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संस्मरण

एक सतत एंग्री मैन
अखिलेश


उन दिनों उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के इलाहाबाद स्थित शाखा कार्यालय में नौकरी कर रहा था। हर इलाहाबादी की तरह मैं भी तब सोचा करता था कि इलाहाबाद के अलावा पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं खुशी खुशी जीना असंभव है। तभी एक रोज अचानक मेरा स्थानांतरण लखनऊ हो गया...

पुराने को भूलो मत और नए को स्वीकार करो प्यार करो; जगहों को लेकर आदमी इस उसूल पर चले तो उनसे बिछुड़ने का कष्ट कम हो जाएगा। इस उसूल का ही सहयोग था कि मैं इलाहाबाद से आकर लखनऊ में गहरे तक समाया या उसमें रम गया। लेकिन अपनी जगह पर यह भी एक सच है कि किसी को प्यार करते हो या नफरत, उसके पीछे कोई एक वजह नहीं रहती है। मेरे लखनऊ प्रेम के पीछे भी महज उपरोक्त उसूल ही नहीं हैं, कई कारण हैं, जिनमें एक है कि यहाँ वीरेंद्र जी रहते हैं। जाहिर है, मैं हिंदी के चर्चित आलोचक वीरेंद्र यादव की बात कर रहा हूँ। वह मुझसे एक दशक वरिष्ठ हैं लेकिन उनसे मेरा संबंध शुरू से दो बेतकल्लुफ मित्रों जैसा रहा है। निश्चय ही ऐसा दोस्ताना उनकी उदारता और मेरी घोर छूट लेने वाली धृष्टता के संयुक्त अवदान से मुमकिन हो सका।

1988 में शायद कोई शहर आज जैसा नहीं था; लखनऊ भी आज जैसा नहीं था। फिलहाल अपनी याद को साहित्यिक परिवेश तक महदूद करूँ तो हजरतगंज में हिंदी संस्थान से सदर अस्पताल तक जो दूरी है और उसके थोड़ा थोड़ा दाएँ बाएँ भी समेट लो तो उसी में साहित्य सबसे ज्यादा धड़कता था। काफी हाउस और मद्रास कैफे था जहाँ लेखक अड्डा जमाते थे और हँसते भिड़ते लड़ते थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नियंत्रित किताबों पत्रिकाओं की दुकान चेतना थी। दूरदर्शन और आकाशवाणी केंद्र थे। स्वतंत्र भारत, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण के कार्यालय थे। और इसी इलाके में कामतानाथ, लीलाधर जगूड़ी, राजेश शर्मा, विजय राय, राधेश्याम उपध्याय, प्रभास कुमार झा जो पद्मनाभ प्रभास नाम से कविताएँ लिखते थे, विलायत जाफरी, नीलम चतुर्वेदी, विनोद दास, सुशील कुमार सिंह, नवीन जोशी, अनिल सिन्हा, वंदना मिश्र, राकेश, वीरेंद्र यादव और स्वयं मैं अपने अपने दफ्तरों में काम करते थे या ज्यादातर काम नहीं करते रहते थे; बस मुलाकात और बातचीत करते थे। कुँवर नारायण जी का व्यावसायिक कार्यालय भी इसी तरफ था जहाँ वह कभी कभार आते थे। मुद्राराक्षस जी का कोई दफ्तर नहीं था किंतु वह दिनभर किसी न किसी के दफ्तर में देखे जाते थे। यदि कोई अस्सी के दशक के दिल्ली से वाकिफ है, समझ सकेगा कि तब बहादुर शाह जफर मार्ग से लेकर दरियागंज तक के इलाके को साहित्यिक चहलपहल के नजरिये से जो रुतबा हासिल था, कमोबेश लखनऊ में 1988 के इर्दगिर्द पूर्वाक्त दायरे को वैसी ही बुलंदी हासिल थी।

गोया किस्मत को इतनी मेहरबानी कम लगी हो कि मैं इंदिरानगर मोहल्ले का बाशिंदा बना जहाँ श्रीलाल शुक्ल, मुद्राराक्षस, लीलाधर जगूड़ी, नीलम चतुर्वेदी, बीर राजा, रामलाल, बशेसर प्रदीप, राकेश, वेदा राकेश, के.के. चतुर्वेदी, राधेश्याम उपाध्याय, विनोद दास आदि लेखकों, साहित्य प्रेमियों के साथ साथ वीरेंद्र यादव पहले से रह रहे थे। वैसे सच्ची बात यह है कि इंदिरानगर मैंने थोड़ा बाद में रहना शुरू किया था। पहले दो साल मैं डेली पैसेंजर था जो सुबह सुल्तानपुर के अपने घर से 140 किलोमीटर दूर लखनऊ हिदी संस्थान के ऑफिस आता था और शाम को वरुणा एक्सप्रेस पकड़कर वापस चला जाता था। लेकिन प्रत्येक कार्यदिवस में यह नियम सा था कि दोपहर के दो तीन घंटे वीरेंद्र जी के साथ बतकही में बीतते। प्रायः विनोद दास भी साथ में होते। अक्सर ऐसा होता कि बहुत सारे लिखने पढ़ने वाले इकट्ठा हो जाते। देश दुनिया की बातें होतीं, ठहाके लगते, यदाकदा वार्ता इतनी तुर्श और उत्तेजक हो उठती कि विचार नारों की तरह सुनाई पड़ने लगते। अमूमन बहस को शुरू करने, उसे विस्तार देने, वृहत्तर प्रसंग बनाने का काम वीरेंद्र जी ही निभाते थे। इस प्रकरण में ही नहीं, वह आज की तरह ही उन दिनों भी नगर की साहित्यिक ऊर्जा की धुरी थे। नाट्यकर्मी, संस्कृतिकर्मी राकेश जी उनके पुराने गहरे दोस्त हैं; दोनों की जुगलबंदी ने हमेशा अपने बल पर बड़ी बड़ी साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों की परिकल्पना करके उनको साकार किया। उस दौर में भी यह जोड़ी सक्रिय थी, साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को अंजाम देती रहती थी, लेकिन मैं उन कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाता था क्योंकि मैं एक एमएसटी होल्डर दैनिक यात्री था जो रोज शाम अपना थैला उठाकर रेलवे स्टेशन भागता था। जब वीरेंद्र जी भागीदारी करने के लिए कहते, मेरा जवाब रहता कि मैं एक डेली पैसेंजर हूँ जिसे शाम को ट्रेन पकड़नी रहती है। क्या कर सकता हूँ।

एक बार वीरेंद्र जी ने आजिज आकर कहा - तुम ये करो कि गोष्ठी वाले दिन मेरे घर रुक जाया करो। मैं रुकने लगा। अब महीने बीस दिन में एकाध दफा ऐसा होता कि गोष्ठी के उत्तरकांड स्वरूप वीरेंद्र जी के घर सी-855 इंदिरानगर, लखनऊ पर देर रात तक बातें और बातें होतीं; सुबह नींद खत्म होने के बाद वार्ता के अखंड धारावाहिक की अगली कड़ी जारी हो उठती।

वीरेंद्र जी के साथ किसी रोज मुद्राराक्षस जी मेरे ऑफिस आए; हल्की फुल्की वार्ता के बाद बोले - कल शाम तुम मेरे घर पर आमंत्रित हो।

- क्या खुशी है? मैंने दावत की वजह जाननी चाही।

- बस ऐसे ही। (दरअसल उन्हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी का राष्ट्रीय सम्मान मिला था)

- लेकिन मुद्रा जी... मैंने गला साफ किया - मैं एक डेली पैसेंजर आदमी...।

- कुछ नहीं सुनना। कल रुकने की तैयारी से आना। मुद्रा जी ने निर्णयात्मक लहजे में कहा।

क्या पार्टी थी वह। श्रीलाल शुक्ल, कुँवर नारायण, मुद्राराक्षस, कामतानाथ, लीलाधर जगूड़ी, रवींद्र वर्मा, राजेश शर्मा, शायद नरेश सक्सेना भी, जैसे नामीगिरामी वरिष्ठों के साथ हम चार दोस्त भी थे - वीरेंद्र जी, राकेश जी, विनोद दास जी और यह बंदा। उपरोक्त सूची में वरिष्ठों में एक दो के आलावा ज्यादातर नाम ऐसे हैं जो अपनी लेखकीय प्रतिष्ठा के साथ साथ मधुपान के मामले में भी राष्ट्रीय ख्याति के रहे हैं। जहाँ तक हम दोस्तों की बात है तो निश्चय ही हम इस फील्ड में युवा पीढ़ी की पराजय और प्रतिभाहीनता की जीती जागती मिसाल थे। विनोद दास शराब छूते ही नहीं थे; अलबत्ता उनको यह सुविधा नैसर्गिक रूप से प्राप्त थी कि नशे चढ़ने के कारण तारी होने वाली आक्रामकता सबसे पहले उनपर ही सवार होती। बाकी तीन दोस्तों की मदिरा की खुराक अत्यंत क्षीण थी। मैं स्वयं शराब की तुलना में उसके साथ चलने वाली खाद्य सामग्री जिसे अवध की देशज भाषा में चिखना कहते हैं, के प्रति अधिक उत्सुक रहता था। अतः समस्या श्रीलाल शुक्ल, कामतानाथ, लीलाधर जगूड़ी, राजेश शर्मा के सामने आन पड़ी...। समस्या यह थी कि मुद्रा जी पेग अंदर वाले कमरे से बनाकर ला रहे थे। एक ही पेग के बाद मुद्रा जी ने हाथ कड़े कर लिए और दूसरे के बाद हाथ खड़े कर दिए। जो बड़े रिंद थे, वे संकोच शिष्टाचार त्यागकर अपना ग्लास आगे बढ़ाकर उसे भरे जाने की शालीन फरमाइश करने लगे और फिर निराश होकर गुहार लगाने लगे। अंततः जल्दी ही लोगों को अहसास हो गया कि मदिरा तो अपनी जगह, अब भोजन का भी भविष्य नहीं है। और वे अपनी जगह सही थे। तब भी हम कुछ देर इंतजार करते रहे और उसके बाद पलायन कर गए।

राजेश शर्मा अच्छे कवि सहित सूचना विभाग में अधिकारी थे वह उखड़े मूड से उठे; वीरेंद्र जी और मुझको अपनी गाड़ी में बैठाकर बोले - मैं बिना छककर पीये घर नहीं जाऊँगा।

मुझे पीने नहीं खाने की चिंता लगी थी क्योंकि मुझे मालूम था, आज भाभी जी कहीं बाहर गई हुई हैं। कम समय में ही राजेश जी ने कहीं से जाम का इंतजाम करके वीरेंद्र जी के घर अर्धरात्रि में महफिल जमाई जिसमें हम सबके अतिरिक्त वीरेंद्र जी के, अचानक आए हुए, एक रिश्तेदार भी शामिल हो गए। मैं बहुत चिंतित था; पेट कैसे भरेगा? राजेश जी ऐसी दशा में थे कि उनका किचन में काम करना घातक था। वीरेंद्र यादव इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में किसी प्रकार बगैर चीनी की डिप वाली चाय बना लेते हैं; तब यह विद्या भी उन्हें नहीं आती थी। उनके रिश्तेदार पीने के साथ खाने के भी शौकीन थे। भूख ने हम दोनों को जोड़ा; हम किचन में घुसे। उन्होंने कोई सब्जी बनाई और मैंने पुलाव, खयाली नहीं असली वाला। अगली तारीख के ब्रह्ममुहूर्त में चार जन भोजन कर रहे थे।

बाद में वरुणा एक्सप्रेस की डेली पैसेंजरी से मुक्त होकर लखनऊ विधिवत रहने आ गया। अब शाम को भी बैठकी संभव थी। अपने हिंदी संस्थान के दफ्तर से निकलता, विनोद दास नाबार्ड के कार्यालय से। आगे वीरेंद्र जी का दफ्तर था। वह यदि वहाँ न होते तो फिक्र की बात नहीं, पता था वह कहाँ कहाँ से कहीं मिल सकते हैं। हजरतगंज के उस महात्मा गांधी मार्ग की उस सीधी सड़क पर हमारे चार पाँच अड्डे थे। एक मद्रासी कैफे था। चेतना पुस्तक केंद्र था जहाँ कामरेड दुर्गा मिश्र दोनों पैर कुर्सी पर लादकर लेटे हुए आपका स्वागत करते थे। फायर ब्रिगेड के ऑफिस के पास पंडित जी की अखबार पत्रिकाओं की दुकान थी जहाँ कोई बिना कुछ खरीदे आराम से खड़े खड़े घंटों अध्ययन कर सकता था। अगर वीरेंद्र जी यहाँ भी न मिलें तो आखिरी अड्डे इंडियन काफी हाउस में किसी के साथ चर्चा करते हुए मिल जाते थे। यूँ ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी और राम आडवानी जी की विश्वविख्यात बुक शॉप भी वीरेंद्र जी के ठिकाने थे मगर वहाँ वह दिन के किसी खाली समय में जाते। कुल मिलाकर पढ़ना और संवाद यही उनके शौक और व्यसन थे। बाकी सिगरेट, शराब, फैशनबाजी, सिनेमा वगैरह से खास लगाव कभी नहीं रहा है। इतने वर्षों की मित्रता में मैं आज तक नहीं जान पाया कि उनको पढ़ने लिखने बतियाने आदि के अतिरिक्त पसंद क्या है? हाँ यह जरूर जानता हूँ, उनको नापसंद कुछ चीजें हैं जिनमें पनीर, विदेशी ढंग के व्यंजन, क्रिक्रेट और कविता का विशेष रूप से जिक्र किया जा सकता है। इनसे वह सदा खार खाए रहते हैं। उनकी नापसंदगी क्रिक्रेट प्रेमियों और कवियों के सम्मुख अधिक ही प्रचंड हो जाती है। क्योंकि स्पष्टता उनका स्वभाव है। साहित्य और जीवन दोनों में वह अमूर्तन के खिलाफ हैं। अपनी भावनाओं, विचारों को कलापूर्ण ढंग से छिपाने के वह समर्थक नहीं। किसी रचना से खुश हुए तो दशकों इसे दर्शाएँगे और विरुद्ध हुए तो उसे ठंडा करके छोड़ेंगे। उनका प्रेम और उनका गुस्सा दोनों एक साथ अगर किसी शख्स पर बरसा तो वह अकेले मुद्राराक्षस थे। कहा जा सकता है, दोनों लंबे वक्त तक एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे और लंबे वक्त तक एक दूसरे को सह नहीं सकते थे। मुद्रा जी इंदिरा नगर छोड़कर दुर्विजयगंज मोहल्ले के अपने पैतृक आवास में रहने चले गए उसके बाद भी वह लगभग नित्य वीरेंद्र जी के ऑफिस में सुबह दोपहर शाम किसी भी बेला या दो बेला में देखे जा सकते थे। वह वीरेंद्र जी को बहुत मानते थे और उनके लेखन को काफी सराहते थे; लगभग यही रवैया उनके प्रति वीरेंद्र जी का था लेकिन उनके सबसे ज्यादा झगड़े, वाद-विवाद मुद्रा जी से ही हुए। इसकी पृष्ठभूमि में शायद यह हो कि दोनों में कुछ बुनियादी भिन्नताएँ थीं - मुद्रा जी विचार जल्दी जल्दी बदलते रहते थे जबकि वीरेंद्र जी में अपने वैचारिक फैसलों को लेकर स्थायित्व था। मुद्रा जी प्रेमचंद को समस्याग्रस्त करते थे; वीरेंद्र जी प्रेमचंद के लिए जान दे देने वाले और जान ले लेने वाले ठहरे। मुद्रा जी नीट ग्रहण करते थे और सुबह से उनका कार्यक्रम शुरू हो जाता था। वीरेंद्र जी इस मामले में नाखून कटाकर शहीदों में नाम कराने वाले हुए। उनके पात्र में करीब जल ही जल मिलेगा।

भिन्नताएँ अपने स्थान पर, समानताओं के कारण भी दोनों भिड़ जाते थे। दोनों बहुत पढ़ाकू, अपनी बात को ऊपर रखने वाले, जल्दी ही तैश में आ जाने वाले और देर तक शांत न होने वाले हुए। एक बार मेरे घर पर ही दोनों में भयानक टक्कर हो गई थी। मैंने अपना आवास कर लिया था उसी के बहाने से डिनर का आयोजन था। श्रीलाल शुक्ल, मुद्राराक्षस, विभूति नारायण राय, रवींद्र वर्मा, शीला रोहेकर, शिवमूर्ति, वीरेंद्र यादव, राकेश, सुशील सिद्धार्थ आदि अतिथि थे। एक हल्का फुल्का प्रसंग था जो धीरे धीरे नोंक-झोंक में बदलने लगा; जल्द ही मुद्रा जी और वीरेंद्र जी ने अपना अपना पक्ष बना लिया और तीर चलाने शुरू कर दिए। थोड़ी ही देर में बात इतनी बिगड़ गई कि मुद्रा जी गुस्से में खड़े होकर तेज स्वर में बोलने लगे, वीरेंद्र जी ने बैठे बैठे ही हमला और तेज कर दिया। बाकी लोग दोनों को शांत कराने लगे किंतु दोनों तो अपने ही ढंग के अनोखे। अंत में मुद्रा जी सभा का बहिष्कार करते हुए बाहर निकल गए। मैं उनको वापस लाने, मनाने के इरादे से बाहर की तरफ दौड़ा; वह दूर निकल गए थे। किसी तरह उनके नजदीक पहुँच जाने पर घबड़ा जाना पड़ा - रास्ते में किसी कुत्ते ने मुद्रा जी की एक उँगली काट ली थी, जिससे तेज रक्तस्राव हो रहा था। मेरे हजार मिन्नतें करने के बाद भी मुद्रा जी, वीरेंद्र जी के लिए, क्रोध, नाराजगी जताते हुए चले गए। मैं यह सोचते हुए अपने घर लौट रहा था कि अब इन दोनों का संबंध खत्म। लेकिन अगले रोज दोनों हजरतगंज में हँसते हुए टहल रहे थे।

जब 1990 में मैं लखनऊ के इंदिरानगर में रहने लगा, उन दिनों की जो सबसे अच्छी यादें हैं उनमें से एक होली के त्यौहार की है। होली के दिन वीरेंद्र जी राकेश जी की जुगल जोड़ी मेरे घर आ जाती। हम दोस्त अबीर गुलाल लगाकर परस्पर गले मिलते। हम निकल पड़ते - सबसे पहले मुद्रा जी के यहाँ, वहाँ से जगूड़ी जी, रामलाल जी के घर। श्रीलाल जी होली के अवसर पर प्रायः अपने गाँव चले जाते थे। किसी वर्ष यहाँ रहते तो जाहिर है, हम वहाँ भी जाते। शाम को वीरेंद्र जी के घर बड़ा जमावड़ा होता। तब भी वह कमरा आज की तरह बेहतरीन किताबों से संपन्न था। बहरहाल होली की शाम वह कमरा वीरेंद्र जी के अपनों और खाने की भाँति भाँति की मीठी नमकीन वस्तुओं से सज जाता था। उतनी प्रकार की चीजें भाभी जी खुद बनाती थीं। बताना होगा कि वीरेंद्र जी के घर की सारी व्यवस्था भाभी जी ही सँभालती रही हैं। इसलिए नहीं कि वीरेंद्र जी असहयोग करते हैं बल्कि इसलिए कि उनको मालूम है कि उनका जो सहयोग होगा वह असहयोग से कहीं अधिक भीषण होगा। यहाँ तक कि वह अपने कपड़े भी स्वयं खरीदें तो उसमें रंग संयोजन, डिजाइन, नाप के बेसलीका होने का खतरा बना रहेगा। अतः यह भी भाभी जी के जिम्मे। वीरेंद्र जी अगर आज भी फबते हैं तो इसका काफी कुछ श्रेय भाभी जी को जाता है। दरअसल पढ़ने लिखने के अलावा उनका किसी अन्य क्षेत्र में मन नहीं लगता है और उसका हुनर भी उनके पास नहीं है। एक बार मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने कभी किसी से प्रेम किया है? उनके जवाब का सार यह है कि वह इस मामले में खिलाड़ी नहीं अनाड़ी थे; इतने बड़े कि यदि अरेंज मैरेज का रिवाज न होता तो वह अविवाहित रह जाते। सच यह है, सामाजिकता ही उनको रास आती है। बगैर सामाजिकता का जीवन उनको पसंद नहीं और बगैर सामाजिकता का रचनाकर्म भी उनको नापसंद है। सामाजिकता भी ऐसी जिसमें दलित, शोषित, मामूली इनसान की पक्षधरता हो। उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष जीवन और साहित्य दोनों ही मोर्चों पर कभी कभी अन्याय कर जाता है। साहित्य में अज्ञेय, कृष्णा सोबती, श्रीलाल शुक्ल, निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी जैसे रचनाकारों के साथ उन्होंने कम या ज्यादा नाइंसाफी की है। जहाँ तक जीवन का मामला है, उसमें वह प्रकृति संगीत आदि में कोई दिलचस्पी नहीं लेते। घर पर भाभी जी के सौजन्य से बढ़िया दर्जे के पेड़ पौधे लगे हैं मगर मजाल है वीरेंद्र जी को किसी का नाम मालूम हो। अपनी कार में उन्होंने म्यूजिक सिस्टम नहीं लगवाया है। आपकी कार में भी, कुछ देर बर्दाश्त करने के बाद निश्चय ही गाना बंद करा देंगे। ध्यान से देखा जाए तो उनके लेखन पर, विचारों पर भले ही आधुनिकता के स्तंभ मार्क्स, आंबेडकर, नेहरू, लोहिया का असर मिलेगा लेकिन गांधी जी से सिद्धांतों से थोड़ा अलग विलग रहने के बावजूद वह जीवन शैली के मामले में उन्हीं के नजदीक हैं। सादा खाना, सादगी भरा रहन सहन, शुद्ध शाकाहारी, नशे पत्ते से सर्वथा दूर। मद्य भी नाममात्र के लिए, जैसे यह साबित करने के लिए कि नहीं नहीं वह गांधी जी के अनुयायी नहीं हैं।

आंबेडकर और लोहिया बाद में उनके वैचारिक संसार में मुखर हुए। इन राजनीतिक विचारकों के चिंतन की छाप भले ही पहले से रही हो मगर वीरेंद्र जी के यहाँ वे मूर्त और मुखर रूप में बाद में प्रकट होते हैं।

खैर, अभी थोड़ा पहले 90 के दशक की चर्चा हो रही थी, तो वाकई उस दौर में एक उबलती हुई खलबली थी और जिसके तापमान से तमाम लिखने पढ़ने वाले भी गर्म थे। लखनऊ इससे अछूता कैसे रहता... यहाँ भी लेखकों के मध्य रोज रोज की मुलाकातें थीं। साहित्य चर्चा, चुहुल, गपशप, गंभीर बहसों से मिलना पूरा होता। वीरेंद्र जी, विनोद दास, मैं तीनों लंच में इकट्ठा होते और यदाकदा काफी हाउस चले जाते, वहाँ अन्य कुछ परिचित मिल ही जाते थे। धीरे धीरे वार्ता इतनी दिलचस्प, रोमांचक, सार्थक हो जाती कि हम तीनों फिर शाम को ही घर लौटने के मकसद से अपना थैला लेने अपने अपने ऑफिस जाते। इसी बीच रवींद्र वर्मा जी और वीरेंद्र जी के परामर्श पर कॉफी हाउस में शुक्रवारी सभा के आयोजन का सिलसिला शुरू हुआ जिसकी शान निराली थी। बहुत सारे लेखक हर शुक्रवार की संध्या इकट्ठा होकर अपने खास एवं प्रिय वेटर देवी के लाए पकौड़े खाते हुए, कॉफी पीते हुए, सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए माहौल को जीवंत किए रहते। कहना ही होगा, हर बैठक में वीरेंद्र जी कोई न कोई केंद्रीय मुद्दा उठा देते और उसमें खुद दक्षता के साथ शरीक हो जाते। मुझे याद है ग्लासनोस्त, मंडल कमीशन, टैगोर, लेखक संगठन आदि पर अद्भुत बहसें वीरेंद्र जी ने वहाँ न केवल छेड़ीं वरन शानदार तेवर भी दिए। ये यादगार क्षण थे जो हमें संयोग से हासिल हुए थे अथवा हमने इन्हें हासिल करने का संयोग रच लिया था। लेकिन यह वह वक्त था जब निजीपन से बाहर समाज, देश के जीवन पर ध्यानपूर्वक आँख टिकाने की जरूरत थी। ऐसा महसूस हो रहा था कि कुछ चीजें समाज की काया में मद्धिम मद्धिम असर करने वाले सूक्ष्म जहर की तरह उतर रहीं हैं तो कुछ प्रत्यक्ष रूप से सीधे खूँखार हथियारों से हमारी साझी विरासत पर हमला कर रही हैं। सूक्ष्म जहर की तरह उपभोक्ता संस्कृति पसर रही थी तो खूँखार हथियार था राम जन्मभूमि का उन्माद। हजरतगंज का वह सीधा महात्मा गांधी मार्ग आए दिन भगवाधारी ध्वजवाहकों से भर जाता था। लोग अपने दफ्तरों में, दुकानों में होते; पहले उनके कानों में दूर से नारे लगाती भीड़ की आवाजें प्रवेश करतीं जो नजदीक आकर चिल्लाहट और शोर में तब्दील हो जातीं। सब उस मंजर को देखने के लिए बाहर निकलकर सड़क पर आ जाते। सड़क केसरिया रंग में रँगे विहिप, संघ, बजरंगदल, विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के जुलूस से भर जाती थी। मैं भी हिंदी संस्थान से बाहर आकर हजरतगंज के मध्य की ओर बढ़ने लगता। रास्ते में ही कहीं सड़क के किनारे किनारे चहलकदमी करते वीरेंद्र जी मिल जाते। सड़क के बीचोंबीच माथे पर केसरिया पट्टी बांधे, हाथ में उसी रंग का झंडा झंडी थामें जुनून से भरा हुआ हुजूम आक्रामक मुद्रा में सांप्रदायिक नारे लगा रहा होता था। उनके वाहनों पर भी इसी अंतर्वस्तु के झंडे, स्टीकर, बैनर लगे रहते थे। एक बार तो ऐसा हुआ कि मैं और वीरेंद्र जी काफी हाउस के बरामदे में खड़े थे कि कथित उपद्रवियों की भीड़ इतनी अराजक हो गई कि वहाँ मौजूद तत्कालीन जिलाधिकारी अशोक प्रियदर्शी को रिवाल्वर तान देनी पडी थी।

अराजकता उस सड़क पर ही नहीं सर्वत्र थी। राह चलते पब्लिक ट्रांसपोर्ट कथित रामभक्तों की भीड़ द्वारा रोक लिए जाते; सवारियों को, चाहें वे जिस धर्म, विश्वास के हों, बाध्य किया जाता था कि वे टीका लगाएँ, सिर पर केसरिया पट्टा बांधें और जय श्रीराम का नारा बोलें। उन रामभक्तों के जत्थे कालोनियों में घरों पर गेट की घंटी बजाते, कुंडी खड़का देते। घर में रहने वालों पर दबाव डालते कि घर की छत पर उनका भगवा झंडा लगाया जाए और बाहरी दीवार पर स्टिकर। यह ऐसी स्थिति थी जिसमें वीरेंद्र जी सरीखे लोग सर्वाधिक असुरक्षित थे। वीरेंद्र जी की दिक्कत थी, उनका खुद पर कोई कंट्रोल नहीं था। ऐसा नहीं था कि वह खतरे को जानते नहीं थे, बहुपठित और कुशाग्र बुद्धि होने के करण वह यथार्थ से अवगत थे किंतु उनका दिमाग ऐसे द्रव और धातु से बना है कि अवसर आने पर सब्र खोकर भिड़ जाते हैं। उन दिनों भी वह दफ्तर में सहकर्मियों, आगंतुकों से और घर रहने पर पड़ोसियों, मोहल्लावासियों से सांप्रदायिकता विरोध करने लगते थे। मैं डरता था कि रास्ते में उन्हें उपद्रवी रोकर टीका चंदन लगाने और जय श्रीराम बोलने के लिए कहें तो वह कहीं गाली बकना न शुरू कर दें। यह बात अलहदा है, वीरेंद्र जी गाली न तब देते थे न अब।

उपरोक्त भयानक परिस्थियों में भी पूरे मंदिर प्रकरण के दौरान लखनऊ में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों ने सांप्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में यात्राएँ, धरने, जुलूस आदि आयोजित किए। कर्फ्यू लगा तो पुराने लखनऊ की बस्तियों में पहुँचे। उन कार्यक्रमों की तसवीरें यदि देखी जाएँ तो जो एक चीज सभी में मिलेगी वह यह कि वीरेंद्र जी एकदम अगली कतार में प्रतिबद्धता के साथ मौजूद हैं। शायद यही सब कारण हों, लखनऊ के साहित्यिक, बौद्धिक परिवेश में ज्यादातर लोग वीरेंद्र जी को सम्मान देते हैं, प्यार करते हैं; और यह भी कहूँ कि थोड़ा सहमते भी हैं। उनके तीसरे गुण पर कुछ विस्तार की आवश्यकता है - वीरेंद्र जी के मित्रों और विरोधियों की अच्छी खासी तादाद है; दोनों अगर उनसे विमर्श के समय काफी सजग, सतर्क रहते हैं तो इसके पीछे वीरेंद्र जी का घोर पढ़ाकूपन, अकाट्य तर्कशीलता और जहीन व्याख्यापरकता है; तथ्यों, दृष्टांतों का अचूक इस्तेमाल करने की बेहतरीन कला है लेकिन एक और महत्वपूर्ण बात कि वह विचार की दुनिया में गजब के साहसी हैं। यूँ व्यावहारिक जीवन में वह प्रायः शांतिप्रिय हैं और पर्याप्त आलसी हैं किंतु बहसों में भिड़ने, टकरा जाने, लड़ने, वाद विवाद करने का जरा भी अवसर मिलते ही अद्भुत रूप से आलस्य का परित्याग करके फुर्तीले और हमलावर हो उठते हैं। वह प्रहार इतना जबरदस्त करते हैं कि कई मर्तबा प्रतिपक्षी निरुत्तर, असहाय होने की दशा में गाली गलौज पर उतर आते हैं, निजी हमले करने लगते हैं। स्पष्ट है, इन सबसे वीरेंद्र जी का मनोबल और बढ़ता है। वस्तुतः प्रतिपक्ष सदैव उनको रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आज जब आलोचना के क्षेत्र में अमूमन रणनीतिक, निरापद, मधुर, लुभावन शब्द व्यवहार का चलन है तब वीरेंद्र जी का उपरोक्त वैशिष्ट्य बेहद अहम है कि उनके चिंतन के केंद्र में प्रतिपक्ष का प्रत्याख्यान रहता है। जाहिर है, यहाँ आशय किसी व्यक्तिगत एजेंडे या विरोधी की नहीं है वरन उनका प्रतिपक्ष वही है जो सामजिक संरचना में व्यापक मनुष्यता का विपक्ष होता है। उनकी आलोचना पुस्तक 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता' या लेखों की 'किताब प्रगतिशीलता के पक्ष में' तथा समय समय पर छपे उनके अन्य लेखों को पढ़ें, यह चीज स्पष्ट दिखती है, वह अपने प्रतिपक्ष को उपस्थित करते हैं फिर उससे जिरह, पॉलमिक्स करते हुए समस्याग्रस्त करते हैं। इस मुठभेड़ की राह में यदि उनका मित्र, आदरणीय, हितैषी भी आ जाए, वह भी सुरक्षित नहीं रहेगा। इसलिए बतौर आलोचक वीरेंद्र यादव की निष्पत्तियों, वैचारिकी, विश्लेषण पद्धति से असहमत हुआ जा सकता है मगर उनकी आलोचकीय ईमानदारी को लेकर लेखन से इतर कोई अवांतर पाठ किया जाना अत्यंत कठिन है। कुछ उदाहरण भी दिए जा सकते हैं कि श्रीलाल शुक्ल, राजेंद्र यादव, मुद्राराक्षस, कामतानाथ जैसे वरिष्ठ लेखकों से उनके नजदीकी संबंध रहे मगर उनको लेकर वीरेंद्र जी ने बेहद तल्ख टिप्पणियाँ की हैं और बहुत सराहना के साथ भी लिखा है।

मैं कभी कभी चुटकी लेता हूँ कि आपमें प्रेम भाव कम क्रोध बहुत ज्यादा है। जवाब में वह हँसते हैं।

मैं आगे बढ़ता हूँ कि आप क्यों इतना भिड़ते रहते हैं। इतना मत लड़िए।

उनका जवाब होता है कि मैं क्या करूँ, कोशिश पर्याप्त करता हूँ पर अंततः मुझसे खामोश नहीं रहा जाता। इस बार भी वह हँसते हैं।

वैसे मैं आगे भी उनको मशविरा देता हूँ मगर यह बात उनके प्रति गहरा सम्मान भाव जगाती है कि वह हमारे बीच के हैं जिसे विचारों में विचलन और विपर्यय बर्दाश्त नहीं होता। यह बात अलग है कि मैं गाहे बगाहे मजाक करते हुए उनको क्रोध के पौराणिक ऋषि दुर्वासा का समतुल्य घोषित कर देता हूँ। इधर एक दिन मैंने उनको नई उपाधि दी कि एक जमाने में साहित्य की प्रसिद्ध नगरी इलाहाबाद में जैसे भैरव प्रसाद गुप्त थे वैसे ही आज के समय में आप हैं। इस बात की वजह जानने के लिए भैरव प्रसाद गुप्त के व्यक्तित्व की एक विशेषता से अवगत होना पड़ेगा। वह एक ऐसे शख्स थे जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते थे और प्रायः कठोर कहने के लिए मशहूर थे। सामने कितनी भी बड़ी शख्सियत हो वैचारिक धरातल पर बेमुरौव्वत होने में उनको टाइम नहीं लगता था। एक मौके पर हाईकोर्ट के एक जज ने मंच से प्रेमचंद को औसत लेखक कहा तो भैरव जी तुरंत तेज आवाज में बोले कि किसने इस मूर्ख को जज बना दिया। सभागार में खौफ छा गया था। वीरेंद्र जी इतना तेज भले न दिखाते हों लेकिन मौका भी नहीं गँवाते। निर्मल वर्मा, मुद्राराक्षस हों या धर्मवीर, प्रेमचंद का कथित कुपाठ करने की वजह से वीरेंद्र जी ने उन पर तीखे तीर चलाए हैं। भैरव जी का एक अन्य किस्सा भी चर्चित है - बनारस में जनवादी लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन था जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के शिखर नेता हरिकिशन सुरजीत पर्यवेक्षक की हैसियत से आए थे। जलेस के उस अधिवेशन में जो सबसे महत्वपूर्ण और चुनिंदा लोगों की गोपनीय बैठक हुई उसमें सुरजीत लेखकों और लेखक संघ के विषय में कुछ ऐसा समझाने लगे जो भैरव जी को असह्य लगा; उन्होंने बिना समय गँवाए निर्भय कहा कि आप साहित्य की दुनिया के बारे में जब कुछ नहीं जानते तो फिर क्यों ये सब कह रहे हैं। याद दिलाना है कि वीरेंद्र यादव के लेखक के निर्माण में प्रगतिशील लेखक संघ की अहम भूमिका रही है। कह सकते हैं, अपने युवापन से ही वह इससे न केवल जुड़े रहे वरन उत्तर प्रदेश में इसे संगठित करने, विस्तार देने में जी जान लगाया। प्रलेस के स्वर्ण जयंती कार्यक्रम की वह धुरी थे तो प्रलेस की तरफ से एक शानदार पत्रिका प्रयोजन का संपादन प्रकाशन भी उन्होंने अपने मित्र राकेश के साथ किया। लेकिन जो पाठक हंस में छपे उनके लेख 'प्रगतिशील लेखन आंदोलन - दशा और दिशा' को पढ़ेंगे, देखेंगे, किस प्रकार वह अपने प्रिय संगठन और पार्टी से भी असहमति दर्ज कर सकते हैं। गोया इतना नाकाफी हो, प्रलेस के तत्कालीन अध्यक्ष और विख्यात आलोचक नामवर सिंह ने प्रलेस के एक कार्यक्रम में आरक्षण और दलित लेखन को लेकर कुछ सवाल उठाए तो बहुत जल्द वीरेंद्र जी ने प्रतिवाद में पूरा एक लेख लिख डाला।

यूँ जब तक मैं वीरेंद्र जी से मिला नहीं था, उनकी मेरे मन में मार्क्सवाद, कम्युनिस्ट पार्टी, प्रलेस को लेकर प्रतिबद्ध और कट्टर इनसान की छवि थी। दरअसल 1986 प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना का स्वर्ण जयंती वर्ष था जिसका केंद्रीय और बृहद आयोजन लखनऊ में होना था। जैसा अभी पहले कह चुका हूँ, वीरेंद्र जी इस आयोजन के नाभिक थे; इस कारण उन दिनों उनके वक्तव्य अखबारों में छपा करते थे जिन्हें मैं अपने गृहनगर सुल्तानपुर में पढ़ता रहता था। उसी के आधार पर मैंने उनकी एक आभासी छवि तैयार की थी जो सही थी या गलत, कह नहीं सकता लेकिन जब उनके निकट आया तो यह पाया कि वह वैसे नहीं हैं। लखनऊ मैं 1989 में आया था तब तेजी से दुनिया बदल रही थी जिसका सर्वाधिक प्रभाव कम्युनिस्ट चिंतन और उसके साँचे में ढले हुए देशों पर पड़ रहा था। मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ में बड़े बड़े बदलाव ला रहे थे। मार्क्सवाद के अध्ययन और विश्लेषण पर नए नए सवाल उठ रहे थे। पर यह हास्यास्पद जैसा था कि हमारे देश के अनेक पार्टी कामरेड इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे; उनके अनुसार यह सब पूँजीवादी प्रेस और अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए की करतूत था वर्ना सब कुछ सही, यथावत था। यहाँ तक कि, दिसंबर 1991 में सोवियत यूनियन का विघटन हो गया, उसके झंडे की जगह तीन रंग के रूसी झंडे ने ले लिया तब भी इस यथार्थ को स्वीकार करने में कई को असुविधा हो रही थी। हमारे देश में भी राजीव गांधी के नेतृत्व में मुक्त अर्थव्यवस्था के लिए दरवाजे खोले जा रहे थे। राम जन्मभूमि विवाद संगठित रूप से भयानक रूप ले चुका था। 90 में एक और बड़ी खलबली मंडल कमीशन के लागू होने के कारण दरपेश हो गई थी। दलितों के मध्य राजनीतिक बोध प्रखर होने लगा था जो उ.प्र. जैसे राज्य में बसपा के फैलाव की शक्ल में सामने था। पारंपरिक वामपंथ की समस्या यह थी कि वह नए परिवर्तनों का मूल्यांकन शास्त्रीय मार्क्सवाद के औजारों से कर रहा था। वह अभी भी पिछड़ी, दलित जातियों के उभार और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अपनी वर्ग संघर्ष की अवधारणा का विरोधी, उसको दिग्भ्रमित करने वाला मान रहा था। वीरेंद्र यादव जैसे वामपंथी इस संदर्भ में भिन्न धरातल पर थे। वह दुनिया भर में घटित हो रहे परिवर्तनों पर निगाह रख रहे थे और वस्तुगत बनकर उस भविष्य की दुनिया की थाह ले रहे थे जिसमें कई मौजूदा, पुरातन चीजों को प्रश्नांकित या अप्रासंगिक में रूपांतरित हो जाना था और कुछ सर्वथा नई नई चीजें पदार्पण के लिए भविष्य की कुंडी खटखटा रही थीं। वीरेंद्र यादव इसे पहचान रहे थे तो उनकी इस सजगता की पृष्ठभूमि में था उनका अध्ययनप्रिय होना। उनके साथ यह भी सुविधा थी कि उनके दफ्तर के पड़ोस में ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी थी। वह दफ्तर में जब खाली रहते, और प्रायः ही खाली रहते, ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी चले जाते जहाँ दुनिया भर की बेहतरीन किताबें उपलब्ध थीं। यह पुस्तकालय मेफेयर टाकीज की बिल्डिंग की ऊपरी मंजिल पर था; भूतल पर ही जगत प्रसिद्ध राम आडवानी की पुस्तकों की शॉप थी जहाँ चुनी हुई श्रेष्ठ किताबें उपलब्ध रहती थीं। बताना है, वीरेंद्र जी वैसे खर्चीले इनसान नहीं हैं लेकिन ऐसे बंदे जरूर हैं जो किताब की दुकान पर फिजूलखर्च तक शाहखर्च बन जाता है। हालाँकि उन्होंने एक दो जुगाड़ भी किया था जिसमें एक, उनका हजरतगंज स्थित एक पत्र पत्रिकाओं की दुकान से करार था जिसके अंतर्गत वह बेहद अल्प मासिक शुल्क के बूते नित्य दो पत्रिकाएँ मुफ्त घर ले जाने के हकदार हो गए थे। अगले रोज उन्हें वापस करके वह नई दो पत्रिकाएँ ले जाते थे। नतीजा यह, उनके थैले में इंडिया टुडे, फ्रंट लाइन, न्यूज वीक, टाइम, वीक, सेमिनार, ईपीडब्लू, मेन स्ट्रीम, हंस, कथादेश आदि में से कोई दो पत्रिका हमेशा मिल सकती थी। यहाँ सूचना देना चाहूँगा, पत्रकारिता का रुझान उनके अंदर किशोरकाल, युवाकाल से था। वह शुरुआत में पत्रकार ही बनना चाहते थे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र जनयुग के संपादकीय विभाग में बतौर चयनित हो जाने के बाद, बस किसी तरह उसमें नौकरी करने के लिए दिल्ली जाते जाते रह गए थे। फिर भी एक जागरूक पत्रकार का चौकन्नापन उनमें सदैव रहा है। वस्तुतः पत्रकारिता, मार्क्सवाद, साहित्य, सामाजिक सांस्कृतिक सक्रियता के मेल से उनके वैचारिक व्यक्तित्व की निर्मिति हुई थी, जिसमें मार्क्सवाद को केंद्रीयता हासिल थी। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि मार्क्सवाद की जमीन पर उनके पत्रकार, रचनाकार, संस्कृतिकर्मी का निर्माण हुआ था। लेकिन जैसा अभी थोड़ा पहले जिक्र हुआ है, 90 के आसपास से विचार और समाज दोनों के नजरिये से दुनिया की काया बदल रही थी। कुछ पुराना क्षीण या विलुप्त हो रहा था; इस विलोपन में कई खराब कई मूल्यवान चीजें थीं। ऐसे ही नया प्रकट हो रहा था जिसमें कुछ अच्छा तो बहुत सारा विनाशकारी था। बहरहाल जो श्रेष्ठ प्रकट हुआ था उसमें दलित पिछड़े समुदाय का अस्मिताबोध सबसे प्रमुख था। वीरेंद्र यादव ने इसे गंभीरता से ग्रहण किया और मार्क्सवाद के दायरे के पार होकर भारतीय समाज की व्याख्या पर नए सवाल उठाने शुरू किया। उन्होंने भारतीय समाज की तलहटी तक धँसी ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक संरचना और धर्म के वर्चस्व के विरोध को अपनी समझ की धुरी बनाया।

वर्णाश्रम और धर्म के शक्तिकेंद्रों का प्रत्याख्यान आज वीरेंद्र यादव की आलोचना में काफी व्यवस्थित हो चुका है। कह सकते हैं उनकी आलोचना की कसौटियाँ प्रायः उन्हीं के विखंडन तथा प्रतिरोध से शक्ल अख्तियार करती हैं। जैसा वह अक्सर कहते हैं कि साहित्य एक सोशल कांस्ट्रक्ट है। स्पष्ट है हमारे देश के सोशल कांस्ट्रक्ट में वर्णाश्रम व्यवस्था और धर्म के दमनकारी रूप की अनदेखी किसी भी सूरत में नहीं की जा सकती। आज बहुत सारे आलोचक विद्वान इस मुद्दे पर पक्षधर राय रखते हैं किंतु वीरेंद्र यादव का महत्व इस मायने में है कि उन्होंने करीब पच्चीस वर्ष पूर्व से इसे अपनी आलोचना दृष्टि का आधार बनाना शुरू कर दिया था और बीती चौथाई सदी की उनकी आलोचना मूलतः उसी दृष्टि का नैरंतर्य और विकास है। उनकी आलोचना की एक शक्ति यह भी है कि उन्होंने अपनी अवधारणाओं को आलोचना में ज्यादातर पाठ केंद्रित प्रस्तुत किया। मैला आँचल, गोदान, आधा गाँव, झूठा सच सरीखे उपन्यासों और 1857 तथा भारत विभाजन जैसी ऐतिहासिक परिघटनाओं का जो पाठ लोगों के सामने रखा वह सर्वथा नवीन ही नहीं था बल्कि उनको लेकर अब तक बनी मान्यताओं को प्रश्नांकित भी करता था। शायद ऐसा पहली बार था कि उक्त कृतियों, परिघटनाओं में व्याप्त त्रासदी की नींव में वर्ण विभाजन के दृष्टिकोण को देख लिया गया था। अपनी इन्हीं कसौटियों पर उन्होंने भारतीय अँग्रेजी उपन्यासों को भी परखा। मुख़्तसर में कहें, उन्होंने यथार्थ को महावृत्तांतों से बाहर निकालकर हाशिये की आँखों से देखा। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से सुखद दोतरफा रहा - एक मेरे अग्रज एवं मित्र ने उपरोक्त बेहतरीन काम किया; दो, उनके आलोचना कर्म का उत्कृष्ट मुझे अपनी पत्रिका तद्भव में प्रकाशित करने का अवसर प्राप्त हुआ। तद्भव में छपे उनके अधिकतर लेखों को अभूतपूर्व सम्मान तथा लोकप्रियता मिली। गोदान, भारतीय अँग्रेजी उपन्यासों, विभाजन पर केंद्रित उपन्यासों, 1857 पर लिखे गए उनके लेख अपनी लोकप्रियता में किसी सफल कहानी उपन्यास से टक्कर लेते हैं। कहानी उपन्यास के जिक्र से याद हुआ, वीरेंद्र यादव की आलोचना में एक खास तरह की आख्यानपरकता भी मिलती है जो उनके लेखन को सहज, पठनीय, स्मरणीय बनाती है। उक्त आख्यान तत्व संभवतः इसलिए है कि वह अपने लेखों में तथ्यों, घटनाओं, उद्धरणों, विवरणों को, और उन्हीं के बीच सरसरी तौर पर अवांतर से लगते मगर बहुत जरूरी प्रसंगों को, परस्पर बड़े दिलचस्प और खूबसूरत ढंग से गूँथ सके हैं; जैसे किसी किस्से में तरह तरह की कहानियाँ किस्से को आकार देती हैं और उनके मध्य पिरोई गई अवांतर कथाओं की भी बेहद सार्थक भूमिका होती है।

वीरेंद्र यादव के लेखन के बारे में एक विशेष बात यह कि उनका चर्चित लेखन करीब पचास की उम्र के आसपास शुरू होता है जो लगातार जारी रहता है। उम्र के इस पड़ाव में हिंदी के अधिकतर आलोचक अपने लिखे हुए में ही उलटफेर करना प्रारंभ कर देते हैं परंतु दिलचस्प है कि वीरेंद्र यादव उस वय में आलोचना का ताजा तेवर, नई प्रणाली, यथोचित ऊर्जा लेकर साहित्यिक पटल पर सक्रिय होते हैं। वैसे न केवल लेखन वरन उनके व्यक्तित्व में भी उम्र बढ़ने के साथ साथ युवापन सांद्र होता गया है। रिटायरमेंट के बाद हमने देखा कि वह लगातार छरहरे, फिट, प्रभावशाली होते जा रहे हैं। विचारों के समानांतर वक्तृता में भी वही तेवर। वही नाकाबिले बर्दाश्त चीजों से खफा हो जाना, उन पर भड़क जाना। स्वभाव के इसी पक्ष के चलते ही उनके विरोधियों, उनसे खार खाने वालों की विपुल संख्या है। कोई बात नहीं, उनको चाहने वाले, सराहने वाले इससे कई गुना ज्यादा हैं जिनमें साहित्य के कई दिग्गजों सहित नए रचनाकार, विद्यार्थी, शोधछात्र, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। बेशक ये लोग वीरेंद्र जी को काफी पसंद करते हैं लेकिन उनकी तरफ से आजकल एक शिकायत भी दर्ज कराई जा रही है कि ठीक है कि वह सामयिक, विचारोत्तेजक, हस्तक्षेपकारी लेख लगातार लिख रहे हैं किंतु एक लंबा अंतराल हो गया, वीरेंद्र यादव ने वैसा लेखन नहीं किया जिनके कारण उनकी प्रसिद्धि है। मैं स्वयं भी इन्हीं शिकायतकर्ताओं की पंक्ति में हूँ। शिकायतकर्ता के बाद जाँचकर्ता बनकर तफ्तीश करने पर पाया गया कि जिस प्रकार पचास की उम्र के करीब उनके लेखन में गुणात्मक बदलाव हुए उसी भाँति उनके जीवन में भी नवोन्मेष हुआ। उनके बेटे ने जोर डालकर कार खरीदवा दी और किसी ड्राईविंग लर्निंग सेंटर में दाखिला कराकर खुद भी उसी में दाखिल हो गया। वह तो एक ही दिन में सीखसाख कर नोएडा चला गया, अब उसके पिता जी पूरे पंद्रह दिन का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद आखिकार कार चलाने ही लगे। अगली बार यह हुआ कि वीरेंद्र जी किताबों पत्रिकाओं में डूबे रहने वाले इनसान ठहरे लेकिन बेटे ने एक दिन इंटरनेट सहित कंप्यूटर का इंतजाम करके पिता को उसका कमोबेश प्रशिक्षण भी दे दिया। अब पिता जी रोज सुबह हिंदी अँग्रेजी के अनगिनत अखबार कंप्यूटर पर पढ़ने लगे। देश विदेश की पत्रिकाएँ इंटरनेट पर खोजने पढ़ने लगे। जरूरी सामग्री डाउनलोड करना भी जान गए। जब दिक्कत आती या कंप्यूटर इंटरनेट का कोई पेंच फँस जाता तो नोएडा में बेटे को फोन लगाकर समाधान पूछते; उसी तरह जैसे ड्राइविंग की शुरुआत में बेटे को बीच बीच में फोन लगाते पाए जाते थे। खैर, वीरेंद्र जी ने प्रारंभ अवश्य बेमन से किया था लेकिन उनने धीरे धीरे रफ्तार बढ़ाई और फेसबुक ज्वाइन कर लिया और उसमें बहुत अधिक ही रम गए। इस माध्यम ने उनको इसलिए भी आकर्षित किया होगा कि उनको इसके जरिये अपने अंदर बुनियादी रूप से मौजूद एक्टिविस्ट को मोर्चे पर सक्रिय करने की संभावना दिखी होगी और सचमुच वह फेसबुक पर अपने सामाजिक राजनीतिक एजेंडे को लेकर ही सक्रिय रहते हैं। तब भी उनको इसके लिए दोषी करार दिया ही जाना चाहिए कि उन्होंने इस मंच पर जरूरत से बहुत ज्यादा सक्रियता दिखाई जिसके नतीजे में उस लेखन में अवरोध उपस्थित हो गया जिसके लिए वह जाने पहचाने जाते हैं और जिसे वह ही कर सकते हैं। वैसे यह सब महज कयास है; तुक्का, यह भी तो हो सकता है कि वह किसी बड़ी तैयारी में लगे हों जिसका नतीजा आने में वक्त लग रहा हो। लेकिन पाठक तो पाठक होते हैं, चाहने वाले चाहने वाले होते हैं; वे मिलने पर, फोन पर उनसे शिकायत करते हैं। वीरेंद्र जी कभी विनम्रता कभी अपने हास्यबोध के जिरहबख्तर से झेल जाते हैं। मगर यदि किसी ने प्रेमचंद, आंबेडकर के खिलाफ बोला तो फिर उसकी खैर नहीं। इसी भाँति अगर सामने कोई ब्राह्मणवाद, या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा का समर्थक टकरा गया तो अरे बाप रे बाप, अब लग गया उसका काम।

नब्बे के इर्दगिर्द बाबरी मस्जिद के विरोध के बहाने उभरी सांप्रदायिकता अबकी सत्ता पर आरूढ़ होने के बाद फासिज्म में बदल रही है। वीरेंद्र यादव नब्बे के दिनों में प्रतिपक्ष के रूप में सक्रिय थे; आज वह ज्यादा ताकत, तेवर के साथ खड़े हैं। बल्कि उनके सतत विपक्षी में अधिक गहराई और मुखरता दोनों का समावेश हुआ है। वह फासिज्म, सांप्रदायिकता एवं भारतीय यथार्थ के अन्य संकटों के मूल में वर्णव्यवस्था की जकड़बंदी को सबसे बड़ी समस्या के रूप में देखते हैं; इसीलिए एक समय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े वीरेंद्र जी इन दिनों मार्क्स और आंबेडकर, लाल और नीले दोनों की एकता के प्रबल आकांक्षी हैं। हम भी चाहते हैं कि ऐसी एकता मजबूती से आकार ले जिससे देश को बदलने तथा बेहतर बनाने की जिम्मेदारी पूरी हो। यूँ हम इसलिए भी उक्त गठबंधन के ख्वाहिशमंद हैं ताकि मेरे अग्रज, मित्र, एक सतत एंग्री मैन वीरेंद्र यादव को खुशी और सुकून हासिल हो सके।


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