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कहानी

रिजर्व फॉरेस्ट
सुविमली करुणारत्ना

अनुवाद - यादवेंद्र


कुछ साल पहले उनके घर के आसपास के जंगल को रिजर्व फॉरेस्ट घोषित कर दिया गया था। अपने बेटे सुनील के साथ बैठकर हीन बाँदा महकमे के कारिंदों को जंगल के चारों ओर बाड़ लगाते टुकुर-टुकुर ताकता रहा - एक प्रवेश द्वार बनाकर पीले रंग का बोर्ड भी लगा दिया गया, जिस पर लिखा था : 'फॉरेस्ट रिजर्व और सैंक्चुअरी'।

'इसका मतलब यह हुआ कि इस जंगल में अब हमारे घुसने की मनाही हो गई': हम शहर के व्यापारियों को यहाँ से ले जाकर लकड़ी नहीं बेच पाएँगे'। सुनील के पिता ने तल्खी के साथ कहा। उसकी झोपड़ी जंगल के बगल में पड़ने वाली पहाड़ी से लगी हुई थी, वहीं एक चट्टान पर बैठ कर सींक से अपने दाँत खोदते हुए वह कह रहा था।

'अब हम अपने चूल्‍हों के लिए लकड़ी कहाँ से लेकर आएँगे? जलावन तो हमें चाहिए ही... यहाँ से नहीं तो फिर किसी दूसरे जंगल से लेकर आएँगे', सुनील बोला। हीन बाँदा वहाँ बैठे-बैठे ही आसपास के जंगलों में मन ही मन विचरण करता रहा, उसकी नजरें जलावन के लिए यहाँ-वहाँ लकड़ी ढूँढ़ती रहीं। 'गोली मारो दूसरे जंगलों को...। जब हमारे घर के सामने इतना बड़ा जंगल है और सालों तक जलाने लायक लकड़ी है तब यहाँ वहाँ क्यों ठोकरें खाना?'

'वहाँ इसके गेट पर फॉरेस्ट गार्ड सुमनपाला रहता है' सुनील की माँ ने तेज आवाज में कहा। वह बाप-बेटे की बातें सुनकर घर से बाहर निकल आई थी : 'जंगल के अंदर घुसकर लकड़ी काटना... और उनको कंधे पर लादकर बाहर ले आना उनके रहते इतना आसान नहीं है... वह नहीं देख पाए तो दूसरे किसी गार्ड की नजर पड़ जाएगी' ।

'तुम अपना मुँह बंद ही रखो... मुझे इस जंगल का चप्पा-चप्पा मालूम है।' सुनील का पिता बोला : 'तुम क्या समझती हो, एक या दो गार्ड इतने बड़े जंगल पर नजर रख पाएँगे?'

हुआ भी यही, हीन बाँदा शुरू में जैसा समझता था - जंगल के अंदर घुसकर लकड़ी काटना और सबकी नजरें बचाकर सुरक्षित बाहर निकल आना आसान नहीं था। फॉरेस्ट गार्ड बेहद चौकस रहते और सामने पड़ जाने पर मुरव्वत बिल्कुल न बरतते।

'ये फॉरेस्ट गार्ड खुद को किसी बड़ी तोप से कम नहीं समझते; एक दिन हीन बाँदा ने अपनी पत्नी से कहा और देर तक डींगें हाँकता रहा; 'अरे हम नहीं जानते क्‍या उनकी हैसियत... जाने कहाँ-कहाँ के आवारा लड़के गार्ड बनकर चले आते हैं...। किसी दिन मेरे सामने पड़ जाएँ तो मैं उनको उनकी औकात बता दूँ।

'अब मेरे पास चूल्‍हे के लिए सिर्फ दो डालियाँ बची हुई हैं... लगता है मुझे कल सुबह दूसरी पहाड़ी की ओर रुख करना पड़ेगा', सुनील की माँ बोली।

'नाहक फि़क्र करती हो...। मैं ले आऊँगा न लकड़ी तुम्हारे लिए।' दारू की बोतल जल्दी-जल्दी में गटकता हुआ सुनील का पिता बोला।

अगली सुबह, अँधेरा रहते ही उसने सुनील को सोते से झकझोर कर जगाया। सुनील कुनमुनाते हुए उठा। "जल्दी से हाथ-मुँह धोकर तैयार हो जाओ, हमें जंगल में जाना है' पिता बोला। झोंपड़ी से जब वे बाहर निकले, रोशनी का नामोनिशान नहीं था। हाँ, आसमान में दूर कहीं हल्के पीलेपन के आसार नजर आ रहे थे। हवा में अच्छी खासी सिहरन थी, पर सुनील इस अप्रत्याशित यात्रा को लेकर बेहद उत्साहित था।

अपने पिता के साथ चलते हुए वह अपनी झोंपड़ी के पिछवाड़े वाली पहाड़ी पर चढ़ने लगा - रिजर्व फॉरेस्ट के अंदर जाने का यही रास्ता था। फॉरेस्ट के चारों ओर कँटीले बाड़ लगे थे... हीन बाँदा बेटे के साथ उसके पास पहुँचा तो उसने अपनी कुल्हाड़ी से निचले तार को दबा दिया और ऊपरी तार जितना संभव था ऊपर उठा कर अंदर जाने का रास्ता बना दिया...। वहाँ से पहले उसने सुनील को अंदर ठेल कर घुसा दिया, हालाँकि हड़बड़ी और घबराहट में तार में फँसकर सुनील की कमीज फट गई।

'इधर से बेवकूफ... देखो, तुमने क्या कर लिया, कमीज तार-तार कर डाली... बिल्कुल उल्लू के पट्ठे हो।' हीन बाँदा ने बेटे को जोर से डाँटा : 'अब खूब जोर लगाकर कुल्हाड़ी से नीचे वाला तार दबाए रहो...। ऊपर वाला तार और उठाओ... पूरी ताकत लगाओ।'

वह चीते जैसी फुर्ती दिखाते हुए बाड़ पार कर अंदर दाखिल हो गया... जंगल के अंदर पिता की फुर्ती का सुनील पहले से कायल था। वह छोटे जानवरों को पकड़ने के लिए जैसे जाल बिछाता... या परिंदों को मारने के लिए जैसे अचूक निशाने लगाता, उसका जवाब नहीं। दारू पीने कि उसकी लत ऐसी थी कि इसके चक्कर में उसने घर-बार सब लुटा दिया। हाँ, उस शर्मिंदगी से उबरने का उसने एक रास्ता खोज लिया था कि जब घर लौटेगा हाथ में जंगल से कोई न कोई चीज जरूर लाएगा... चाहे वह कोई शाक-भाजी या फल ही क्यों ना हो, पर कभी-कभार कोई जानवर या पक्षी भी उसके हाथ लग जाते। अपने खेतों में पैदा शकरकंदी के साथ जब सुनील की माँ गोश्त पकाकर परोसती तो बाप बेटे बड़े चाव से खाते...। भात तो कभी-कभार ही खाने को मिल पाता। जैसे-तैसे बेहद सीमित साधनों में वे अपना गुजारा कर रहे थे।

मुश्किल से कँटीले बाड़ पार करके वे कच्चे रास्ते पर आ गए - सुनील को जंगल के अंदर तक ले जाने वाले उस रास्ते का पता था। कुछ दूर उस पर चलने के बाद हीन बाँदा उससे परे हटकर पहाड़ी पर और ऊपर चढ़ने लगा...। सुनील भी घनी झाड़ियाँ लाँघते हुए पिता का अनुसरण कर रहा था। एक जगह रुक कर उसने पैरों को देखा तो दो जोंकें उनमें चिपकी हुई दिखीं।

जब वे दोनों पहाड़ी की चोटी पर पहुँचे हीन बाँदा थोड़ी देर को रुका और पहले एक पेड़ से कुछ टहनियों को छाँटा और उसके बाद पेड़ को काटने लगा। सुनील थोड़ा अलग होकर अपनी टाँगों में चिपकी जोंकों को निकालने की कोशिश कर रहा था।

साथ ही उसकी नजरें आस-पास कोई है तो नहीं इसकी पड़ताल भी कर रही थीं। 'यहाँ आओ सुनील तुम इन डालियों को नीचे ले चलना', पिता ने कहा। "जल्दी, बगैर थोड़ा भी समय गँवाए हुए''। दोनों ने मिलकर गिरे हुए पेड़ और डालियों को नीचे उतारा...। लगभग दौड़ते हुए। हीन बाँदा बेटे को और तेज चलने को कह रहा था - उसे भोर का धुँधलका घटता हुआ दिखाई दे रहा था और ऊँचे पेड़ों के शिखर से सूरज की किरणें जंगल के अंदर प्रवेश करने लगी थीं। रास्ते में पानी से चप-चप करती हुई एक घाटी मिली जिसमें पहुँचते ही तोतों का एक झुंड जोर-जोर से शोर मचाने लगा... अचानक पैदा हो गए शोर ने जंगल की शांति और लय को बिगाड़ दिया।

नीचे उतर कर जब वे तारों की बाड़ पारकर बाहर आए आसमान उजाले से भरने लगा था। सुनील की माँ ने भट्ठी सुलगा कर काली-कलूटी केतली उस पर चढ़ा दी थी। उनके घर पहुँचने की आवाज सुनकर उसने दरवाजे की तरफ मुँह उठाकर देखा और दरवाजे के सामने पड़े बहुमूल्य खजाने को देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई। 'इसको यहीं धूप में सूखने को छोड़ देते हैं', हीन बाँदा ने उससे कहा और अंदर रसोई में आ गया। उसने अपनी कुल्हाड़ी दीवार में लगी कील पर टाँग दी।

सुनील की माँ ने एक पिचके हुए टिन के मग में चाय की कुछ पत्तियाँ डालीं और ऊपर से खौलता हुआ पानी भर दिया। दीवार में लगे तख्ते पर एक डिब्बे में चीनी रखी थी। उसने डिब्बे को खोलकर चीनी के कुछ दाने अपनी हथेली पर रखे और पति से बोली 'तुम रोटी खा लो, पर आज रोटी के साथ और कुछ खाने को नहीं है... बस यही चाय है।'

हीन बाँदा का सारा जीवन जंगल के बाहरी हिस्से में ही बीता था और उसको अच्छी तरह मालूम था कि जंगल से क्या-क्या लिया जा सकता है। सुनील को भी अपने पिता की तरह जंगल की खासी जानकारी थी क्योंकि वह इसके अंदर और बाहर पिता के साथ होश सँभालने के बाद से ही भागता-दौड़ता रहा था। इतना करने पर भी जंगल सुनील की जीविका कभी नहीं बना, यह उसका खेल का मैदान जरूर था - स्कूल बंद होने के बाद वह अपने दोस्तों के साथ जंगल में अंदर तक चला जाता, बेर और आम तोड़कर भरपेट खाता और एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाते बंदरों पर पत्थरों से निशाना लगाता।

जंगल के अंदर एक बौद्ध मठ था जिसमें अनेक भिक्षु रहते थे। कई बार सुनील मठ में चला जाता और उनके बीच समय बिताता। मठ के प्रमुख हर रविवार भिक्षुओं को धार्मिक ग्रंथों के उपदेश समझाते, पर सुनील और उसके दोस्त अक्सर उन कक्षाओं से अलग ही रहते। पूर्णिमा के दिन शहर से भी अनेक श्रद्धालु मठ में आते और बैठकर ध्यान लगाते, उपदेश सुनते।

ऐसे ही एक दिन सुनील जब मठ में गया तो मठ के प्रमुख और फॉरेस्ट गार्ड सुमनपाला को आपस में बात करते हुए सुना : 'विदेश से एक फिल्म कंपनी आई है और वह लड़ाई पर आधारित एक फिल्म बनाने जा रहे हैं।' सुमनपाला मठ प्रमुख को बता रहा था। 'लड़ाई वाली फिल्म? किस लड़ाई के बारे में है?' प्रमुख ने अचरज से पूछा। "देखिए इस लड़ाई में बंदूक और बम चलेंगे और जंगल के बीच से वर्दी वाले फौजी कूच करेंगे"। "पर यह तो रिजर्व फॉरेस्ट है", मठ प्रमुख ने छूटते ही कहा। "फिल्म कंपनी के लिए शहर के इतनी नजदीक जंगल का सुभीता कहाँ मिलेगा, होटल वगैरह भी सब इतने आस-पास ही हैं''। "पर यह तो रिजर्व फॉरेस्ट है'', मठ प्रमुख ने अपनी बात जोर देकर दोहराई। 'सर, इसमें मेरा क्या दोष है, मैं तो बस हुकुम मानने वाला एक छोटा सा मुलाजिम हूँ' फॉरेस्ट गार्ड ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। घर पहुँचकर जब सुनील ने अपने पिता से इस बातचीत के बारे में बताया तो हीन बाँदा को बहुत गुस्सा आया। 'यदि फिल्म वालों ने जंगल से एक पत्ती भी तोड़ी तो मैं इन फॉरेस्‍ट गार्ड की खबर लूँगा। यदि एक टहनी भी यहाँ से टूटी तो देखना मैं इस साले सुमनपाला का क्या करता हूँ।' 'अरे इस बेचारे की क्या हैसियत, यह तो एक मामूली सा मुलाजिम है...। वैसे ही जैसे आप,' सुनील की माँ ने कहा। 'यदि उसको सहानुभूति दिखानी ही है तो मेरे जैसे छोटे आदमी पर दिखाए।' हीन बाँदा ने अविलंब जवाब दिया।

अगले दिन जब सुनील स्कूल से लौटा तो घर पहुँचते ही उसकी माँ ने जो पहली बात उसे बताई वह फिल्म कंपनी के जंगल में आने के बारे में बताई। 'एक के बाद एक गाड़ियों का जंगल के अंदर आना सुबह से चालू हो गया था... इन गाड़ियों से इतना शोर हो रहा था जैसे हम जंगल में नहीं बीच सड़क पर खड़े हैं'। "क्या वे चले गए?'' सुनील ने उत्तेजित होकर पूछा। 'मुझे पहले मालूम होता तो मैं पास जाकर उनको देखता और देखता कि वे कैसे फिल्म शूट करते हैं। मुझे लगता है छोटा-मोटा काम फिल्म कंपनी में मुझे भी मिल ही जाता। क्या वे फिर आएँगे? माँ ने थोड़े असमंजस के साथ जवाब दिया, 'मुझे तो नहीं मालूम बेटे, सुबह जब वे आए तो गाड़ियों का बहुत शोर था और ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों लोग जंगल को रौंदते हुए आगे बढ़ रहे हैं। बंदूक की गोली और बम के धमाके भी सुनाई दे रहे थे। दूर से मुझे धुआँ उठता हुआ भी दिखाई दिया। मुझे मालूम नहीं कि ऐसे में तुम्हारा उनके साथ काम करना सुरक्षित है भी कि नहीं।' सुनील ने जैसे-तैसे खाना खाया और जंगल की तरफ दौड़ पड़ा। परंतु अंदर जाने पर उसे न तो कोई आदमी दिखा और न ही कोई गाड़ी। उस दिन की शूटिंग पूरी करके फिल्म कंपनी जा चुकी थी। जंगल में एक अजी़ब और असहज खामोशी पसरी थी...। ऐसा लग रहा था जैसे जंगल अपनी साँसें रोक कर खड़ा है। सुनील ने आस-पास दूर तक नजर दौड़ाई, यहाँ तक कि पेड़ों पर सारे घोंसले खाली मिले। उनमें रहने वाले परिंदे घोंसलों को छोड़ कर जा चुके थे। पास की घाटी जो अक्सर तोतों की आवाज से गुलजार रहती थी वहाँ कोई भी तोता न तो नजर आया न उसकी आवाज सुनाई दी। हमेशा उधम मचाने वाले बंदर कहीं भी नजर नहीं आ रहे थे। पूरे जंगल में एक अजीब किस्म की गंध - बेहद अप्रिय गंध - भर गई थी। सुनील जंगल में अंदर तक चला गया। आगे जाकर उसे जमीन का एक ऐसा टुकड़ा दिखाई दिया जिसमें कटे हुए पेड़, डालियाँ और पत्तियाँ बेतरतीब ढंग से बिछे हुए थे...। छोटी झाड़ियाँ और घास जलाकर राख कर दी गई थी। सुनील अपने पैरों से जमीन पर पड़ी हुई पत्तियों और टहनियों को उल्टा-पुल्टा कर ही रहा था कि सामने से सुमनपाला आता हुआ दिखाई दिया। 'ए! यहाँ क्या कर रहे हो? आज अकेले?'' सुमनपाला ने मुस्कुरा कर पूछा। 'हाँ आज अकेले ही हूँ'। सुनील को अचरज हुआ कि हमेशा कड़क बोलने वाला सुमनपाला आज इतने अच्छे मूड में कैसे है। सुमनपाला ने अपनी जेब से सिगरेट की डिब्बी निकाली और उससे एक सिगरेट निकाल कर अपने होठों के बीच दबा ली। डिब्बी को उसने अपनी जेब में इस तरह रखा जिससे सुनील को मालूम हो जाए कि यह कितनी महँगी विदेशी सिगरेट है। इसके बाद उसने बड़ी अदा से एक चमकता हुआ लाइटर निकालकर सिगरेट सुलगाई। इसमें भी सुमनपाला ने ध्यान रखा कि सुनील की आँखों में लाइटर की चमक जरूर दर्ज हो जाए।

'अपने पिता को बोलना कि कभी-कभार यहाँ आकर जंगल से कुछ टहनियाँ ले जा सकते हैं', सुमनपाला ने सिगरेट के धुएँ का छल्ला बनाते हुए कहा। 'जब मैं उनका ध्यान रखूँगा तो वे भी मेरा ध्यान रखेंगे। छोटी-मोटी बातों के लिए लड़ना-झगड़ना क्या...। है न।' सुनील फॉरेस्ट गार्ड को जाते हुए पीछे से देखता रहा... आज उसकी चाल में खास तरह की अकड़ थी।


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