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लेख

नवजागरण - उन्नीसवीं सदी एक मुठभेड़
अमरेंद्र कुमार शर्मा


भारत में नवजागरण गहरी उत्सुकता का विषय रहा है। यह उत्सुकता ही समय समय पर नवजागरण के संदर्भ में नए-नए स्रोतों के उत्खनन उसका परिवर्धन और कई बार तो एक दूसरे के विचार पर अपने उत्खनन से उत्पन्न विचार द्वारा हमले के रूप में सामने आता है। इक्कीसवीं सदी में नवजागरण पर विचार एक दूसरे पर हमले करके नहीं किया जा सकता बल्कि नवजागरण के संदर्भ में कुछ नया जोड़ने और बौद्धिक बहस में अपना योग देने के लिए किया जाना चाहिए। अपने इस योग को हम उन्नीसवीं सदी के दौरान तमाम विचार सरणियों के मुठभेड़ से निर्मित करना चाहते हैं। यह उम्मीद करता हूँ कि इक्कीसवीं सदी के नए राजनीतिक और समाजार्थिक मुठभेड़ के परिदृश्य में इस मुठभेड़ को देखना अर्थ के नए स्तर का खुलासा करेगा।

नवजागरणकालीन भारतीय साहित्येतिहास औपनिवेशिक भारत की निर्मितियों और इन निर्मितियों के अपने अंतरद्वंद्व से जुड़ा हुआ है। औपनिवेशिक भारत की निर्मितियों में दो किस्म की धारा हमें मिलती है। एक, जिसमें कई देशी चिंतन पद्धतियाँ हैं जिनमें परंपरावादी और सुधारवादी शामिल हैं जो नवजागरण की सामाजिक, सांस्कृतिक सुधार की तमाम परियोजनाओं में शामिल हैं; और दूसरा, पश्चिमी ज्ञान सरणियों के प्रभाव से जुड़ी हुई परियोजनाएँ हैं जिनसे अनेक चिंतक जुड़े हुए हैं। दोनों में 'पहचान' का सवाल मुख्य है। औपनिवेशिक भारत में 'पहचान' के सवाल से जुड़े हुए चिह्न, उसकी व्याख्या के दृष्टिकोण और उस चिह्न तथा उस व्याख्या से अपने अतीत, अपनी अस्मिता को तलाशने, तराशने और स्थापित करने (जिद की हद तक) जिससे भारत के भविष्य की दिशा परिभाषित हो सके, की कोशिशें प्रमुखता से मिलती हैं। संपूर्ण उन्नीसवीं सदी में 'पहचान' की आकांक्षा गतिमान दिखलाई देती है। इस पूरी परियोजना में ब्रिटिश विद्वान, भारतीय चिंतक और बुद्धिजीवी, धर्म सुधारक, साहित्यकार, मिशनरियाँ, कई सभाएँ और समाज, बहुस्तरीय संस्थान आदि अपनी विभिन्न अर्थ छवियों और रूपाकारों के साथ शामिल हैं, और मुठभेड़ करते हुए दिखलाई देते हैं। औपनिवेशिक भारत की इस परियोजना में भारतीय समाज और उसकी जनता के उत्थान और जागरण सर्वप्रमुख मुद्दा है, लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि भारत में अंग्रेजों ने उत्थान और जागरण के लिए जितनी भी परियोजनाएँ चलाई वे केवल उत्थान और जागरण के लिए ही थीं? इसका उत्तर सरल नहीं है इसी कारण इस परियोजना में भारतीय जनता अपनी स्थानीय विशेषताओं के साथ, अपने समय की सचाइयों और अपने मुद्दों की यथार्थ समझ के साथ कभी शामिल होती है और कभी दूर चली जाती है। हम यहाँ इसी परिप्रेक्ष्य में उन्नीसवीं सदी के मुठभेड़ को नवजागरण के संदर्भ से समझने की कोशिश करेंगे।

यूरोप के आल्प्स पर्वत श्रृंखलाओं की उत्तरी और दक्षिणी तलहटियों में बसे बड़े से भूभाग पर पसरती नई ज्ञान की धाराएँ भूमध्य सागर को पार करती, हिमालय की महान श्रृंखलाओं को लाँघती हुई जब, दुनिया के सबसे पुराने और सबसे नवीन भूखंड भारत में पहुँचती हैं तब, भारत मुगलिया सल्तनत और भारतीय सामंतों के बिखरावों और ध्वंसावशेष का गवाह बन रहा था और यहाँ के रजवाड़े अपनी-अपनी सल्तनत को सुरक्षित रखने के हर संभव उपक्रम में लगे हुए थे। आर्थिक और राजनीतिक लाभ के लिए ब्रितानी हुकूमत से समझौतों, षड्यंत्रों के पर्यावरण में उन्हें अपनी जनता के रंजों-गम से ठीक-ठीक कुछ लेना देना नहीं था। धीरे-धीरे ज्ञान के फैलाव ने धीमी गति से अपने तर्क के लिए जगह बनानी शुरू कर दी थी। राजा राममोहन राय इस धीमी गति के वाहक बने, और 1800 ई. में स्थापित 'फोर्ट विलियम कॉलेज' आदि इसके केंद्र बने। आगे चलकर, लगभग सौ साल में भारत में ज्ञान के प्रसार की गति ने अनेक रंग अख्तियार किए, अनेक मोड़ों पर रुके, अपना आत्म-विश्लेषण किया और अपनी दिशा भी बदली। इस पूरी गतिकी और ब्रितानी हुकूमत के फैले हुए मायाजाल पर 1909 में 'हिंद स्वराज' ने अपनी सभ्यता समीक्षा की। लेकिन यह समीक्षा अकस्मात नहीं थी बल्कि इसके बीज कहीं अतीत में दबे-छिपे थे।

सत्रहवीं शताब्दी के भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर जब अंग्रेजों ने अपना लंगर डाला था और अपने पाँव इस भूभाग पर पहली बार रखा था तो कौन जानता था कि वह धीरे-धीरे व्यापार के रास्ते हमारे देश के खेत-खलिहानों में हमारे किसानों के मन के विरुद्ध अपनी पसंद की फसल (नील की खेती) उगाने को बाध्य कर देगा; और हमारी उपजाऊ जमीन को बंजर कर उजड़ती हुई मिल्कियत में रूपायित कर देगा। हमारे कारीगरों और दस्तकारों की कला को धीरे-धीरे नष्ट कर एक मजदूर के रूप में रूपायित कर देगा। उत्पादन के समस्त साधनों पर कब्जा कर हमारे श्रम को बिनमोल गुलामों की तरह अपनी सत्ता के पहिये में टाँक देगा। हमारे जीवन-राग की लय को अवरुद्ध कर देगा। संभवतः इसी कारण कार्ल मार्क्स ने 'भारत में ब्रिटिश राज के भावी परिणाम' में लिखा, " भारत में अंग्रेजों के राज का इतिहास केवल नाश की ही कहानी है; खंडहरों के ढेर में से उनका रचनात्मक काम शायद ही दिखाई पड़ता है। फिर भी इस काम का आरंभ हो चुका है... भारतीय समाज के पुनर्निर्माण का एक नया और सशक्त साधन आजाद अखबार है, जिनसे एशियाई समाज पहली बार परीचित हो पाया है और जिनका संचालन मुख्यता भारतीयों और योरोपियनों के समाज वंशज कर रहे हैं।" गौर से अगर भारत के इतिहास को चाहे वह राजनीतिक हो या समाजार्थिक पढ़ा जाए तो भारत में अंग्रेजों को लेकर हमेशा से एक दुविधा, एक दुचित्तापन दिखलाई देता है। वे अच्छे थे या बुरे। इन दोनों निकषों पर बार-बार चर्चा होती है लेकिन स्पष्टता से यह कभी नहीं कहा जा सका कि वे अच्छे थे या बुरे। उपनिवेशवाद की आलोचना में तो प्रखरता दिखलाई देती है लेकिन यूरोपीय सभ्यता के प्रति एक उदार रुख हमेशा मौजूद हुआ करता है। उन्नीसवीं सदी के नवजागरण की एक अंतर्धारा औपनिवेशिक पद्धतियों के प्रभुत्व से जुड़ी हुई है तो दूसरी भारतीय चिंतन की पद्धति से जुड़ कर औपनिवेशिक सभ्यता से टकराहट से आगे बढ़ती है। एक तरफ महात्मा ज्योतिबा फुले अंग्रेज सत्ता को ब्राह्मण के देशी शासन से ज्यादा बेहतर कह रहे थे तो भारतेंदु कृष्ण के उपासक बने हुए थे। दयानंद सरस्वती मूर्तिपूजा के विरोधी बने हुए थे। इस प्रकार की तमाम अंतरधाराएँ, तमाम अंतर्द्वंद्व उन्नीसवीं सदी के नवजागरण की विशेषता हैं और एक स्तर पर सीमा भी। वर्तमान समय में वैश्वीकरण को लेकर यही दुविधा, यही दुचित्तापन है। भारतीय नवजागरण में औपनिवेशिक सभ्यता के विरोध, समर्थन और राष्ट्रीय चेतना के बीच एक तनाव हमेशा व्याप्त है। उन्नीसवीं सदी के नवजागरण का यह दौर एक स्तर पर बुद्धिवादी जागरूकता का है और दूसरे स्तर पर एक राष्ट्रीय आत्मपहचान का दौर है। शुरुआत में यह आत्मपहचान उन्नीसवीं सदी के औपनिवेशिक भारत में बड़े पैमाने पर अनुवाद से जुड़ा हुआ था यानी एक 'अनूदित आत्मपहचान' का निर्माण हुआ था। सखाराम गणेश देउस्कर की किताब 'देश की बात' की भूमिका में मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि, "भारत में जब नवजागरण की शुरुआत हुई, तब भारत का शिक्षित समुदाय एक विचित्र स्थिति का सामना कर रहा था। 18वीं और 19वीं सदियों में भारतविदों द्वारा भारतीय पाठों के अंग्रेजी तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं में जो अनुवाद हुए थे वे यूरोप के लिए हुए थे, लेकिन अधिकांश भारतीय शिक्षित लोग इन अनूदित पाठों को ही भारतीय कानून, दर्शन और साहित्य आदि के ज्ञान का मूल स्रोत मान रहे थे। यही नहीं, वे उन पाठों के माध्यम से भारतविदों द्वारा निर्मित भारत, भारतीयता, भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास संबंधी विचार-विमर्श तथा आख्यान को प्रामाणिक मानकर ग्रहण कर रहे थे, क्योंकि वे अनुवादकों की दृष्टि,पद्धति और पाठों को स्वाभाविक समझ रहे थे।" हम जानते हैं औपनिवेशक भारत के नवजागरण के दौर में अधिकांश चिंतक प्रमुख अनुवादक भी थे। हिंदी नवजागरण में भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीरप्रसाद द्विवेदी आदि ने कई ग्रंथों के अनुवाद किए। हिंदी में सबसे अधिक अनुवाद नवजागरण के दौर में बंगला से हुआ था। तात्पर्य यह कि अभी तक अनुवादों के माध्यम से पढ़े गए पाठों के आधार पर चेतना का निर्माण हो रहा था जिसे हम 'अनूदित चेतना' कह सकते हैं। भारतीय नवजागरण के लिए अभी भी एक क्रांतिकारी परिघटना की जरूरत थी। एम.एन. राय के मशहूर लेख 'भारतीय नवजागरण की पूर्व शर्तें' नवजागरण के दर्शन को खालिस अपने यथार्थ की जमीन पर तलाश करने पक्ष की संकल्पना करते हैं। जिसमें महान चीनी दार्शनिक 'ह्यू शी', जिन्हें चीनी नवजागरण का जनक कहा जाता है के विश्लेषण के हवाले से और भारतीय जमीन की यथार्थ समझ से एम.एन. राय एक निष्कर्ष निकालते हैं "भारत में आसन्न नवजागरण उन 'महान व्यक्तियों' के नेतृत्व में नही आ सकता, जो अपनी उपदेशपरक राष्ट्रीयता एवं घिसे-पिटे आध्यात्मिक मतवादों के बावजूद सच्चे या अच्छे रूप में प्रतिक्रिया की हिमायत करते हैं। भारत में नवजागरण एवं क्रांतिकारी दर्शन के झंडा तले ही आएगा।" भारतीय नवजागरण के दौर में यह भी लक्षित किया जाता है कि एक स्तर पर पश्चिमी सभ्यता से लगातार संपर्क बनाए जाने की कवायद चलती रहती है और दूसरे स्तर पर अपने जातीय अतीत से संवाद का आग्रह भी बनाए रखती है। दरअसल भारतीय नवजागरण का यह लक्षित प्रतिरूप अपने समय में भिभिन्न 'वर्ग समूहों' में आपसी जिरह से उत्पन्न हुआ है। और यही नवजागरण को संतुलन प्रदान करता है और उसे 'भारतीय' किस्म का भी बनाता है। इन्हीं आधारों पर भारतीय नवजागरण के प्रतिरूप को बहुवचनात्मक प्रतिरूप वाला कहा जा सकता है। इसमें कई चिंतनधाराएँ जिरह करती हैं, साथ चलती हैं, दूर हो जाती हैं लेकिन अंततः अपने मूल में एक ही तरह के मुद्दों पर अपनी स्थानीय विशेषता के साथ साथ खड़ी होती हैं।

भारतीय साहित्येतिहास में नवजागरण एक दरवाजे की तरह है जिसे खोलकर हम अपने अतीत को तार्किक निगाह से देख सकते हैं और उसके आधार पर अपने भविष्य के तार्किक रास्तों का अन्वेषण कर सकते हैं। हम जरा इस पर गौर करें कि कैसे 1857 की क्रांति में चर्बी वाला कारतूस 1909 के 'हिंद स्वराज' में डॉक्टर की दवाइयों में शामिल हो जाता है, जिसकी चिंता महात्मा गांधी को 'हिंद स्वराज' के बाद भी रहती है। 1800 ई. में राजा राममोहन राय की प्रथम उपलब्ध कृति 'तुहफात-ए-मुवाहिदीन' धर्म के उद्देश्यों और उसकी धार्मिक प्रणाली पर पर विचार करती हुई और कुरान के उद्धरणों को प्रस्तुत करती हुई महात्मा गांधी के 'सनातन धर्म' के विचार में समा जाती है। इसी प्रकार विवेकानंद, राधाकांत, दयानंद, केशवचंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा फुले और भारतेंदु के विचार और कार्य के साथ-साथ स्वयं के 'होने' का इतिहास किन द्वंद्वों से होकर गुजरा है। धर्म के संदर्भ से उन्नीसवीं सदी को देखे जाने पर एक बात जो सामने आती है वह यह कि शुरुआत में राजा राममोहन राय के समय में धर्म का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विकास हुआ था। यह परिप्रेक्ष्य एक आगे बढ़ा हुआ कदम माना गया था और यही भारतीय नवजागरण की अपनी मौलिकता भी थी लेकिन जैसे-जैसे यह आगे बढ़ता गया इसमें से वैश्विक परिप्रेक्ष्य धीरे-धीरे समाप्त होने लगा एक खास किस्म की रूढ़िवादिता आने लगी। बंकिम चंद्र ने 'हिंदू धर्म के महान सिद्धांत सभी योगों और समस्त मानव जाति के लिए अच्छे हैं' की धारणा को मानते हुए और दयानंद सरस्वती ने हिंदी प्रदेश में वेदों को आदर्श मानते हुए अपने जीवन को सामाजिक कार्य के लिए समर्पित किया। इन दोनों से पहले महाराष्ट्र में राजवाड़े हिंदू धर्म की एक अलग व्याख्या कर रहे थे, जो ज्यादा कट्टर और रूढ़िवादी था। यदि उन्नीसवीं सदी उतरोत्तर विकास करती हुई सदी थी, चेतनशील होती हुई सदी थी, शिक्षित और आत्मनिर्भर होती हुई सदी थी तो धर्म के मामले में कट्टर क्यों होती जा रही थी। धर्म के इस पूरे परिप्रेक्ष्य में हमे उन्नीसवीं सदी के नवजागरण को देखना चाहिए तब शायद तसवीर साफ और किंचित अधिक तार्किक दिखलाई देगी। धर्म के इस पूरे परिप्रेक्ष्य को यहाँ स्थगित रखते हुए उन्नीसवीं सदी के कुछ और मुठभेड़ों की तरफ चलते हैं।

भारतीय नवजागरण के संदर्भ से बात करते हुए एक बड़ा दरवाजा कला के संदर्भ से खुलता है। जिसकी पृष्ठभूमि में चित्र, संगीत की मजबूत परंपरा मौजूद रही है। भारत में लघु चित्रकारी का इतिहास हमें ग्यारहवीं शताब्दी के तालपत्रों पर बनाए उन जैन लघु चित्रों में मिलता है जिसका इस्तेमाल मोटे तौर पर जैन धर्मग्रंथों को चित्रित करने के लिए किया जाता था। मुगलिया दरबार में इस प्रकार के चित्रों को खूब प्रश्रय मिला। अकबर के दरबार में दो ईरानी चित्रकारों का जिक्र आता है, अब्दुस्समद और मीर सैयद अली। इन दोनों चित्रकारों ने भारत में चित्रकारों को एकत्र कर उसको प्रशिक्षित करने का काम किया। माना जाता है जहाँगीर के समय में इसका विकास अपने चरम पर था। अठारहवीं सदी में पंजाब के पहाड़ी अंचलों में लघु चित्रकला का विकास हुआ। राजस्थान और कांगड़ा के लघु चित्रों में सौंदर्यबोध का उच्चतम रूप दिखलाई देता है। यहीं से चित्रकला बंगाल के गाँवों तक और रवींद्रनाथ के चित्रों में पहुँच गया था। उन्नीसवीं सदी के चित्रकला के विषय पर सामान्यता भारत की प्राचीन, मध्यकालीन ललित कला की परंपरा मौजूद हुआ करती थी; यही कारण है कि विकसित होती चित्रों के प्रतिरूप में अधिकांश तैल चित्रों के विषय में धार्मिक और पौराणिक विचारों की प्रधानता मिलती है। तैल चित्रों में त्रावनकोर के राजा रवि वर्मा का नाम महत्वपूर्ण माना जाता है। नवजागरण काल की महत्वपूर्ण पत्रिका 'सरस्वती' में राजा रवि वर्मा के चित्रों को प्रकाशित किया जाता था। इन चित्रों के प्रकाशन से हिंदी का एक बड़ा समुदाय जो ललित कला प्रेमी था प्रभावित हो रहा था। 1854 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में आर्ट स्कूल की स्थापना को उन्नीसवीं सदी के ललित कला विद्या में एक परिवर्तनकारी पड़ाव के रूप में जाना जाता है। भारतीय चित्रकला को एक नई दिशा देने का काम इस आर्ट स्कूल ने किया था। संगीत अपनी ध्वनियों और शब्द लहरियों से भी भारतीय जनता के मानस तक अपनी यात्रा क्रमशः इतिहास के विकास क्रम के साथ आगे बढ़ा और उन्नीसवीं सदी की चिंतनधारा को प्रभावित किया। कहा जाता है, बैजूबावरा जो अकबर के दरबार में थे और इसी दरबार में तानसेन भी थे; 'मानकुतूहल' नामक संगीत की पहली किताब बैजूबावरा ने लिखी। भारतीय संगीत दरअसल ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में इस्लामी सभ्यता के बड़े पैमाने पर प्रसार ने उत्तर भारतीय संगीत की दुनिया का महत्वपूर्ण विस्तार किया और यह विस्तार उन्नीसवीं सदी के नवजागरण के दौर तक संगीत में ध्वनित होता है। अठारहवीं सदी की उर्दू शायरी जिसमें सौदा (1713-1780), मीर (1720-1810) और दर्द (1719-1785) सबसे प्रमुख हुए, ने न केवल उर्दू शायरी को उत्कृष्ट रूप प्रदान किया बल्कि इस पूरी शताब्दी के जन-मानस को झकझोरा और अपने समय की युगीन परिस्थितियों से रु-ब-रु कराया।

औपनिवेशिक सभ्यता में भाप वाली मशीन का आविष्कार एक ओर इंग्लैंड के समाज को औद्योगिक क्रांति के युग में ले जा रहा था वहीं भारत में श्रम को उजरती अवस्था में तब्दील कर रही थी। उसके हाथों के काम को छीनकर मशीन के हवाले कर दिया जा रहा था। भाप वाली मशीन ने औपनिवेशिक सभ्यता के लाभ के लालचों को बढ़ाया जो हमारे उपजाऊ खेतों में फैलता जा रहा था। उन्नीसवीं सदी के बंगाल में चावल और चीनी के बदले पटसन उत्पादन करने का सिलसिला चल निकला, पटसन से अंग्रेजों और कुछ भारतीय व्यापारियों को फायदा हो रहा था। पटसन सीधे-सीधे नकद में तब्दील हो रहा था, लेकिन उन्होंने यह नही देखा कि धीरे-धीरे देश में अन्न की कमी होती जाएगी। धीरे-धीरे अन्न में लगातार कमी होती गई और बंगाल भुखमरी का शिकार होता गया। इस प्रकार के पूरे परिवेश को लेकर एक आर्थिक नवजागरण का इतिहास लिखा जा रहा था, जिसमें दादाभाई नौरेजी, महादेव गोविंद रानाडे, गोपालकृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी की परियोजना शामिल थी। इंग्लैंड भारत से किन पद्धतियों से धन ले जा रहा है और रानी विक्टोरिया की तिजोरी को किस तरीके से भर रहा है, उसकी व्याख्या इन चिंतकों ने की है और जन-मानस को बड़े स्तर पर प्रभावित किया खासकर जो नव शिक्षित वर्ग के थे। राजा राममोहन राय से लेकर विवेकानंद और उससे आगे महात्मा गांधी तक बौद्धिक लोगों में व्यक्ति की गरीबी और असमानता की चिंता मिलती है। 'दरिद्रनारायण' (विवेकानंद) से लेकर 'अंतिम व्यक्ति के दुख-दर्द' (महात्मा गांधी) की चिंता इनके विचारों के केंद्र में हुआ करती थी। यहाँ यह कह देना उचित होगा कि राजा राममोहन राय की 'तुहुफात' और बंकिम की रचना 'साम्य' दोनों अपने समय में असमानता और गरीबी के विरुद्ध और समानता के पक्ष में लिखे गए श्रेष्ठ साहित्य हैं। जिसका गंभीर पाठ किया जाना जरूरी है। "केशवचंद्र सेन ने 'अपने स्वार्थ की पूर्ति या विलासिता का जीवन जीने के लिए भारत की संपत्ति, धन-दौलत और संसाधनों' के उपयोग के अंग्रेजों के अधिकार पर आपत्ति की।" सवाल यह है कि जब, भारत में उजरती श्रम के कारण अकाल और गरीबी आ रही थी और 'पैय धन विदेश चली जात यही अति ख्वारी' की चिंता थी तो क्या भारत में नवजागरण एक गरीब होते देश का नवजागरण है; जो अपनी 'अस्मिता' की चिंता में डूबा हुआ है और उन्नीसवीं सदी के लगभग बीच में एक क्रांति का गवाह बन चुका है, जिसके कारण भारत में अंग्रेज ज्यादा संस्थागत रूप से काबिज हो गए थे। भारत में नवजागरण आखिर कितनी परतों में था? नवजागरण के संदर्भ से भारतीय साहित्येतिहास की कितनी परतें हो सकती हैं? दरअसल, भारतीय नवजागरण जैसा कि कहा गया है बहुवचनात्मक किस्म का है, इसमें एक ही साथ राजा राममोहन राय 'संवाद कौमुदी पत्रिका में,' अक्षयकुमार 'तत्वबोधिनी पत्रिका' में, दयानंद 'सत्यार्थ प्रकाश' पत्रिका में, बंबई में बाल शास्त्री जांभेकर 'दिग्दर्शन' पत्रिका में, दादा भाई नौरोजी 'रस्त गोफ्तार' पत्रिका में, यंग बंगाल 'ज्ञानान्वेशन' पत्रिका में जैसे कई चिंतकों और कई पत्रिकाओं में एक किस्म का सामूहिक वातावरण निर्मित हो रहा था। नवजागरण के बहुस्तरीय होते हुए भी और उसके समय में अंतर होते हुए भी अपनी देशी जातीय पहचान में एक जैसा था। इन पत्रिकाओं में वे अपनी स्थानीय भाषा में ही अपनी बात लिख रहे थे। 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल' जैसे नारे के साथ भारतेंदु भाषा की महत्ता को तलाश कर रहे थे। दरअसल, राष्ट्रीयता और उसकी चेतना का विकास अपनी ही भाषा में होता है। औपनिवेशिक भारत में भले ही अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त वर्ग का विकास हो रहा था लेकिन उनको राष्ट्रीय चेतना के लिए अपनी ही भाषा में आना होता था। उन्नीसवीं सदी में शिक्षा संबंधी तमाम जिरह में देशी शिक्षा प्रणाली अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती हुई दिखलाई देती है। इस दौर में मोटे तौर पर शिक्षण संस्थाओं को दो स्वरूपों में करके देखा जा सकता है। एक वह जिसमें देशी प्राथमिक पाठशालाएँ थीं और दूसरी वे थीं जिसमें उच्च शिक्षा संस्थान थे। इन प्राथमिक पाठशालाओं के भी दो रूप थे एक जिसका सरंक्षण जमींदारों द्वारा किया जाता था और दूसरा जो अपने गाँव या शहर के समुदायों से सहायता प्राप्त करती थी। दूसरे संस्थान के संचालन में विद्यार्थियों के अंशदान की भूमिका हुआ करती थी। भारत में शिक्षा के संदर्भ में मद्रास प्रेसिंडेसी के संबंध में टामस मुनरो की 1822 की रिपोर्ट, बंबई प्रेसिडेंसी के संबंध में माउंट एलफिंस्टन की 1823 की रिपोर्ट और बंगाल प्रेसिडेंसी के बारे में विलियम एडम की 1835-1838 की रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण रिपोर्ट हैं। विलियम एडम ने अपनी रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया था कि "उन्नीसवीं सदी के आरंभ में बंगाल में 1,00,000 देशी पाठशालाएँ थीं। प्रांत की आबादी का हिसाब 4,00,00,000 रखते हुए एडम इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि प्रत्येक 400 की आबादी पर एक ग्रामीण पाठशाला थीं।"

उन्नीसवीं सदी के वातावरण की निर्मिति में मुख्यतः साहित्य पर उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों और उनके द्वारा प्रचारित विषयों का प्रभाव लक्षित किया जा सकता है। उन्नीसवीं सदी में सामाजिक-सांस्कृतिक विचारों के जद्दोजहद में जो भिन्न किस्म के तनाव हमें दिखलाई देते हैं, उसे मोटे तौर पर विचारधारा की निर्मिति में एक अनुपूरक के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। विचारों की इस जद्दोजहद में एक की दिशा परंपरा, संस्कृति और विचारधारा के प्रतिगामी प्रवृतियों के विरुद्ध थीं और दूसरे की दिशा औपनिवेशिक सभ्यता और संस्कृति के प्रतिरोध से उपजी थी। इस जद्दोजहद में विचारों के इतिहास की निर्मिति दो तरह से संपन्न होती है। एक जो पश्चिम की शिक्षा से प्रभावित होकर अपनी जड़ों की ओर लौटे और दूसरी वे जो अपने मूल विचारों को हमेशा भारतीय जड़ों में ही ढूँढ़ा। राजा राममोहन राय के पाश्चात्य और भारतीय परंपरा के विचार में समन्यव के बाद, विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक और जवाहरलाल नेहरु जैसे कई उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के आरंभिक दशक की बौद्धिक जमात पाश्चात्य ज्ञान से पहले प्रभावित होते हैं और फिर बाद में भारतीय ज्ञान के स्रोतों की ओर लौटते हैं। दूसरी तरफ राधाकांत देव, दयानंद सरस्वती, नारायण गुरू पूर्णतया भारतीय परंपरा की ज्ञान सरणी की उपज हैं। विचार की इन दोनों दृष्टियों में यह बात समान रूप से रूप से उभर कर आती है कि औपनिवेशिक सत्ता के चरित्र को समझने में भारत में ब्रिटिश और देशी सरकारों को समझने में कोई भेद नहीं किया। यह माना कि सत्ता के शोषण का चरित्र एक होता है चाहे वह विदेशी हो या देशी। इन दृष्टियों या विचारों के मूल में पारंपरिक संस्कृति के पिछड़े-तत्वों के विरुद्ध संघर्ष तथा समाज के आधुनिकीकरण की विचारधारा और भविष्य की योजना बनाने को लेकर थी, जिसमें भारतीय जमीन पर फैली हुई कई भाषाएँ, धर्म, कलाएँ, दर्शन, विचार आदि के चिन्हों का समावेश किया जाना था। क्योंकि इन्हीं चिन्हों के आधार पर भारत के अतीत पर उपनिवेशवादी लोगों ने भारत के इतिहास पर अधिकार किया था और भारतीय जनता को वास्तविक इतिहास से वंचित कर दिया था जिसमें जेम्स मिल का भारतीय इतिहास का काल-विभाजन, मार्शमैंन का सामाजिक रीति-रिवाजों का वर्णन, हेनरी बेवरिज का धार्मिक आचार-व्यवहारों का विवरण तथा ऑर्म का अंग्रेजों की सैनिक सफलता का स्पष्टीकरण जैसी धारणाएँ हमारे मानस पर अंकित कर दी गईं थीं। वास्तविक इतिहास से वंचित तो आज भी भारतीय जनता है और सांस्कृतिक उपलब्धियों के नवजागरण के बाद एक 'नागरिक नवजागरण' की जरूरत तो आज भी है।


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