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कहानी

अपना खाना ख़ुद गर्म करो
इमरान साक़िब

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


मीटिंग ख़त्म हुई तो तमाम औरतें अपने घरों को रवाना होने लगीं। शाज़िया भी जाना चाहती थी लेकिन सुग़रा ने उसे ज़रा ठहरने को कहा, अरे बाजी मैं चली जाऊँगी। घर पे बेटी अकेली है, शाज़िया ने दरख़ास्त की। सुग़रा ने कहा, बस मैडम फ़ारिग़ हो जाएँ, कल की मीटिंग का पूछूँगी कि है या नहीं क्योंकि परसों तो प्रोग्राम है ना। अच्छा ऐसा करो तुम जाओ, मैं पूछकर तुम्हें बता दूँगी। जी बाजी शुक्रिया कह कर शाज़िया अपने घर को रवाना हुई। बत्तीससाला शाज़िया की बारहसाला बेटी माहीन घर में अकेली थी। उसे यही फ़िक्र हो रही थी। घर पहुँची तो देखा माहीन अपनी पड़ोस की सहेली के साथ पढ़ रही थी। अम्मी को आते देखा तो मुस्कुरा दी। सहेली ने कहा अच्छा माहीन अब मैं चलती हूँ। मेरी अम्माँ भी आ गई होंगी। शाज़िया ने कहा हाँ बेटा आ गई हैं, जाओ शाबाश। शाज़िया और माहीन साथ बैठ गईं। माँ बेटी को मीटिंग की दास्तान सुनाने लगी और वहाँ से लाई चिकन सैंडविच और समोसे भी दिए। अम्माँ को सुनते सुनते अचानक माहीन की हँसी ज़ोर से छूट गई और इसी अस्ना में मजीद भी घर में दाख़िल हुआ।

चालीससाला मजीद घर का वाहिद कफ़ील है। सरीये की फ़ैक्ट्री में मज़दूरी करता है। थका माँदा काम से घर आ चुका था लेकिन बेटी को हँसते देखकर उसकी सारी थकन काफ़ूर हो गई थी। मुस़्का के पूछा क्यों हँस रही है मेरी बिटिया रानी। माहीन ने उठकर अब्बा के हाथ से टिफिन लिया। बाप ने बेटी को प्यार से माथे पे बोसा दिया। कुछ नहीं बाबा बस यूँही अम्मी की इक बात पे हँसी आ गई। अच्छा मुझे नहीं सुनाओगी। अरे हाँ माँ बेटी की आपस की बात होगी। चलो कोई बात नहीं। मजीद ने जूते निकालते हुए कहा, शाज़िया कमरे के अंदर चली गई। माहीन ने अब्बा को पानी लाकर दिया पानी पीकर मजीद ने वाशरूम जाते हुए शाज़िया को आवाज़ दी। बेगम जल्दी खाना लगा दो मुझे जाना है काम पे। शाज़िया कमरे से बाहर आई, सेहन के कोने पे बावर्चीख़ाने के लिए मुख़तस हिस्से तक गई। वहाँ कुछ देर खड़ी कुछ सोचती रही फिर वापिस मुड़ कर अंदर कमरे में चली गई। माहीन सेहन में चटाई पे बैठी अपना स्कूल होमवर्क करती रही। मजीद हाथ मुँह धोकर सेहन में आया तो देखा खाना नहीं लगा था तो आवाज़ लगाई। शाज़िया खाना लगा दो भई मुझे देर हो रही है। शाज़िया चुप रही।

अरी सुन रही हो, मजीद ने दुबारा आवाज़ दी। अंदर से जवाब आया, हाँ सुन रही हूँ। ये कहकर शाज़िया कमरे से बाहर आ गई और तुम भी सुन लो अब से अपना खाना ख़ुद पकाया करो और गर्म भी ख़ुद ही किया करो, मैं नौकरानी नहीं हूँ तुम्हारी। मजीद हैरानी से बीवी का मुँह ताक रहा था। शाज़िया तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना, पिछले चौदह सालों में इक बार भी तुमने मुझसे ऐसे बात नहीं की। आज अचानक क्या हो गया तुम्हें। शाज़िया ने बरजस्ता जवाब दिया, हाँ पहले मुझे बेशऊरी की बीमारी थी। अब जाके मेरी तबीयत ठीक हुई है। पिछले चौदह सालों से मुझे होश ही नहीं रहा कि मेरी अपनी ज़िंदगी क्या है मेरे हुक़ूक़ क्या हैं। में भी कुछ हूँ मेरा वजूद मेरी ज़ात मेरे ख़ाब भी कुछ मानी रखते हैं। क्या-क्या क्या ये फ़लसफ़ियाना बातें कहाँ से सीख लें तुमने। पी.टी.वी. पे बानो क़ुदसिया का ड्रामा तो नहीं देख लिया तुमने। पास ही चटाई पे बैठी माहीन फिर से दबे होंठों हँसने लगी। अब्बा आपने आते ही मुझसे पूछा था ना क्यों हँस रही है मेरी बेटी तो अम्माँ की इऩ्ही बातों पे हँसी निकली थी मेरी।

अम्माँ आज सुग़रा बाजी के साथ औरतों की आज़ादी मीटिंग में गईं थीं। ओह अब समझ आया। अच्छा तो ये मुआमला है। ये जो दो तीन दिन से तुम सुग़रा के साथ मीटिंगों में जा रही हो तो वो तुम्हें यही सबक़ सिखा रहे हैं कि तुम अपने शौहर की ख़ानसामा हो। अपने घर में ग़ुलाम हो, तुम्हें आज़ाद होना है। सुग़रा का तो काम ही यही है। उसे इस काम के पैसे मिलते हैं, तुम क्यों मुफ़्त अपने घर का सुकून तबाह करने पे तुली हो, अरी पागल हो गई हो क्या? मजीद माहीन के पास बैठते हुए बोला। नहीं! कोई कुछ भी हो मुझे क्या पर ये तो सच्च है औरत मर्द की ग़ुलाम बनकर क्यों रहे। क्यों ज़िंदगी-भर उस की ख़ानसामा बनी रहे। आज मालूम हुआ सुग़रा बाजी और मैडम रीमा जैसी समझदार आज़ाद औरतें तुम मर्दों को क्यों अच्छी नहीं लगती क्योंकि वो मर्दों के दिमाग़ों का इलाज ख़ूब जानती हैं। बाहरी दरवाज़े की तरफ़ मुँह किए खड़ी शाज़िया ने क़दरे तनदही से कहा। मैडम रीमा, कौन, रीमा मजाज़! मजीद ने हैरानगी से पूछा, जी मैडम रीमा मजाज़। शुक्र है जानते तो हो उन्हें। देखा कामयाबी आप अपना तआरुफ़ है यही तो आज़ाद जीवन का दिलकश कमाल है। उन्होंने ऐसा अपना नाम बनाया कि तुम जैसे फ़ैक्ट्री मज़दूर भी उनको पहचानते हैं। अगर वो मेरी तरह घर में खाना पकाती, कपड़े धोती तो बर्बाद हो जानी थी ना उनकी शख़्सियत। अरी ओ मैडम शाज़िया ख़ातून लौट आओ। किस तारीक बंद गली में घुसने को रोशन शाहराह पे चहलक़दमी समझ रही हो?

मजीद ने क़दरे नाराज़गी से कहा, जानती भी हो मैडम रीमा कौन हैं। वो हमारी फ़ैक्ट्री के मालिक मजाज़ साहिब की बेगम हैं। फ़ैक्ट्री की सालाना तक़रीब में आती हैं तो इसलिए हम मज़दूर उनको जानते हैं। बेहद अमीर हैं, रुपया पैसा, जायदाद बहुत है उनके पास। ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है हममें और उनमें। हम ग़रीब लोग दो वक़्त की रोज़ी रोटी के लिए चार पैसा कमाने निकलते हैं लेकिन ये अमीर लोग नाम कमाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं। इनके घर में पचासों नौकर हैं तो खाना क्यों पकाएँगी, तुम ठहरी ग़रीब मज़दूर की बीवी जिसको तीन माह से तनख़्वाह नहीं मिली, उधार पे बड़ी मुश्किल से घर चल रहा है। ज़्यादा पैसे होते तो हम इस किराए के कच्चे मकान में ना रहते बल्कि अपने ज़ाती अच्छे घर में रहते, माहो को बड़े स्कूल में दाख़िल करवाते। ग़ुर्बत से बड़ी कोई गु़लामी नहीं होती। शाज़िया, ग़रीबी की ज़ंजीर वैसे दिखाई तो नहीं देती लेकिन इसमें लाखों करोड़ों इनसानों की जिंदगियाँ जकड़ी हुई है। तमाम ग़रीब ग़ुलाम हैं इसमें मर्द औरत का फ़र्क़ डालने वाले ग़ुलामों को घर के अंदर तक़्सीम करने की साज़िश रच रहे हैं। ये अमीर मैडमें ग़रीबी के ख़िलाफ़ क्यों बाहर नहीं निकलतीं। होश के नाखून लो शाज़िया, ये अमीर मैडम लोगों के चोंचले ग़रीब औरतों को शोभा नहीं देते।

मजीद ने उठते हुए कहा, अच्छा मत दो खाना बहुत थका दिया होगा तुम्हें मैडमों की मीटिंगों की बड़ी बड़ी बातों ने आराम कर लो थोड़ा। मैं चलता हूँ नयाज़ भाई की शर्बत की रेड़ी पे उस का हाथ बँटाने। आधी दीहाड़ी दे देगा तो सर से कुछ उधार उतर जाएँगे। माहीन अपनी जगह से उठी अरे नहीं अब्बा आप ऐसे ना जाएँ में अभी गर्म कर के लाती हूँ खाना। नहीं बेटा मैं वहीं नयाज़ भाई के यहाँ छोला डबल-रोटी खा लूँगा तुम खा लेना। शाज़िया मजीद की बातें सुन कर अंदर से दहल गई थी। उसे बहुत बेचैनी महसूस होने लगी। चौदह सालों में ये पहली बार है जब वो अपने ख़ावंद से इस बेक़दरी से पेश आई। वो मन ही मन ख़ुद को कोस रही थी फिर सिटपिटा कर उसने बाहरी दरवाज़े की तरफ़ मजीद को आवाज़ दी सुनिए, माहीन ने रुँधी हुई आवाज़ में कहा अब्बा काम पे जा चुके हैं अम्माँ।

दूसरे दिन सोशल एक्टिविस्ट बाजी सुग़रा मज़दूर आबाद की बहुत सी औरतों को चार बग़ैरहुड वाली सोज़ो क्यों में भर के मैडम रीमा के घर शहर के महँगेतरीन इलाक़े डिफेंस सोसाइटी ले गई। वहाँ हाल भरा हुआ था। ख़वातीन की ज़्यादा तादाद लोअर और लोअर मिडल क्लास औरतों पे मुश्तमिल थी। मीटिंग जारी थी। स्टेज पर पाँच महँगे कपड़ों में मलबूस सफ़ेद सुथरी रंगत वाली मैडमें बैठी हुईं थीं जिनमें से तीन साठ साल से ऊपर की थीं जिनके चेहरों पे झुर्रियों के बीच मस्नूई सुर्ख़ी कमाल फ़नकारी से गुज़ारी गई थी बिलकुल असली रंगत समान ऐसे जैसे गुलाब का फूल मुरझाते मुरझाते फिर से खुलने को पर तौल रहा हो। क़ीमती रंगीन साड़ी पहने माथे पे बिंदिया लगाई हुई माईक पे मैडम रीमा तमाम औरतों से मुख़ातिब थीं। हम औरतें अगर अपनी अहमियत अपनी ताक़त पहचान लें तो हम दुनिया बदल सकती हैं। वो कौन सा काम है जो औरतें नहीं कर सकतीं। आज औरतें जहाज़ उड़ा रही हैं, डाक्टर हैं, इंजीनियर हैं, खिलाड़ी हैं, कामयाब बिज़नस वूमन हैं और ये वो औरतें हैं जिन्होंने मर्द की गु़लामी को चैलेंज किया है। अपने बल बूते पर ख़ुद को मनवाया है। अगर हम औरतें मर्दों की गु़लामी से आज़ाद हो जाएँ तो हमें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। कल की रैली में बस हमारा एक ही नारा होगा जोकि तमाम मर्दों के लिए एक वाशिगाफ़ पैग़ाम है कि अपना खाना ख़ुद पकाएँ, अपना खाना ख़ुद गर्म करें, अपने कपड़े ख़ुद धोएँ, आप देख लीजिए ये सुनते ही मर्दों के पैरों तले ज़मीन निकल जाएगी। हम औरतों को मर्दों से नजात के लिए एक बाग़ी फ़ौज तैयार करनी है जो तमाम मुआशरे में इन्क़िलाब बरपा कर दे। इसके इलावा और कोई चारा नहीं। आप लोग अपनी बस्तियों में घर-घर जाकर ये पैग़ाम तमाम औरतों को दें कि बस अब मर्दों की मज़ीद गु़लामी नहीं करनी कल की रैली में हमारी गूँज मर्दों की नींदें उड़ा देगी। ये इब्तिदा है और हमारी ये जद्द-ओ-जहद औरत की आज़ादी तक चलती रहेगी।

मैडम रीमा तक़रीर ख़त्म कर के डाइस के पास ही खड़ी रहीं। मैडम रीमा की एनजीओ की ख़ुश-लिबास अट्ठाईस साला मुतवाज़िन ख़द-ओ-ख़ाल शोख़ रंग प्रोजेक्ट कोआर्डीनेटर माईक पे आईं और ज़ोरदार आवाज़ में कहा हमारी क़ाइद मैडम रीमा...। ज़िंदाबाद (हाज़िरीन का जवाब धीमा था)

अपनी मुहसिन अपनी रहनुमा के लिए और ज़ोर से पूरी क़ुव्वत से जवाब दीजिए हमारी लीडर मैडम रीमा...। ज़िंदाबाद (अब के हाल नारों से गूँज उठा) अब मर्दों को दो टूक जवाब दीजिए। अपने कपड़े... जवाब में हाल ज़ोर से गूँज उठा ख़ुद धोओ... अपना सालन... ख़ुद पकाओ... अपना खाना... ख़ुद गर्म करो। गूँजते हाल में शाज़िया एकदम परेशान बैठी सोच रही थी मैंने तो सुबह टिफिन तैयार किया था पर मजीद लेकर ही नहीं गया वो मुझसे नाराज़ है ना। ना जाने वो सारा दिन क्या खाएगा। फिर उसे याद आया आज तो उसे यहाँ नहीं आना था तो वो क्यों आई, हाँ अब याद आया।

इस बीच नारों की मश्क़ ख़त्म हो गई थी। मैडम रीमा अपनी सदारती कुर्सी पे बैठ गईं और दीगर मैडमों से गुफ़्तगू में महव हो गई। शाज़िया ने अपना हाथ खड़ा किया। सुग़रा की नज़र इस पर पड़ी। शाज़िया हाथ नीचे करो पहले मुझसे पूछो क्या बात है। शाज़िया ने कहा नहीं मुझे मैडम से पूछना है। सुग़रा ने उसे ग़ुस्सैल नज़रों से देखा, तनदही से कहा मैंने कहा ना हाथ नीचे करो, डाइरेक्ट मैडम से बात मत करो, पहले मुझे बताओ। शाज़िया ने रूखेपन से कहा अरी वाह सुग़रा तुम मैडम लोग हम ग़रीब औरतों को हमारे मर्दों से आज़ादी दिला कर अपना ग़ुलाम बनाना चाह रही हो क्या, शौहर की बात ना मानूँ पर तुम्हारी मानूँ? इसी दौरान माईक से मैडम रीमा की आवाज़ आई हाँ बीबी पूछिए, शाज़िया खड़ी हो गई और कहा मैडम जी मेरा ख़ावंद आपकी मजाज़ सरिया फ़ैक्ट्री में मज़दूर है। वो बहुत मेहनत करता है। ख़ून पसीना बहा कर हमें सँभालता है। मैडम जी उसे तीन महीने से तनख़्वाह नहीं मिली और मज़दूरों को भी नहीं मिली। साब लोग कहते हैं कारोबार में मंदी है पर इस से उन के घर में तो कोई तंगी नहीं आई होगी ख़ुदा ना करे कभी आए। कल यहाँ मीटिंग से जाने के बाद मैंने अपने मियाँ को बोल दिया कि अपना खाना ख़ुद पकाओ तो वो कल रात भूखा शर्बत वाले के यहाँ काम पे चला गया और सुबह बग़ैर नाशतादान लिए, बिना कुछ कहे आपकी फ़ैक्ट्री में मज़दूरी करने भी चला गया और मैं उसे खाना ना देकर उसे अपनी आज़ादी समझ रही थी, मत मारी गई थी मेरी। शाज़िया की आवाज़ रुँध गई और आँखों से आँसू बह चले। वो कहती गई, मैडम जी मेरी गुज़ारिश है कि जैसे आपके घर में आपको मजाज़ साहिब और बच्चों को पचासों नौकर ख़िदमत करते हैं तो आप ना मजाज़ साहिब से कहिए मेरे ख़ावंद को वक़्त पे सही तनख़्वाह दें क्योंकि जो मज़दूरी मिलती है उसमें बहुत मुश्किल से गुज़ारा होता है और साथ ही हर माह एक नौकर की इज़ाफ़ी तनख़्वाह दे दीजिए ताकि मेरा शौहर तंगदस्ती से आज़ाद हो जाए और मैं भी आपकी तरह खाना पकाने कपड़े धोने से आज़ाद हो जाऊँ। शाज़िया के बैठते ही हाल में मौजूद मज़दूर आबाद की तमाम ख़वातीन ने हाथ खड़े कर दिए।


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