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कहानी

फूल
एलिस वॉकर

अनुवाद - यादवेंद्र


म्योप मुर्गीखाने से सुअरों के बाड़े तक और वहाँ से धुएँ वाले कमरे में फुदकती हुई चली गई - उसको लगा इतने सुहाने दिन उसने पहले कभी नहीं देखे। उत्सुकता भरी हवा चारों ओर पसरी हुई थी जो उसकी नाक में रह रह कर चिकोटी काट रही थी। मक्का, कपास, मूँगफली और स्क्वॉश की फसल पक चुकी थी और हर रोज इनके साथ जुड़ा हुआ नया तजुर्बा उसको खूब खूब उत्साहित कर रहा था... इस अनूठे आनंद से उसका शरीर सिहर सिहर जाता।

म्योप के हाथ में एक छोटी सी गोल हत्थे वाली छड़ी थी... जो चूजा उसको लुभाता हौले से उसके ऊपर वह छड़ी का सिरा रख देती... और सुअरों के बाड़े के घेरे के इर्दगिर्द अपनी पसंद के एक गाने की धुन गुनगुनाते हुए घूम रही थी। धूप की तपिश में वह खुश और हल्का महसूस कर रही थी। वह थी भी तो महज दस साल की और उसके लिए उसका गीत और साँवली हथेली में थामी हुई छड़ी सरीखे साजो-सामान के सिवा भला किस और चीज का महत्व था।

म्योप वहाँ अपने केबिन से धीरे धीरे आगे बढ़ती हुई आहाते के तार लगे बाड़ तक आई तो सामने हाल की बरसात में बन गए एक नाले पर उसकी नजर पड़ी। इस नाले से ही उसके घर का पीने का पानी जाता था - उसके आसपास सिल्वर फर्न और जंगली फूल खिले हुए दिखे। इसके पास आकर सुअर लोटते थे। म्योप का ध्यान मिट्टी के ऊपर काली परत के बीच से बाहर निकलते सफेद बुलबुलों की ओर अनायास चला गया जिनके कारण गीली मिट्टी कभी उठ रही थी कभी गिर रही थी।

घर के पिछवाड़े के जंगल में म्योप पहली बार नहीं आई थी, इधर आना उसका प्रिय शगल था। पतझड़ के मौसम में नीचे गिरी पत्तियों के बीच से बादाम के फल बीन कर लाने के लिए उसकी माँ कई बार उसको इधर लेकर आई थी। आज वह अपने आप इधर आ गई, डालियों को इधर उधर परे हटाती हुई पर उसका ध्यान हर पल साँपों से बचने पर लगा रहा। फर्न और दूसरे फूलों पत्तियों के अलावा आज म्योप को नीले रंग के अजीब से फूल और झाग की तरह दिखने वाले भूरे रंग की कलियों के गुच्छे दिखाई दिए जिनसे खूब भीनी भीनी सुगंध आ रही थी।

बारह बजते बजते वह अपने घर से कोई मील भर आगे निकल गई थी और उसके दोनों हाथ डालियों और फूलों से भरे हुए थे। ऐसा नहीं कि पहले कभी वह इतनी दूर तक नहीं आई थी पर आज वह जहाँ जा पहुँची थी वह अजनबी तो लग ही रहा था कहीं कुछ गड़बड़ भी लग रहा था। वह एक सँकरे खोह में पहुँच गई थी जिसमें पहले से कुछ उचाटपन मौजूद था। हवा नमी से भारी थी और आसपास बहुत गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।

इन सब से घबरा कर म्योप घर की ओर वापस मुड़ने को हुई... शांत माहौल में, जैसा सुबह सुबह घर से निकलते हुए उसको एहसास हुआ था। मुड़ते ही म्योप की नजर उसकी आँख से जा टकराई - दरअसल म्योप की जूती की हील उसकी भौं और नाक के बीच के गड्ढे में फँस गई थी ...उसको डर नहीं लगा पर घबरा कर वह अपने पाँव निकाल कर नीचे की ओर चली गई। जब उसने उसकी नंगे चेहरे को हौले हौले मुस्कुराते हुए देखा तो घबराहट में उसके मुँह से चीख निकल गई।

वह लंबे कद का आदमी था... पाँवों से लेकर गर्दन तक का धड़ एक तरफ और कटा हुआ सिर दूसरी तरफ पड़ा हुआ था। जब म्योप ने जिज्ञासावश पत्तियाँ टहनियाँ और जमी हुई मिट्टी वहाँ से हटाई तो उसके बड़े बड़े सफेद दाँत चमकते हुए दिखाई दिए हालाँकि नजदीक जाकर देखा तो उनमें से एक भी साबुत नहीं बचा था सब टूटे हुए थे। लंबी उँगलियाँ... और चौड़ी हड्डियाँ। उसके कपड़े तार तार होकर गल चुके थे... बस ब्लू डेनिम के कुछ धागे यहाँ वहाँ बचे हुए थे। उसके ओवरऑल के बकल अपनी चमक खो चुके थे और हरे रंग के दिख रहे थे।

म्योप ने इधर उधर निगाह दौड़ाई... जहाँ उसका सिर पड़ा था उसके बिलकुल पास जंगली गुलाब का गुलाबी फूल सिर उठाए खड़ा था। जैसे ही म्योप उसको तोड़ने झुकी और हथेलियों के अपने खजाने में शामिल किया उसकी नजर गुलाब के पौधे की जड़ के पास गोल उभरी हुई टीलेनुमा जमीन पर पड़ी जिसके ऊपर एक गोला बना हुआ सा दिखा। नजदीक जाकर देखा तो यह गले में डालने वाले फाँसी के फंदे का अवशेष था जिस से लंबा रस्सा बँधा हुआ था जो अब सड़ गल कर धीरे धीरे मिट्टी का हिस्सा बनने लगा था। निकट ही ओक का एक विशाल वृक्ष खड़ा था - इसी तरह का दूसरा फंदा उसकी एक टहनी में फँसा हुआ था... अब वह भी सड़ गल कर बदरंग और तार तार हो गया था पर हवा चलने से लगातार फड़फड़ा रहा था। इसको देखते ही म्योप के हाथों से जतन से थामे सारे फूल और टहनियाँ फौरन वहीं जमीन पर छूट गए।

म्योप की गर्मी की छुट्टियाँ वहीं एकदम से खत्म हो गईं।


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