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कविता

आदतें
लीना मल्होत्रा राव


आदतन
जब पुरुष गुट बनाकर खेलते हैं पत्ते

स्त्रियाँ धूप में फैला देती हैं पापड बड़ियाँ और अपनी सर्द हड्डियाँ
मंगल गीत गाते हुए
जमा कर लेती हैं धूप
अँधेरे में गुम आत्माओं के लिए
स्वेटर बुन लेती हैं
रजाइयाँ धुन लेती हैं
ठिठुरती संवेदनाओं के लिए

मर्द जब तनाव भगाने को सुलगाता है बीड़ी
भरता है चिलम

औरतें बन जाती हैं खेल के मैदान की गोदी
बच्चे धमाचौकड़ी लगा चुकते हैं जब
पुचकार कर उन्हें
होम वर्क करवा देती हैं
बाल सँवार देती हैं
चोटियाँ गूँथ देती हैं

आदमी ऊँघते हैं जब थक कर
स्त्रियाँ सम्हाल लेती हैं उनकी दुकानें
पुरुषों ने फेंकने को निकाली थी जो नकारा चीजें
बेच देती हैं वे उन अपने जैसी लगने वाली आत्मीय चीजों को
कुशलता से समझा देती हैं उनकी उपयोगिता ग्राहकों को

आदमी के घर लौटने से पहले
बुहार कर चमका देती हैं पृथ्वी
फूँक मार कर उड़ा देती हैं धूल दूर अंतरिक्ष में
ठिकाने लगा देती हैं बेतरतीबी से बिखरी चीजें
अँधेरों को कर देती हैं कोठरियों में बंद
परोस देती हैं गर्म खाना

थका माँदा पुरुष पटियाला की खुमारी में सो जाता है जब
बचे खुचे समय में सुलगते सपनों को भर देती हैं इस्त्री में
और पुरुषों की जिंदगी में बिछी सलवटों को
मुलायम चमकदार बना देती हैं...
सोते सोते
सुबह के लिए सपनों में सब्जी काटती रहती हैं जब उनकी उँगलियाँ
आँखें जुदा होकर देह से
समानांतर जीवन जी आती हैं
पृथ्वी जैसे लगने वाले किसी और ग्रह पर


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