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आलोचना

सुरेंद्र चौधरी और प्रगतिशील आंदोलन की कथा आलोचना
आशुतोष कुमार पांडेय


हिंदी साहित्य में 1936 के बाद का दौर प्रगतिशील आंदोलन के नाम से जाना जाता है। प्रगतिशील आंदोलन कब से कब तक था यह सवाल जब भी आता है तो हम लोग उसे अपनी सुविधा के लिए एक कालखंड में बांधने का प्रयास करते हैं और बहुत हद तक सफल भी रहे हैं। जैसे कविता के क्षेत्र में 1943 और कहानी के क्षेत्र में 1954 तक। इसी तरह अन्य विधाओं में भी एक समय-सीमा निर्धारित की गई। परंतु प्रगतिशील शब्द की व्यापकता और प्रगतिशील आंदोलन की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक क्षेत्रों में पहल और उसके यथार्थ को देखते हुए यह भान नहीं होता है कि प्रगतिशील आंदोलन अपने मुकाम पर पहुँच गया हो। यह आंदोलन साहित्य में मनोरंजनपरक और कल्पनापरक प्रवृत्ति के विरुद्ध सामाजिक यथार्थ के दखल के लिए हुआ था (परंतु हिंदी सहित्य में प्रेमचंद, निराला और महादेवी की रचनाओं में इसका प्रस्फुटन पहले ही हो चुका था)।

प्रगतिशील आंदोलन की पृष्ठभूमि के बाद अब बात सीधे-सीधे प्रगतिशील साहित्य पर की जाए तो सबसे पहले प्रेमचंद द्वारा 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन (10 अप्रैल 1936 ई.) में दिया गया भाषण प्रासंगिक हो उठता है। प्रेमचंद ने साहित्य के उद्देश्य और साहित्यकारों के उद्देश्य पर बोलते हुए कहा था कि - "साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है - उसका दर्जा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सचाई है। यदि साहित्य ने अमीरों का याचक बनने को जीवन का सहारा बना लिया हो, और उन आंदोलनों, हलचलों और क्रांतियों से बेखबर हो जो समाज में हो रही हैं - अपनी ही दुनिया बनाकर उसमें रोता और हँसता हो, तो इस दुनिया में उसके लिए जगह न होने में कोई अन्याय नहीं है। जब साहित्यकार बनने के लिए अनुकूल रुचि के सिवा और कोई कैद नहीं रही, जैसे महात्मा के लिए किसी प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता नहीं, आध्यात्मिक उच्चता ही काफी है, तो महात्मा लोग दर-दर फिरने लगे, उसी तरह साहित्यकार भी निकल आए।" 1 प्रेमचंद ने अपने इस बहुप्रचलित वक्तव्य में साहित्य और साहित्यकार के लक्ष्यों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया है। 1936 से पहले ऐसा नहीं है कि सामाजिक यथार्थ का रेखांकन नहीं हुआ था। जैसा कि ऊपर इंगित किया गया है कि प्रेमचंद, निराला और महादेवी की रचनाओं में प्रगतिशीलता के तत्व मिलते हैं और इनसे पहले भी भारतेंदु और द्विवेदी युग के रचनाकारों (भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी और यशोधरा इत्यादि) ने तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों का विरोध किया परंतु वह विरोध ज्यादा अमूर्त ही रहा। 1857 की क्रांति से सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में तत्कालीन व्यवस्था से प्रतिरोध के स्वर की शुरुआत हो चुकी थी।

हिंदी कहानी में प्रगतिशील आंदोलन के दौर को प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी के नाम से जाना जाता है। इस दौर में मुख्य रूप से तीन तरह की विचारधाराओं के प्रभाव को देखा जा सकता है - मनोविश्लेषणवाद, गांधीवाद और समाजवाद (मार्क्सवाद)। यह एक तरह से भारत के स्वाधीनता आंदोलन के अंतिम दशक का दौर था। मनोविश्लेषणवाद से प्रभावित कथाकारों में इलाचंद्र जोशी और अज्ञेय प्रमुख थे। वहीं गांधीवाद से प्रभावित थे जैनेंद्र कुमार। मार्क्सवादी कथाकारों में यशपाल, उपेंद्रनाथ अश्क, अमृत राय, रांगेय राघव को परिगणित किया जाता है। इन मार्क्सवादी कहानीकारों में कहानी के क्षेत्र में सर्वाधिक लंबा सफर यशपाल का ही रहा है। इस दौर की कहानियों और कहानीकारों के संदर्भ में जैनेंद्र कुमार ने साहित्य अकादमी की ओर से 23 हिंदी कहानियों को संपादित करते हुए इसकी भूमिका में लिखा था कि - "प्रेमचंद हमारे समस्त हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युग-निर्माता रहे हैं। उनके अंतिम दिनों में ही प्रगतिवाद और समाजवाद के स्वर गूँजने लग गये थे बाद में हिंदी साहित्य में एक धारा इन वादों के सहारे बड़े जोर से बह निकली। लगता था, मानो उनके बहाव में सब कुछ बह जाएगा। कहानीकार के भी पैर उखड़ गए। वह सिद्धांतों को कहानी का रूप देने लगा। सहानुभूति के पात्र निश्चित हुए, आक्रोश के भी। जैसे साहित्य भी पक्षधर हो। आज जब वह लहर बहकर चली गई है, तब लगता है कि वह स्वयं अपने को ही बहा ले गई साहित्य जहाँ का तहाँ है। और कहानी भी उन्हीं आधारों पर टिकी है, जिन पर पहले टिकी थी। जिन कहानीकारों ने उस लहर में भी कहानी का साथ न छोड़ा उनमें यशपाल विशिष्ट हैं।"2 ऐसे में नई कहानी के दौर के कथाकारों ने अपने को प्रेमचंदीय परंपरा से जुड़े रहना ही उचित समझा। प्रेमचंद के बाद के दौर में 'वादों' ने जिस तरह से कथाकारों को प्रभावित किया परंतु प्रेमचंद का दौर भी 'वादों' के प्रभाव से अछूता नहीं रहा था। जैसे खुद प्रेमचंद की रचनाओं का पूर्वार्द्ध और उतरार्द्ध या निराला की रचनाओं को देखने से पता चलता है। रही बात पात्रों की सहानुभूति और आक्रोश की तो प्रेमचंद, प्रसाद और निराला की रचनाओं में इस तरह के पात्रों की भरमार है। इस संदर्भ में सुरेंद्र चौधरी की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है - "कहानी का बाहरी रूप उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना आंतरिक स्थापत्य। घटनाओं का अंतर्क्षेप इन कहानियों के ढाँचे के लिए आवश्यक फार्मूला नहीं रह गया था, किसी भी एक घटना के सहारे कहानीकार विचार-वस्तु का सफल नियोजन कर लेने में समर्थ था। कहानी की निबंधना का वही रूप प्रेमचंद के बाद के कहानीकारों के सम्मुख नहीं था जो घटनाप्रधान के नाम पर चल रही थीं। मानवीय भावनाएँ, कथा के कारण घटनाओं के चमत्कारिक अंतर्भाव की आवश्यकता नहीं रह गई थी। जैनेंद्र, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, अज्ञेय, पहाड़ी, इत्यादि स्थापत्य का विकास कर रहे थे जो प्रेमचंद की कहानियों में उभर कर आया था।"3 सुरेंद्र चौधरी ने यहाँ दिखाने की कोशिश की है कि प्रेमचंद के बाद कहानियों के शिल्प के स्तर पर तो समानता थी परंतु विषय-वस्तु के स्तर पर भिन्नता थी। जिसके अनेक कारण हो सकते हैं। उसमें प्रथम कारण विचारधाराओं का प्रबल रूप होना था वहीं दूसरा कारण सामाजिक, राजनैतिक यथास्थिति में बदलाव भी था। 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण आजादी का प्रस्ताव पास किया गया। सुरेंद्र चौधरी ने जिस विषय-वस्तु के बदलाव को इंगित किया है। वह विषय-वस्तु सामाजिक यथार्थ का चित्रांकन करती है ऐसा महसूस नहीं होता है। प्रगतिशील आंदोलन का जैसा प्रभाव कविता और उपन्यास विधा पर रहा वैसा प्रभाव कहानी पर प्रतीत नहीं होता है जैसा कि यशपाल की प्रथम दो कहानियों 'मक्रील'(1934) और 'पिंजरे की उड़ान' (1939) से ऐसा परिलक्षित होता है। यह अलग बात है कि उसमें व्यवस्था के प्रति व्यंग्य है परंतु धारदार व्यंग्य महसूस नहीं होता। इससे अच्छा व्यंग्य तो प्रेमचंद की 'पूस की रात' (1930) या व्यवस्था का प्रतिरोध पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की कहानी 'चिनगारियाँ' में है। 'मक्रील' कहानी जिस तरह से प्राकृतिक वातावरण और फिर पंजाब के वातावरण से शुरू होती है। उसमें एक प्रसंग आता है - "जनता की उन्मत्तता के कारण मोटर को दस कदम पीछे ही रुक जाना पड़ा - 'राष्ट्र के मुकुट-मणि की जय!' 'के नारों से पहाड़ियाँ गूँज उठी।"4 इससे पहले भी इस कहानी में व्यंग्य 'यूरोप और अमेरीका जिसके प्रतिभा का लोहा मान लिया हो' के रूप में दिखाया गया है। यह व्यंग्य दरअसल तत्कालीन व्यवस्था के अलमबरदारों के प्रति है। जैसा कि चौधरी जी ने संकेत किया है - "वास्तविक जीवन की हलचलों, टकराहटों और तनाव से टूटकर यशपाल की कहानियाँ अतीतजीवी रोमांसों में ठहर जाती हैं। पुराणगथाओं में यशपाल के लौट जाने की शिकायत राजेंद्र यादव ने गलत नहीं की है। वर्तमान बार-बार यशपाल की पकड़ से छूटने लगता है।"5 यह इशारा उनके उपन्यासों और कहानियों के प्रति है। यशपाल के उपन्यासों का मुख्य आधार सामाजिक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक और पौराणिक भी रहे हैं। कहानियों में एक उनकी कहानी है 'वैष्णवी' यह कहानी हिंदू रीति-रिवाजों से शुरू होती है। फिर हिंदू समाज में एक लड़की या स्त्री के विधवा होने के बाद उसके माता-पिता और उस स्त्री की दीनता का चित्रण है। इस कहानी में एक प्रसंग है - "हिंदू वैधव्य है, नारी शरीर और नारी का स्वभाव और नारीत्व के स्वभाव और प्रकृति के अधिकारों से वंचित हो जाने, निरंतर अपनी ही प्रकृति से लड़ने, अपने में जलते रहने, मरते रहने का धर्म निबाहने का दंड।" 6 यशपाल जिस विचारधारा के वाहक माने जाते हैं। उसके मूल में सामाजिक विडंबनाओं से प्रतिरोध है। परंतु इस कहानी के पात्र कहीं भी प्रतिरोध करते नहीं दिखते हैं। जिसके संदर्भ में मार्कंडेय लिखते हैं कि - "फलतः यशपाल ने जाहिर तौर पर जीवन की जिन समस्याओं का चुनाव किया, वे प्रगतिशील तो थीं, लेकिन उनसे कहानी की मूल प्रकृति पर कोई असर नहीं आया। कल्पना की देह पर जहाँ आदर्शों की सफेद टोपी थी, वहीं अब लाल कर दी गई।"7

यशपाल की प्रसिद्ध कहानियों में - 'मक्रील' (1934),' पिंजड़े की उड़ान' (1939), 'फूलो का कुर्ता' (1949), 'परदा' और 'दूसरी नाक' इत्यादि हैं। यशपाल की कहानियों के मूल में व्यंग्य है। जैसा कि सुरेंद्र चौधरी ने लिखा है कि "परदा' या 'साईं सच्चे', 'नमक हलाल' जैसे 'कथानक' वाली कहानियाँ हों या 'मैं होली नहीं खेलता', 'गुडबाई दर्देदिल', 'आदमी का बच्चा' जैसी व्यंग्य विचार वाली कहानियाँ, ढाँचा सबका एकतान और पूर्ण है। कहानी के इस एकतान ढाँचे को लेकर जितने प्रयोग यशपाल जी ने किए हैं उतने उनके सामयिक लेखकों में शायद ही किसी ने किए हों।"8 इस दृष्टि से उनकी कहानी 'परदा', 'फूलो का कुर्ता', और 'दूसरी नाक' महत्वपूर्ण कहानी है। 'दूसरी नाक' कहानी जब्बार के विवाह से शुरू होती है। उसका बाप चाहता है जब्बार की शादी किसी और लड़की से करना परंतु जब्बार को शब्बू से शादी करनी थी। इसी तरह के संवाद से कहानी शुरू होती है। आखिर में शब्बू से ही जब्बार की शादी होती है। फिर शादी के बाद की परिस्थितियों का अंकन है। कहानी मोड़ लेती है अंत होते समय जब जब्बार शब्बू की नाक काट लेता है। कहानी के अंत में बहुत मार्मिक व्यंग्य है - "शब्बू पूरे दो दिन उपवास रही तो जब्बार ने रबड़ की नाक की कीमत चालीस रुपये डॉक्टर के यहाँ जमा करवा दी परंतु पत्नी से वायदा ले लिया कि शब्बू नाक लगाएगी जरूर लेकिन गैर मर्द उसे घूरेगा तो झट नाक उतारकर जेब में डाल लेगी।"9 ऐसे में यशपाल के समकालीन समान विचारधारा के रचनाकार नागार्जुन की कहानियाँ याद आती हैं जो लगभग इसी व्यंग्यात्मक लहजे में लिखी गई हैं। नागार्जुन (हालाँकि न के बराबर कहानियाँ लिखी) की 'असमर्थ दाता' (1936)और 'ताप-हिरणी' (1945) इत्यादि कहानियाँ इस दृष्टि से देखी जा सकती हैं।

यशपाल के बाद इस दौर के महत्वपूर्ण कहानीकार जैनेद्र और अज्ञेय हैं। यशपाल के बाद जैनेंद्र ने अपनी विचारधारा के हिसाब से कहानियाँ लिखी हैं जैसा कि ऊपर इंगित किया गया है कि जैनेंद्र 'गांधीवाद' से प्रभावित रचनाकार थे। इसके संदर्भ में जैनेंद्र की एक बात भी उद्धृत की गई है। जिसमें उन्होंने अपने दौर के कहानीकारों और कहानियों के बारे में विचार व्यक्त किया है। इसके संदर्भ में मधुरेश लिखते हैं - "जैनेंद्र और यशपाल दोनों ही विचारों से अपनी कहानियाँ बुनते हैं। ...जैनेंद्र कहानी में जीवन की वास्तविकता का वह जैसा है, तिरस्कार करके आगे बढ़ते हैं। जैनेंद्र वास्तविक और यथार्थ जीवन की अपेक्षा अवास्तविक और अमूर्त जीवन में गहरी अभिरुचि रखते हैं। ...जैनेंद्र जिन्हें अपनी प्रतीकात्मक कहानियाँ कहते हैं, उनके विषय में उनका कहना है; 'इन कहानियों में भाव प्रधान है, यथार्थ अप्रधान।"10 जैनेंद्र की कहानियों की विषय-वस्तु स्त्री-पुरुष संबंधों पर केंद्रित रही है। जैनेंद्र की कहानियों में गांधीवादी विचारधारा का उनकी एक कहानी 'गदर के बाद' के प्रसंगों से पता चल जाएगा। "राजधर्म का पहला नियम है कि शासन से न्याय अलग होकर ऊपर रहे। शासन की निरंकुश होने की वृति होती है। अधिकार मद है। अधिकार की आदत अधिक अधिकार माँगती है। न्याय उस पर अंकुश रखे। शासन न्याय के प्रति उत्तरदायी रहे, और शासन न्याय की माँग और न्याय के हुक्म को पूरा करे और उसके नियम की मर्यादा में रहे।" 11 पूरी कहानी का ढाँचा सन् 57 की क्रांति के ऊपर निर्मित है। कहानी की शुरुआत ("सन् 57 में हिंदुस्तान ने लाल दिन देखे! तब धरती पर खून बहा और आसमान पर उछल-उछल आया। उन्हीं दिनों की बात है -।"12) भी 'कैदी के भागने' से होती है। जो कि एक तरह से प्रतिरोध भी है। जिसकी अंतरात्मा 57 की क्रांति की भी थी ऐसे में ऊपर उद्धृत अंश जैनेंद्र की वैचारिकी को उजागर करता हुआ मालूम पड़ता है। सुरेंद्र चौधरी ने लिखा है कि - "जैनेंद्र को अपने पात्रों के व्यापारों को सांकेतिक रूप से ही सामान्य बनने देना इष्ट है, वे सिद्धांततः ऐसा करने के पक्षपाती नहीं हैं। जहाँ वे व्यक्ति के व्यवहारों तक अपने को सीमित रखते हैं वहाँ उनकी कहानियाँ मर्म में प्रवेश करती हैं, किंतु जहाँ वे अपने पात्रों से दार्शनिक मुद्राओं में चिंतन करवाते हैं वहाँ वे आत्यंतिक रूप से विरूप हो उठते हैं, सामाजिकता उनके लिए दंभ है, व्यक्ति की नैतिकता के अतिरिक्त वे सारे 'नार्म्स' को कृत्रिम और व्यक्ति-विरोधी मान बैठते हैं, भावना के ज्वार में जीवन के समाज-व्यापी सत्यों की अवहेलना करने लग जाते हैं। उनकी रचना-प्रक्रिया में यह दोष सर्वाधिक स्पष्ट है। जैनेंद्र को अपने तर्क प्रिय हैं, तर्क के प्रमाण में वे सामान्य सत्य को भी अजीब ढंग से प्रस्तुत करने के आदी हो गए हैं।"13 इसी तर्क के आधार पर जैनेंद्र की एक कहानी 'नीलम देश की राजकन्या' को परखने की कोशिश कि जाए तो इस कहानी की शुरुआत ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं से होती है। जिसको परिचित कराते हुए जैनेंद्र लिखते हैं कि "वह सात समुंदर पारजो नीलम का द्वीप है, वहाँ की कहानी है।" 14 उसके बाद राजकन्या का चित्रण है कथा आगे बढ़ती है तो आगे कहानी में राजाओं (राजकुमार और राजकन्या) के वैभव और विलास पूर्ण जीवन के साथ कहानी बढ़ती जाती है। उसी में राजकन्या के साथ किन्नरी बालाओं के हँसी-मजाक का भी चित्रण कहीं-कहीं पर है। फिर आगे अकेलेपन का (राजकन्या की) चित्रण है। इसी तरह अनेक अलग-अलग प्रसंगों को लेकर कहानी चलती है। कहानी के अंत में राजपुत्र आते हैं उसके बाद किन्नरी बालाओं के चित्रण के साथ-साथ राजकन्या के मन के उद्वेलन का चित्रण है। कहानी के अंत में यह उद्वेलन और बढ़ता है - "इसके बाद राजकन्या उठकर अपनी किन्नरी सखियों के साथ एक-एक से गले मिली। अनंतर वह हर प्रकार की क्रीड़ा में मग्न भाव से भाग लेने लगी और फिर अवसाद उसके पास नहीं आया।" 15 इस प्रकार कहानी में एक नायिका की अभिजात्य वर्गीय विलासता का चित्रण तो है ही परंतु कहानी के अंतिम हिस्सों में जैनेंद्र का मनोविश्लेषणवाद प्रखर हो उठता है।

1936 से 1954 तक के दौर में यशपाल और जैनेंद्र के अलावा अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी महत्वपूर्ण कथाकार थे। इन दोनों ही कहानीकारों ने फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद के आधार पर कहानियाँ लिखीं। इस संदर्भ में सुरेंद्र चौधरी का एक कथन ध्यातव्य है - "अज्ञेय की कहानियों की रचना प्रक्रिया अधिकांशतः आत्मविवृतिमूलक और शोधात्मक है, इसलिए उनकी कहानियों की एक अलग विधा (जॉनर) ही है जिसे हम 'क्वेस्ट स्टोरी' की संज्ञा दे सकते हैं। आत्मान्वेषण अज्ञेय की कहानियों में ही नहीं उनके उपन्यासों में उद्धृत होता है। शेखर के संबंध में उन्होंने लिखा है - "...जैसे क्रिस्तोफ में लेखक एक आत्मान्वेषी के पीछे चला है।" अज्ञेय की अधिकांश कहानियों में 'प्रथम पुरुष कथावाचकता' का कारण भी यही है।"16 इस आत्मविवृतिमूलक प्रवृत्ति को अज्ञेय की पहली ही कहानी 'विपथगा' में देखा जा सकता है। 'विपथगा' कहानी कुछ अमूर्त कहानी लगती है। पढ़ने के बाद महसूस होता है कि कथा नायक अपने आप से बात कर रहा है। पूरी कहानी 'मैं' शैली (आत्मकथात्मक) में विश्लेषित महसूस होती है। बीच में नायक अपने आप से संवाद करता है और एक क्रांतिकारिणी का संवाद है। कहानी में क्रांतिकारिणी और उस नायक का संवाद - "अभी एक घंटा भी नहीं हुआ। उसी की तलवार, इन हाथों ने उसी के हृदय में भोक दी तुम पूछोगे, क्यों? शायद तुम्हें नहीं मालूम कि स्त्री कितना भीषण प्रतिशोध करती है।"17 उस क्रांतिकारिणी और तथाकथित क्रांतिकारी नायक (तथाकथित कहने का अभीष्ट क्रांतिकारिणी के इस प्रसंग से पता चल जाएगा। "मैंने सुना था कि क्रांतिकारियों से आपको सहानुभूति है और आपने इस विषय पर व्याख्यान भी दिए हैं। इसी सहानुभूति की आशा से आपके पास आई हूँ।" 18) के बीच बातचीत के दौरान क्रांतिकारिणी एक रक्तरंजित तलवार निकालती है जो गोरोवस्की के यहाँ से चोरी की गई होती है और इसी से उस पर प्रहार करती है। वह तलवार दिखाती है फिर आगे क्रांति और क्रांतिकारिता पर संवाद है। कहानी हिंसा और अहिंसा पर संवाद करते हुए आगे बढ़ती है। परंतु क्रांतिकारिणी की एक बात बहुत प्रतिरोधात्मक है। एक तरह से शायद उस समय जब पितृसतात्मकता के विरुद्ध न के बराबर आवाज उठ रही होगी तब यह बात नोटिस लेने लायक महसूस होती है। जब क्रांतिकारिणी कहती है 'शायद तुम्हें नहीं मालूम कि स्त्री कितना भीषण प्रतिशोध करती है।' यह कहानी की मूल संवेदना होनी चाहिए परंतु कहानी में बहुत सारे प्रसंगों के कारण यह प्रसंग दबा सा महसूस होता है। इस पूरी कहानी को पढ़ने के बाद महसूस होता है कि जैसे अज्ञेय अपने आप को ही प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जैसा कि सर्वज्ञात है कि अज्ञेय का शुरुआती जीवन क्रांतिकारिता से जुड़ा हुआ था। 'विपथगा' कहानी का अंत बिखरा हुआ सा महसूस होता है। कथा नायक क्रांति का कार्य छोड़ अब अध्ययन-अध्यापन करने लगता है उसके बाद उसके विभिन्न मनोदशाओं का चित्रण है। मार्कंडेय ने उनकी कहानी 'शेखूपुरे के शरणार्थी' की समीक्षा करते हुए लिखा है कि - "हैरत की बात है कि अज्ञेय ने जहाँ भी एक राजनीति का विरोध किया है वहीं एक दूसरी कमजोर राजनीति ने जन्म लेकर उनकी रचना को पंगु और प्रचारात्मक बना दिया है।" 19 इसका भान अगर गौर से पढ़ा जाए तो 'विपथगा' में भी हो जाएगा।

संदर्भ सूची

1. प्रेमचंद रचना-संचयन, संपादक : निर्मल वर्मा और कमल किशोर गोयनका, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली : पृष्ठ 921

2. 23 हिंदी कहानियाँ, संपादक : जैनेंद्र कुमार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद : पृष्ठ -12

3. सुरेंद्र चौधरी (प्र.सं. 1995), हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली : पृष्ठ-33,

4. यशपाल, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल, नई दिल्ली (प्र.सं.) 1997 : पृष्ठ-35

5. सुरेंद्र चौधरी, इतिहास संयोग और सार्थकता, संपादक - उदयशंकर, अंतिका प्रकाशन, गाज़ियाबाद, 2009: पृष्ठ 161

6. यशपाल, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल, नई दिल्ली (प्र.सं.) 1997 : पृष्ठ-70

7. मार्कंडेय (2013), हिंदी कहानी : यथार्थवादी नजरिया, आंनदप्रकाश (संपा), भूमिका से, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद : पृष्ठ 123

8. सुरेंद्र चौधरी (प्र.सं. 1995), हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, राधाकृष्ण प्रकाशन : पृष्ठ 36

9. यशपाल, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल,नई दिल्ली (प्र.सं.)1997 : पृष्ठ-134

10. मधुरेश (प्र. सं. 1996), हिंदी कहानी का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद : पृष्ठ 41

11. जैनेंद्र रचनावली, खंड-4, संपादक : निर्मला जैन (सह संपा. - प्रदीप कुमार), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, (प्र.सं.-2008) : पृष्ठ 49

12. वही, पृष्ठ-42

13. सुरेंद्र चौधरी (प्र.सं. 1995), हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, राधाकृष्ण प्रकाशन : पृष्ठ 63

14. जैनेंद्र रचनावली, खंड-4, संपादक : निर्मला जैन (सह संपा. - प्रदीप कुमार), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली,(प्र.सं. - 2008) :पृष्ठ 387

15. वही, पृष्ठ-64

16. सुरेंद्र चौधरी (प्र.सं. 1995), हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, राधाकृष्ण प्रकाशन : पृष्ठ 64

17. 23 हिंदी कहानियाँ, संपादक : जैनेंद्र कुमार, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद : पृष्ठ -192

18. वही, पृष्ठ-191

19. मार्कंडेय (2013), हिंदी कहानी : यथार्थवादी नजरिया, आंनदप्रकाश (संपा), भूमिका से, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद : पृष्ठ 133


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