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कविता

16 दिसंबर 2012
लीना मल्होत्रा राव


तुम मेरा नाम जानना चाहते हो मेरा चेहरा देखना चाहते हो
यह जरूरी नहीं है दोस्त

क्योंकि मैं वह भय हूँ
जो हर लड़की पर रात के अँधेरे की तरह उतरता है
और जेब में रखी मिर्ची की पुड़िया की तरह दुबका रहता है
वह हर लड़की जिसके पाँवों के नीचे अकेली सड़क की धुकधुकी बढ़ जाती है
और दिल देह से निकल कर
दो फुट आगे दौड़ने लगता है
अँधेरे के खतरों पर कुत्ते की तरह भौंकते हुए

मैं वह हर लड़की हूँ जो आजकल
अपनी आँत के रौंदे जाने से भयभीत है

मैं
वेंटिलेटर की कृत्रिम साँसों के बीच बचा हुआ साहस हूँ

जिसे रामसिंह की सलाख रौंद नहीं पाई
चिकित्सकों के चाकू काट कर अलग नहीं कर पाए।
साहस हूँ जिसे इन्फेक्शन नहीं हुआ

मैं मर भी जाऊँ तो मुझे याद रखना
क्योंकि
मैं बीते जन्म में किया हुआ कोई वायदा नहीं हूँ
जिसकी गहराई सिर्फ सपनों में मापी जा सकती है
मैं वो स्वप्न हूँ
जो आँख खुलते ही टूट जाएगा

बेशक !
धुल पुँछ जाएँगे उसके दृश्य
फिर भी छोड़ जाएगा एक सुर आत्मा की खिड़की पर
जिसे तुम गुनगुनाते रहोगे
जो तुम्हारी खामोशी को तोड़ डालेगा

(निर्भया के बलात्कार के बाद)


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