डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कहानी

दहशत
मुनीर अहमद बादीनी

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


बस चलने लगी थी मगर फिर धीरे धीरे रुक गई। मैंने खिड़की से देखा एक मुसाफ़िर दूर से लंबे डग भरता बस की तरफ़ आ रहा था। शायद ड्राइवर ने उसे देखा तो उसके लिए बस रोक दी हो। ऊपर आसमान पर काली घटाएँ छा गई थीं और बस के रवाना होने से कुछ लम्हे पहले बूँदें भी पड़नी शुरू हो गई थीं। मुझे ख़ौफ़ ने आ घेरा। अगर ये बारिश इस तरह बरसती रही तो अपनी मंज़िल पर पहुँचना हमारे लिए नामुमकिन होगा। क्योंकि मैं वादी के गाँव और इसके रास्तों से अच्छी तरह वाक़िफ़ था। कितने नदी नालों से होता हुआ एक कच्चा रास्ता साँप की तरह बल खाता हौवा वादी तक जाता था। बरसात के मौसम में ये रास्ता कभी कभी हफ़्तों बंद रहता था। लेकिन फिर मुझे ख़्याल आया कि ख़ुदा वसीलासाज़ है। ये बारिश जो ख़ारान में ज़ोर ज़ोर से बरस रही है, शायद वहाँ वादी में हो ही ना रही हो, कौन कह सकता है?

जनवरी के आख़िरी दिन थे। सर्दी ज़ोरों पर थी। मुसाफ़िरों ने गर्म पोशाकें पहनी हुई थीं। बस की हालत भी ऐसी थी कि इसकी एक भी खिड़की या दरवाज़ा इस हालत में नहीं था जहाँ से सर्द हवा अंदर ना आती हो।

वो शख़्स जिसके लिए बस रुकी थी अब बस में दाख़िल होकर अपने जिस्म को कंबल में अच्छी तरह लपेटता मुख़्तलिफ़ सीटों के सरों पर हाथ रखता हुआ आकर मेरे बाएँ तरफ़ बैठ गया। बस की यही एक सीट ख़ाली थी जिस पर मैं अकेले बैठा था। इस के वहाँ बैठने से मुझे ख़ुशी हुई क्योंकि सफ़र में कोई बातचीत करने वाला मिल गया था।

वह एक जवान आदमी था और डीलडौल से सेहतमंद और ताक़तवर दिखाई दे रहा था। उसके तमाम बाल दाढ़ी समेत काले थे। अलबत्ता उस की दाढ़ी कुछ लंबी थीं शायद काफ़ी मुद्दत से उसको बनाने का उसे मौक़ा ना मिला हो। उसके कंबल और कलाई में बँधी घड़ी से लग रहा था कि वह एक खाते पीते घराने से ताल्लुक़ रखता है। लेकिन अपनी ख़ूओ बूओ से वो ख़ामोश और मुनकसिर-उल-मिज़ाज दिखाई देता था जैसे बैठते वक़्त इसने मुझसे पूछा था आपको कोई तकलीफ़ तो नहीं हो रही है? इसका ये कहना मुझे इसलिए खटका कि कहीं मैं ख़ुद इस शरीफ़ आदमी के लिए बाइस-ए-तकलीफ़ तो नहीं हूँ!

जब बस रवाना हुई तो उसने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाल कर सुलगा लिया। अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए सर झुका कर नीचे देखने लगा। शायद बारिश का नज़ारा उसे पसंद नहीं था। दूसरों से बात करना भी। इसलिए मैंने उससे छेड़-छाड़ करना मुनासिब नहीं समझा।

जब बस तीन चार घंटे सफ़र के बाद मेन रोड को छोड़कर वादी के कच्चे रास्ते पर उतर गई तो एक एक करके बस के बहुत से मुसाफ़िर रास्ते में आने वाले देहातों में उतरते गए। अब बस में क़स्बे के इक्का-दुक्का मुसाफ़िर रह गए थे। उसको भी शायद वहाँ तक जाना था जिसका उसने अभी तक अलिफ़ ज़िहार नहीं किया था। हो सकता है वो आगे किसी गाँव में उतर जाए क्योंकि वादी अभी काफ़ी फ़ासले पर थी, बहुत से ऐसे मुसाफ़िर थे जिन्हें पहले उतरना था शायद उनमें वो भी हो। मैं देख रहा था वो कहाँ उतरता है?

मेरे लिए हैरानगी की बात यह थी कि उसके पास कोई सामान ना था सिवाय एक कंबल के। कोई बैग ना बिस्तर ना कोई गठरी वग़ैरा। वो ख़ाली हाथ था। डीलडौल और अपनी हरकतों से इस इलाक़े का नहीं लग रहा था, क्योंकि महिकमा तालीम में अपनी मुलाज़मत के इन छ महीनों में वादी के तमाम-तर लोगों से वाक़िफ़ था। वो सब ग़रीब और निचले तबक़े के लोग थे। ये शख़्स जो मेरे साथ वाली सीट पर बैठा था उनसे अलग था, लेकिन वो वादी में क्यों जा रहा था?

फिर मुझे ख़्याल आया कि शायद वो वहाँ नौकरी के सिलसिले में जा रहा हो, लेकिन वादी में सरकारी नौकरी बस एक ही थी, वे थे मिडिल स्कूल के दो टीचर जिनमें एक वादी का मुक़ामी बाशिंदा था जो प्राइमरी सैक्शन में पढ़ाता था और दूसरा सरकारी मुलाज़िम ख़ुद मैं था उसी स्कूल का हेडमास्टर। कलात से मेरी पोस्टिंग छ महीना पहले उस वक़्त यहाँ हुई थी जब क़स्बे के प्राइमरी स्कूल को अपग्रेड करके मिडिल स्कूल बनाया गया था। तीन चार मज़ीद पोस्टें अभी तक ख़ाली थीं जिनके लिए कोई भी वादी में आने के लिए तैयार ना था। ख़ुद मेरे लिए भी वादी एक क़ैदख़ाना थी लेकिन बहालत-ए-मजबूरी में अपने शब-ओ-रोज़ गुज़ार रहा था। इस लिए मैं समझ नहीं सका ये आदमी वादी में क्यों जा रहा है?

बूँदें अब भी बरस रही थीं लेकिन इतमीनान की बात ये थी कि वे हल्की थीं। हल्की बारिश से पहाड़ों का पानी देर से आता था इस लिए रास्ता बंद होने का ख़तरा कम था।

एक दो मुसाफ़िरों के उतरने के बाद अब बस की आख़िरी मंज़िल क़स्बा था जहाँ के सिर्फ तीन मुसाफ़िर रह गए थे मै, वह शख़्स, और एक दुकानदार, जो मेरी जान पहचान वाला था। वो गाँव की इकलौते दुकान का मालिक था!

सूरज ग़ुरोब हो रहा था लेकिन बादलों के घेरे में था। पहाड़ियाँ ख़त्म हो रही थीं। अचानक जब हमारी बस एक उतराई में उतरी तो एक फैला हुआ मैदान छोटी पहाड़ियों और ख़ाली ज़मीन समेत हमारे सामने था जो बारिश के ग़ुबार में तारीक दिखाई दे रहा था हम जान नहीं सकते थे कि हम कहाँ आ गए हैं?

बस दनदनाती हुई मैदान को पार करके पहाड़ियों और रेत पर मुश्तमिल वादी के क़स्बे में पहुँच गई। स्कूल के सामने अपने अड्डे पर रुक गई। दुकानदार ने हमसे हाथ मिलाया और अपनी राह ली। स्कूल का चपरासी मेरा सामान समेटने लगा। वो शख़्स जिसने चुप शाह का रोज़ा रखा हुआ था मेरे साथ ही उतर गया और मैं हैरत में पड़ गया कि वो कहाँ जाएगा। किसका मेहमान है और यहाँ क्यों आया है?

जब मैं स्कूल की चार-दीवारी में दाख़िल हुआ तो वह भी मेरे पीछे पीछे आया। स्कूल के तीन कमरे थे। दो कमरों में क्लास लगती थी। तीसरा मेरे तसर्रुफ़ में था। टीचरों की रिहायश के लिए अलग कोई इंतिज़ाम नहीं था। मैं इसी कमरे में गुज़ारा कर रहा था जो दरअसल स्कूल का स्टोर था। अब जो वो नामालूम आदमी मेरा मेहमान था तो उसे भी इसी कमरे में जगह देनी थी। स्कूल के चपरासी अर्ज़ मुहम्मद ने मेरे सामान और राशन कमरे के एक कोने में रखे। आतिशदान में आग सुलगाई। लम्हा-ब-लम्हा कुहरे और सर्दी का ज़ोर बढ़ रहा था। आग कमरे के माहौल को ख़ुशगवार बनाए हुए थी। अर्ज़ मुहम्मद ने लालटेन जला के अँगीठी के ऊपर रख दी। अजनबी, मेरा मेहमान ख़ामोशी से आग के पास बैठा सिगरेट पी रहा था। उसकी नज़रें मुसलसल आग के शोलों पे लगी हुई थीं। अर्ज़ मुहम्मद कभी उसे देखता और कभी मुझे। शायद वो मुझसे जानना चाहता था कि वो कौन है, और कहाँ से आ रहा है। लेकिन फिर वो काम-काज में मसरूफ़ हो गया। कोई मौक़ा नहीं था कि मैं मेहमान के बारे में उसे बताता।

मैंने अर्ज़ मुहम्मद से कहा कि वो मेहमान के लिए मुर्गी का इंतिज़ाम करे और चावल भी पकाए ताकि हम उसे एक अच्छा खाना खिला सकें।

जब मैं बाहर के कामों से निपट कर आया तो आतिशदान के सामने बैठ गया जहाँ अर्ज़ मुहम्मद देगची चढ़ाए हुए था और हम दोनों उसे देख रहे थे। देगची के एक कोने में अर्ज़ मुहम्मद केतली भी रखे हुए था। वादी के इलाक़ों पर अब रात का ख़ेमा बादलों के साथ पूरी तरह तना हुआ था और मूसलाधार बारिश अब भी जारी थी।

चाय पीने के बाद अर्ज़ मुहम्मद ने देगची उतारी और रोटी पकाने के लिए गाँव चला गया। स्कूल की इमारत गाँव से ज़रा फ़ासले पर थी। जहाँ अर्ज़ मुहम्मद का घर था। वो रोटियाँ घर में पकवाता था। जब अर्ज़ मुहम्मद चला गया तो लपकती आग की रोशनी में उसके चेहरे की तरफ़ देखते हुए मैंने पूछा : तुम कौन हो? कहाँ जा रहे हो?

वो पहली बार मुझसे नज़रें मिलाने के बाद मुस्कराकर कहने लगा आप ये क्यों पूछते हैं, छोड़िए इन बातों को, बस मैं तुम्हारा मेहमान हूँ लेकिन ये सब कुछ अजीब सा लगता है, मैंने कहा। मैं चाहता हूँ कि सब कुछ वाज़िह हो, रास्ते में भी तुम चुप रहे और मैंने भी पूछताछ करना मुनासिब नहीं समझा। तुम एक मुसाफ़िर थे और हम दोनों को अपनी अपनी राह लग जाना था। इसलिए सवाल जवाब का सवाल पैदा नहीं होना था जब मुझे मालूम हुआ तुम्हें अपनी मंज़िल की ख़बर नहीं है और तुम मेरे साथ ही चले आए तो साफ़ बात है कि मेरे ज़हन में मुख़्तलिफ़ किस्म के सवाल तो उठने ही हैं? मैंने कम होती आग की तपिश को बढ़ाने के लिए कुछ कोयले आतिशदान में रखते हुए अपनी बात जारी रखी। वो ख़ामोशी से सुनता रहा। तौर तरीक़ों से पता चलता है कि तुम इस इलाक़े से नहीं हो, मेरे सवालों के तसल्लीबख्श जवाब तुम्हारे पास हैं? मैं ये सब कुछ इसलिए जानना चाहता हूँ ताकि मैं सुकून की नींद सो सकूँ। अगर मैं जान नहीं पाया तुम कौन हो, कहाँ जा रहे हो तो मैं ठीक तरह सो नहीं पाऊँगा।

इन सब चीज़ों को जानने की ज़रूरत भी क्या है? उसने एक और सिगरेट जलाया और कहने लगा। लेकिन मेरे लिए ये इतमीनानबख्श बात है कि मैं तुम्हारे यहाँ ठहरा हुआ हूँ। क्योंकि आप एक टीचर हैं और मैं टीचरों को क़दर की निगाह से देखता हूँ। एक टीचर का मेहमान होना मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा एज़ाज़ है!

मैं तुम्हें जानना चाहता हूँ, मैंने अपना पहला सवाल दुहराया।

क्या करोगे जान कर। आदमी जितना जानता है, उतना ही अपने आपको ख़राब करता है। परेशान करता है। मुझे अच्छा नहीं लगता कि मैं अपने बारे में बात करूँ। बेहतर यही है कि आप ख़ुद समझ लें कि मैं कौन हूँ। अब मैं तुम्हारा मेहमान हूँ तो आने वाले दिनों में तुम को सब पता चल जाएगा। उसने सिगरेट ख़त्म करने के बाद आतिशदान में फेंक दिया। वह ग़ौर से मेरी तरफ़ देखने लगा जैसे वो जवाब का मुंतज़िर हो। और मुझे उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक नज़र आई जिसमें ना सिर्फ शराफ़त और सादगी थी बल्कि उसमें फ़िक्र और ताक़्क़ुल भी बदरजा-ए-उत्तम मौजूद था। उसकी शख़्सियत ने मुझे बहुत मुतासर किया। लेकिन मुझे उसका बग़ैर किसी सबब के घर से निकलना और किसी अनजान आदमी का मेहमान बनना बहुत अजीब लग रहा था। मैं इस राज़ की तह तक पहुँचने का ख़ाहाँ था। मुझे यक़ीन नहीं आ रहा था कि एक शख़्स अपने घर से निकले और उसे इसका पता भी ना हो कि वो कहाँ जा रहा है। अगर ये सब एक इसरार नहीं था तो क्या था फिर वो भी एक ऐसे शख़्स से ये सब कुछ सरज़द होना जो मेरे नज़दीक अक़ल और शऊर का एक पैकर नज़र आ रहा था, ये सब कुछ मेरी फ़िक्र और सोच से बालातर था। मैं इस राज़ से हर हाल में पर्दा उठाना चाहता था। मेहमान भी उतना अच्छा था कि बार-बार उसको तंग भी नहीं करना चाहता था। फिर वो क्या सोचेगा कि मैं उससे इतना क्यों पूछताछ कर रहा हूँ। इसलिए मैंने सोचा, वो मेरे यहाँ ही ठहरा हुआ है। कल सुबह या शाम किसी वक़्त इस राज़ से पर्दा उठ ही जाएगा।

अर्ज़ मुहम्मद ने खाना लगा दिया तो मैंने मेहमान के साथ खाना खाया। उसने मेरा शुक्रिया अदा किया और मैंने उससे कहा कि ये कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि अपने मेहमानों की ख़िदमत करना हमारी रिवायत में शामिल है।

मैंने उसके लिए बिस्तर लगा या। वो अपने बिस्तर पर लेट गया। जब कि मैं कमरे के दूसरे कोने पर अपने बिस्तर पर दराज़ हो गया। बारिश बरस रही थी। दूर गाँव में कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी और अँधेरे कमरे में मेहमान के बारे में सोचते हुए ना जाने कब मेरी आँख लग गई।

सुबह मेहमान उठा तो मैंने उसके साथ नाश्ता किया और स्कूल जाने की तैयारी करने लगा। बारिश रुक चुकी थी। बादल दूर दूर बिखर गए थे कहीं कहीं नीला आसमान नज़र आ रहा था। कभी कभी उन्हीं हल्के होते बादलों में सूरज झाँकता था और दूर गाँव के उदास घर, फ़सीलें और झोंपड़ियाँ यूँ नज़रों में वाज़िह हो जातीं जैसे कोई ताक़तवर कैमरे में इनका क्लोज़ अप शॉट ले! स्कूल के बच्चे बहती नाक और चमकते चेहरों के साथ स्कूल में दाख़िल हो रहे थे। मैंने मेहमान से इजाज़त ली और दोपहर तक बच्चों के साथ मशग़ूल रहा। दोपहर का खाना हमने एक साथ खाया। बादल एक-बार फिर छा गए थे लेकिन इस के साथ गोरीच (मौसम-ए-सुरमा में चलने वाली सर्द हवा) का एक झोंका आया और सारे बादलों को रुई की तरह बिखेर कर पहाड़ों के उस तरफ़ ले गया। और चारों तरफ़ सिर्फ और सिर्फ गोरीच का राज हो गया। जिसका चलना ऐसे था जैसे कोई उस्तरे से बदन के गोश्त छीले। हम दोनों शाम तक आतिशदान के सामने बैठे रहे। फिर हम बाहर निकले। स्कूल के सामने टीलों का एक ला-मुख़्ततम सिलसिला था। जो हद नज़र तक फैला हुआ था। इन्ही टीलों पर रेत आकर जम जाती जिससे वो रेतों के नीचे दब जाते। सूरज की रोशनी में रात की बारिश से भीगी रेत अब खुश्क हो रही थी जिनके नीचे दबे हुए टीले चमक रहे थे। मेहमान अपनी शाल ओढ़े, मुसलसल सिगरेट पी रहा था। जब हम स्कूल के सामने एक बड़े टीले पर पहुँचे तो उसने अपने सिगरेट को पाँव के नीचे मसलते हुए मेरी जानिब देखा और शाइस्तगी से कहने लगा : आप कल से मुसलसल पूछ रहे हैं कि मैं कौन हो, कहाँ जा रहा हूँ? आइए मैं आप पर सब वाज़िह करता हूँ? ये मुनासिब भी नहीं है कि मैं आपके यहाँ ठहरा हूँ। आपका खाना खा रहा हूँ, और आपको पता भी ना हो कि मैं कौन हूँ? दरअसल कुछ अर्से से मुझे एहसास सता रहा था कि मैं किसी ऐसी जगह जाऊँ जहाँ मुझे ज़िंदगी का कोई ख़ौफ़ कोई दहशत दामन-गीर ना हो।

बचपन से एक दहशत मेरे साथ लगी हुई है। आप उसे ख़ौफ़ नहीं कह सकते, ये ख़ौफ़ से कुछ ज़्यादा ही ताक़तवर शै है। ख़ौफ़ में, आप एक बैरूनी इल्लत से ख़तरा महसूस करते हैं। बाज़-औक़ात तो आप बैरूनी इल्लतों को ग़लत मानी देते हैं और ख़ौफ़ तुम्हारे दिल में जा गज़ीं होता है। लेकिन यहाँ मुआमला कुछ अलग है। यहाँ आप ज़िंदगी से एसा ख़ौफ़ महसूस करते हैं। जैसे ये आपको खा रही हो। तुम्हें निगल रही हो। हड्डियों और गोश्त में छेद कर डाल रही हो। ये एक निहायत ही अजीब एहसास है। जब एक-बार आदमी उस के शिकंजे में फँस जाए तो वो, पहले जैसा नहीं रह सकता। इसके लिए दूसरे तमाम एहसासात ही सच हो जाते हैं। सिवाय इसी एक दहशत के एहसास के। पता नहीं मुझसे क्या गुनाह सरज़द हुआ है कि ज़िंदगी की दहशत ने मुझे शिकंजे में कस लिया है। शायद मेरा ख़मीर कुछ इस तरह का है कि मैं ज़िंदगी को एक अलग नुक्ता-ए-निगाह से देखता हूँ। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग हस्सास ज़रूर होते हैं। मगर अपनी अना को ख़राब नहीं करते कि वो ज़िंदगी को एक दहशत समझें। वो ख़ुद को हस्सास ज़ाहिर करते हैं लेकिन असल में होते अना-परस्त हैं जबकि ज़िंदगी की दहशत से दो-चार होने के बाद आप अलग राह लग जाते हैं जिसमें कोई अना-परस्ती नहीं होती। ज़िंदगी तुमको एक ख़ौफ़ में मुब्तला करती है, और तुम मजबूर हो उसकी हर चीज़ को अलग ढंग से देखने लगते हो। इसका मतलब एक अना-परस्त का हस्सास होना नहीं है। बल्कि इसमें ज़िंदगी के मानी पोशीदा हैं। मेरे मुताबिक़ अगर कोई ज़िंदगी की दहशत से वाक़िफ़ है तो वो ख़ुद ज़िंदगी से वाक़िफ़ है। अगर वो उसके बारे में नहीं जानता तो वो कुछ भी नहीं जानता। लेकिन ये समझ लो कि हस्सास होना, ख़ौफ़ में मुब्तला होना नहीं है। इसका मतलब ये है कि तुम ज़िंदगी को इस तरह क़बूल नहीं करते हो जिस तरह दूसरे लोग क़बूल करते हैं। बल्कि तुम इससे बुलंद होने की कोशिश करते हो। और इसकी दहशत का सामना करने के बाद तुम समझ सकते हो कि दरअसल ज़िंदगी क्या है। शायद तुम्हें मालूम नहीं हम किस क़दर ग़लत चीज़ों में ज़िंदगी बर्बाद करते हैं? आप एक एक चीज़ का नाम लें मैं आपको बता दूँगा। हमवतन से, लोगों से, क़ौम से मुहब्बत को, अपने क़बीले के जोश और जज़्बे को, और दूसरे लोगों से मेल-मुलाक़ात को किस क़दर ग़लत मानी पहनाते हैं। जबकि हम इस मुआमले में बिलकुल कोरे और नासमझ होते हैं। सिर्फ ज़िंदगी की दहशत को समझने के बाद ही हमें एहसास हो सकता है कि वतन क्या है? क़ौम, क़बीला क्या है? इलम क्या और अमल क्या है? फ़िलहाल मुख़्तलिफ़ लोगों की दहशत हमें मजबूर कर रही है कि फलाँ काम करोगे तो तुम्हें फलाँ आसूदगी मिलेगी। सियासतदान हमारे ख़ारिज का और मुल्ला हमारे बातिन का इस्तिहसाल इसी तरह से करता है। सियासतदान और मुल्ला दोनों हमें ये मौक़ा ही नहीं देना चाहते हैं कि हम ज़िंदगी की दहशत का सामना करें और अपनी ख़ुदी का सामना करके अपना मुक़ाम बना सकें। अपना मालिक आप बनें। मेरे भाई, इनसान कहने से कोई अपनी ज़िंदगी का मालिक नहीं बन सकता जब तक वो ज़िंदगी की दहशत से दो-चार ना हुआ हो और इसको समझ ना सका हो। जब तुम उसको जान गए तो फिर एक क़ौम एक आदमी और एक सोसाइटी बन जाते हो, लेकिन वो लोग जो ज़िंदगी की इस दहशत से नावाक़िफ़ हैं जिसमें किसी किस्म की कोई पेचीदगी नहीं है। तो वो बस ज़िंदा हैं और ज़िंदगी उनके लिए एक वसीअ मैदान की तरह फैली हुई है जो ख़त्म होने में नहीं आती। इनकी ज़िंदगी हमेशा इस तरह गुज़रती है जो हर किस्म की आसूदगी से ख़ाली होती है और उनकी इसी मुफ़लिसी और बदहाली पर लोग अपनी सियासत और मलाईयत को चमकाते हैं। और वो लोग कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते कि वो ज़िंदगी की दहशत को जान लें और अपनी ज़िंदगी तब्दील करें। मुझे बहुत ख़ुशी है कि तुम एक टीचर हो, तुम उनको सिखा दो कि ज़िंदगी की दहशत का मतलब क्या है। इसका मतलब अपने आपको जानना है। बाक़ी सारे नज़रिए, फ़लसफ़े सब फ़िक्री धागे हैं जिन्हें तुम ख़ुद बाँधते हो और ख़ुद ही तोड़ देते हो, सिर्फ़ ज़िंदगी की दहशत का एहसास लाज़िमी है। ये तमाम फ़लसफ़ों से बुलंदतर है। वहाँ एक फ़र्द खड़ा होकर अपने ख़ुदा से सवाल-ओ-जवाब कर सकता है जिसके बाद सारे फ़िक्री सिस्टम बेकार हो जाते हैं। बस यही एक दहशत-ज़दा इनसान जान सकता है कि इसके, सोसाइटी, क़ौम क़बीले का मतलब क्या है। तुम इसी दहशत के मालिक-ओ-मुख़तार हो और तुम इसको जान लो। और मैं इस दौर उफ़्तादा इलाक़े में इसलिए आया हूँ कि मैं समझ सकूँ कि इनसान ज़िंदगी की इस दहशत से बुलंद कैसे हो सकता है। फिर उसके बाद ज़िंदगी उसके लिए दोस्ती और मुहब्बत के ख़ूबसूरत दरवाज़े वा करती है। और वह कीना-ओ-नफ़रत और जंग-ओ-जदल से दामन छुड़ाने लगती है। क्योंकि ये तमाम जज़्बे दहशत के एहसास के दुश्मन हैं ये तुम्हें पस्ती में धकेल देते हैं। जबकि दहशत का एहसास तुम्हें बुलंद दर्जे पर फ़ाइज़ करता है। अभी तक तुम शख़्सियात की तारीफ़ से थकते नहीं हो। अभी तक तुम ज़िंदगी की ठोस हक़ीक़त के नशे में इस क़दर बदमस्त हो कि तुम्हारे लिए ज़िंदगी एक गुरीज़, एक क़ाचाक़ के सिवा कुछ भी नहीं। उस के लिए तुम सबके सामने झुकते हो। सबका आदाब बजा लाते हो। अभी तक तुम्हारी सोच तुमसे झूट बोलती है कि सिर्फ ख़ुदा ने तुम्हें ज़मीन पर पैदा किया है। वहीं से तुम्हारे सारे फ़ैसले होते हैं। तुम चाहे कितनी भी शिद्दत से अपना मुक़द्दमा बयान करो। वो कमज़ोर होगा। क्योंकि तुम ज़िंदगी की दहशत से अनजान हो... अभी तक तुम हैवानों की तरह ज़िंदा हो। तुमने सर उठाना नहीं सीखा है। तुम इन रिवायतों का पासदार हो जो नीस्त-ओ-नाबूद हो रही हैं। मिट रही हैं।

अब अगर तुम्हें ज़िंदा रहना है तो फिर ज़िंदगी की दहशत से दो-चार भी होना होगा क्योंकि ये वो एहसास है जिसमें सारी क़ौम, क़बीला, और वतन एक हैं। जिसका भी सामना उस दहशत से हुआ है। वो समझ सकता है कि इन सारी चीज़ों का मतलब क्या है। ज़िंदगी ये नहीं जो तुम्हारी नज़रों के सामने है। ज़िंदगी की एक और तसवीर भी है जिसका अक्स मेरी और आपकी नज़रों से पोशीदा है। इसका एहसास तुमको उस वक़्त हो जाएगा जब तुम ज़िंदगी की दहशत का सामना करोगे। और ख़ुदा करे कि तुम्हारा सामना उस दहशत से हो। ताकि तुम्हें पता चल सके कि इन बोसीदा रिवायतों से हट कर भी कोई ऐसी चीज़ है जिसमें बर्दाश्त, इलम, दोस्ती, शऊर, और अक़ल की बादशाही है। तुम इन चीज़ों से जितना दूर रहोगे उतनी ही ये दहशत परवान चढ़ेगी जो उनके सामने मज़बूती से इस्तादा है। फिर उसके बाद तुम अपने आपको जान पाओगे और दुनिया को समझ पाओगे। अभी तक तुम्हारा माज़ी इस एहसास से भागने, उसे खोने से इबारत है। तुम्हारे मसतबक़ल की तारीख़ उसी दहशत का सामना करने से सही हो सकती है वर्ना तुम इस तरह बेनाम-ओ-निशान हो जाओगे जैसे दूसरी कौमें हुई हैं!

सूरज बुलंद पहाड़ों के कोहानों के पीछे छुप रहा था और मैं हैरान हो रहा था कि मैं क्या सुन रहा हूँ। क्या मैं कोई ख़ाब देख रहा हूँ? ये आदमी वली, बुजुर्ग, या कोई सूफ़ी है या कोई भूत। और वो किस से मुख़ातब है? इसकी बातों में कितनी ताक़त है, कितना ज़ोर है कि मैं इनको समझ नहीं पा रहा हूँ मगर मैं इतना जानता हूँ ये तमाम बातें उसके दिल की गहराइयों से निकल रही हैं।

मैंने सूरज को ग़ुरूब होते देखा तो मेहमान को इशारा करना चाहा कि वो उठे ताकि हम घर जाएँ लेकिन मुझ पर उसका सह्र इस क़दर तारी था कि मैं ख़ुद में ये जुर्रत पा नहीं सका कि उसको इस तरह उठने का कह सकूँ। इसलिए मैं चाहता था कि उसके हाथों को बोसा देकर उससे कहूँ कि आप यहाँ से मत जाएँ। हमेशा के लिए मेरे मेहमान बन जाएँ। ताकि मैं आपकी बातें सुनता रहूँ, हमेशा, इसी तरह रवानी से! लेकिन उसने मुझे मौक़ा नहीं दिया, फिर कहने लगा कुछ दिन पहले मैंने इरादा किया था कि मैं वादी में जाऊँ। ये हमारे मालिक का एक दौर उफ़्तादा इलाक़ा है। कुछ दिन मैं वहाँ किसी का मेहमान बन जाऊँ। वहाँ मैं उन मासूम और नासमझ लोगों में रहूँ... जब उसने सिगरेट सुलगाया तो मैंने पूछा :

"दहशत, दहशतगर्दी तो नहीं है।"

वह मुस्कुराया। जिस तरह हम आजकल दहशतगर्दी के माहौल में हमेशा दहशतगर्दी के बारे में बात करते हैं, कहने लगा : दहशत का मतलब ये है कि ज़िंदगी एक ऐसा सफ़र है कि इसमें हर क़दम, हर लम्हे में एक हंगामा है। एक करब है। अगर कोई उस को नजरअंदाज़ करना चाहे तो वो नुक़्सान में है। अगर तुम उसका मुक़ाबला करोगे तो तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी हो जाएगी, इस पर किसी फ़लसफ़े का तसल्लुत होगा ना किसी नज़रिए की हुक्मरानी। तुम इन सबसे बुलंद सोचने लग जाओगे या बुलंद हो जाओगे। क्योंकि अज़मत सिर्फ़ दोस्ती और मुहब्बत, दूसरों का ख़्याल रखने, बर्दाश्त करने में पिनहाँ है। इनके इलावा कोई महान नहीं हो सकता ना ही किसी और चीज़ से बुलंदी का रुतबा पा सकता है। बाक़ी तमाम चीज़ें तुम्हें पस्ती की तरफ़ ले जाएँगी। बुलंदी की जानिब कोई रास्ता जाता है तो वो दहशत ही है। कुछ और तुम्हारी मंज़िल नहीं हो सकती। ये तुम्हारी कामयाबी का पहला सबक़ है। मैं ये नहीं कहता कि तुम दहशत को अपनी मंज़िल समझ लो बल्कि इस से बुलंदतर हो जाओ। अंग्रेज़ी में इस को Tragic Sense Of Life कहते हैं जो Terrorism से बिलकुल अलग चीज़ है। दहशत या Tragic Sense Of Life तुम्हें इसलिए आन घेरती है कि ज़िंदगी के कोई हतमी मानी मौजूद नहीं हैं। बल्कि ये एक कर्ब-ए-मुसलसल है। जिसका इलाज बस तुम्हारा अमल, किरदार, हरकत है। ज़िंदगी का मक़सद ही हरकत है। इसमें बर्दाश्त, मुहब्बत, ख़्याल रखना सब शामिल होता है। उनके बग़ैर तुम्हारी सब हरकतें दहशतगर्दी (Terroism) के ज़ुमरे में आती हैं। इसके लिए तुम्हारे हर फ़र्द को ये समझना पड़ेगा ताकि वह इस दर्जे तक पहुँच सके कि वहाँ वह ज़िंदगी की महानता प्राप्त कर सके।

लेकिन ये बहुत दुश्वार है मगर हतमी बात भी यही है, उसने कहा, नहीं तो तुम इसी दर्जे में रहोगे, जिस दर्जे में अभी हो तुम्हारा गुरीज़, तुम्हारा क़ाचाक़ होना, तुम्हारा इलम से बे-बहरा होना और दूसरों के सामने झुकना! ये सब तुम्हें पस्ती की तरफ़ ले जाते हैं। वो उठा और हम स्कूल की जानिब रवाना हुए। रात की ख़ामोशी, गाँव का सन्नाटा और उसकी बातें, मुझे ख़ुद से भी ख़ौफ़ महसूस हो रहा था। मैं ज़िंदगी में पहली बार ऐसी बे-सर-ओ-पा और उलझी हुई बातें सुन रहा था लेकिन मेहमान की बातों में किस क़दर असर था, या ख़ुदा। या ख़ुदा ये ज़िंदगी कैसे समझ में आए?

रात, हम दोनों बहुत देर तक बैठे रहे, लेकिन अब वो बहुत कम गुफ्तगू में हिस्सा ले रहा था। मैं उससे बहुत सी बातें पूछ रहा था। जिनके वो हूँ, हाँ में जवाब दे रहा था। जैसे उसे जो कुछ कहना था कह चुका। अब उसे कुछ भी कहना नहीं!, मेरा तजसुस बढ़ रहा था।

फिर हम लेट गए। मैं सोचता रहा। बहुत से सवालात मेरे ज़हन में कुलबुला रहे थे। मैंने सोचा कल में इससे कुछ और पूछ-ताछ करूँगा क्योंकि उस की बातों के बाद मेरे ज़हन में बहुत से सवाल उठे थे जिनके जवाब जानना मेरे लिए अज़हद ज़रूरी था।

सुबह जब मेरी आँख खुली, तो मेहमान नदारद। मैंने अर्ज़ मुहम्मद से पूछा उसको भी कुछ मालूम नहीं था। पता नहीं वो कहाँ चला गया? मैं आज के दिन तक मुंतज़िर हूँ कि वो लौट आए और मुझे मेरे सवालों के तसल्लीबख्श जवाब दे।


End Text   End Text    End Text