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कविता

वह बहुत देर से सच की तरह कड़क बैठी रही
लीना मल्होत्रा राव


वह बहुत देर से सच की तरह कड़क बैठी रही
अंत मे टूट कर रो पड़ी
फिर
अंत के बाद भी उसने कुछ जवाब दिया
पर वह बदजुबान कहकर जूते से पीटने लगा

वह पिटते हुए भी रुलाई में भीगी अपनी बात कहती रही
वह अधिक खूँखार होता गया
चुप रहने को पीटता रहा
उसने उसके बाल पकड़ कर चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया
उससे माफी माँगने को कहने लगा
वह अपने आँसुओं और रुलाई के बीच बहती हुई अपनी आत्मा के जख्मों की चट्टानें पकड़े अड़ी रही
उसने मार मार कर
उसके मुँह से खून निकाल दिया
वह खून में भीगी आवाज में बोलती रही
तभी उसकी नजर सहमे हुए बच्चों पर जा पड़ी है
वह उससे उन गुनाहों की माफी माँगने लगी जो उसने किए नहीं
वह बच्चों को सांत्वना देने लगी
उसने उन्हें मुस्कुरा कर दिखाया और कहा कुछ नहीं हुआ
अब वह उन नीले निशानों के समंदर में अपने बच्चों सहित डूब मरेगी


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