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कविता

टुच्चा आदमी
लीना मल्होत्रा राव


मेरी बिटिया ने कहा मम्मी आप खड़े हो मेरा फोन चार्जिंग पर डाल दो
पति भी अक्सर कहते हैं खड़ी हो एक गिलास पानी ही पिला दो
खड़ी हो जरा अखबार उठा लाओ
गोया कि खड़े होना कर्म करने का प्रस्थान बिंदु बन गया है

लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता
आप खड़े होने पर भी कर्म करने से विमुख हो सकते हैं

आप कह सकते हैं कि मैं खड़ा हूँ क्योंकि मैं सिर्फ खड़ा होना चाहता हूँ
मेरे खड़े होने का कोई प्रयोजन नहीं है

उदहारण के लिए
खड़े रहे कई लोग जब फर्खुन्दा को जलाया जा रहा था
उसे सबक सिखाया जा रहा था
एक धार्मिक पुस्तक को जलाने का
आसमान तक उठती थी उसकी चीखें
बाल पकड़ कर घसीट रहे थे उसके
उसे ठोकरें मार रहे थे नाईकी और चमड़े के नोक वाले जूतों से
उसकी देह पर तेल का कनस्तर खाली कर रहे थे
धर्म में अंधे निर्दयी मर्द
उसके जलते हुए अंग
उसकी बुझती हुई आँखें
मद्धम फिर दम तोड़ती चीखें
चमक उठे थे उन क्रूर लोगों के चेहरे

पर उससे भी कहीं अधिक लोग थे जो सिर्फ खड़े थे
फर्खुन्दा को जलते हुए देखते
अपने टुच्चेपन में तल्लीन खड़े रहे बहुत सारे लोग

जेबों में हाथ डाले खड़े रहे
अचंभित
पहली बार देखे दृश्य की अद्भुतता को भाँपते हुए
किसी रहस्य से पर्दा उठता हो ज्यों
स्तब्ध खड़े रहे खामोशी को ओढ़े
चकित बिना हरकत किए
चमत्कृत आल्हादित होने को दबाते हुए
अपलक देखते रहे
जैसे तमाशा लगा हो मृत्यु का
मेला देखने आए हो जैसे
खेल देखते हो खड़े हुए कठपुतली का
वैसे ही खड़े रहे हजारों हजारों लोग
जब फर्खुन्दा काबुल में जला दी गई !!!

सच कहना !
तुम्हारे भीतर भी रहता है उन हजारों जैसा कोई टुच्चा आदमी
जो खड़ा रहता है
तमाशा देखता
जबकि उसे हरकत करनी चाहिए ?

(यू ट्यूब पर फरखुंदा को जलाने का हृदयविदारक विडिओ देखने के बाद)


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