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कहानी

सैंतीस दिन की ज़िंदगी
रिहान रिंद

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


05 सितंबर 2016

नीला नीला आसमान, काले रंग में ढल चुका है।

सड़क को पानी ने गले लगा कर तरो तर कर दिया है।

घड़ी का शोर मेरे कान में गूँज रहा है...। टुक टुक टुक।

मस्जिद में घड़ी के इस शोर के इलावा पूरा हस्पताल ख़ामोश है। जैसे आज का सूरज तलूअ ही नहीं होगा! एक अजीब सी बेचैनी है दिल में। किसी चीज़ के खोने की, ख़ुद से दूर जाने की।

ज़ीशान मेरे पास आया और कहा, हारिस चल रिहान की तबीयत बहुत ख़राब हो गई है।

हारिस : तो जा, में आता हूँ!

ज़ीशान : और कब तक मस्जिद में यूँ ही बैठा रहेगा हारिस? कल रात से तो मस्जिद में है और अब तो सुबह होने वाली है।

हारिस : जब तक रिहान ठीक नहीं हो जाता, में यहाँ से नहीं जाऊँगा!

ज़ीशान : तो पागल तो नहीं हो गया है! मत कर बचपना, चल वहाँ रिहान को तेरी ज़रूरत है।

चल मेरे दोस्त चल।

हारिस : तो कहता क्यों नहीं है ख़ुदा से कि ठीक करें मेरे दोस्त को, इस की ज़िंदगी बख्श दें। चाहे मुझे ही क्यों ना उसकी जगह ले जाएँ। तो बोल ना बोल ना ज़ीशान।

ज़ीशान : चल उस के पास हारिस और भरोसा रख कुछ नहीं होगा।

रिहान हमेशा की तरह बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था।

इतनी तकलीफ़ और इतने दर्द के बाद भी इस के चेहरे पर एक अजीब सा नूर है। इसकी आँखें मुझे ही घूरे जा रही हैं। शायद ये कुछ कहना चाहता हो मुझसे। क्या कहेगा यही कि मैं जा रहा हूँ! दो दिन पहले भी उसने यही कहा था। पर आज ये आँखें कुछ अलग ही कह रही हैं।

बहुत कुछ है इसकी आँखों में क्या-क्या पढ़ूँ? आज जा रहा है तो? छोड़ रहा है अपने दोस्त को? तो ने तो कहा था हम कभी अलग नहीं होंगे फिर क्यों जा रहा है तो? मत जा यार! क्यों अकेला कर रहा है? मुझे माफ़ कर दे, अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई हो। रिहान माफ़ नहीं करेगा अपने दोस्त को? इस आँखों से हमने आधा घंटा बात की होगी। पर ये अदा घंटा मेरी पूरी ज़िंदगी के लिए काफ़ी था।

तैंतीस दिन पहले।

02 अगस्त 2016

छोटे से सपने ले के इस दुनिया से बेगानावार ज़िंदगी गुज़ार रहा था मैं। अपनी धुन में मगन अपने ही सुरों को छेड़ता हुआ ज़िंदगी गुज़ार रहा था। अचानक मेरी दुनिया बदल गई! अँधेरा मेरी रोशनी को बुझा गया।

ये आपको किसी फ़िल्म की कहानी की तरह लग रही है। क्योंकि ऐसी कहानियाँ अक्सर हम फिल्मों में ही देखते हैं, पर इस बार ये एक हक़ीक़त है!

06 अगस्त 2016

इस उभरते सूरज के साथ आज सातवाँ दिन है। और मैं अब तक इस हस्पताल में कैंसर के मर्ज़ से लड़ रहा हूँ। ये मर्ज़ बहुत ज़ालिम है! बहुत मुश्किल होती है इस मर्ज़ के साथ अपने महबूब को देखना और इसका सामना करना। ये मर्ज़ रोज़ बरोज़ मेरे सब्र को तोड़ता जा रहा है। ये सब कुछ काफ़ी नहीं था कि आज की रिपोर्टस भी ख़राब आई हैं। डाक्टर का कहना है कि तुम्हारे सफ़ेद ख़ून में दो से चार हज़ार का इज़ाफ़ा हुआ है।

इन सब चीज़ों के बाद भी अगर कहीं सुकून मिलता है तो इसकी आवाज़ सुनकर, आँखें बंद करके इसका चेहरा देखकर। पर सिर्फ सपनों में! क्यों कि हक़ीक़त में इसका सामना नहीं कर सकता और ना ही अपनी हिम्मत तोड़ना चाहता हूँ। क्यों कि मैं जीना चाहता हूँ।

10 अगस्त 2016

ग्यारहवाँ दिन शुरू हो चुका है। सुबह का सूरज तुलवा होते देख रहा हूँ। बहुत ख़ूबसूरत मंज़र मेरी आँखों के सामने है। तुलवा होते हुए सूरज के साथ एक कबूतर हर-रोज़ मेरे कमरे की खिड़की जो मेरे बैड के बिलकुल साथ ही है, वहाँ आकर बैठ जाता है। कबूतर जंगली है और इस कबूतर को "सोज़ कबूतर कहते हैं। मुझे कबूतरों का शौक़ नहीं! ये सब कुछ मैंने अपने बड़े भाई फ़ैसल से सीखा है। उसे कबूतरों का बड़ा शौक़ था। हर-रोज़ नए नए रंग के कबूतर वो घर लाता था। बड़ा मज़ा आता था। कबूतरों की आवाज़ सुनकर ऐसा लगता था कि कोई नई ज़बान हो। उनके रंग बड़े ख़ूबसूरत होते थे। ख़ासकर जंगली, और मुझे उनमें सफ़ेद रंग के कबूतर बहुत पसंद होते थे। ये कबूतर भी सब्ज़ और जामनी रंग के साथ अपनी नारंगी आँखों में काले नक़्शे के साथ बड़ा ही ख़ूबसूरत लग रहा है। मैं नहीं जानता ये कबूतर यहाँ क्यों आता है?। शायद मेरी बेबसी देखने या फिर उसे ताज्जुब होता होगा मुझे इस तरह क़ैद देखकर। में भी इस कबूतर की तरह आज़ाद फिरना चाहता हूँ, वो पहली बारिश की मिट्टी की ख़ुशबू सूँघना चाहता हूँ, वो चिड़िया का गुनगनाना, वो नाचती और शोर मचाती पानी की बूँदें। इन प्यार भरी बूँदों में बहना चाहता हूँ। मैं अपने आपको इस क़दर पाना चाहता हूँ कि फिर कभी खोना नहीं चाहता। पर आज लगता है कि ये सपने सच होंगे। क्योंकि आज की रिपोर्टस अच्छी आई हैं। बस अब सब कुछ जल्द से जल्द ठीक हो और मैं घर जाऊँ और एक नई ज़िंदगी गुज़ारूँगा।

13 अगस्त 2016

ये आग़ा ख़ान हस्पताल वाले क़साई हैं। उनको इनसानियत से कोई सरोकार नहीं! बस एक चीज़ को पहचानते हैं; पैसा, रुपया और आग़ा ख़ानी! यानी उनकी अपनी कम्यूनिटी। कराची में रह कर मैंने एक चीज़ ये भी सीखी के आगर अपने आपको ताक़तवर बनाना है तो किसी कम्यूनिटी में शामिल हो जाओ। क्यों कि यहाँ अकेला बंदा एक पुरसुकून ज़िंदगी नहीं गुज़ार सकता। कोई ना कोई ज़रूर आपकी टाँग खींचेगा। और क्यों ना खींचे भई! हम जिस क़ौम से ताल्लुक़ रखते हैं, इस क़ौम में कौन चाहेगा कि एक बंदा अपनी जद्द-ओ-जहद से कामयाब हो भी रहा हो तो दूसरे बंदे को कहाँ हज़म होगा कि वो कामयाब हो। ख़ैर छोड़ें इन बातों को। आज मुझे उन क़साइयों यानी उन डाक्टरों ने घर में आराम करने की इजाज़त दे दी है। आज में अपने घर जा रहा हूँ।

15 अगस्त 2016

आज़ादी का मतलब मुझे आज समझ आया है! अपने घर जा कर। बहुत सुकून मिलता है। अम्मी जान के हाथ का बना खाना, बाजी के हाथ की बिरयानी, दोस्तों का मज़ाक़, अपनों का प्यार। काश मुझे ये सब कुछ दो दिन के लिए नहीं बल्कि हमेशा के लिए नसीब हो पाता। आज मेरी तबीयत फिर ख़राब है। डाक्टर का कहना है कि मेरे सफ़ेद ख़ून में फिर इज़ाफ़ा हुआ है और मुझे जल्द से जल्द दाख़िल होना पड़ेगा। पर-आब एक मुश्किल ये है कि मुझे बैड नहीं मिल रहा। हम वेटिंग एरिया (waiting area) में बैठे हैं। कहर है, यहीं शाम तक मिलेगा बैड। जब तक फेसबुक इस्तिमाल कर लें।

"मुझे उम्मीद है कि आप सब ठीक होंगे। सबसे पहले तो मैं आप सबका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। आप लोगों की लगन और जुस्तजू का बहुत मशकूर हूँ। खासतौर पर वो लोग जो दूसरे ममालिक से भी मेरे लिए फ़ंडज़ भेज रहे हैं। मैं हमेशा इनसानियत पे यक़ीन रखता हूँ और इनसानियत हमेशा ज़िंदा रहती है, इस बात की यक़ीनदहानी आप लोग कर रहे हैं।

मेरे अज़ीज़ दोस्तो, मैं आप सबसे गुज़ारिश करता हूँ कि इस मुहिम को रुकने ना देना जब तक कि हम बलोचिस्तान में एक कैंसर का हस्पताल ना बना लें। चाहे मैं रहूँ या ना रहूँ। में एक-बार फिर आप सबसे आजिज़ी से कह रहा हूँ कि इस मंसूबे को रुकने ना देना, क्यों कि इस मंसूबे के तहत हम कामयाब होकर क़ीमती जानें बचा सकेंगे।

एक-बार फिर में आप सब का शुक्रिया अदा करता हूँ। मेरे उस्ताद, शागिर्द, दोस्त, साथी और वो लोग जिन्हें मैं जानता तक नहीं, आप सब का शुक्रगुज़ार हूँ।

22 अगस्त 2016

बढ़ते दिन के साथ साथ मेरा दर्द भी बढ़ता जा रहा है। कल से मेरे पेट में अजीब सा दर्द शुरू हो गया है। कभी कभी तो बर्दाश्त नहीं होता, बहुत मुश्किल होती है इस दर्द के साथ। फिर सोचता हूँ अपने सपनों के बारे में तो आहिस्ता-आहिस्ता हिम्मत आने लगती है। क्यों कि मैं मरना नहीं चाहता नाँ इसलिए।

26 अगस्त 2016

आज मुझे स्पेशल रूम (special room) में मुंतक़िल कर दिया गया है। डाक्टर का कहना है कि मेरी तबीयत ख़राब होती जा रही है। इस रूम में सब बहुत ही ज़्यादा तशवीशनाक हालत में हैं। अजीब अजीब साँस लेने की आवाज़ें, रोने की आवाज़ें, और आज ही मेरे सामने वाले बैड पे एक मरीज़ ने दम तोड़ा है। इस की लाश मेरे सामने उठाई गई। इस रूम में तो वो कबूतर भी नहीं आता! और सुबह का तलूअ होता सूरज भी नज़र नहीं आता। अब मैं थक गया हूँ! मुझे घर जाना है। यहाँ मेरी बात कोई समझता क्यों नहीं!? ये क़साई (डाक्टर) मुझे मार डालेंगे।

मुझे घर ले जाओ, में यहाँ नहीं मरना चाहता।

28 अगस्त 2016

ऐसा लगा रहा है कि किसी ने मेरे सीने पे वज़नी चीज़ रख दी है। बहुत दर्द हो रहा है। डाक्टर का कहना है कि मुझे चेस्ट इन्फ़ैक्शन (chest infection) हो गया है। पर मुझे कुछ शक हो रहा है कि मुझसे कुछ छुपाया जा रहा है। ये चेस्ट कैंसर भी हो सकता है! और मैंने उस के बारे में पढ़ा भी है कि ये चेस्ट कैंसर लाइलाज मर्ज़ है। और मुझे पता है कि अब में नहीं बच सकता, मेरा वक़्त आ गया है। मौत को कौन टाल सकता है! डाक्टर का कहना है कि आज मेरी ब्रान्कस कापी (broncos copy) होगी। इस के लिए मुझे नीचे जाना पड़ेगा। फिर उस ब्रान्कस कापी के बाद पता चलेगा के ये इन्फ़ैक्शन किस चीज़ का है। और इस के लिए इन क़साइयों ने मुझे रात से भूखा रखा है।

29 अगस्त 2016

आज रिपोर्टस आ गई हैं। पर जैसा में सोच रहा था, वैसा नहीं हुआ। चलो ये तो अच्छी बात है कि मुझे चेस्ट कैंसर नहीं! पर कुछ गंदा ख़ून मेरे सीने में आ गया है, जिसकी वजह से मुझे ये इन्फेक्शन हुआ है। गंदे ख़ून के नीचे आ जाने से मेरी तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब होती जा रही है। मेरी दिन बह दिन ख़राब होती तबीयत मेरे सब्र का गला घोंट रही है। और अब एक नया ऑप्रेशन! डाक्टर का कहना है कि मेरे गले में सुराख़ करेंगे। अब आगे की कीमोथेरेपी (chemotherapy) गले से होगी। एक तो मैं पहले से इस ब्रान्कस कापी से बोल नहीं पा रहा, ऊपर से ये नया ऑप्रेशन! इतनी सारी अज़ीयतें। पहले में अपने जीने की दुआ करता था, पर अब में ऐसे ज़िंदा नहीं रहना चाहता। मैं थक गया हूँ!

30 अगस्त 2016

ऑप्रेशन तो हो गया पर में ये कीमोथेरेपी बर्दाश्त नहीं कर सका!। मुझे सी.सी.यू. ले जा रहे हैं। डाक्टर का कहना है कि मुझे होश नहीं आ रहा! पर मैं उनकी बातें सुन रहा हूँ। बाहर से रोने की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। ये सब ऐसा क्यूँ कर रहे हैं, मुझे होश नहीं! जब कि मैं तो सब देख रहा हूँ। मुझे यहाँ वेंटीलेटर (ventilator) पे रखेंगे। ये बहुत ख़तरनाक होता है। कुछ पाइप मेरे गले से अंदर ले जाएँगे, जिससे मेरी साँस ठीक से बहाल हो सके। मेरे दिल की धड़कन भी कुछ दिन से बहुत तेज़ धड़क रही है। डाक्टर का कहना है इस वेंटीलेटर के ज़रिये दोनों चीज़ों पे क़ाबू पा सकते हैं।

2 सितंबर 2016

सूरत यासीन की तिलावत की आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही है। मेरी आँखों के सामने अँधेरा आ रहा है और जा रहा है। अब अँधेरा भी मुझसे चोर पुलिस का खेल खेल रहा है। अरे अम्मी जान मत रोइये, या अल्लाह ये कैसी मुसीबत है! मेरी आवाज़ तक नहीं निकल रही। मैं किसी तरह इशारों में ये बोलने में कामयाब हो गया कि अम्मी जान मत रोइये. पर ये बात समझते ही अम्मी जान और ज़्यादा रो पड़ीं। ये अम्मी भी ना! अजीब रिश्ता होता है माँ बेटे का। पहले नौ माह अपने पेट में पालती हैं फिर पूरी ज़िंदगी। हमारी छोटी से छोटी ख़ुशियों से उनकी ख़ुशियाँ जुड़ी होती हैं। पहले तो ख़ुद मार मार के स्कूल भेजती हैं, फिर ख़ुद ही परेशान हो कर सोचती रहती हैं कि पता नहीं मेरा बेटा कैसा होगा, उसने कुछ खाया होगा या नहीं। में भी अक्सर अम्मी जान का सोच कर परेशान होता हूँ। पता नहीं मेरे बाद अम्मी जान का क्या होगा।

03 सितंबर 2016

मेरा जिस्म फूलता जा रहा है। मेरे जिस्म के हर हिस्से में दर्द बढ़ता जा रहा है। मेरा खाना पीना और सब कुछ उन पाइपों के ज़रिये हो रहा है। मैं सिर्फ देख सकता हूँ। ना हिल सकता हूँ ना बोल सकता हूँ। क्या इनसान वाक़ई इतना बेबस है? मेरी इस बेबसी पे मुझे बहुत रोना आ रहा है। मैं खुलकर रो भी नहीं सकता! अगर इनसान इतना ही बेबस होता है तो लोग किस चीज़ का ग़रूर करते हैं? किस चीज़ का नाज़ है उन्हें? क्यों भूल जाते हैं कि कोई ग़रीब या अमीर नहीं होता, सब एक हैं इनसान! आज मुझे मेरी अहमियत और हैसियत का पता चल गया। मुझे मौत का पता चल गया! पर मैं यहाँ मरना नहीं चाहता हूँ, इस हस्पताल में नहीं! में अपने घर अपनी मिट्टी में मरना चाहता हूँ। मैं जिस घर में पैदा हुआ, जिस घर में खेला, जिस घर में यादें हैं मेरी, जिस घर में चिड़िया का शोर है, जिस घर में सपनों का चमन है, जिस घर में माँ के हाथ का खाना है, जिस घर में बहनों का प्यार है, जिस घर में भाइयों का ग़ुस्सा, उनका बिना बात के प्यार करना, जिस घर में अब्बू का समझाना, जिस घर में दोस्तों का शोर मचाना, जिस घर में मेस्सी बन के छोटे भाई को गोल मारना, इस घर में मरना चाहता हूँ... इस घर में फ़ना होना चाहता हूँ।

05 सितंबर 2016

आज वो दिन आ गया है जिसके लिए मैं इस हस्पताल में आया था। दो दिन पहले इस पागल को कहा! मैं जाने वाला हूँ तो रोने लग गया और अभी भी रो रहा है। पर इस पागल को आँखें पढ़नी आती हैं। अभी भी आँखें पढ़ रहा है। देख रहा है मेरी आँखों में कि मैं क्या कहना चाहता हूँ। मुझे जाना होगा! अपना ख़्याल रखना और बाक़ी सब का भी। मैं सिर्फ यहाँ से जा रहा हूँ, तुझसे दूर नहीं जा रहा, हम हमेशा साथ हैं।

ख़ुदा-हाफ़िज़ दोस्त।


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