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कहानी

ग्वादर के मछुआरे
सुलेमान हाशिम

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


माह जान, माहीन और उनकी वालिदा हलीमा के घर दो दिन से उनका चूल्हा ना जल सका। नाख़ुदा अली दाद दो दिनों से गहरे समुद्र तो दूर की बात है साहिल तक जाने की भी सोच नहीं सकता। मुल्ला मूसा मोड़ पर सख़्त सैक्योरिटी लगी हुई थी। दो दिन सुबह से लेकर शाम तक इस रोड को पार करना जो-ए-शीर लाने के मुतरादिफ़ था। क्योंकि चायना की एक बहुत बड़ी वीआईपी मूमैंट को कभी ग्वादर एयरपोर्ट और कभी ग्वादर सी पोर्ट और कभी पीसी होटल आना जाना चल रहा था। नाख़ुदा अली दाद की बदकिस्मती से उनकी कश्ती दीमी ज़र East Bay जहाँ ग्वादर सी पोर्ट और सी पैक के अहम मुक़ाम के साहिल पर लंगरअंदाज़ था। उनका घर मिला मौसी मोड़ के दूसरी पार था। उसे रोज़ मिला मौसी मोड़ पार करना होता था। उसे मालूम ही नहीं था कि दो दिन वीआईपी मूमैंट होगा। और उसे समुद्र जाने की इजाज़त नहीं होगी।

नाख़ुदा के घर में उनकी बड़ी बेटी माह जान दसवीं जमात की तालिबा थी और वो कॉलेज जाना चाहती थी। लेकिन उनके चाचा नबी-बख़्श कई बार कह चुका था भाई अली अब तुम्हारी बेटी जवान है आगे उसे पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। उर्दू लिखना, पढ़ना सीख चुकी है। मेरा बेटा जवान है वो अपनी तालीम मुकम्मल कर चुका है और अब प्राइवेट काम कर रहा है। अच्छा कमा रहा है। लड़कियों की ज़्यादा तालीम ठीक नहीं है। लेकिन नाख़ुदा अली ने ठान रखी है कि मेरी बेटी अच्छी तालीम हासिल करेगी वो अंग्रेज़ी तालीम हासिल करके एक स्कूल की हैडमास्टर बने, हमेशा इन दोनों भाइयों का इस मुआमले पर बहस चलती रहती थी, लेकिन...।

आज अली दाद बहुत परेशान था। वो अपने बच्चों की भूख और फ़ाक़ाकशी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। उसने अपनी बेटी से पूछा कि क्या आज वीआईपी वाले आ रहे हैं। बेटी ने कहा हाँ बाबा स्कूल की बाजी यही कह रही थी कल सुबह साढ़े छ बच्चे स्कूल पहुँची। एक बहुत बड़ी वीआईपी में चाइनीज डेलीगेशन ग्वादर के दो-रोज़ा दौरा पर आ रहा है। इसमें हमारा क्या फ़ायदा होगा, बाबा अब चायना इस शहर को दुबई और सिंगापुर बनाएगा। ग्वादर के लोग इलाज मुआलिजा के लिए कराची नहीं जाएँगे, डीज़ीलीशन प्लांट से समुद्र के पानी को मीठा बनाने के प्लांट लगाएँगे, कोल पावर प्लांट से बिजली पैदा करेंगे अब लोड शैडिंग नहीं होगी।

लेकिन ये बातें नाख़ुदा अली की समझ से बाहर थीं। वो तो सोच रहा था कि आज कैसे अपने जानशोओं का ख़र्चा पूरा किया जाए।

उनकी कश्ती में पाँच दीगर जानशो (ख़लासी) भी काम करते थे उनके घर का चूल्हा कैसे जले। अगर उन्हें समुद्र में जाने की इजाज़त ना मिली तो क्या होगा...

वो आज सुबह-सवेरे मछली के शिकार के लिए जाल, काँटा, पानी कुश्ती के इंजन के लिए पैट्रोल का केन और पानी का गैलन उठा कर्जा रहे थे तो ड्यूटी पर मौजूद खड़े फ़ौजी सिपाहीयों ने कहा, कहाँ से आ रहे हो और ये क्या सामान है, नीचे उतारो! साब ये मछली पकड़ने का सामान है। दो पोलिस वालों ने उनके सामान और शनाख्ती कार्ड चैक किए, और कहा कोई आज समुद्र नहीं जा पाओगे। दो दिन के लिए समुद्र बंद है। क्या तुम्हें पता नहीं है कि ग्वादर में बड़े लोग आ रहे हैं? साब मालूम है लेकिन जब हम समुद्र में शिकार पर नहीं जाएँगे तो खाएँगे कहाँ से?

ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है, चल रोड ख़ाली कर और घर में दो दिन आराम कर और फिर समुद्र में जा सकते हो। ठीक है साब...।

नाख़ुदा के जानशो (ख़लासी) बड़े परेशान थे उन्होंने नाख़ुदा से क़र्ज़ा तलब की। तो उन्होंने कहा फ़िक्र ना करें हमारा सेठ क़मरउद्दीन शाम तक हमें कुछ ना कुछ देगा। लेकिन शाम को सेठ क़मरउद्दीन का फ़ोन बंद था। वो घर पर मौजूद ना था। वो भी वीआईपी वाले दोस्तों को मिलने पीसी होटल पहुँच चुका था। एक बड़ी पार्टी आई थी उसे ग्वादर में एक इंडस्ट्री खोलने के लिए ज़ब्बाद डन में उन्हें ज़मीन दरकार थी। जो सेठ क़मरउद्दीन के पास कई सौ एकड़ ज़मीन ख़ाली पड़ी थी। वो उनको मुँह-माँगे दाम फ़रोख़्त करना चाहता था। इस से अच्छा मौक़ा कहाँ मिलता था। सेठ ने ज़मीन बेचने वाले ब्रोकरों को इत्तिला दी कि बड़ी तगड़ी पार्टी है। जहाँ ज़मीन जिस रेट में मिले मुझे जल्द मालूम करें।

ग्वादर में एक-बार फिर रॉयल स्टेट एजेंसियाँ चंद साल बंद होने के बाद दुबारा खुल गईं। न्यू टाउन के जो 500 गज़ के 10,20,30 हज़ार में बिक जाते थे अब उनकी क़ीमतें 30,40,50 लाख तक पहुँच चुकी थीं हज़ार गज़ के प्लाट साठ सत्तर लाख तक पहुँच थीं। स्टेट एजेंसी वाले ज़्यादा-तर नए एयरपोर्ट के क़रीब ही ज़मीन अच्छे दामों में ख़रीद रहे थे। ग्वादर एयरपोर्ट रोड के दोनों जानिब स्टेट एजेंसियों की लंबी क़तारें लग चुकी थीं। ग्वादर में ज़मीनों की खरीद-फरोख्त कभी तात्तुल का शिकार होता था जहाँ ग्वादर में हालात ख़राब होते ज़मीन के रीटेक दम गिर जाते थे तो असल ख़रीदार कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में बैठे थे। उन्हें पल पल की ख़बर मिलती थी। उनके पास ग्वादर का नया मास्टर प्लान मौजूद है कि मुस्तक़बिल में ग्वादर के किस जगह की ज़मीन की कितनी वैल्यू होगी। इस्लामाबाद वाले रॉयल स्टेट एजेंसी के मालिक चौधरी सुलतान मुग़ल, सेठ क़मरउद्दीन का पार्टनर और दोस्त हमेशा ऐसे मौके पर ग्वादर आता था। वो सस्ते दाम ज़मीन ख़रीद कर इस्लामाबाद वाले चौधरियों और सरकारी अफ़सरान और बीरू किरीट अफ़सरान को फ़रोख़्त करता था। और बहुत कमा रहा था। उनका इस्लामाबाद में बड़े बड़े अफ़सरान के साथ बड़े दोस्ताना ताल्लुक़ात हैं। देखने में सेठ क़मरउद्दीन वैसे मछली का एक मामूली व्यापारी है, लेकिन उनका असल कारोबार ज़मीन ख़रीदना और बेचना था। वो इंतिहाई बेरहम इनसान था लेकिन मीठी ज़बान को छुरी की तरह इस्तेमाल करना जानता है, छोटे मछेरों को ब्याज पर क़र्ज़ा भी देता था, लेकिन कोई माहीगीर अपनी मछलियाँ फिर किसी और को फ़रोख़्त करने की जुर्रत नहीं कर सकता था।

दुकानदार हसन अली मूसियानी ने बार-बार क़र्ज़ा देना बंद कर दिया था, एक बोर्ड लगाया था कि कश्मीर की आज़ादी तक क़र्ज़ा बंद है इस बोर्ड के लगने से अब लोग उस के दुकान की तरफ़ जाने से कतराते थे।

अब नाख़ुदा को अपने भाई के पास जाना पड़ा जो रिटायर्ड ऑफीसर था लेकिन इसके पैसे बैंक में जमा थे, उन्होंने सिर्फ बीस हज़ार उनसे क़र्ज़ा माँगकर अपने जानशोओं को पाँच-पाँच हज़ार देकर उन्हें राज़ी किया कि उनके घर का चूल्हा ना बुझे वो किसी दूसरे क्षति या लॉन्च में ना जाएँ।

नाख़ुदा अली दाद हिसाब किताब में बिलकुल कोरा था लेकिन उसकी बेटी बड़ी ज़हीन थी, और उसकी बीवी हलीमा अगरचे कम पढ़ी लिखी थी लेकिन चंद क्लासें पढ़ने के बाद उनकी कमउमरी में शादी हुई थी, वो चाहती थी कि उनकी बेटी भी बहुत पढ़े और पढ़कर डाक्टर या किसी स्कूल की प्रिंसिपल या टीचर बने।

एक बार अली दाद को माहीगीरों के एक सेमिनार में शिरकत का मौक़ा मिला था, वहाँ पर आए हुए मुक़र्ररीन ने माहीगीरों की फ़लाह-ओ-बहबूद पर तक़रीर की और माहीगीरों पर ज़ोर दिया कि वो अपने बच्चों को पढ़ाएँ क्योंकि ग्वादर आइंदा चंद सालों में तरक़्क़ी के मनाज़िल तै करने वाली है, यहाँ पढ़े लिखे माहीगीर ज़्यादा मछलियों के नित-नए शिकार के तरीक़े जान पाएँगे। उनकी पैदावार बढ़ेगी, अगर आप लोगों के लड़के नहीं तो अपनी लड़कियों की जल्द उमरी में शादी ना कराएँ। उन्हें लड़कों से ज़्यादा पढ़ाएँ और काबिल बनाएँ क्योंकि कल वो इस क़ौम की माँएँ बनेंगी। क़ौमों की तरक़्क़ी में औरतों का एक बहुत बड़ा किरदार है। ये बात नाख़ुदा अली दाद के दिल को लगी, उन्होंने इस रोज़ से तय किया कि वो अपनी दोनों बेटियों को आला तालीम देगा। मुक़र्ररीन कह रहे थे कि नेपोलियन ने कहा है कि मुझे तालीमयाफ़्ता माँ दे दो मैं तुम्हें एक मुहज़्ज़ब और तालीमयाफ़्ता क़ौम दूँगा। जिस घर में तालीम-ए-याफ़्ता औरतें मौजूद होंगी वो घर बज़ात-ए-ख़ुद एक यू्निवर्सिटी है। इनसान बुनियादी इल्म माँ की गोद से ही सीखना शुरू करता है। माँ की गोद तालीम का चश्मा है। जाहिल और कमइल्म माँ इल्म की शम्मा कैसे रोशन कर सकती है?

किसी भी मुल्क की तरक़्क़ी में मर्द के साथ ख़वातीन का बड़ा किरदार है। किसी घर में नागहानी मौत की सूरत में एक पढ़ी-लिखी तालीमयाफ़्ता बीवी ही पूरे घर का निज़ाम सँभाल सकती है। इसलिए औरतों की तालीम पर रुकावट पैदा ना करें। ये बातें नाख़ुदा अली दाद के ज़हन में बैठ गई। इसलिए अब वो कहता है कि मैं समुद्र की लहरों से लड़कर अपनी दोनों बेटियों को इल्म के ज़ेवर से आरास्ता करूँगा।


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