डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

आलोचना

प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल सा : शमशेर बहादुर सिंह
सुबोध शुक्ल


जर्मनी के विख्यात संगीतकार एवं पियानोवादक 'लुडविग बीथोवन' ने अपनी 'नवीं सिंफनी' के सार्वजनिक लोकार्पण के दौरान, 'संगीत का स्वरूप कैसा होता है ?' ऐसा पूछे जाने पर, एक टिप्पणी की थी जिसकी उल्लेखनीयता शमशेर की कविता-प्रकृति और कवि-भूमिका को समझने में सहायक होगी। उसने कहा कि अच्छा संगीत जीवन और मौत के दोआब पर अपने को खड़ा करके दोनों से अपने लिए मुक्ति माँगता है। बात आई गई हो गई। लेकिन आज शमशेर को व्यवस्थित तरीके से पढ़ने के बाद, कविता के संबंध में जुड़ी इस टिप्पणी के मायने, ज्यादा प्रबुद्ध स्तर पर खुलते हैं। अधिकांश कलाविदों, दार्शनिकों और यहाँ तक कि क्रांतिकारियों ने भी जीवन और मौत को लेकर जैसी रोमानी और रंगमंचीय व्याख्याएँ की हैं, उन्हें पढ़-सुनकर जीवन और मौत अवस्थाएँ कम, अनुष्ठान ज्यादा लगने लगे हैं। यह बात झुठलाई नहीं जा सकती कि विवेकशीलता के आग्रहों और बौद्धिक व्यामोहों ने, अधिक दमनकारी ओर प्रताड़ना से भरी परंपराओं का निर्माण किया है। ये परंपराएँ एक प्रशिक्षित सीमा तक सरलता, समझदारी, अंतरंगता, नैसर्गिकता, भोलेपन, आस्था और सौंदर्य के खिलाफ प्रायोजित मुलम्मों और अकादमीय व्याकरणों से संस्कारित वितंडों के मानक खड़ा करती हैं। हिंदी कविता की प्रकृति और उसका विकास, अपने १५० साल के कार्यकाल में जीवित है, स्वस्थ है और प्रभावशाली है। विश्व की तमाम कविता-भाषाओं की तुलना में यदि देखा जाए तो हिंदी, नवीनतम और सर्वाधिक आधुनिक भाषाओं में से एक है। यहाँ यह कहने में किसी प्रकार का संकोच नहीं कि भौतिक धरातल पर हिंदी कविता की सीमित और किशोरवय इतिहास-यात्रा में, उसकी वैचारिक और मानसिक उपलब्धि का अनुदान, क्षेत्रीय और जातीय स्तर पर प्रौढ़ हुआ है, स्वायत्त हुआ है और परिवेश के सांस्कृतिक जीवनानुभवों को लेकर सावधान बना है। सौ वर्ष के व्यवस्थित कविता के प्रवाह में, यदि उसके किसी सबल पक्ष को रेखांकित करने की बात होगी तो वह होगा उसका जीवन के समयान्तर संबंध-सूत्रों का साक्षात्कार और यदि एक दुर्बल पहलू को उद्घाटित करने की बात होगी तो वह यह कि उन सभी संबंध-सूत्रों की एक संवेदनशील और बहुदिशात्मक भाव-बोध से असंपृक्तता।

यह एक सघन विसंगति है कि दोनों ही पक्षों के बीच बुनियादी अवकाश, सामंजस्य का है। इन सभी असंतुलनों और टूटे-बिखरे मानदंडों के बीच, शमशेर ऐसे कवि हैं जो नैतिक सौंदर्य बोध और सांस्कृतिक यथार्थ बोध के अंतराल से, कविता को जन्म देते हैं। ये दोनों ध्रुव इसलिए अधिक उल्लेखनीय हैं क्योंकि कविता से जुड़ा हुआ जो अतीतगर्भी परंपरावादी कठमुल्लापन है, वह उसे सस्ते समझौतों के रचनाधर्मी अंध-विश्वासों की ओर ले जाता है और उसका दूसरा हिस्सा जो अपने को परिस्थितिगत विकासधर्मी तर्कशीलता से बाँधता है; वह अव्यावहारिक नतीजों के मामूलीकरण की पैदाइश सा हो गया है। 'अंतराल' शमशेर की कविता के लिए एक वृहत्तर अनुभव को पालने-पोसने जैसा है। संघर्ष के स्तर पर अनाथ हो जाने की ग्लानि, अकेलेपन की कातरता, समग्रता की चेतना से छिटक कर दूर कर लिए जाने की हताशा; शमशेर की काव्य-चेतना को जहाँ अधिक स्मृतिधर्मी और नॉस्टैल्जिक बनाती है, वहीं स्वप्न की तरह धुँधली, अस्पष्ट और यथार्थभासी आत्मचेतना की मौजूदगी, उसे विरोध और प्रतिरोध के सरलीकृत अनुशासनों की शक्ति सत्ता से दूरकर, सामंजस्य और स्वीकृति के मूलबोध से जोड़ती है। इस तरह से शमशेर की कविता किसी महाकाव्य से कम नहीं है। किसी क्षण की इतिहास होती लिप्सा से लेकर, शताब्दियों के ज्वरग्रस्त अहम्बोध तक का विश्व उनकी कविता में जीवंत है। यह एक लंबे देशकाल में फैले-पसरे मनुष्य और उसके ऐतिहासिक निर्वासन को, कला की चुनौतियों के साथ देखने-सुनने का साहस पैदा करती कविताएँ है। यहाँ यह बात भी समझ लेनी जरूरी है कि कला के समयधर्मी और समयातीत सृजन-क्षण, किसी भी चेष्टा में विभाजित नहीं किए जा सकते। ऊपर जिस 'अंतराल' के बिंदु की बात कही गई थी, वह इसी अविभाजित बोध का धरातल है। इसीलिए शमशेर की काव्य-यात्रा में अतिक्रमण, किसी किस्म की आस्वाद-प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। हाँ, यह भी उतना ही सच है कि अरक्षित और अनाश्वस्त परंपरा बोध को, जीवन की भीतरी नियति और मर्यादाओं के साथ मिलाकर देखने का उनका अपना तरीका है। यह तरीका या कहें युक्ति ही, उनके समूचे रचना-धर्म को, स्मृति और स्वप्न के सम्मोहनों से निष्कासित कर देती है और उन पर जमी इतिहास की पुरातात्त्विक गर्द को झाड़-पोंछकर, वर्तमान अर्थों में लोकेट कर देती है। यहाँ स्मृति और स्वप्न से निष्कासन, तकनीकी रूप से या सकारात्मक स्तर पर संभव नहीं है। स्वप्न किसी मत, वाद, झूठे-सच्चे आदर्श और किसी यूटोपिया के निर्णय से अपने अस्तित्व को प्रकट करता है, ऐसा नहीं है। यह मात्र यह समझाने का प्रयास है कि शमशेर की कविताओं में इनकी अनिवार्यता, इतिहास और परंपरा के आपसी संवाद को संभव बना सकने वाले उत्प्रेरक की तरह है। अकेले और निर्वासित युग बोध के प्रसंग में उनकी कविता एक पनाहगाह बनती है - अकादमीय मानदंडों के अमूर्त घेरावों के लिए, मजाक बनती जाती शांति और निर्जनता के लिए और घटनाओं के बीच से गुजरती हुई वैयक्तिक आकांक्षाओं और सामूहिक एहसासों के लिए। क्योंकि ये सभी तत्व, स्वीकृति और निषेध के अवकाश में, एक विशृंखलित और बिखरी हुई अर्थवत्ता को पैठाने की कोशिश करते हैं। शमशेर में ऐसे ही हस्तक्षेपों का द्वंद्व सर्वत्र है जैसे कि ये कविता - 'सूर्य मेरी अस्थियों के मौन में डूबा । / गुट्ठल जड़ें / प्रस्तरों के सघन पंजर में / मुड़ गईं। / व्योम में फैले हुए महराव के विस्तार / स्तूप औ' मीनार नभ को थामने के लिए / उठते गए। / विकटतम थे अति विकटतम / विगत के सोपान पर्वत शृंग।' (सूर्यास्त)।

अत्यंत करीब होकर समय की गति, ठहराव, ऊहापेाह, आत्मसंघर्ष और विवशता को महसूस कर सकने के कारण ही वे तात्कालिता की सीमा और उसकी सैद्धांतिक उपस्थिति को जीवन तथा प्राण के सामयिक बना पाते है। शमशेर के यहाँ जीवन किसी कथ्यात्मक एपीसोड का सुखांत नहीं है। वह एक सतत मृत्यु की, कविता की संभावना में तलाश है। मृत्यु अगर वर्टिकल ढाँचे के रूप में देखी जाय तो शमशेर की कविता का फॅार्म है। इसलिए उनकी कविता में फॉर्म, तकनीकी और शिल्पगत मसला नहीं है। आधुनिक हिंदी कविता का शायद ही ऐसा कोई कवि रहा है जो सूने और मरघट से दिखते यथार्थ बोध को, अप्रत्याशित विश्वासों और आस्थामूलक संवेदनाशीलता के सिलसिले मे देखने को यत्न तो करे ही उसे निभाए भी। किंतु इस निर्वहन का विरोधाभास यह है कि इतिहास के बीच से गुजरता हुआ कवि-विवेक, विश्वासों और संवेदना को सत्ता-शक्ति की दुविधाजनक हठधर्मिता से गठबंधित कराने का बोझिल और अधूरा प्रयास करने लगता है जिससे ऐतिहासिक कालक्रम में न चाहते हुए भी उनकी भूमिका, एक 'प्रिमिटिव' की तरह हो जाती है। बंदी बना लिए गए मूल्य, उपेक्षा-अभिशाप झेल रहीं जीवन-दृष्टियाँ और कुहासे की बदहवासी में ठेल दिए गए अस्तित्व - ये सभी जो कि विरासत से मिली जीवन-व्यवस्थाएँ थी : आधुनिकता के बहिष्कृत यूटोपिया बना दिए गए। शमशेर चुनावधर्मी नहीं हैं। अपने अंदरूनी के प्रति उनकी सजगता, उनकी कविता को इच्छा-अनिच्छा के ध्रुवों में नही बाँटती। कविता के लिए वे कारणधर्मी भी नही हैं। प्रथमतः वे एक औसत जिंदगी को जीते मनुष्य है। अतिरेक और संपूर्ण के विरुद्ध वे क्रमशः अपेक्षित और रिक्तता के संवाहक है। यही वजह है कि शमशेर की कविता, विस्मृत वर्तमान और विलुप्त परिवेश के बीच के सिरे से खुलती है। ये कविताएँ इसीलिए इकहरे और सरलीकृत आवाजों के सहारे नहीं सुनी जा सकती क्योंकि इनसे बातचीत के लिए, प्रतिध्वनित होते विश्व-बोध की पहचान जरूरी है। ये सभी कविताएँ प्रतिपल बनती बिगड़ती हैं। ये दो दृश्य देखें - 'धूप कोठरी के आईने में खड़ी / हँस रही है / पारदर्शी धूप के पर्दे / मुसकराते / मौन आँगन में / मोम सा पीला बहुत कोमल नभ / एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को / बहुत नन्हा फूल / उड़ गई / आज बचपन का / उदास माँ का मुख / याद आता है' (धूप

कोठरी के आईने में खड़ी)। 'कत्थई गुलाब / दबाए हुए हैं / नर्म नर्म / केसरिया साँवलापन मानो / शाम की / अंगूरी रेशम की झलक, / कोमल / कोहरिल / बिजलियाँ-सी / लहराए हुए हैं' (कत्थई गुलाब)।

उनका प्रत्येक पाठ और दुहराव, मानवीय संदर्भों में सदियों की जिजीविषा और आदिम कच्चेपन को रह रह कर पुनजीर्वित करता है। इस पुर्नजीवन को सभ्यताओं को सरलीकरण के मुहावरों और सच्चाई के तर्को को छिपाने वाले किसी उपकरण की तरह देखना वैसा ही है जैसा यह मानना कि कविता शब्दों का तराशा गया रूप है। पर शमशेर की कविता के पाठ की ये बुनियादी उलझन भी है। बीतते हुए वक्त का इतिहास और उपलब्ध होते इतिहास का वक्त, उनके यहाँ प्रत्येक क्षण की संघर्षशील प्रतिबद्धता का खतरा लेकर उपस्थित होता है। खतरा इसलिए क्योंकि प्रतिबद्धता सामयिक वृत्तांतों और परंपराबद्ध आग्रहों का सामूहिक निष्कर्ष होती है। अपनी अंतःप्रक्रिया के दौरान, प्रतिबद्धता जितनी सामयिक अनुगूँजों को पैदा करती है उतनी ही वह उन बाहरी रचना-प्रक्रियों के स्थापत्य के प्रति भी सजग रहती है जिन्होंने रचनाकार के वृहत्तर अनुभवों और बहुआयामी चुनौतियों को परिपक्व बनाने में सहयोग दिया था। शमशेर की कविताओं में इन बहुआयामी चुनौतियों के गहरे और समय सापेक्षिक आग्रह हैं। यही कारण है कि उनकी कविता एकरैखिक व्यवस्थाओं या वर्गविहीन प्रभावों को उदासीन और तटस्थ भी बनाती है। यहाँ यह ध्यान दिलाना आवश्यक होगा कि उदासीनता अवसाद नहीं है और न ही शमशेर की कविता के विशेष संदर्भों में उसका अर्थ, निरपेक्षता है। उदासीनता शमशेर की कविताओं में संस्कार की तरह उपस्थित है। एक आश्वस्त करती प्रश्नाकुल आस्था की तरह। शमशेर के कविता संसार में यह आस्था, इतिहास के दुःस्वप्नों के बीच, मानवीय जीवनी शक्ति की अप्रतिहत भूमिका में दिखाई देती है। इसी कलासंदर्भित वैयक्तिकता और अनुभूतिमय आस्वाद के सहारे शमशेर संसार-संस्कृति के उन ढाँचों केा कविता की लय बनाकर प्रस्तुत करते हैं जेा आधुनिकता के स्तब्ध और विजड़ित आपातकाल में अस्पृश्य हैं, शोषित हैं और शिकार हैं। ये ढाँचे या कहें सरोकार वे ही है जो हमारी दैनिक संसार के यथार्थ और फैंटसी को अनुभव, अभिव्यक्ति और ऐंद्रिक संदर्भों में बनाते, बिगाड़ते या बदलते है। यह कविता की अंदरूनी कंडीशनिंग है जो उसे आयातित और प्रायोजित भावभूमियों के कामचलाऊ प्रयोगों से सुरक्षित रखती है। इसलिए अपने संवेदनों और प्रत्ययों में, वे अधिक निष्कवच और वध्य हैं। और यही सांस्कृतिक मांसलता, उनकी कविता को अधिक रक्तधर्मी, द्वंद्व की ऊष्मा में अधिक पगी और रोमानी स्तर पर अधिक सच्ची और भोग्य बनाती है। वह विज्ञापित अभिलेखों, संदेहों और विश्वासघातों के दकियानूसी और कायर संसार से जूझती कविता है। शमशेर की रचना-प्रक्रिया की अक्षुण्णता उस अंतर्विरोध में भी स्थित है जो निरंतर स्थानांतरित जीवन और मुकम्मल हो चुकी मृत्यु के, आपसी अंतर्द्वंद्व की अनिवार्यता से उपजी है। कवि के लेखे, अतीत और वर्तमान की उपलब्ध आकारबद्धता इस बात की द्योतक है कि परंपरा से प्राप्त प्रयोगधर्मिता के अंतर्संयोजन कैसे हैं। यह कविता का बोध और उसकी सजगता दोनों है।

शमशेर की कविता में संसार एक प्रश्न की तरह मौजूद है जिसका उत्तर कविता की अंतमुर्खी स्थानीयता में मिलते है। यह स्थानीयता शमशेर की कविता को समझने का दूसरा पड़ाव है। किसी कविता में पैठी जमी स्थानीयता का आयतन, कविता के आकस्मिक को पहचान लेने के क्रम में चिन्हित होता है। इसकेा आँकने या परखने का यही निर्णायक बिंदु है। आकस्मिकता का व्यापार, कविता के गठन को जितना मथेगा उसकी स्थानिकता उतनी ही स्पष्ट और सीमांकित होती जाती है। शमशेर की कविता में इस स्थानिकता की एक अलग पहचान है। ऐसा नहीं है कि सांसारिक उपस्थिति के दबाव उनकी कविता पर नहीं है पर प्रतिरोध के आलोचकीय संस्कार, उनकी अपनी ही कविता के वस्तुगत आत्मालाप को, स्वायत्त करने की क्षमता रखते हैं इसमें कोई संदेह नहीं। यह वस्तुगत आत्मालाप, कविता बनाने की प्रक्रिया का सबसे निजी और भावुक पहलू है; शमशेर की कविता में। ये आत्मालाप ही हैं जो संवाद से लेकर विवाद तक और बतकही से लेकर बड़बोलेपन तक के कविजनित अंतरंग कलह के, प्रति उत्पाद हैं। किंतु ये किसी फिनिश्ड उत्पाद की तरह हल भी होते हैं ये जरूरी नहीं। ये सारे निर्माण, शमशेर की कविता के मनःजनित क्षितिज हैं। या कहें कोशिकाएँ हैं। रचना में छिपे एकांत और सूनेपन को ये क्षितिज, एक वृत्त की तरह या घेराव के रूप में उपलब्ध होते हैं। यह ध्यान रहे कि जैसी प्रक्रिया रचना के अंतजर्गत में काम कर रही है वही रचना की सतह पर भी चल रही होती है। अंतर मात्र इतनी ही होता है कि सतह का रेखांकन, कविता के भीतरी द्वंद्वों के निपटारे के बाद ही किया जा सकता है और इस आयोजन का जोखिम यह है कि अंदरूनी तनाव से उत्पादित चरित्र, कभी कभी सतह के अस्तित्व को निगल जाता है और कविता अपनी ही बनाई गई पारदर्शिता में आक्रामक हो जाती है और उसे अपने गर्भ तक पहुँचने के लिए स्वयं को आंदोलित करना पड़ता है - 'सींग और नाखून / लोहे के बख्तर कंधों पर / सीने में सूराख हड्डी का। / आँखों में घास-काई की नमी। / एक मुर्दा हाथ / पाँव पर टिका / उल्टी कलम थामे। / तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।' (सींग और नाखून)।

यहाँ विलक्षणता यह है कि कविता में प्रतिध्वनि की जिस अंतर्भूमिका को, परंपरा से एक बुनियादी जरूरत के रूप में देखा जाता रहा है, वह शमशेर की कविता की बुनियादी मजबूरी बनकर सामने आती है। इस मजबूरी के लिए वे कविता के रैशनल आग्रहों और अवधारणात्मक अपरिहार्यताओं के संगठन की पैमाइश करते हैं। अभिव्यक्ति की सारी कश्मकशों के साथ, वे असंभव से दिखने वाले बहिरंग को रचना के विश्वास से नियंत्रित करते हैं। यह प्रक्रिया शंका और सहजता को अनिवार्य जद्देाजहद तक पहुँचाने की प्रक्रिया है।

'बहिरंग' उनकी कविताओं का विन्यास समझने का अगला संकेतक है। अंतराल और स्थानीयता के बाद 'बहिरंग', रचना की चुनौती है। शमशेर में यह सरल रेखा सा है। ये रेखाएँ इतिहास, चेतना और स्मृति के स्पर्श से, ताजी चमकदार और जीवंत होती हैं। पल-पल रूपांतरित तनाव और संघर्ष की दुनिया का रचनाधर्मी आक्रोश और उससे पैदा उदासी, इन एकरैखिक और एकविमीय रेखाओं के कारण ही हैं। इसलिए आयामों की बहुलता शमशेर की कविता में नदारद है। उनकी सभी कविताएँ वन-डाइमेन्शनल हैं। अतिरंजना, स्वप्न और यथार्थ के सार्वकालिक अहसासों को उनकी कविता, बगैर किसी कुण्ठा और ठंडेपन के समसामयिक बनाती हैं; सापेक्षिकता के असंतुष्ट से दीखते मूल्यविरोध के रहते हुए भी। इस ऐसी संरचना पर घटित होने वाला बहिरंग शमशेर की रचना धर्मिता को उदार अस्तिकता में बदलता है - मुक्ति की, सहिष्णुता की, विद्रोह की और साथ ही साथ इंद्रियानुभवों की भी। जीवन-बोध के पेचीदा से लगने वाले ये इंद्रियानुभव इन्हीं अस्तिकताओं के सहारे अपने को स्वयं सिद्ध करते है और ऐंद्रिकता की अनवरत सन्निद्धि में, कविता की भीतरी जिंदगी में इस्तेमाल होने लगते हैं। और इसके बाद स्पष्टतर होते ऐंद्रिक स्थापत्य में प्रेम, आत्मीयता, संबंधों की ऊष्मा, ममता और मोह इत्यादि एक साहसिक से जादू में खुलते चले जाते हैं। एक अनुपस्थित से दिखाई देते अस्तित्व की एकाएक उपलब्ध सदाशयता। यह कोई चीखती-चिल्लाती या अपनी गवाही में मुद्दई की तरह खड़ी, अपने ही हिस्सों से लड़ती-झगड़ती कविता नहीं है। वह सब्र के ईमानदार स्पर्श की कविताएँ है। बनावटी से प्रतीत होते आकर्षण से हीन और दार्शनिक फतवेबाजी से दूर उनकी कविता, किसी संशय से अर्जित आत्मरति की आवाज नहीं है। वह एक ज्यादा विस्तीर्ण और अधिक गहरे भाषाई जगह की रचना या खोज भी है। एकदिशात्म, बेलोच और ठुकरा दिए जाने के स्नायविक और कलाधर्मी भयों के विरुद्ध, कविता की शमशेरी शर्त इतनी ही है कि वह (कविता) जीवन को संशय के वैचारिक स्तर पर स्वीकार करे और जीवंतता के अप्रासंगिक होते हुए जा रहे विश्वास का पुनर्पाठ करे। घोषणाओं के क्षुब्ध करते बर्तावों से परहेज करती ये कविताएँ एक नकारे जा रहे समय में, सरल-सुगम अभिप्रेतों की संभावना तराशती हैं। अंतर्विरोधों, दुस्साहसों और शंकाओं के व्यापक बाजारवाद के खिलाफ उनकी बुनावट, सार्थक निश्चयीकरण और सोद्देश्य प्रासंगिकताओं को उनकी परिभाषा में ही नहीं अपितु व्यवहार में भी जीवित रखती हैं - 'किस-किस के हाथ दबाऊँ मैं... / किस-किस की उँगलियाँ चंचल चटकाऊँ मैं / किस-किस की उँगलियों का दर्द / हौले-हौले / सहलाऊँ मैं / हर इक इस पहले हाथ से / हर बार मेरा ही हाथ सबके आगे आ जाता' (देश के एकाकी हाथ)।

शमशेर ऐसे कवि रहे हैं जिनकी काव्यगत मौजदूगी में परंपरा और वर्तमान का कुटुंब, कुछ-कुछ सांस्कृतिक मूल्य जैसा रहा है। ये दोनों अपने बहुआयाम और यहाँ तक कि अपने बहुरूप में भी एक दूसरे को परावर्तित करते हैं। शमशेर की कविताओं का इन कालधर्मी जवाबदेहियों पर उत्तराधिकार सा है। यह कम साहस और शौर्य का काम नही है कि वक्तव्य की कचहरी बनती कविता के समय में उनका रचना कर्म इश्तिहार, जुलूस और नारों की भाषा से अलग जड़ों की खोज को आकार देती दस्तावेजी भाषा है। यही कारण है कि उनकी कविता में राग के चटक रंगों का अभाव है। यह भी सही है कि विरक्ति का अहसास भी उनकी कविता को समय और मृत्यु के शब्दाडंबर की भाषा में नहीं पिरोता। राग के चटक रंगो का अभाव; आशय यह नहीं है कि शमशेर में मानवीय आसक्ति के रंग फीके हैं या नीरस हैं। कहने का अर्थ मात्र इतना ही लिया जाय कि वे स्वाभाविक हैं। सादे हैं। किंतु शक्तिशाली हैं। कल्पना के मनगढ़ंत अक्ष को झकझोरती यह भाषा कविता के फंडामेण्टल तयशुदा फतवों से जूझती-टकराती भाषा है, इस निश्चित प्रतिपादन के साथ कि वह टकराव की भाषा नहीं है। हाँ, वह एक मेहनतकश भाषा जरूर है। वैचारिक उत्तेजना और खिलंदड़पने से भरे आनंदबोध के समानांतर, संसार में चलती और स्वानुभूतियों के आस्वाद का प्रतिसंसार गढ़ती कविता है। शमशेर के साथ-साथ हिंदी कविता का भी यह उपार्जन है। अल्जीरियाई स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित उनकी एक छोटी सी कविता है जिसे कि उपयुर्क्त प्रसंग में देखा जा सकता है - 'लगी हो आग जंगल में कहीं जैसे, / हमारे दिल सुलगते हैं। / हमारी शाम की बातें / लिए होती हैं अक्सर जलजले महशर के; और जब / भूख लगती है हमें तब इंकलाब आता है। /...हमारे अपने नेता भूल जाते हैं हमें जब, / भूल जाता है जमाना भी उन्हें, हम भूल जाते हैं उन्हें खुद। / और तब / इन्क़लाब आता है उनके दौर को गुम करने' (हमारे दिल सुलगते हैं)।

काव्य-प्रक्रिया में यंत्रणा को पुनर्परिभाषित करती ये रचनाएँ, उद्वेगहीन और सहृदय द्वंद्वों को बिना किसी पूर्वनियेाजित शास्त्रीय ढकोसले के देखने का आदर्श परोसती हैं। यह एक दिलचस्प कंट्रास्ट है। सहज, ऐंद्रिक और आसक्त कविता की यही संकल्पना है कि वह बौद्धिक रूप से अत्यंत मिलनसार, अनुभवगत प्रक्रिया से संयत और तौर तरीकों से अकुंठ होती है। सपाटधर्मी प्रतिमानों का निषेध करती कविता, जीवन और दुनियादारी की वेदना-प्रताड़ना को बखूबी समझती है। इसलिए भोग और मुक्ति के मिथकीय विभाजन को शमशेर की कविता सृजन-प्रक्रिया के अंतर्जात मनोवेगों में अविष्कृत करती है। ये मिथकीय विभाजन, काव्यजनित अंतर्व्यवस्था में नकार और प्रतिकार के आकस्मिक अंतरालों को ढीला करता है और सुस्त छोड़ जाता है। अंतजर्नित मनोवेग, मात्र इन विभाजनों के साथ, कविता की आंतरिक और निजी सर्वांगीणता की मूर्त, क्रमवार और जैविक व्याख्या करते है। ये गड़बड़ियाँ कविता को जनोन्मुख संवेदनाओं और स्वचालित मान्यताओं के प्रतिवादी तेवरों से जोड़कर, उन्हें विस्मृत करने का प्रयत्न करती हैं। जनोन्मुखता संभवतः किसी भी देशकाल की कविता का निकष हो सकती है। किंतु शमशेर की कविता में किसी भी पूर्व निर्मित आग्रह के लिए आकर्षण, मात्र उस आग्रह के जीवन को अतिक्रमित करने और परंपरा के सजीव तथा आंदोलित संदर्भों में है। कोरी और अंधी सहानुभूति के रस्मी या रिवाजी संकोच से किनारा करती ये कविताएँ, जीवन के चुनाव और जीवन के अधूरेपन के बीच किसी औपचारिक रोमान का कथानक नही गढ़तीं। वे कविताएँ ऊसर होती आत्मीयता और लड़खड़ाती जीवंतता को, कविता के क्षण और समय के क्षण के अंतर्भुक्त आख्यानों में लोकेट करने की कविताएँ हैं। इनके साथ आक्रामक नही हुआ जा सकता है। ये अपने अतिक्रांत जीवन-विवेक में 'समाधान' की तरह प्रस्तुत न हेाकर समस्या को निर्द्वंद्व स्थिति में चुनौती देतीं; एक तरह से अपनी अंतर्वेदना की ही मुखरता हैं। आभिजात्य के दर्प, एकाकीपन तथा खोखलेपन से टकराती ये सभी रचनाएँ, कलाधर्मिता के साथ लिपटा दी गई झूठी त्रासदियों का एंटी डोज तैयार करती हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे नए किस्म की विपरीतधर्मी मुद्राओं का रसायन तैयार कर रही हैं। वह सिर्फ इतना करती हैं कि प्रसंग और घटना के निरकुंश एवं अराजक से लगते बारीक कठमुल्लेपन को, एक लीनियर सीधेपन की सादगी से छीलती हैं तब तक जब तक उनके कुंठित संस्कार का रंग न उतर जाय। जैसे कि सूर्योदय का एक दृश्य है जोकि इमेज के परंपरा से चले आ रहे नॉस्टेल्जिक अभ्यास का सीधा बहिष्कार है - 'प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे / भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है) / बहुत काली सिल जरा से लाल केसर से / कि जैसे धुल गई हो / स्लेट पर या लाल खड़िया चाक / मल दी हो किसी ने / नील जल में या किसी की / गौर झिलमिल देह / जैसे हिल रही हो। / और... / जादू टूटता है इस उषा का अब / सूर्योदय हो रहा है।' (उषा)

वस्तुधर्मी सादगी, व्यक्तिनिष्ठ सरलता से अधिक जटिल और धोखेबाज होती है। जटिल इस मायने में, क्येांकि वह इंद्रियबोध की वह अवस्था है जहाँ भय और गर्व के तत्व अधिक घनीभूत और सिद्धांतवादी होते है। विरोधाभास का ऐसा दुरूह विलयन अन्यत्र दुर्लभ है और धोखेबाज इसलिए क्येांकि यह पहचान और अस्तित्व के दो टूक संप्रेषण को आत्म-प्रदर्शन के रेटरिक में ढकेल देती है। इन दोनों परस्पर टकराती वस्तुस्थितियों और रचना शिल्प के शास्त्रों से जूझती-बौखलाती शमशेर की कविताएँ, प्रकृति और मनुष्य के लगातार समानांतर चल रही वांछनाओं को, एक दूसरे के लिए संभव और निर्भर बनाती हैं।

शमशेर की कविता से जुडा हुआ एक मत यह भी है कि ये अधिकांश कविताएँ, चित्रकला के नियमों का कविता में उपयोग हैं। इस सिलसिले में यह देखना अधिक तर्कसंगत होगा कि शमशेर की ये कविताएँ आयामों के अंतर्निहित यथार्थ को रंग और बिंबों के स्तर पर कितना खोलती हैं। जीवन और उसकी अनवरत लय को समेटती-सहेजती उनकी कविता, शब्दों के अनिवार्य और मजबूर से दिखते रचना-विश्व के बरक्स, तरल भावावेगों के ठोस रचना-शिल्प की निर्मिति करती हैं। नकली समझदारी और झूठी वैचारिक प्रथा को ढोती भाषा के विरुद्ध अनुभवों, प्रतीतियों और प्राकृतिक संरचना के गहरे, अटपटे और बेबूझ से चरित्र केा छविबद्ध कर सकने वाली एक दृश्य-भाषा उनकी कविताओं में प्रयुक्त हुई है। एक निर्वासित भूगोल के संभावित तापमान को सुनिश्चित करती हुई यह भाषा है। रचनात्मक भूमिकाओं के भावजगत को तलाशती ये भाषा; प्रतीकधर्मी रूपविधान और सांकेतिक काव्यशास्त्र के व्याकरणधर्मी पर्यावरण को चुनौती देती है इसमें कोई संदेह नहीं किंतु परीक्षण का विषय यह है कि क्या यह भाषा अवकाश की अभिव्यक्ति को चित्रकला की ही तरह, संकेतधर्मी या कहें श्लेषधर्मी बनाती है। पिकासो से यह पूछे जाने पर कि चित्र वस्तु का संकेत है या अवयव का तो उसने कहा कि यह मनुष्य और उसकी मनुष्यता के विरोधाभास का संकेत है। चित्र संसार को आदर नहीं देते है। वे उसको हड़काते हैं। धमकाते है और विलगाव के उदास सामाजिक स्तर पर, हर बार उसे अभियुक्त करते हैं। चित्रों के शास्त्र पर यदि इस विश्लेषण को प्रतिमान मान लिया जाय तो शमशेर की कविता, चेतना के ऐसे ही संकटापन्न संशयों के अंतर्द्वंद्व की कविताएँ हैं। आदिम चिंताओं और अधुनातन तनावों के शून्य को, एक घरेलू और आत्मिक से भाषा संसार में पिरोती यह रचनाधर्मिता, कविता के संसार का अभीष्ट सा बनती जाती है। हाँ, किंतु चित्रों के बिंब-संदर्भों और सरल सी लगती प्रतिक्रिया के विरुद्ध, शमशेर की कविताएँ शब्द-लाघव और शिल्प-चातुर्य से निर्वैयक्तिक भी नहीं हैं।

चित्र अपने सृजन में बेगाना होता है। लेकिन ये कविताएँ दृश्य और छवियों की अंतहीन ललक में अपनी सामाजिक व्याप्ति और वर्तमान में उपस्थिति की जवाबदेही को नकारती नहीं है। अस्थिर और प्रश्नाकुल अपेक्षाओं के विविध संकल्प के कामचलाऊ दौर में, ये कविताएँ एक टिकाऊ और होशपूर्ण सौंदर्यबोध का अंश है। मूल्येां का सजग और सावधान वरण ऐसी कविता की पहचान है। वर्तमान व्यवस्था का वैषम्य, मनोराज्यों से स्थापित इच्छा-बिंब, कविता में, सामाजिक मुक्ति की राह में रोड़े बने अनिश्चयजन्य अविवेक और अवसाद से भरे परिहासों के लिए इंटैनेशनल-मोटिव बनते हैं। ये प्रयोजन-उत्तेजक (इंटैनेशनल-मोटिव), जीवन-दर्शन और व्यक्ति नियति को मताग्रही और फैनेटिक जनपक्षधरताओं से विलगाने का यत्न करता है। कविता में अर्थ और वक्तव्य के औपचारिक साधन को शमशेर, दो समानधर्मी दिशाओं की तरह नियत करते हैं जिससे कि एक बहुस्तरीय और तीव्रगतिक आत्मस्थ अनुशासन, सामान्य से लगती तात्कालिकता और सुविधाजनक सर्जनात्मकता का प्रतिरोध करने लगता है। प्रयोगों के इकहरे वातावरण के बीच शमशेर की ये कविताएँ जीवन के आंतरिक और व्यावसायिक उदग्रताओं की तस्वीर भी है - औचक भावुकता के सम्मोहनकारी अनुकरणों के बाजारी हो-हल्ले के विरुद्ध। किंतु इसका आशय यह नहीं है कि शमशेर की कविताएँ प्रेम के तिरस्कार की कविताएँ हैं। यदि आकलन के समर्थ और संपृक्त दृष्टिकोण से इसे समझा जाए तो निस्संदेह शमशेर प्रेम और भावना को उसकी मूल संवेदना के उत्तरोत्तर विकसित हेाती ऐंद्रिकता के धरातल पर सृजित करते हैं। हठधर्मिता अथवा पक्षधरता के उत्पीड़ित अंतर्व्यक्तित्व से मुक्त यह सृजनधर्मिता, सहानुभूति, करुणा और न्याय के बौद्धिक-चिंतन से सिक्त जीवन-तत्व को संयोजित करती है। मामूली से लगने वाले प्रसंग, निश्छल से दीखते संस्कार, अनायास मौजूद हो जाती खामोशी, कच्चे से संवेदन और अवकाश की भाव स्थितियों को गढ़ते दर्शन- शमशेर के कवि परिस्थिति के लिए उपलब्ध आत्यांतिक साक्ष्य की तरह हैं। अभ्यस्त भंगिमाओं का विपरीतधर्मी आस्वाद रचती शमशेर की कविता, संस्कृतियों के रचनाधर्मी साझे की कविता है। निर्देशों और नियमों के बाहरी विश्व को वे निजी दुनिया के अनुपस्थित और अदृश्य आदमी के विन्यस्त और संभावित आजमाइशों के साथ जोड़ते हैं, अनुभव करते हैं। अनिवार्य और अपरिहार्य होती जाती मूल्यहीनता और अतिवादी प्रदर्शनकामिता के आत्ममुग्ध तेवरों के बीच यह कविता सजायाफ्ता आदर्शों और जमानत पर बख्शी गई रचनागर्भी निष्ठाओं के पक्ष में खड़ी योजना है - 'हृदय का परिवार काँपा अकस्मात्। / भावनाओं में हुआ भू-डोल सा। / पूछता है मौन का एकांत हाथ / वक्ष छू, यह प्रश्न कैसा गोल-सा : / प्रात-रव है दूर जो 'हरि-बोल!'- सा, / पार, सपना है - कि धारा है - कि रात / कुहा में कुछ सर झुकाए, साथ-साथ, / जा रहा परछाइयों का गोल-सा / प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल सा; / सत्य की है एक बोली, एक बात।' (अंतिम विनिमय)

स्वयं को संसार की प्रत्याशा में बेधती और संसार को अपनी सृजनक्षमता की आश्वस्ति में पुनर्जीवित करती ये कविताएँ अपनी आस्था, आशय और संस्कार में जीवनासक्ति की सशक्ततम और पवित्रतम कविताएँ हैं। निःसंदेह शमशेर की ये कविताएँ फीकी पड़ती जाती कल्पना और यंत्रवत होती जाती आधुनिकता के बीच सौभाग्य की उपस्थिति हैं।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में सुबोध शुक्ल की रचनाएँ



अनुवाद