास और उसकी नई ज्ञानसरणी के संदर्भ में एक नया वर्ग उत्पन्न हो रहा था। यह वर्ग समाज में अपनी नई विचार सरणियों के साथ मौजूद हुआ करता था जिसका असर सामान्य जनता पर बड़े पैमाने पर हुआ। बाद में जाकर संगीत की परंपरा भारतीय सिनेमा के माध्यम से अपनी प्रचिलित लोकप्रिय शैली में विकसित हुई। जिस पर अलग से विचार किया जा सकता है।


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हिंदी समय में अमरेंद्र कुमार शर्मा की रचनाएँ