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कहानी

बेटी
गौहर मलिक

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


ज़र बीबी तेज़ तेज़ गई और नवासी को उठा लिया। उसे ज़ोर से ज़मीन पे पटक दिया और डाँटने लगी।

कितनी झूठी हो तुम! तुमने नहीं कहा था कि बेटा है? तुम मर गई होतीं ऐसा झूठ बोलते हुए। बूढ़ी औरत तुम्हें शरम ना आई ऐसा झूठ बोलते हुए? मैं ही मस्ख़रा रह गई हूँ तुम्हारे लिए? मेरे सरुपा कुलाह रखती हो?

ये बेटी है। फिर एक बेटी। ये छुट्टी बेटी है।

बग़ैर बेटे की औरत, बग़ैर रेवड़ वाले चरवाहे की तरह होती है।

बे-चारी नाज़ उस पर ख़ुदा तरस खाए। ख़ुदा उसे अपनी कोख से भाई दे दे। बग़ैर भाई की बहन है। जितने मुँह इतनी बातें। हर कोई अपनी जानिब से तरस खा रहा था। लेकिन अगर सास (ज़र बीबी) का बस चलता तो नाज़ो और नन्हीं दोनों को ज़िंदा निगल लेती। वो फिर फट पड़ी शर ख़ातून को मुलाहिज़ा फ़रमाएँ। झूठ बोल कर और मुझ जैसी बुढ़िया को जल देने की क़सूरवार हुई।

बीबी, मुझे माफ़ कर दो। मैं नाफ़ काट रही थी कि आपने पूछा, मैं जल्दी में थी। अगर ख़ुदा-न-ख़्वास्ता नाफ़ ठीक ना कटती तो क्या हश्र होता। डाक्टर, हस्पताल तो यहाँ हैं नहीं। नाज़ो को कुछ हुआ तो हम क्या कर सकती हैं?

नाज़ो को कुछ नहीं होगा। वो बेटी पैदा करने की आदी है। मेरा मुँह काला करती रहती है। मेरे बेटे को लावारिस करती है।

बड़ी जेठानी तंज़िया हँसी कि अच्छा है हमारे बेटों को ग़ुर्बत की हालत में घर ही में बीवियाँ दस्तयाब होती जा रही हैं। किसी ने इस की बात को अहमियत ना दी। बैठी हुई औरतों में से एक बोली। ज़्यादा बातें ना करो। लाओ मुझे दे दो। इंशाअल्लाह अगली बार बेटा पैदा करेगी।

ए बीबी। मैंने हर तरह से अपना मुँह काला कर के देखा है। मैंने उसे क्या-क्या नहीं खिलाया। ये पहली बार नहीं है, सब्ज़क (दवाई का नाम) मैंने दिया। पका हुआ अंडा मैंने खिलाया, कच्चा अंडा मैंने खिलाया, घी मैंने दिया, नरीना हिरन का पता मैंने खिलाया। और किस-किस चीज़ का नाम लेकर तुम्हारा सर चकरा दूँ। मुझे जो भी मश्वरा किसी ने दिया मैंने उसे दे दिया। मगर वो तो ख़ुद बे-बख़्त है, बदबख़्त को कौन कह सकता है नेक-बख़्त? इसकी ऐसी क़िस्मत कहाँ कि बेटा पैदा कर के उसे लोरियाँ दे? मुझे तो पहले ही पता था कि बीबी नाज़ो फिर बेटी लाएगी। बेटे वाली माँ का चेहरा तो चौधवीं के चाँद की मानिंद होता है। मगर नाज़ो का चेहरा तो यूँ लगता था जैसे किसी ने राख छिड़क दी हो।

उसने नौज़ाईदा को ज़मीन पर पटख़ दिया, खड़ी हो गई और एक कोने में दिनों हाथ सरुपा मार कर बैठ गई। बैठी हुई औरतों में से एक ने बच्ची को उठा कर गोद में रख लिया और कहा नाज़ो, बेचारी, उस के लिए कपड़े लत्ते बनाए हैं कि नहीं?

नाज़ो ने रेल की बोगियों की तरह क़तार में रखे हुए संदूक़ों में से एक की तरफ़ इशारा किया कि इसमें हैं।

औरत बेचारी तो मुफ़्त में तोहमत का शिकार होती है। जो बीज बोया जाएगा वही फ़सल तैयार होगी। जो काश्त करोगे तो जो उठाओगे, गंदुम काश्त करोगे तो गंदुम मिलेगा।

नहीं नहीं, बहन। मेरे बेटे का कोई क़सूर नहीं है। नाज़ो से पूछो वो ख़ुद कितने भाइयों की बहन है, बोलो नाज़ो।

तौबा करो, ज़र बीबी, तौबा करो। शीदो की माँ ने यही कहा था। फिर क्या हुआ शीदो? कहाँ गईं वो बहुत सारी बेटियाँ? मेरी तुम्हारी आँखों के सामने की बात है। बेटियाँ बड़ी हो गईं, शादीशुदा और घर-वाली हो गईं। फिर एक एक कर के ऐसे मरती गईं कि एक अंधी लड़की भी इसके नाम की ना रही। नाज़ बीबी ज़िंदा थी, उसने ये सब अपनी आँखों से देखा। वो कफ-ए-अफ़सोस मिलती रही। ख़ुदा तक किस के हाथ पहुँच सकते हैं? तौबा है ख़ुदा के क़हर से।

नहीं ज़र बीबी। यहाँ तुम ग़लत हो। नाज़ो की माँ ने अपनी पूरी कोशिश की मगर बेटा या बेटी उसकी क़िस्मत में ना थी। सब मर गईं। कितने पीरों, मुलाऊँ के दम दुरूद तावीज़ों के बाद कहीं ख़ुदा को तरस आया जो ये अकेली नाज़ो बच गई। शुक्र है इसके दम से इसके माँ बाप का नाम लिया जाता है।

नाज़ो के दिल में आग लग गई। उसकी आँखें भर आईं। कहने लगी :

शायद ख़ुदा ने मुझे इन्हीं दिनों के लिए ज़िंदा रखा। काश मैं भी उन्हीं की तरह मर जाती।

बस-बस ख़ुद को परेशान ना कर, सोच सोच कर मर जाओगी। जैसे ख़ुदा की मर्ज़ी, तुमने कौन से पैसे दिए कि परेशान हो जाओ कि बेटा ना हुआ। कल ये बेटियाँ तुम्हारे लिए ख़ुद को वार देंगी। तुम्हारी मददगार बनेंगी। दुर्रीन ने यही किया था। चौथी बेटी पैदा होने पे ख़ुद को दोहतड़ मारती रही, मारती रही, सर्दी वाले बुख़ार में मुब्तला हुई और सातवें दिन क़ब्र में चली गई। फिर बना क्या? इसके बच्चों को भाई की बीवी ने पाला पोसा, तुम्हारों को कौन पालेगा, बे-चारी?

बाईं और बैठी हुई दूसरी औरतों ने ज़च्चा बच्चा को बिस्तर पे लिटाया, तीमारदारी की। सास ने फिर भी अपने हाथ तक ना हिलाए, ग़ुस्से में उठी, दरवाज़े को ज़ोर से मारा और बाहर निकल गई :

बीबी हौसला। दरवाज़े को ज़ोर से मारने में बच्चे का सर टूटेगा दाई ने कहा।

जहन्नुम में जाए। सास ने कहा।

जान मुहम्मद ने दरवाज़े की आवाज़ सुनी तो तेज़ी से दूसरे कमरे से निकला।

हाँ, माँ, क्या हुआ?

बेटी और क्या? लालू। ओ लालो। आ जाओ दुकान चले जाओ और वहाँ से गड़ ख़रीद लाओ।

गड़ क्यों, अम्माँ?

माँ ने ग़ुस्सा भरी निगाहों से बेटे की तरफ़ देखा : क्या मिस्री और मिठाई ख़रीदे जाएँ कि वाजा जान मुहम्मद के घर बेटा पैदा हुआ है?

जान मुहम्मद समझ गया कि आज माँ, बात सुनने की नहीं है। वो तेज़ी से वापिस कमरे में दाख़िल हो गया।

माँ ने लालू को रवाना कर दिया और ख़ुद आ गई, ख़ामोश और मलूल, जान मुहम्मद के क़रीब बैठ गई। काफ़ी वक़्त गुज़रा मगर ना तो बेटे ने बात की और ना माँ ने। माँ की उदासी तो ज़ाहिर थी, जान मुहम्मद भी दिल में मलूल था।

इसी लम्हे कम-सिन नूर बख़्त दौड़ती हुई आई और बाप के गले लग गई : बाबा। चू चू का नाम क्या रखोगे?

दादी वहाँ से बोल उठी : उस का नाम है बेबस। अब बेटी से बस।

नहीं अम्माँ, उस का नाम होगा ज़रबख़्त। इस तरह दादी के नाम का हिस्सा भी इस में शामिल रहेगा।

जान मुहम्मद की बात से गोया माँ की क़मीस में बिल्ली घुस गई हो। वो पागलों की तरह खड़ी हो गई और बेटे का कंधा पकड़ा।

जानो ख़ुदा का वास्ता है, अब बस करो। बख़्त तुम्हारे पास नहीं है, नाम रखने से बख़्तावर ना होगे। ये जान बख़्त, नाज़ बख़्त, दरबख़्त, नूर बख़्त, शाद बख़्त, उन जैसे बदबख़्त नाम और कितने होंगे?

बहुत हैं अम्माँ, फ़िक्र ना करो।

माँ ने धाड़ें मार कर रोना शुरू कर दिया। जान मुहम्मद हँसने लगा :

अम्माँ, अम्माँ ख़ैर है। मेरे तुम्हारे हाथ में होता तो उन छः की छः बेटियों को बेटा बना लेते। तुम्हें तो ऐसा नहीं सोचना चाहिए। तुम तो ख़ुद औरत हो।

मैं नाज़ो की तरह की औरत नहीं हूँ। मुझे ख़ुदा ने सरसब्ज़ किया। मैं बेटों की माँ हूँ। मुझे तो तुम पे तरस आ रहा है।

बेटी ख़ुदा की रहमत है।

मैं ख़ुदा पर ख़ैरात हो जाऊँ। रहमत बरसाने उसने सिर्फ तुम्हारा घर देखा है?

तौबा करो अम्माँ, तौबा करो। मेरा एक दोस्त है। खुदा ने उसे माल, दौलत, सेहत, इज़्ज़त, हर चीज़ दे रखी है मगर औलाद नहीं दी। वो कहता है कि ख़ुदा मेरी सारी दौलत ले जाता और मुझे औलाद दे देता, बेटी ही दे देता मगर दे देता। अब तो कहता है कि अपने लिए यतीमख़ाना से एक बच्चा लाकर पालेगा।

तुम उसे अपनी बेटियों में से एक क्यों नहीं देते? तुम्हारी बीवी ने बेटियों का एक अंबार देख लिया है। साल बाद तुम्हारे लिए एक और लादेगी।

जान मुहम्मद को सख़्त बुरा लगा। माँ की इस बात ने उसे जला भुना डाला। वो महज़ सर हिलाने लगा।

सर क्यों हिला रहे हो, मैं ग़लत कह रही हूँ? पता नहीं नाज़ो ने तुम पे क्या जादू कर दिया कि यके बाद दीगरे छः बेटियाँ लाने के बाद भी तुम्हारे दिल में है और आँखों पे है। अपनी जवान और क़द निकालती हुई बेटियों के लिए शौहर कहाँ से लाओगे?

जान मुहम्मद को एक-बार जैसे जोश आ गया हो। वो फट पड़ा। तुम कहो, उन्हें क्या करूँ? इन सबको क़तल कर दूँ, गोली मार दूँ? तुम कहती हो, बेटा! बेटा! क्या कर देगा बेटा? बादशाही ताज मेरे सर पर रखेगा? बुढ़ापे में ज़ईफ़ वनातवां हो जाऊँगा तो बेटा और बहू मेरा हाथ पकड़ेंगे और घर से बाहर फेंक देंगे। तुम्हें अपना भाई नूर मुहम्मद याद नहीं? उसने जान तुम्हारे घर में दे दी। हालाँकि उस के तो चार बेटे थे, फिर?

मैं बदक़िस्मत माँ हूँ। तुम्हारी लावारसी मेरे लिए एक दर्द है।

मेरी फ़िक्र ना करो। मेरी बेटियाँ मेरी उत्तराधिकारी हैं। वही मेरे बेटे हैं। कुछ दिनों बाद नाज़ो को बड़े हस्पताल ले जाऊँगा और बच्चे बंद करने का ऑप्रेशन कराऊँगा। बेटियों के लिए शौहरों का ग़म ना करो, तुम्हारे पोतों के साथ नहीं ब्याहूँगा उन्हें। कौन सा मेरा माल व मताअ महल माड़ी हैं या करोड़ों का कारोबार है कि जब मरूँगा तो लोग ले जाएँगे। या मेरी नहरें बह रही हैं। बाप से विरसे में मिली मीरास तुम्हारे इन दो बेटों के हाथ में है, वो उनका पेट नहीं भरती। मैं तो अपनी सफ़ेदपोशी वाली नौकरी करूँगा। चार पैसे बचा लूँगा। अपनी बेटियों को अच्छी तालीम दिलाऊँगा। वो मेरा बेटा बनेंगी। तुम जाओ, ज़रा अपने इन दोनों बेटों में से एक के घर में साल छः माह तो गुज़ारो। देखता हूँ बहुएँ तुम्हें नाज़ो की तरह रख तो लें। क्यों उनके यहाँ नहीं रह सकती हो? तुम यहाँ इसलिए नहीं रह रही हो कि मैं तुम्हारा बेटा हूँ, बल्कि इसलिए रह रही हो कि नाज़ो तुम्हारी भतीजी है, तुम्हारी बेटी है, तुम्हें अपनी माँ गर्दानती है।

जान मुहम्मद के ग़ुस्से और चीख़ों से माँ नरम पड़ गई। जान मुहम्मद ने चादर कंधे पे डाली, ग़ुस्से से भरा उठ खड़ा हुआ। जूते ग़लत पाँव में ठूँसे और घर से बाहर निकला।

बेटी ने आवाज़ दी। अब्बा, मेरी जान, तुमने जूते ग़लत पैरों में पहने हैं।


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