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कहानी

प्रतीक्षा
एमोस ओज

अनुवाद - यादवेंद्र


तेल इलान बहुत प्राचीन गाँव था और चारों ओर से बाग-बगीचों से भरा हुआ था। पूरब की ओर की पहाड़ियों की ढलानें अंगूर से लदी पड़ी थीं और कहीं कहीं लाल खपरैल वाले घर ऐसे दिखाई पड़ते थे जैसे सैकड़ों साल पुराने बादाम के घने वृक्षों की कतारों ने उन्हें अपने पंजे में दबोच रखा हो।

यूँ तो खेती-बाड़ी पर लोगों का ध्यान कम होता जा रहा था पर अब भी कई परिवार ऐसे थे जो बाहर से आ कर मजदूरों के दम पर खेती कर रहे थे - आस-पास इन मजदूरों की जैसे-तैसे खड़ी कर दी गई झोपड़ियाँ नजर आने लगीं थीं। लोगों ने अपने खेत बटाई पर दे दिए और अब कोई छोटा-मोटा धंधा करने लगे। जैसे रात भर के लिए बिस्तर और खाने का जुगाड़ करने वाले सराय खोल लिए ...या आर्ट गैलरी खोल ली...। या आज वाली फैशन की बुटीक का काम करने लगे। बहुत सारे लोग काम की तलाश में दूर-दराज के इलाकों में चले गए।

यहाँ के मार्केटिंग कांप्लेक्स में दो रेस्तराँ, देशी शराब की एक दुकान और पालतू जानवरों का एक स्टोर भी था जिसे कुछ खास मछलियों के लिए जाना जाता था। एक आदमी ने एक वर्कशॉप खोल रखा है जहाँ नकली एंटीक फर्नीचर बनाते हैं। सप्ताहांत में यह तेल इलीन गाँव विदेशी सैलानियों से और मोल-तोल कर के सस्ता सामान खरीदने वालों की भीड़ से अँटा पड़ा होता - पर शुक्रवार की दोपहर सब कुछ एकदम बंद रहता। उस समय शायद ही कोई ऐसा होता जो खा पी कर झपकी न ले रहा हो ...पूरा-पूरा आराम।

बेनी एवनी तेल इलीन के जिला परिषद का प्रमुख था - लंबा, छरहरा किंतु झुके हुए कंधों वाला इनसान, जिसे तुड़े-मुड़े कपड़ों और नाप से बड़े लटकते हुए स्वेटरों से पहचाना जा सकता था। उसकी चाल अड़ियल टट्टू जैसी थी। उसको चलते हुए देख कर ऐसा लगता जैसे सामने से खूब तेज आँधी धकेल रही है और वह उसे चीर कर बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ रहा है।

खूबसूरत चेहरा मोहरा... ऊँची भौंहें... सुघड़ मुँह... परदे के पीछे तक बेधती गहरी भूरी आँखें लगता जैसे कह रही हों हाँ मैं तुम्हें जानता पहचानता हूँ। और हाँ, मुझे आपके बारे में बहुत सारी ऐसी बातें पता हैं जिन पर आप अब तक परदा डालते रहे हैं।

उसके बारे में सबसे खास बात यह थी कि वह सामने वाले को यह आभास दिए बिना कि उसकी बात को पूरी तरह से खारिज किए जा रहा है बड़ी कुशलता के साथ चाशनी लगी बातों के सहारे वह उसका दिल जीतने में कामयाब होता था।

फरवरी में शुक्रवार का एक दिन : दोपहर बाद एक बजे का समय। बेनी एवनी अपने दफ्तर में अकेला बैठा हुआ लोगों की चिट्ठियों के जवाब लिख रहा था। हालाँकि उसका आफिस शुक्रवार के दिन जल्दी ही बंद हो जाता है पर बेनी देर तक दफ्तर में बैठा हुआ एक चिट्ठी का जवाब दिया करता था। उसकी नजर से एक भी चिट्ठी चूक नहीं सकती थी। सारा काम निपटाने के बाद ही वह आफिस से निकलता। घर आ कर पहले लंच लेता फिर नहाता और दिन छिपने तक आराम करता। शुक्रवार को बेनी एवनी और उसकी पत्नी नावा एक शौकिया क्वायर ग्रुप में शामिल हो कर गाना गाते।

उस दिन वह अपना काम निपटाने ही वाला था कि दरवाजे पर किसी ने एक दस्तक दी। उसका आफिस उन दिनों मरम्मत के लिए अस्त-व्यस्त था। और अस्थायी तौर पर उसके एक डेस्क, दो कर्मियों और एक आलमारी के भरोसे काम जैसे तैसे चल रहा था।

दरवाजे पर हुई दस्तक ने बेनी एवनी का ध्यान खींचा। - 'अंदर आ जाओ।' यह कहते हुए उसने सामने रखे कागजों पर से निगाहें उठाईं।

एक अरब नौजवान दरवाजा खोल कर कमरे में दाखिल हुआ... एदेल, उसका नाम था। बेनी उसको पहले से जानता था... उसको उसने स्कूल में पढाया था और अब वह फ्रैंको के इस्टेट में माली का काम करता था।

'ओ एदेल... तुम यहाँ कैसे? ...बैठो' बेनी ने मुस्कुरा कर कहा। पर दुबला पतला ठिगना सा एदेल अपना चश्मा ऊपर नीचे करते हुए बेनी के मेज के इर्द-गिर्द घूमता रहा ...बड़े अदब और शर्म से उसने कहा : 'माफ करना साहब... कहीं मैंने आपके काम में खलल तो नहीं डाली? मैं जानता था कि आफिस बंद है, पर मेरा आना जरूरी था।'

'कोई बात नहीं... बैठो ...बोलो क्या बात है?'

एदेल बहुत हिचकिचाते हुए कुर्सी पर बैठ तो गया पर तना हुआ बदन बता रहा था कि उसकी पीठ कुर्सी से बहुत दूर है।

'बात यह है साहब आपकी बेगम मुझे अभी सड़क पर मिलीं ...उन्होंने एक कागज दिया मुझे आपको देने के लिए यह।'

बेनी एवनी ने हाथ बढ़ा कर उससे कागज का मुड़ा हुआ टुकड़ा थाम लिया; 'कहाँ मिली वो तुम्हें?'

'यहीं... मेमोरियल पार्क के पास।'

'किधर आ रही थी; चली किस दिशा में?'

'वे कहीं जा रही थी साहब... पार्क में बेंच पर बैठीं थीं।'

यह कह कर एवेल अचकचा कर कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। पूछा - 'वह इस सिलसिले में कुछ और मदद कर सकता है?'

बेनी एवनी मुस्कुराया और कंधे उचका कर बोला - 'और कुछ नहीं।'

एवेल शुक्रिया और आदाब कर के कमरे से निकल पड़ा।

बेनी एवनी ने हाथ में पकड़ा हुआ परचा खोल कर देखा - यह किचन में रखी हुई कापी में से फाड़ा हुआ एक पन्ना था। नावा की सुंदर लिखावट में उस पर चार शब्द लिखे थे - 'मेरी फिक्र मत करना।'

उन शब्दों को पढ़ कर बेनी एवनी चौंक गया। हमेशा ही वे लंच एक साथ बैठ कर खाते थे। दोपहर में वह स्कूल - प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती थी - से घर आ जाती और बेनी के आफिस से लौटने का इंतजार करती। उनकी शादी को सत्रह साल हो गए पर आपस में प्यार कम नहीं हुआ। हाँ, समय बीतने के साथ उनके दैनिक व्यवहार में दूसरे के लिए साधी गई विनम्रता के साथ मिले दमित अधैर्य के भाव मुखर होते गए। नावा को उसकी अफसरशाही वाला टालमटोल का रवैया एकदम नहीं सुहाता और न ही घर में आकर भी काम धाम की उधेड़बुन में उलझे रहना। हालाँकि वह बात-बात पर जरूरत से ज्यादा सहज और बेतकल्लुफ दिखाई देने की भरपूर कोशिश करता। नावा की घर के आँगन में पका कर बनाई गई कलात्मक मूर्तियों से वह उबने लगा था...। यहाँ तक कि नावा के कपड़ों में रच बस गई पकी हुई मिट्टी की महक से उसे अब उबकाई आने लगी थी।

बेनी एवनी ने घर का नंबर आठ-नौ बार डायल किया। पर जब किसी ने उठाया नहीं तो उसे तसल्ली हो गई कि नावा घर पर नहीं है। ताज्जुब हुआ कि उसके घर पहुँचने का इंतजार किए बगैर वह बाहर कैसे निकल गई। पर उससे भी ज्यादा जिस बात ने एवनी को अचरज में डाला वह यह कि एवेल की मार्फत पुर्जा भेजने की जरूरत कहाँ से आन पड़ी वह भी यह बगैर बताए कि वह वजा कहाँ रही है और कब तक वापस लौटेगी। सारी बात सोचने पर फिर से उसे इस पूरे घटनाक्रम में कुछ गड़बड़झाला लगा। वह और ज्यादा उद्विग्न होने लगा। वैसे इसमें बहुत परेशान होने की बात नहीं थी। पहले भी कई मौकों पर उसने या नावा ने लिविंग रूम के फूलदान के पीछे एक दूसरे के लिए पर्चे रखे थे।

बेनी एवनी ने आखिरी दो चिट्ठियाँ निबटाईं। एक एवा दवास को लिखी चिट्ठी थी पोस्ट ऑफिस के पुनर्निर्माण के बारे में, और दूसरी जिला परिषद के कोषाध्यक्ष को लिखी चिट्ठी जिसमें किसी कर्मचारी के पेंशन के बारे में चर्चा की गई थी। दोनों चिट्ठियाँ उसने आलमारी पर निर्धारित स्थान पर रखीं। खिड़कियाँ दरवाजे देखे कि ठीक से बंद तो हैं। अपना जैकेट पहना, बाहरी दरवाजा अच्छी तरह से बंद किया और आफिस से बाहर निकल आया।

पहले उसने मेमोरियल पार्क की तरफ चलने का फैसला किया। जिससे नावा बेंच पर बैठी मिल जाए तो वे दोनों साथ घर जाएँ। पर कुछ कदम चलने के पश्चात उसने लंच के लिए उलट कर अपने आफिस का रुख कर लिया। उसे लगा वह अपना कंप्यूटर शायद खुला छोड़ आया है, ऑफ करना भूल गया। बाथ रूम की लाईट भी शायद खुली रह गई। पर आफिस आने पर कंप्यूटर और लाईट दोनों सही ढंग से बंद मिले। उसने बाहरी दरवाजा एक बार फिर से बंद किया। उसके ताले को दुबारा चेक किया और फिर नावा को ढूँढ़ने पार्क की तरफ चल पड़ा।

मेमोरियल पार्क की बेंच पर नावा का नामो-निशान नहीं मिला। हाँ, एवेल वहाँ जरूर दिख गया। अपनी गोद में एक खुली किताब रखे वह एक बेंच पर अकेला बैठा हुआ था। उसकी निगाहें चलती-फिरती सड़क पर टिकी हुईं थी। और सर के ऊपर बैठी हुई चिड़िया के गानों से वह एकदम बेखबर था। पीछे से जा कर बेनी ने उसके कंधों पर हाथ रखा और कोमल आवाज में पूछा कि नोवा अब भी वहीं पार्क में है। एवेल ने बताया कि थोड़ी देर पहले तक तो वह यहीं पार्क में दिखाई दी थी पर अब वहाँ वह नहीं है।

'मैंने यह तो देख लिया कि इस वक्त वह यहाँ नहीं है' बेनी बोला पर मुझे लगा तुम्हें शायद पता हो कि वह किधर गई है।

'माफी चाहता हूँ साहब... मैंने देखा नहीं।' एवेल ने थोड़ा सकपकाते हुए कहा।

बेनी एवनी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। 'ठीक है... घबराओ नहीं एवन। इसमें तुम्हारी क्या खता है?'

पार्क से निकल कर कई सड़कों को पार करता हुआ आगे बढ़ा। वह शरीर को आगे की ओर झुका कर चल रहा था। जैसे किसी अदृश्य ताकत से लड़ता हुआ वह मुश्किल से आगे बढ़ रहा हो। रास्ते में जो भी मिलता - मुस्कुरा कर बेनी को सलाम करता। वह लोगों के बीच खासा लोकप्रिय जो था। हर किसी को वह बड़ी गर्मजोशी से मुस्कुरा कर जवाब देता। किसी किसी से 'वह आप कैसे हैं?', 'खैरियत तो है?' 'कुछ नया ताजा?' जैसे जुमले भी पूछता। किसी-किसी को उसने यह बताया कि साथ की पैदल चलने वाली सड़क की मरम्मत का काम जल्दी ही शुरू किया जाने वाला है। उसके ठीक होते ही यह सहूलियत हो जाएगी कि दोपहर में समय पर घर पहुँच सकेंगे जिससे खा पी कर थोड़ा सा आराम कर सकें।

घर पहुँचने पर बेनी ने देखा सामने वाले दरवाजे पर ताला नहीं लगा था। किचन में रेडियो भी चालू था... हाँ, स्वर धीमा था। रेडियो पर कोई रेलवे सिस्टम का इतिहास बता रहा था। और यह भी कि कारों के मुकाबले रेलवे कैसे बेहतर है। अंदर आकर बेनी सीधा फूलदान तक गया कि नावा वहाँ कोई पुर्जा तो दबा कर नहीं गई है। हालाँकि उसे इसकी व्यर्थता पहले से मालूम थी। हाँ, किचन में डाईनिंग टेबुल पर उसका खाना करीने से रखा हुआ था। एक बड़ी सी थाली से ढका हुआ जिससे खाने की गर्मी बनी रहे - चिकेन, उबाल कर मसले हुए आलू, पके हुए गाजर और हरी बीन्स। प्लेट के साथ छुरी काँटा सहेजा हुआ तह लगी हुई कपड़े की नैपकिन के साथ।

बेनी एवनी ने माईक्रोवेब के अंदर दो मिनट रख कर अपना खाना गर्म किया। एहतियात बरतने के बावजूद खाना ठंडा हो गया था। उसने फ्रिज खोल कर बियर की एक बोतल निकाली। ढक्कन खोल कर उसे मग में उड़ेला। इसके बाद किसी भुक्खड़ की तरह वह खाने पर टूट पड़ा। रेडियो पर तब संगीत बजने लगा जिसमें संगीत कम और विज्ञापन ज्यादा थे। एक विज्ञापन के दौरान उसे लगा जैसे दरवाजे की सीढ़ियों से नावा के कदमों की आहट आ रही है। खिडकी से झाँक कर देखा तो बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। हाँ, भटकटैया की झाड़ियों और लोहे के कबाड़ के बीच जंग लगे पहियों वाली एक सगड़ी उसे खड़ी दिखाई दी।

खाना खा कर उसने प्लेट सिंक में डाली, रेडियो बंद किया और किचेन से बाहर निकल आया। पूरे घर में चुप्पी पसरी हुई थी। कोई आवाज सुनाई दे रही थी तो वह भी घड़ी की टिक-टिक। उसकी दोनों जुड़वा बेटियाँ - युवाल और इन्वाल - फील्ड ट्रिप पर अपर गैलीली गई हुईं थीं। नहाने की नीयत से वह बाथ रूम की तरफ बढ़ा तो बीच में लड़कियों का कमरा पड़ा। देखा, उस कमरे का दरवाजा भिड़काया हुआ था। फिर भी उसने अंदर झाँक कर देखा - अंदर साबुन और कपड़े पर इस्त्री करने की गंध थी। उसने हौले से दरवाजा बंद किया और बाथ रूम की तरफ बढ़ गया। अंदर जा कर उसने शर्ट-पैंट उतारे फिर अचानक कुछ सोच कर सिर्फ अंडरवियर पहने वह टेलीफोन तक आया।

उसके मन में घबराहट या चिंता नहीं थी। फिर भी वह खुद से यह सवाल बार-बार करता जा रहा था कि नावा कहाँ चली गई। हर रोज की तरह मेरे लंच पर आने का इंतजार उसने आज क्यों नहीं किया?

उसने गिला स्टीनर को फोन किया। पूछा नावा उसके पास तो नहीं आई। 'नहीं, मेरे पास तो नहीं आई। उसने आने को कहा था क्या?' गिला ने सवाल किया।

'यही तो बात है...। नावा ने यह नहीं बताया वह कहाँ जा रही है।' बेनी ने जवाब दिया।

गिला बोली - 'जेनरल स्टोर दो बजे तक खुला रहता है... शायद कुछ लेने वहाँ चली गई हो।'

'ठीक है गिला शुक्रिया। मुझे नावा के जल्दी घर लौट आने का भरोसा है। चिंता की कोई बात नहीं है' - बेनी ने कहा।

हालाँकि फिक्र की बात तो थी। उसने जेनरल स्टोर का नंबर मिलाया। देर तक घंटी बजती रही। फिर एक बूढ़े ने फोन उठाया और रटी रटाई शैली में बोला - 'येस प्लीज, मैं स्टोर से श्लोमो लाईबरसन बोल रहा हूँ। बोलिए, क्या खिदमत करूँ?'

बेनी एवनी ने नावा के बारे में उससे पूछा। पर उधर से जवाब मिला - 'सॉरी कॉमरेड एवनी, आपकी बेगम आज स्टोर में नहीं दिखाई दीं हैं। हमें उनका स्वागत करने का मौका अब तक नहीं मिला। देखें कब मिल पाता है?'

फोन से हट कर बेनी एवनी नहाने के लिए फिर बाथ रूम में आ गया। गीजर में पानी गरम किया और देर तक नहाता रहा। जब वह बदन पोछ रहा था तो एक बार दरवाजा खुलने का अंदेशा हुआ। अंदर से ही उसने आवाज लगाई - 'नोवा तुम हो?' पर बाहर से कोई जवाबी आवाज नहीं आई। कपड़े पहन कर वह बाथ रूम से बाहर निकल आया। किचन की तरफ देखने गया फिर बड़े कमरे में चला आया। वहाँ टी.वी. के सामने उसे कुर्सियाँ पड़ी हुईं दिखाई दीं। उसके बाद बेड रूम से होता हुआ वह छत पर आया। वहाँ नावा ने अपना 'क्रिएटिव स्टूडियो' बना रखा था।

वह काम करने के लिए अक्सर इस ढकी हुई छत को बंद कर लिया करती थी और मिट्टी की मूर्तियाँ बनाया करती थी। कभी-कभी अजीबोगरीब शक्लो-सूरत वाले जीव, तो कभी-कभी टूटी नाक और खिसके जबड़ों वाले मुक्केबाजो के सिर। पीछे के आँगन में उसकी भट्ठी थी। बेनी निकल कर भट्ठी तक गया, बत्ती जलाई और कुछ देर तक खड़ा खड़ा कुछ सोचता रहा। उसकी आँखें खुलीं और बंद हुईं, पर वहाँ उसे टूटी-फूटी मूर्तियों और ठंडी भट्ठी के सिवा कुछ न दिखाई पड़ा। हाँ, दीवारों पर काले धब्बों पर जरूर निगाहें टिकीं।

बेनी ने खुद से पूछा कि क्या उसे थोड़ी देर बिस्तर पर लेट जाना चाहिए और नावा के घर पर लौटने का इंतजार करना चाहिए। फिर वह किचेन में चला आया और अपनी जूठी प्लेट साफ करने के लिए डिश-वाश में डाल दी। उसने इधर-उधर निगाह मारी घर से निकलने के पहले नावा ने कुछ खाया या नहीं। शायद कुछ भी नहीं खाया। डिशवाशर अंदर से बिल्कुल भरा हुआ था और यह पता करना मुश्किल था कि उसमें ताजे रखे हुए बर्तन कौन से हैं और पहले के इस्तेमाल किए हुए कौन से।

चूल्हे पर पके हुए चिकेन का भगोना रखा हुआ था। पर उसे देख कर अंदाजा लगाना कठिन था कि नावा ने खुद अपना खाना खा लिया था और उसके हिस्से का चिकेन छोड़ गई थी। बेनी फिर फोन के पास चला गया। बात्या रूबिन को फोन मिलाया कई बार घंटी बजती रही। दस बार... पंद्रह बार... पर किसी ने उठाया नहीं। खीझ कर खुद को समझाया 'क्या बेवकूफों जैसी हरकत कर रहे हो?' फिर धीरे-धीरे चलता हुआ बेडरूम में चला आया। सोचा थोड़ी देर आराम क्यों न कर लिया जाए।

बिस्तर के नीचे नावा की चप्पलें रखीं थीं। छोटी, एड़ी पर थोड़ी घिसी हुई। रंग-विरंगी। उसे लगा जैसे बच्चों की खेलने वाली नावें हों। बिस्तर पर वह चुपचाप पड़ा रहा - बगैर हिले-डुले और छत को निहारता रहा। इन दिनों नावा बात-बात पर झुँझला जाया करती थी। और बीतते समय में उसे समझ आने लगा था कि बातों से उसे समझाने की तमाम कोशिशें माहौल और बिगाड़ ही देती थीं। और बेनी ने संयम बरतने और और समय बीतने का रास्ता अख्तियार कर लिया। शायद इसी से नावा का रोष कुछ कम हो जाए। वह उन बातों और घटनाओं से उबर तो आती थी पर उन्हें एकदम से भुला दे, ऐसा कभी नहीं हुआ।

एक बार की बात है - नावा की अंतरंग सहेली डॉक्टर गिला स्टीनर ने बेनी से कहा कि क्यों न परिषद की गैलरी में नावा की बनाई मूर्तियों की प्रदर्शनी लगाई जाए। बेनी ने तपाक से इस प्रस्ताव पर गौर करने का वायदा तो कर लिया पर धीरे-धीरे उसके मन में बात घर करती चली गई कि इससे उसकी सार्वजनिक छवि पर असर पड़ सकता है। वह यह खतरा उठाने को तैयार नहीं था। उसे लगा कि नावा की बनाई मूर्तियों में क्या ऐसा खास है? वैसी चीजें तो घर बैठी कोई मामूली स्त्री शौकिया तौर पर बना सकती है। साधारण मूर्तियाँ ही तो हैं। इन्हें तो किसी प्राइमरी स्कूल में प्रदर्शित किया जा सकता है बस...। परिषद् की गैलरी में प्रदर्शित करने से कोई यह आरोप न लगा दे कि मैं अपने घर वालों को बढ़ावा दे रहा हूँ। यह सुन कर नावा एक शब्द भी न बोली पर अगली कई रातों वह भोर के तीन-चार बजे तक कपड़ों पर इस्त्री करने में बिताती रही। घर का एक-एक कपड़ा उसने न छोड़ा। यहाँ तक कि तौलिया और फेंके जाने के लिए इकट्ठा कर रखे गए फटे-पुराने चिथड़ों तक।

बेनी करीब बीस मिनट तक लेटा होगा फिर अचानक उठा और अँधेरे बेसमेंट में उतर गया। बत्ती जलाई तो फतिंगे असहज हो कर इधर-उधर उड़ने लगे। उसने एक-एक बक्सा खोल-खोल कर देखा। इलेक्ट्रिक ड्रिल को छू कर देखा... शराब का बैरल ठकठका कर देखा, आवाज से मालूम हुआ कि खाली होने लगा है। बत्ती बुझाई और ऊपर किचेन में आ गया। थोड़ी देर के लिए ठिठका भी। फिर अपना जैकेट बदन पर डाला हालाँकि मोटा सा स्वेटर पहले ही पहने हुए था। और घर से बाहर निकल आया... बगैर दरवाजे में ताला लगाए। वह आगे झुक कर चलने लगा जैसे तेज हवा को ढकेलना पड़ रहा हो। बेनी एवनी अपनी पत्नी नावा को ढूँढ़ने के लिए घर से निकल पड़ा।

शुक्रवार का दिन होने के नाते सड़कें खाली और सुनसान थीं। सभी लोग रात की गहमागहमी से पहले खा पी कर आराम कर रहे थे। काफी नीचे उतर आए बादल छतों से लटके हुए थे और कोहरे के टुकड़े यहाँ-वहाँ नजर आ रहे थे। हल्का अँधेरा और नमी भरा दिन था। हर घर के इर्द-गिर्द उनींदेपन का साम्राज्य था। तभी कहीं से उड़ता हुआ अखबार का पन्ना वहाँ आ गया। बेनी ने उसे पकड़ कर कूड़ेदान में डाल दिया। जब बेनी वेटेरन गार्डन के पास पहुँचा जाने कहाँ से एक बड़ा सा मिश्रित नस्ल का कुत्ता आ टपका। पीछे-पीछे चलता हुआ वह दाँत निकाल कर गुर्राता जा रहा था। बेनी ने रुक कर उसे घुड़का, पर वह और आक्रामक हो गया। लगा, वह बेनी के ऊपर ही झपट पड़ेगा। झुक कर बेनी ने एक पत्थर उठाया और उसकी ओर फेंका। पिछली दोनों टाँगों के बीच अपनी दुम दबा कर वह पीछे मुड़ा भी... पर फिर पलट के बेनी के पीछे-पीछे चलने लगा। इस बार थोड़ी दूरी बना कर। करीब दस मीटर का फासला बना कर थोड़ी देर वे आगे-पीछे चलते रहे। फिर बाएँ रास्ते पर मुड़ गए। इस सड़क पर भी सभी दुकानों के शटर गिरे हुए थे। यह लोगों के आराम करने का समय था। अधिकांश शटर ग्रे रंग में रँगे हुए थे। पर अब उनका रंग धुँधला पड़ने लगा था।

कभी उसके अपने घर के सामने वाले बाग में पुरानी प्रजाति के खजूर के दो पौधे हुआ करते थे। पर कोई चार बरस पहले नावा ने उन्हें कटवा दिया - हवा चलने पर दीवार से टकरा कर बिस्तर के सामने की खिड़की पर उसकी पत्तियाँ रात को जैसे सरसराया करती थीं, उससे उसे नींद नहीं आती थी। जाने क्यों उन्हें देख कर उसका मन गहरी उदासी से भर जाता था।

आँगन में चमेली और शतावरी की लतरें भी थीं। खजूर के पेड़ के नीचे और भी कई झाड़ियाँ उग आई थीं। और हवा चलने पर उनके दाएँ-बाएँ झूलने को देखने में मजा आता था। बेनी एवनी आस-पास की सड़कों से होता हुआ एक बार फिर मेमोरियल पार्क में आ गया। वह उस बेंच तक आया जहाँ नावा के बैठे होने की बात एवेल ने बताई थी। और जहाँ बैठ कर उसने उसके लिए एक पुर्जा भेजा था - 'मेरी फिक्र मत करना।'

उस बेंच के पास बैठ कर बेनी एवनी पल भर को ठिठका। कुत्ता भी उसके साथ ठिठका, पर दस मीटर का फासला बना कर। इस वक्त कुत्ता न तो गुर्रा रहा था न खींसे निपोर रहा था पर बेनी एवनी पर चौकस निगाहें जरूर रखे हुए था।

जब वे दोनों तेलअबीब यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे - तभी शादी से पहले नावा को गर्भ ठहर गया। नावा टीचर्स सेमिनरी की स्टूडेंट थी और वह बिजनेस स्कूल था। फौरन ही आपसी रजामंदी से उन्होंने एबार्शन का फैसला कर लिया, पर एक प्राईवेट क्लिनिक में ऑपरेशन से दो घंटे पहले नावा का मन पलट गया और उसने एबार्शन कराने से मना कर दिया। नावा बेनी एवनी के सीने पर सर टिका कर देर तक रोती रही। बेनी ने उससे नादानी न करने की बात कही और पूछा - उन परिस्थितियों में एबार्शन न कराने का उनके सामने क्या विकल्प है?

बेनी ने उसे आश्वासन दिया कि एबार्शन की पूरी प्रक्रिया उतनी ही संक्षिप्त है जैसे अक्ल का दाँत उखड़वाने की। बेनी क्लिनिक के बाहर सड़क पार के कैफे में बैठ कर पुराने अखबार के पन्ने उलटते रहा। दो घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि नावा क्लिनिक के बाहर आ गई। उसके चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी। वे एक टैक्सी ले कर डर्मिटरी के कमरे पर गए। पर वहाँ शोर मचाते हुए छह-सात स्टूडेंट्स बेनी की प्रतीक्षा में इकट्ठा थे। दरअसल बेनी ने वहाँ पहले से कोई मीटिंग तय कर रखी थी। वहाँ पहुँच कर नावा एक कोने में कंबल ओढ़ कर लेट गई। पर उनके बीच जिस ढंग की बहसबाजी, नोक-झोंक और मजाक हो रहे थे - साथ में सिगरेट का धुआँ - सब कुछ नावा के कंबल को बेध कर दाखिल हो रहा था। कमजोरी और उबकाई - टायलेट की तलब - जैसे-जैसे एनेस्थीसिया का असर उतर रहा था, शरीर के अंदर की चीर-फाड़ का दर्द बढ़ता जा रहा था। बाथ रूम के अंदर से उसे सड़क पार का नजारा दिखाई दे रहा था। - एक बंदा उल्टी कर रहा था, सो वह खुद पर भी काबू नहीं रख पाई और ढेर सारी उल्टी कर बैठी। शर्म से वह देर तक बाथ रूम के अंदर ही बंद रही। अपनी बाँहों के बीच में सिर रख कर सिसकती रही। उसे समय का एहसास तब हुआ जब कमरे में काँव-काँव करते हुए लड़के चले गए और बेनी ने आकर उसे थामा। बुरी तरह से काँपती हुई नावा को बेनी बिस्तर तक ले कर आया।

शादी उन्होंने इस वाकये के दो साल बाद की। पर नावा को फिर से गर्भधारण में मुश्किलें आने लगीं। एक के बाद एक उन्होंने अनेक डॉक्टरों को दिखाया और उनका इलाज भी चलाया। पाँच वर्ष की मशक्कत के बाद नावा ने दो जुड़वा बेटियों को जन्म दिया - युवाल और इन्वाल। हालाँकि अजीब बात यह हुई कि एबार्शन वाले वाकये पर उन्होंने बाद में कभी बातचीत नहीं की - एक बार भी नहीं। जैसे अपने-अपने मन में चुपचाप दोनों ने मान लिया हो कि उस घटना पर बात करने का कोई मतलब नहीं था।

नावा स्कूल में पढ़ाती थी और मुखाकृतियाँ गढ़ती थी। इत्तफाक की बात है कि बेनी एवनी तेल इलान जिला परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया। उस शहर में वह अच्छा खासा लोकप्रिय था। और लोगबाग उसकी धैर्यपूर्वक सबकी बात सुनने की और समस्याओं के तत्काल निबटारे की कार्य-शैली के कायल थे।

बेनी को सामने वाले को काबू में करने की कला में महारत हासिल थी और फिर दिलचस्प बात यह थी कि सामने वाले को इस बात का कत्तई अंदेशा नहीं होता था कि बेनी उन्हें अपने भ्रमपाश में लपेटे जा रहा है।

चलते-चलते वह एक जगह रुका। यह देखने के लिए कि कुत्ता अब भी उसके पीछे चल रहा है। कुत्ता कुछ दूरी पर खड़ा हुआ था। अपने पैरों के बीच में दुम दबाए, थोड़ा सा मुँह खोले, धैर्यपूर्वक बेनी की तरफ टकटकी लगाए। धीमी आवाज में बेनी बोला - 'इधर आओ।' यह सुन कर हाँफते हुए कुत्ते ने अपने कान नीचे गिरा लिए और और गुलाबी जीभ निकाल कर हवा में लहराने लगा। जाहिर था, बेनी से वह दोस्ती करने को तैयार था। मगर बहुत नजदीक जाने को तैयार न था। दिन का वह ऐसा समय था जब पूरे शहर में एक परिंदा भी नहीं दिखाई दे रहा था। सिर्फ बेनी एवनी, वह कुत्ता और पेड़ों की ऊँचाई तक नीचे उतर आए बादल थे जो सड़क पर दिखाई पड़ रहे थे।

पानी की टंकी के पास एक भूमिगत सार्वजनिक बम शेल्टर था। बेनी एवनी ने उसका लोहे का गेट धकेला। उस पर ताला नहीं लगा था। वह अंदर घुस गया पर वहाँ धुप्प अँधेरा था। दीवार पर हाथ मार कर बेनी ने स्विच तो ढूँढ़ लिया पर बिजली का कनेक्शन कटा हुआ था। साहस कर के वह बारह सीढ़ियाँ उतर गया। नमी से चिप-चिप करती गंदी-संदी फर्श पर आगे बढ़ा तो उसके पैर से बिस्तरों का ढेर और आलमारियों के दराज टकराए। जब उसकी नाक में सड़ी-गली चीजों की गंध आने लगी तो उलटे कदम सीढ़ियों तक वापस हो लिया। ऊपर निकल कर उसने दोबारा स्विच आन कर के देखा। लोहे का भारी दरवाजा बंद किया और सूनी सड़क पर निकल आया।

हवा रुक गई थी, सो कोहरा ज्यादा घना होता जा रहा था। इतना घना कि मकानों की शक्लें धुँधली पड़ गईं। कुछ घर तो एक सौ साल से भी ज्यादा पुराने थे। ज्यादातर मकानों के छज्जे पुराने पड़ कर उखड़ गए थे। जिनसे सामने की दीवारों पर बड़े-बड़े चकत्ते उभर आए थे। अहातों में चीड़ के पेड़ों की कतारें दिखाई दे रही थीं पर बीच-बीच की दीवार लगभग सटे हुए मकानों को एक दूसरे से अलग करती थीं। खाली जगहों पर झाड़ियाँ उग आई थीं और उनके बीच कहीं-कहीं कोई पुरानी टूटी-फूटी चीज नजर आ जाती थी।

बेनी एवनी ने सीटी बजा कर, कुत्ते को पास बुलाने की कोशिश की, पर वह दूर ही खड़ा रहा। जब करीब सौ साल पहले यह शहर बसाया गया था तब का बना हुआ सायनागौग ...उसके प्रवेश द्वार पर एक खोखा सा खड़ा था। बेनी एवनी ने नजदीक से जा कर देखा तो वहाँ सिनेमा और शराबघरों के विज्ञापन चिपके हुए थे। एक बोर्ड जिला परिषद के इश्तहारों के लिए भी था। जिस पर बेनी ने अपने हस्ताक्षरों वाली नोटिसें भी देखीं। उन्हें पढ़ते हुए उसे एकबारगी महसूस हुआ कि अब वे बेमानी हो चुकी हैं। कुछ मायनों में भ्रामक भी। अब तक बेनी को लगा जैसे सड़क जहाँ सामने खत्म होती है वहाँ कोई झुक कर खड़ा है। पर जब उसने गौर से देखा तो कोहरे के अंदर छुपती हुई झाड़ियाँ दिखाई दीं। सायनागौग की छत धातु की टोपी की बनी हुई थी। उसके दरवाजों पर शेर और सितारे जड़े हुए थे। बेनी पाँच सीढ़ियाँ चढ़ कर दरवाजे तक पहुँचा और दरवाजे को हिला कर देखा कि खुला है या बंद। अंदर घुसा तो अँधेरा था... हवा सर्द। सामने आर्क को ढके हुए परदे के सिरहाने तक मोमबत्ती टिमटिमा रही थी। उसने नजरें गड़ा कर देखा - लिखा था - 'ईश्वर सदैव मेरे सामने खड़ा होता है।' अँधेरे में ही बेनी ने बेंचों के बीच से ऊपर जाने की सीढ़ियाँ ढूँढ़ निकालीं। वहाँ बेंचों के ऊपर प्रार्थना की कई कटी-फटी पुरानी काली किताबें फेंकी हुई थीं - पसीने की और पुरानी खंडहरनुमा इमारत की मिली-जुली गंध। उसने एक बेंच पर अपना हाथ फिराया... उसे लगा था उस पर किसी का शाल या स्कार्फ छूट गई थी।

सायनागौग से निकल कर उसने देखा कुत्ता सीढ़ियों के नीचे बैठा उसके आने का इंतजार कर रहा है। बेनी एवनी ने जमीन पर पैर पटकते हुए कहा : 'भागो... धत्त।' कुत्ते ने बड़े इत्मीनान से अपनी गर्दन घुमाई और हाँफता रहा। जैसे उससे दरियाफ्त कर रहा हो कि तुम्हारी इतनी हिम्मत हुई कैसे? बेनी भला उस कुत्ते को सफाई क्यों देता। वह वहाँ से जाने के लिए मुड़ा... कंधा उचकाया तो उसका भारी-भरकम स्वेटर जैकेट से बाहर झाँकने लगा। लंबे-लंबे डग भरता हुआ वह ऐसे चल रहा था जैसे तेज लहरों की दीवार तोड़ता हुआ कोई जहाज। कुत्ता फिर उसके पीछे-पीछे चलने लगा। हालाँकि नजदीक आने से निरंतर बचता हुआ।

आखिर नावा गई तो गई कहाँ? हो सकता है किसी सहेली के यहाँ गई हो और लौटने में किसी कारण से देर हो गई हो। या हो सकता है स्कूल में ही कोई काम अचानक आन पड़ा हो। यह भी हो सकता है किसी डॉक्टर के यहाँ गई हो। अभी कुछ ही हफ्ते तो हुए किसी बात पर बहसबाजी में उसने कहा था कि तुम्हारी भलमनसाहत दुनिया को दिखाने वाला मुखौटा है और कोई इस मुखौटे के अंदर जा कर देखे तो उसे मिलेगा - साइबेरिया। बेनी ने यह कटाक्ष सुन कर भी कोई जवाब नहीं दिया। बस हलके से मुस्कुरा दिया जैसे वह नावा के क्रोध में होने पर हमेशा किया करता है। उसके इस बर्ताव से नावा का पारा और चढ़ गया और जोर से चिल्ला पड़ी - 'तुम्हें किसी की फिक्र नहीं है, न मेरी न बच्चों की।' वह बेशर्मी से मुस्कुराता रहा और हाथ बढ़ा कर नावा के कंधों पर रख दिया। नावा ने झटक कर उसे परे कर दिया। कुर्सी से उठी और कमरे से बाहर जा कर दरवाजा धड़ाम से बंद कर दिया। करीब एक घंटे बाद बेनी नावा के स्टूडियो में गर्म हर्बल टी के कप में शहद डाल कर ले कर आया। उसे लगा मौसम सर्द है कहीं नावा ठंड न खा जाय पर नावा को सर्दी महसूस नहीं हो रही थी। हालाँकि उसने चुपचाप चाय का कप थाम लिया था और बोली - थैंक्स, इसकी कोई जरूरत थी नहीं।

उसके मन में तभी यह ख्याल आया कि कहीं ऐसा न हो कि नावा को इस घने कोहरे में यहाँ-वहाँ ढूँढ़ रहा है और वह उसके पीछे से घर लौट आई हो। उसने सोचा एक बार लौट कर घर देख आए - पर खाली-खाली घर का ख्याल - खास तौर पर खाली बेड रूम में पलंग के नीचे करीने से सँभाल कर रखी हुई खिलौने वाली नावों सरीखी उसकी रंग-विरंगी चप्पलों की छवियाँ उसे घर लौटने का जोखिम उठाने से रोकने में सफल हुईं। वह न चाहते हुए भी घर लौटने की बजाए आगे बढ़ गया। बीच की सड़कों को पार करता हुआ वह नावा के स्कूल तक आ गया। अभी मुश्किल से महीना भी नहीं बीता था जब उसने जिला परिषद् में विरोधियों द्वारा शिक्षा परिषद के उस प्रस्ताव पर जोरदार बहस की थी जिसमें नावा के स्कूल को अतिरिक्त धन-राशि मुहैया कराने के प्रस्ताव को ही हरी झंडी न दिखाने की बात कही गई थी। और उसके तर्कों के बलबूते उस स्कूल को चार नए क्लास रूम्स और जिम्नेजियम बनाने के लिए पैसे स्वीकृत किए गए थे।

आने वाले त्यौहार के मद्देनजर स्कूल के लोहे के फाटक पर भारी-भरकम ताला डाल दिया गया था। स्कूल भवन और खेल के मैदान को चारों ओर से... ऊपर से भी लोहे की जालियों से घेरा गया था। बेनी एवनी ने उस घेरे के दो चक्कर काटे कि शायद कहीं से ऐसा चोर रास्ता मिल जाए जिससे हो कर अंदर घुसा जा सके, पर सफल नहीं हो पाया। सड़क के दूसरे किनारे चल रहे कुत्ते को उसने इशारे से पास बुलाया और एक जगह लोहे के खंभों का सहारा ले कर जाली के अंदर कूद गया। इस कोशिश में वह घायल हो कर खून भी निकलवा बैठा। टखनों पर घाव ज्यादा था। पर इसी हालत में उसने लंगड़ाते-लंगड़ाते मैदान पार किया।

सामने से नहीं बाजू के किसी दरवाजे से वह दरवाजे के अंदर दाखिल हुआ और एक लंबे हाल में पहुँच गया। इस हाल के दोनों तरफ कतार में क्लास रूम बने हुए थे। वहाँ की हवा में पसीने इधर-उधर फेंके हुए खाने के अवशेष और ब्लैक-बोर्ड पर लिखने वाले चाक के कणों की गंध बसी हुई थी। यहाँ-वहाँ फर्श पर नारंगी के छिलके और कागज के तुड़े-मुड़े टुकड़े बिखरे हुए थे। एक अधखुले दरवाजे को धकेलता हुआ बेनी एवनी एक क्लास रूम में घुस गया। टीचर की मेज पर ब्लैक बोर्ड साफ करने का डस्टर और कापी के कुछ लिखे हुए पन्ने पड़े हुए थे। उलट पुलट का कर देखने पर उसे लगा कि यह किसी स्त्री की लिखावट है। गौर किया तो यह साफ हो गया कि यह नावा की लिखावट नहीं थी। उन पन्नों को पकड़ने से उसकी चोट के खून के निशान उन पन्नों पर भी लग गए। उसने डेस्क का ढक्कन उठा कर उन पन्नों को उसके अंदर डाल दिया। फिर ब्लैक बोर्ड की ओर ताकने लगा। उसी जनाना लिखावट में ब्लैक बोर्ड भी कुछ पर लिखा था। बोर्ड पर होम वर्क में किसी खास पाठ के तीन चैप्टर्स को बुधवार तक पूरा करने का निर्देश दिया गया था। बोर्ड के ऊपर स्टेट के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चित्र टँगे हुए थे। साथ में संदेशों वाले कुछ रंगीन इश्तेहार भी लगाए गए थे।

क्लास में डेस्क जिस तरह से रखे हुए थे उसे देख कर समझ आ रहा था कि घंटी बजने पर बच्चे एक साथ दौड़ते हुए इन्हें इधर-उधर धकेलते हुए बाहर निकले होंगे। खिड़कियों पर रखे गमलों में पौधे सूख रहे थे। टीचर की मेज के सामने इज्रायल का एक बड़ा सा नक्शा टँगा हुआ था जिसमें तेल इलान की जगह पर हरे रंग का एक गोला बनाया हुआ था। खूँटी पर एक लावारिस जैकेट भी टँगा हुआ था।

बेनी एवनी क्लास रूम से बाहर निकला और लंगड़ाता-लंगड़ाता सूने कारीडोर में चलता गया। उसके घाव से रिस-रिस कर खून फर्श पर अपने निशान छोड़ता रहा। हाल पार कर उसे बाथ रूम दिखाई दिए और बगैर आगा-पीछे किए वह लेडीज बाथ रूम में घुस गया। अंदर पाँच कमरे थे। वह हर कमरे में घुसा। दरवाजे से अंदर जा कर एक-एक चीज का मुआयना करता रहा। वहाँ से बाहर निकल कर बेनी एवनी दूसरे हाल की ओर गया... फिर तीसरे हाल की तरफ। इन सबको पार कर के वह टीचर्स लाउंज के सामने पहुँचा। पल भर को दरवाजे पर वह ठिठका। दरवाजे पर लिखे निर्देश की तरफ उसका ध्यान गया - टीचर्स लाउंज। छात्रों को बगैर इजाजत अंदर आना मना है। उसने उन शब्दों को छू कर देखा जैसे ब्रेल लिपि में लिखा गया हो। उसके मन में एकदम से आया कहीं अंदर कोई मीटिंग न चल रही हो। वह उसमें व्यवधान डालना नहीं चाहता था। और न ही अंदर घुस कर देखने का लोभ संवरण कर पा रहा था। अंदर पहुँच कर उसने देखा वहाँ सन्नाटा और अँधेरा पसरा हुआ था। खिड़कियाँ पूरी तरह से बंद थीं और परदे खींचे हुए थे। इस लंबे-चौड़े कमरे में किताबों की दो लंबी बुक-शेल्फ थी। बीच में रखी लंबी मेज के इर्द-गिर्द करीब बीस कुर्सियाँ रखी हुईं थीं। मेज पर चाय के कई कप, कुछ किताबें, कुछ बेंतें और कुछ पर्चे रखे हुए थे। लाउंज के अंतिम छोर पर एक बड़ा सा कैबिनेट रखा हुआ था जिसमें हर अदद टीचर के लिए अलग-अलग ड्रावर बने हुए थे। नाम पढ़ते-पढ़ते उसे नावा का ड्रावर मिल गया। उसने खींच कर खोला। अंदर कापियों का एक बंडल, चाक का एक बाक्स, गले की खराश के लिए कुछ गोलियाँ और धूप के चश्मे का एक खाली डब्बा दिखाई पड़ा। कुछ देर बेनी उसे देखता रहा और कुछ सोच कर ड्रावर को अपनी जगह पर रख दिया।

मेज के अंतिम छोर पर जो कुर्सी पड़ी थी उसके ऊपर रखा स्कार्फ उसे पहचाना सा लगा - नावा के पास एक ऐसी ही स्कार्फ है। पर इतनी धीमी रोशनी में वह पहचाने भी तो कैसे। फिर भी उसने स्कार्फ उठाया। घाव से रिसते खून को उससे पोछा और तहा कर अपने जैकेट की जेब में रख कर बाहर निकल आया। टीचर्स लाउंज से बाहर आ कर वह फिर हाल के अंदर घुस गया। एक-एक क्लास रूम में झाँक कर देखा। स्कूल के हेल्थ सेंटर वाला दरवाजा खोल कर बेनी ने पूरे कमरे पर निगाह मारी और स्कूल भवन से बाहर चला आया। इस बार उसने दूसरे दरवाजे का इस्तेमाल किया, जिससे अंदर आया था उसका नहीं। खेल का मैदान पार करते हुए वह अब भी लंगड़ा कर चल रहा था। जाली के पास पहुँच कर उसने पहले जैसा ही लोहे के खंभों का सहारा लिया और बाहर जाली के पार कूद गया। इस बार वह दोबारा चोट खाने से तो बच गया पर जैकेट में लंबा चीरा लग ही गया।

बाहर आ कर थोड़ी देर जाली की जड़ में ध्यान लगाए खड़ा रहा। किस लिए... किसके इंतजार में... उसको यह तब पता चला जब उसकी नजर सड़क के दूसरे किनारे पर बैठे कुत्ते पर गई। वैसे ही करीब दस मीटर की दूरी बनाए हुए बैठा था वह। कुत्ते की निगाहें उसी की ओर थीं। ...उत्सुक निगाहें। उस क्षण एकबारगी उसके मन में आया वह कुत्ते को पाल ले। पर कुत्ता था कि वहाँ से उठा। अपने बदन को सीधा किया और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। सुरक्षित दूरी बरकरार रखते हुए।

करीब पंद्रह मिनट तक बेनी एवनी सूनी सड़क पर कुत्ते के पीछे-पीछे लचक-लचक कर चलता रहा। चारखाने के स्कार्फ को अपने जेब से निकाल कर उसने अपना जख्म पोछा। वह स्कार्फ जाने नावा का था या उसके स्कार्फ से मिलता जुलता किसी और का था, पक्का नहीं मालूम। नीचे उतर आए भूरे रंग के बादलों के टुकडे पेड़ों की फुनगियों से उलझ रहे थे। घरों के अहाते में कोहरे का साम्राज्य था। उसे लगा चेहरे की नंगी चमड़ी को पानी की एकाध बूँद छू गई। पर उसने न तो उसकी परवाह की और न पक्के तौर पर उसे उन बूँदों के होने या न होने का ही पता चला था। सामने आ खड़ी हुई दीवार पर उसे लगा कोई चिड़िया बैठी हुई है। पर जैसे जैसे वह नजदीक चलता चला गया उसे अहसास हुआ वह कोई चिड़िया नहीं, टीन का एक पुराना खाली डब्बा था।

चलते-चलते अब वह बोगेनबिलिया की दो कतारों के बीच से जाती एक सँकरी गली में आ गया था। उसे याद आया दो-चार दिन पहले ही उसने उस गली में सड़क का काम दुबारा शुरू करने के आदेश पर दस्तखत किए थे। सुबह-सुबह की सैर के बहाने खुद आ कर वह मौके पर मुआयना भी कर गया था। उस गली से होता हुआ वह फिर से सायनागौग के सामने जा पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर उसे ध्यान आया कि अब कुत्ता पीछे-पीछे नहीं बल्कि आगे चलने लगा है। मानों वही उसे रास्ता दिखा रहा हो। इस बार पहले के मुकाबले रोशनी और भी कम हो गई थी। उसने खुद से सवाल किया - 'क्या अब सीधे घर नहीं जाना चाहिए?' नावा जरूर घर लौट आई होगी, और अब आराम कर रही होगी। और उसे घर पर न देख कर उसे हैरान हो रही होगी। या चिंता भी कहीं न कर रही हो। पर सब कुछ के बावजूद खाली घर का खौफ उसके मन पर इस कदर हावी हो जाता था कि वह पैर की चोट को नजरअंदाज करके कुत्ते के पीछे-पीछे ही चलता रहा।

कुत्ते ने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। थूथन इस तरह नीचे लटकाए रहा जैसे उससे फर्श को सूँघता चल रहा हो। इस तरह चलते-चलते अब जल्दी ही साँझ घिरने लगेगी और आसार ऐसे लग रहे थे कि भारी बरसात होने वाली है जिसमे सब कुछ धुल कर साफ-सुथरा हो जाएगा। वह उन तमाम संभावनाओं के बारे में सोचता रहा जिनकी गुंजाइश थी पर उनमे से शायद एक भी सही साबित न हो। यह सोचते-सोचते उसका मन एक बार फिर से भटक गया। नावा की घर के पिछवाड़े के छज्जे बेटियों के साथ बैठने की पुरानी आदत थी। वे सब बैठे-बैठे नीबू के पेड़ों की कतारों को निहारा करतीं और बीच-बीच में खुसुर-पुसुर करती रहतीं। उसे कभी यह समझ नहीं आया कि बैठ कर क्या बतियाती हैं। और न ही कभी उनसे बातचीत करके यह जानने की उसने परवाह ही की। अब इन बातों की याद आते ही उसके मन में उनकी खुसुर पुसुर के विषय को जानने की लालसा तो हुई पर अब किया भी क्या जा सकता था। उसे खुद पर खींझ भी हुई कि इतनी देर से वह यहाँ-वहाँ भटक रहा है, पर अपना मन किसी एक नतीजे पर नहीं टिका पा रहा है। अपने काम के सिलसिले में कोई ऐसा दिन नहीं बीतता जब उसे बहुआयामी फैसले न लेने पड़ते हों। पर इस घड़ी में तो मन पर उसके 'शक' हावी था। और उसे एकदम से समझ नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे। मन की उधेड़बुन चलती रही कि उसने देखा कि कुत्ता उससे सुरक्षित दूरी - करीब दस मीटर - बना कर सड़क के उस पार बैठ गया है। उसकी देखा-देखी बेनी एवनी भी मेमोरियल पार्क की बेंच पर बैठ गया। उसी बेंच पर जिस पर कोई दो-तीन घंटे पहले उसकी पत्नी नावा बैठी हुई थी। घिसटते हुए वह बेंच के बीचोबीच चला आया, स्कार्फ से अपने जख्म को पूरी तरह ढक लिया। हलकी बूँदाबाँदी शुरू हो गई थी। सो उसने अपने जैकेट के सभी बटन लगा लिए और इस तरह बेनी एवनी वहाँ बैठ कर अपनी पत्नी की प्रतीक्षा करने लगा।

(मूल हिब्रू से अँग्रेजी अनुवाद - एमोस ओज और जिल सैंड डी एंजेलो। ' द न्यूयार्कर ' में 8 दिसंबर 2008 को प्रकाशित।)


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