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निबंध

श्मशान में कविता
आनंद वर्धन


श्मशान में कविता? बात कुछ अजीब सी भले लगे पर सच है। कुछ दिन पहले अपने पड़ोसी धर्म को निबाहते हुए अपने मोहल्ले में रहने वाले एक व्यक्ति के पिता की मृत्यु पर उनकी शवयात्रा में निर्विकार भाव से शामिल हो ढलती दुपहरी में श्मशान स्थल पहुँचा। घनी बस्ती के बीच एक खुली जगह जहाँ दूर दूर तक कोई नदी नहीं है, न घाट, फिर भी उसे विश्राम घाट कहा जाता है। शवयात्रा की औपचारिकताएँ पूरी होती रहीं। मैंने अपने दूसरे पड़ोसी मित्रों के साथ श्मशान के द्वार से प्रवेश किया। पहले भी बीसों बार आया हूँ यहाँ। श्मशान की निर्विकार हवा की तरह। आए, चिताओं को जलते देखा और लौट कर अपने अपने रोजमर्रा के कामों में लग गए। पर इस बार का जाना कुछ अलग रहा।

यों तो इस श्मशान में कुछ श्रद्धालुओं ने दानस्वरूप कुछ मूर्तियाँ बनवा कर स्थापित की हैं जिनमें कोई कलात्मक सौंदर्य नहीं है। लोग इन्हें देखकर कभी हाथ जोड़ते हैं, कभी आगे बढ़ जाते हैं। पर इस बार मूर्तियों के आगे से गुजरने के बाद दाहिने बाएँ बने शेड्स के पास पहुँचते ही कदम ठिठक गए। अनेक श्वेत श्याम पोस्टरों पर नजर पड़ी जिसमें बुजुर्गों की तस्वीरों के साथ कविताओं की पंक्तियाँ छपी थीं। उस शवयात्रा में शामिल तमाम लोगों ने रुक रुक कर उन कविताओं को एक एक कर पढ़ा। उनमें गीत थे, दोहे थे, गज़लों की पंक्तियाँ थीं, उन कविताओं की खासियत थी उनके विषय जो बुजुर्ग पीढ़ी, माँ और पिता से संबद्ध थे।

सामने चिताएँ जल रही थीं और वहाँ बैठे खड़े लोग पंक्तियों को पढ़ कर बुदबुदा रहे थे -

मंदिर में जैसे आरती, मस्जिद में अजाँ है
दे या दिखाई ना दे हर जगह पे माँ है

नज़़रें घुमाईं तो एक दूसरे पोस्टर पर लिखे हर्फ उनमें से उछलकर दिल में समाते चले गए -

खुद हार के हमको जिता गए
यूँ कर दुनिया से पिता गए।

दाहिनी तरफ के एक पोस्टर पर एक बूढ़ी माँ की पोपली हँसी के बगल में लिखा था -

जब तक माँ का साया था कभी नहीं घबराया था
उसके जापे का लड्डू, कोख में मैंने खाया था।

बाईं ओर नज़र घुमाईं तो लिखा पाया -

मेरे अल्ला और कुरान
मेरे प्यारे अब्बू जान
रटवाते थे सबक यही
बनना तुम बेहतर इनसान।

उस श्मशान में ऐसे 60 से अधिक पोस्टर थे जो बार बार मजबूर कर रहे थे पढ़ो और सोचो कि कितना सच है यह सब। कितनी सच हैं ये कविताएँ, ये शब्द। क्या आज की दुनिया सचमुच अपनी बुजुर्ग पीढ़ी को उपेक्षित नहीं कर रही। कहते हैं कि शब्दों में बड़ी ताकत होती है। तभी एक प्रश्न कौंधा - क्या कविता के पाठक बिल्कुल समाप्त हो चले हैं कि उसे उन्हें खोजने के लिए श्मशान तक चल कर आना पड़ा? फिर लगा कि उन कविताओं के लेखक अमित गोयल ने वह पोस्टर प्रदर्शनी बिल्कुल ठीक जगह लगाई। कम से कम श्मशान में तो आदमी सांसारिकता से परे चला जाता है। कुछ ही देर के लिए सही पर ऐसा होता है। कविता से दूर होता आदमी श्मशान में लटकी कविताओं का कुछ असर लेकर तो जाएगा। इन कविताओं के लेखक को ठीक विचार सूझा और श्मशान में कविताएँ लटकाकर उन्होंने एक बड़ा पाठक वर्ग अनायास पा लिया। श्मशान से लौटते वक्त याद आ रहे थे कबीर जो कहते चले गए - 'साधो ये मुरदों का गाँव।'

पर श्मशान में ही सही कविता तो कविता होती है और आह से उपजा हुआ गान ही अंतिम सत्य है।


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