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लेख

आधुनिक कथा-भाषा
सर्वेश सिंह


"अफसाना-ओ-दास्तान में वो कुछ सुनो की कभी किसी ने देखा न सुना।" (ग़ालिब)

कथा साहित्य के मूल्यांकन की कई प्रविधियाँ हमारे सामने हैं। हर पद्धति भले ही वैचारिक रूप से भिन्न हो किंतु उसे भाषा का आश्रय लेना ही पड़ता है। पर प्रायः यह देखने में आता है कि आलोचना की पद्धतियों में भाषा को उचित स्थान नहीं दिया जाता। कथा भाषा की सही समझ भी उनमें नहीं होती। जाहिर है कि बिना भाषा की सही समझ के केवल विचारधारा के आधार पर बेढंगे मूल्यांकन कर लिए जाते हैं। आलोचना के नाम पर हमारे यहाँ ऐसा बहुत सा कूड़ा इकट्ठा हो चुका है। अतः आवश्यक है कि आधुनिक हिंदी कथा भाषा की एक स्पष्ट समझ उपलब्ध हो ताकि आलोचनाएँ संयत रहें। प्रस्तुत लेख का उद्देश्य इसी समझ को सामने रखना है।

कथा-भाषा से हमारा आशय आधुनिक गद्य के कल्पना प्रधान रूपों - उपन्यास एवं कहानी - की भाषा से है। भाषा का प्रकार्य एवं गठन दोनों ही विधाओं में लगभग समान है। प्रभाव में, अंतर यह है कि औपन्यासिक भाषा समूची जीवन दृष्टि विकसित कर सकती है जबकि कहानी की भाषा जीवन के कुछ संगत क्षणों का चुनाव करके उन्हें आलोकित करती है। इसलिए नहीं कि दोनों के आकार में अंतर है, बल्कि दोनों का विधान फर्क है विशेषतः परंपरागत रूप में। कहानी सर्जनात्मक गद्य का आद्य रूप और अधिकतर एक कोशकीय विधान है। उपन्यास का चरित्र द्वंद्वात्मक है, जहाँ जीवन दृष्टि के विकास की संभावना अधिक है। वैसे इधर कहानी भी यथार्थ के बहुस्तरीय व्यंजन की ओर अग्रसर है।

कथा का अस्तित्व, भारत में, ऋग्वेद से ही प्राप्त होता है। शास्त्र इसे 'विकल्प' के रूप में देखता रहा है - 'कर्विमनीशी परिभूः स्वयम्भूः' (इशोपनिशद)। किंतु 'आधुनिक कथा' एक निश्चित समय एवं संदर्भ से जुडी है, विशेषतः बीसवीं सदी से। इस प्रसंग को आ. रामचंद्र शुक्ल ने 'नई' एवं 'पुरानी' कथा के रूप में देखा है -

"पुराने ढंग के कथा कहानियों में कथा का प्रवाह अखंड गति से एक ओर चला चलता था जिसमें घटनाएँ पूर्वापर क्रम से जुड़ती सीधी चली जाती थी... नई कथाओं में घटनाओं की शृंखला सीधी न जाकर इधर उधर गुंफित होती चलती है... घटनाओं के विन्यास की यह वक्रता आधुनिक कहानियों की प्रत्यक्ष विषेशता है।' (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 336-37)

पर आधुनिक कथा एवं उसकी भाषा का स्पष्ट दर्शन शुक्ल जी के चिंतन में नहीं है। यह दृष्टि आजादी के बाद विकसित हुई। कथा रूपों को लेकर वर्तमान में कई शोध उपलब्ध हैं जिनमें राजेंद्र यादव, नामवर सिह और मैंनेजर पांडेय की दृष्टियाँ उल्लेखनीय है।

किंतु आधुनिक हिंदी कथा का विन्यास एवं विकास आधुनिक कथा भाषा से भी संबद्ध है - इस दृष्टि से अध्ययन न के बराबर है। रामस्वरूप चतुर्वेदी की पुस्तक 'हिंदी गद्य : विन्यास और विकास' इस प्रसंग में उल्लेखनीय है, किंतु यह अधूरा अध्ययन है। प्रस्तुत लेखन का उद्देश्य इस दृष्टि की ही परख एवम उसका विस्तारण है।

पश्चिमी साहित्य में रूपवादी माने गए रोमन याकोब्सन ने कथा भाषा की बहस शुरू की। (मेटानिमिक और मेटाफोरिक, क्लोसिंग स्टेटमेंट, 1975) बाद में, अँग्रेजी में, डेविड लाज ने 'लैंगवेज ऑफ फिक्सन 1978' में कथा भाषा को स्वतंत्र रूपाकार देने की कोशिश की। उनके चिंतन का पर्यवसान 'टूवार्ड्स ए पोएटिक्स ऑफ फिक्सन' के रूप में होता है अर्थात भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका के आधार पर कथा के काव्य शास्त्र का निर्माण।

वस्तुतः, आदि कथाओं - रानी केतकी की कहानी, भाग्यवती आदि - में भाषा का जो रूप हम देखते हैं, वही - ग्यारह वर्ष का समय, गोदान आदि - का नहीं है। गठन एवं प्रभाव में दोनों भाषाएँ जमीन-आसमान की तरह भिन्न है। यह भिन्नता क्रमशः बनी। निरंतर सर्जनात्मकता की चाह ने आधुनिक कथा भाषा को रूपाकार दिया। यह चाह आधुनिक मनुष्य को ठीक से रचने की रही।

सर्वप्रथम हिंदी कथा भाषा की आरंभिक स्थिति पर दृष्टिपात करें। प्रारंभ में दोनों ही कल्पना प्रधान रूपों (उपन्यास, कहानी) में भाषा का एक सामान्य, अव्यस्थित तथा स्थूल प्रयोग दिखता है। भाग्यवती, परीक्षागुरू, श्यामा स्वप्न, चंद्रकांता तथा रानी केतकी की कहानी जैसी कथाओं में भाषा का उपर्युक्त स्तर नजर आता है। कूछ अंश देखें -

"पर कुँवर जी का रूप क्या कहूँ... न खाना न पीना न मग चलना... वह कुँवर उदैभान जिससे तुम्हारे घर का उजाला है इन दिनों में कुछ उसके बुरे तेवर और बेडोल आँखें दिखाई देती हैं।" (रानी केतकी की कहानी, पृ. 07)

"मैं कहाँ तक उस सुंदर देश का वर्णन करूँ... जहाँ की निरझणी... जिनके तीर वानीर से भरे, मदकल कूंजित विहंग में से शोभित है... धूल ऐसी गलियों में छा जाती है मानो कुहिरा गिरता हो।" (श्यामा स्वप्न, 1888)

यह दरअसल गद्य की आद्य स्थिति है, जिसे सर्जनात्मक गद्य कहने में भी संकोच होता है। संकोच इसलिए कि यह इतिवृत्तपरक, कला-कल्पनाहीन एवं अर्थ सघनताहीन है। घटना वैचित्र्यता यहाँ लक्ष्य है तथा वर्णन मात्र ही प्रधान। हो, सो जैसे शब्द संकेत करते हैं कि गद्य का विन्यास भी स्थिर नहीं है। भाषा वस्तुतः यहाँ द्वितीयक है। शैली भी स्थिर नहीं। देवकीनंदन खत्री जी जहाँ हिंदुस्तानी में लिखते थे तो वहीं गोस्वामी जी अधिकांशतः संस्कृत प्रायः समास बहुला में। कथा-गद्य का यह स्वरूप देखकर ही आ. शुक्ल असमंजस में हैं। कहीं न कहीं भाषा का अस्थिर परिदृश्य उनकी आलोचनात्मक चेतना को प्रभावित भी करता है। वे खत्री जी को मौलिक उपन्यासकार मानते हुए भी साहित्य की दृष्टि से दूसरे स्थान पर टरका देते हैं और किशोरीलाल गोस्वामी को पहला उपन्यासकार मान लेते हैं। तर्क देखिए - "दूसरे मौलिक उपन्यासकार पं. किशोरीलाल गोस्वामी हैं, जिनकी रचनाएँ साहित्य कोटि में आती है। साहित्य की दृष्टि से उन्हें हिंदी का प्रथम उपन्यासकार कहना चाहिए।" (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 443) अब जब शैली स्थिर नहीं, भाषा का स्वरूप अधर में है तो किस कारण से गोस्वामी जी पहले मौलिक उपन्यासकार हुए? क्या अधिक उपन्यास लिख देने के कारण? पर शायद कुछ दूसरे कारणों, जैसे कि रस संचार, भावाविभूति या चरित्र चित्रण, यथार्थ चित्रण (शब्द शुक्ल जी के) आदि से शुक्ल जी इस स्थिति को देख रहे थे। लेकिन इस आधार पर तो चंद्रकांता गोस्वामी जी के तमाम उपन्यासों पर भारी पड़ती है। क्या लोकप्रियता का रस संचार, भावाविभूति से विरोध है? और क्या चंद्रकांता यथार्थहीन उपन्यास है? आज चंद्रकांता में अभिव्यक्त यथार्थ को आँकने के लिए साहित्यिक आलोचना को ही क्या समृद्ध नहीं होना पड़ेगा? क्या ऐय्यारों के परिवर्तनशील चरित्र में तब का मानव और साम्राज्यवादी शक्ति का परिवर्तनशील और छद्म चरित्र शामिल नहीं है। वास्तव में चंद्रकांता में युगीन यथार्थ का एक भयानक छायारूप अभिव्यक्त है जो एक दूसरे स्तर पर इसे नितांत साहित्यक बनाता है। हाँ इसकी भाषा वर्णन बहुला जरूर है। शैली भी स्थिर या आज की दृष्टि में मानक नहीं है। दरअसल भाषा के इसी रूप को शुरू में ही चतुर्वेदी जी के कथन के माध्यम से 'मिट्टी का प्रभाव' बतला आए हैं। खैर, तो प्रारंभिक कथा-भाषा में यही वर्णन बहुलता, इतिवृत्तिपरकता और अर्थसघनहीनता दिखाई देती है। भाषा प्रयोग का संस्कार भी पूरी तरह से जम नहीं पाया है। शैली हिंदुस्तानी और संस्कृत बहुला के इधर या उधर। वास्तव में घटनापरकता, मनोरंजन तथा नीतिपरकता के प्रभाव ने भाषा को बनने ही नहीं दिया। कुल मिलाकर भाषा का यह रूप असर्जनात्मक है।

लेकिन यह एक आधार है, एक प्रेरणा, एक नींव। चंद्रकांता जैसी कृतियों में व्यक्त यथार्थ ने तदनुरूप भाषा का मार्ग प्रशस्त किया। स्वाभविक विकास के क्रम में आधुनिक कथा-भाषा ने एक रूपाकार लिया - उपन्यास और कहानी दोनों में। आ. शुक्ल, गुलेरी जी, की कथाओं मे आरंभिक विन्यास और प्रेमचंद, आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेंद्र, अज्ञेय और फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य में आधुनिक कथा-भाषा के स्वरूप का आगे विकास होता है।

आधुनिक होने के तमाम अर्थों में एक महान अर्थ है - वयस्कता का। मौलिकता, समाज सापेक्षता, गंभीरता, ऐहिकता, सर्जनात्मक कल्पनाशीलता आदि भाव इसमें शामिल है। इस आधार पर देखें तो प्रेमचंद में पहुँच कर हिंदी उपन्यास अपनी भाषा में वयस्क या आधुनिक होता है। वहीं कहानी में यह 'इंदुमति' (किशोरी लाल गोस्वामी, सरस्वती, 1900), ग्यारह वर्ष का समय (आ. शुक्ल, सरस्वती, 1903) से आती है। ब्रज भाषा के प्रभाव से मुक्त, अँग्रेजी अनुवादों से मुक्त, पूर्व प्रचलित संस्कृत कथाओं कें अनुकरण से मुक्त खड़ी बोली की अपनी भंगिमा यहाँ से दिखाई देने लगती है -

"उन्होने चट अपना हाथ फैला दिया, जिस पर एक काला तिल दिखाई दिया। स्त्री कुछ काल तक उसी की ओर देखती रही, फिर मुँह ढाँप कर सिर नीचा करके बैठ रही। लज्जा का प्रवेश हुआ। क्योंकि यह एक हिंदू रमणी का उसके पति के साथ प्रथम संयोग था।" (ग्यारह वर्ष का समय, आ. शुक्ल - सरस्वती, 1903)

"वहाँ खूब रौनक और सफाई है। प्रायः सभी द्वारों पर सायबान थे, उनमे बड़े-बड़े तख्त बिछे हुए थे। अधिकांश घरों में सफेदी हो गई थी... चौतरे पर बैठे हुए चौधरी रामायण पढ़ रहे थे और स्त्रियाँ बैठी सुन रही थी।" (प्रेमाश्रम, प्रेमचंद, 1921)

सर्वप्रथम कथा-गद्य का विधान, उसका विन्यास बदला। कथा का आद्य वाक्य-विन्यास, 'कर्ता-कर्म-क्रिया' अर्थात 'एक राजा था' - इसमें परिवर्तन आया। इस विन्यास के बदलने से ही राजा का होना या उसके होने का ढंग बदला। तो विन्यास का यह बदलाव आधुनिक कथा-भाषा की पहली विशेषता है। गद्य तो शुरू से ही आधुनिक था, पर कथा गद्य इस रूप में ही आधुनिक हुआ - अर्थात सर्जनात्मकता का उदय। शेखर (1941) में अज्ञेय लिखना शुरू करते है "सबसे पहले तुम, शशि।" विन्यास का यह रूप अन्य कथाकारों में भी हम देखते हैं, पर प्रेमचंद में कम। क्योंकि कहानी, सुनाने का आदर्श उनके यहाँ लिखने से अधिक है। हालाँकि इसके भी सकारात्मक-नकारात्मक पक्ष हैं। वैसे कफन और गोदान में विन्यास का यह रूप हम कतिपय देख सकते है।

विन्यास के इस बदलाव ने वर्णन पर निर्भरता को समाप्त कर दिया। कर्ता-कर्म-क्रिया का रूप उल्टा-पल्टा, बिना क्रिया के वाक्यों के प्रयोग का चलन हुआ, फलतः कथा भाषा में भावात्मकता और अर्थसघनता आई। यह सर्जनात्मकता का दूसरा स्तर हुआ। यह वस्तुतः वर्णन और अनुभव का सम्मिलन है, जो आधुनिक कथा-भाषा की दूसरी विषेशता है। जैनेंद्र के त्यागपत्र (1937) का शुरूआती अंश ही देखें -

"हम लोगों का असली घर पछाँह की ओर था। पिता प्रतिष्ठावाले थे और माता अत्यंत कुशल गृहणी थीं। जैसी कुशल थीं वैसे कोमल भी होतीं तो?"

"इस होती तो?" में वर्णन से आगे बढ़कर अनुभव की अभिव्यक्ति की आकांक्षा है, पर यहाँ वह पूर्ण नहीं, कोशिश मात्र है, केवल व्यंजना है। लेकिन आधुनिक कथा-भाषा का यह प्रस्थान बिंदु हैं। अनुभव की अभिव्यक्तियाँ आगे चलकर और भी समृद्ध हुईं।

यह मिट्टी के जड़ और स्थूल वर्णन से पानी के अनुभवगत वैविध्य गति और कल्पनाशीलता का एक रासायनिक घोल है जो आधुनिक कथा भाषा का प्रधान स्वरूप सामने लाता है। अज्ञेय शेखर में लिखते हैं - "अभिमान से बड़ा एक दर्द है और दर्द से भी बड़ा एक विश्वास" या "अहंकार स्वाभाविक होता है, विनय सीखनी ही पड़ती है।" वस्तुतः यह भाषा के साथ अनुभव की संपृक्ति है। इसलिए ये वाक्यांश सूत्र रूप में बन गए हैं। संशय नहीं कि बड़े अनुभव की भाषा, अपने आकार में बडी़ नहीं हो सकती। चिंतन विस्तार देता है पर जहाँ अनुभूति योग हो जाय, वहाँ यह पूरा योग जालों को साफकर संकुचित होकर पारदर्शी बन जाता है और इस तरह भाषा ग्रंथ नहीं बनाती, केवल शब्द बनाती है जैसे कि गीता, मानस, राम की शक्ति पूजा आदि।

कथा के इस आधुनिक गद्य में भाषा भी अपना एक स्वरूप धारण करती है। आ. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक संस्कार भर दिया था, इधर प्रेमचंद भी इसको लगभग साध चुके थे। कुल मिलाकार एक परिनिष्ठित हिंदी का रूप चल पड़ा था। यह रूप प्रकृति में सर्वसमावेषी तथा चरित्र में जनतांत्रिक था। इसने आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी से भी अपना प्रयोग करवा लिया। वाणभट्ट की आत्मकथा (1946) में तत्सम बहुला भाषा के बीच 'निउनिया, बंड, फक्कड़ बच्चू तथा लौ गुरू, पौ बारह हैं तुम्हारे' जैसे प्रयोग दिखते हैं। कथा-गद्य लेखन की इस नई शैली में हम देखते हैं कि धीरे-धीरे तत्सम पदावली बुनी जाती है और उसके बीच एकाएक कोई लोक प्रयोग डालकर भंग कर दिया जाता है, मानो पंडि़त और सामान्य जन दोनों को विश्वास में लेने का इरादा हो। उधर प्रेमचंद और जैनेंद्र में यह शैली अपने उभार पर है। गोदान में गोबर कहता है - "मैं तो अपने हाथों अपने पैर पर कुल्हाड़ी न मारूँगा,' वहीं जैनेंद्र त्यागपत्र में लिखते हैं - "मन में एक गाँठ सी पड़ती जाती है या नींव ढीली ही होगी और ऐसे हाथ में अपने आने वाला कुछ नहीं है।" हम देख सकते हैं कि प्रेमचंद में जहाँ प्रचलित प्रसंगमूलक मुहाविरों का प्रयोग अधिक है तो वहीं जैनेंद्र में बोलचाल का ठेठ मुहाविरा है। वस्तुतः यह भाषा को अलग-अलग अंतर्भुक्त कर रचने की रचना प्रकिया है। अतः शैली में विविधता देख सकते हैं पर भाषा विधान सम पर ही बना हुआ है।

इस आदर्श को कायम रखते हुए भी रेणु 'मैला आँचल'(1954) में आधुनिक कथा-भाषा के उक्त स्वरूप में कुछ नया जोड़ देते हैं। समावेसन हेतु परिनिष्ठित हिंदी में चंचलता भर देते हैं और इस तरह भाषा में गति तथा वैविध्यता जोड़ देते हैं। हमारा संकेत वस्तुतः अंचल की बोली, भाषा की ओर है। यह कथा-भाषा में अनुभव को बाँटना तथा जोड़ना एक साथ है। इस अंतर्क्रिया ने आधुनिक कथा भाषा को समृद्ध ही बनाया। सम भाषा विधान के साथ ही चंचलता गति तथा वैविध्यता का यह रंग देखें -

"पियारे भाइयों! कोठारिन साहेब जितना बात बोलीं, सब ठीक है। लेकिन सबसे बड़ा दोशी हम हैं। हमारे कारण ही गाँव में लड़ाई झगड़ा हो रहा है... हम कोई विद्वान नहीं है, शास्तर पुराण नहीं पढे़ हैं। गरीब आदमी है, मुरख हैं।" (मैला आँचल, पाँच)

वस्तुतः यह वर्णन से अनुभव को जोड़ने की कोशिश ही नहीं है अपितु भाषा के विधान को ही रससिक्त कर देने की चेष्टा है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि वेदों में मैं सामवेद हूँ क्योंकि उसमें ज्ञान और रस दोनों है। यह आदर्श, संशय नहीं, साहित्य से भी जुड़ा हुआ है। इसको प्राप्त करने के कई तरीके हो सकते हैं। पर एक उपाय है विशिष्ट की सामान्य के रूप में पहिचान कराना। अंचल विशिष्ट है, पर रेणु इस अनुभूति का प्रसार कर देते हैं। आधुनिक कथा-भाषा का मूल स्वरूप निःसंदेह इस आदर्श से संबद्ध है।

गद्य और पद्य का सम्मिलन भी कथा-भाषा के आधुनिक स्वरूप के साथ संबद्ध है। वस्तुतः पद्य का योग भी कथा की भाषा को अर्थसंघनता और इस तरह सर्जनात्मकता की ओर ले गया। वैसे गद्य से पद्य का यह जुड़ाव हमें गद्य कविता की ओर भी ले गया जो लगभग निराला के समय से ही अस्तित्वमान है। पर पद्य का जो रूप कथा-गद्य ने अर्जित किया वह दरअसल दूसरे तरह का है। पाश्चात्य रोमांटिकों ने गद्य और पद्य में भेद स्थापित करने के लिए दो रूपकों का सहारा लिया। गद्य के बारे में उनका विचार था -

"गद्य अर्थात् घूमना (वाकिंग), जिसका सदैव एक निश्चित उद्देश्य होता है। यह एक क्रिया है, एक निश्चित मंजिल की ओर जहाँ हम पहुँचना चाहते हैं। हमारी इच्छा, हमारा शरीर, राह की स्थिति आदि हमें नियमित करती हैं, इस तक पहुँचने में।"

वहीं पद्य के बारे में उनकी राय थी -

"पद्य नृत्य की तरह है, जो गद्य से नितांत भिन्न है। निश्चित ही यह क्रियाओं की व्यवस्था है, लेकिन जिनका लक्ष्य इन क्रियाओं में है। यह कहीं नहीं जाता। अगर यह कुछ द्योतित करता है तो वह है एक मानसिक, भावात्मक वस्तु, एक उल्लास, एक पुष्प का आभास हाने का सर्वोतम रूप।"

तो गद्य के चिंतन मनन में पद्य अपने नृत्य रूप में प्रकट हुआ और इसकी चाल को बदल दिया। आश्चर्य नहीं कि इस प्रभाव ने गद्य के चलन को भी बदला। क्या कहना जरूरी है कि आधुनिक यथार्थ की बहुस्तरीयता को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द नृत्य की यह भंगिमा जरूरी थी। इस प्रसंग को विस्तृत रूप से समझने के लिए आधुनिक युग में भाषा और यथार्थ के बारे में बनी नई समझ का संक्षिप्त निरूपण जरूरी होगा।

वस्तुतः यथार्थ बहुस्तरीय, बहुरूप होता है। अज्ञेय लिखते हैं - "लेकिन यथार्थ एक साधारण दृष्य स्तर पर होता है, और एक दूसरे स्तर पर भी घटित होता है।" (अज्ञेय, अपने बारे में पृ. 70) इसीलिए यथार्थ की पहचान की विभिन्न प्रणालियों को उसकी ऐंद्रिक और भाषिक पहचानों को एक ही वर्ग में नहीं रखा जा सकता। यदि माध्यम यथार्थ की नई रचना करता है तो मानना होगा कि यथार्थ के उतने ही प्रकार संभव है, जितने प्रकार के माध्यमों से हम उसे पहचानने का उपक्रम करते हैं। इसलिए विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों की तरह साहित्य के विविध रूप भी यथार्थ की पहचान की इस प्रक्रिया में उसकी रचना के विविध स्वायत्त मध्यम है। स्वायत्त इसलिए कि यथार्थ की जो रचना वे करते हैं वह अन्य माध्यमों के अनुशासन से नियंत्रित नहीं है। उसकी सर्जनात्मकता उनके माध्यम की अपनी प्रकृति में ही अंतर्भुक्त है। साहित्य के प्रत्येक रूप की इसलिए प्रत्येक कथा रूप का औचित्य इस बोध में निहित है कि वह यथार्थ की ऐसी रचना करता है और पहचान भी करवाता है, जो अन्य किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता तो साहित्य, प्राकृतिक या सामाजिक विज्ञान एक रूप होते।

अतः संशय नहीं कि जो माध्यम हम अपनाते हैं, यथार्थ की हमारी पहचान उसी से अनिवार्यतः प्रभावित होती है। यदि इस तर्क को हम स्वीकार करें तो मानना पड़ेगा कि भाषा , जो केवल अभिधात्मक या सूचनात्मक नहीं, जिसके अनेक रूप और बोलियाँ हैं, जो जानकारी का ही नहीं विचार अनुभव और चेतना के विकास का भी माध्यम हो सकती है, जिसकी सर्जनात्मक संभावनाएँ असीम है तो अनिवार्यतः हमें यह मानना होगा कि साहित्य के विविध रूप भाषा की बहुआयामी अर्थ रूपगर्भिता के आधार पर विकसित होते हैं और इन विधाओं का हर नया रूप यथार्थ की नई रचना करता है।

कथा, भाषा का ही एक विशिष्ट रूपाकार है और इसलिए यथार्थ की रचना और उसकी पहचान का एक विशिष्ट माध्यम भी जिसका पहला एवं अंतिम आधार भाषा का स्वभाव है। इस संदर्भ में डेविड लाज लिखते हैं - "कथाकार का माध्यम भाषा है, वह जो भी करता है, भाषा के ही आधार पर करता है।" तो इस प्रकार कथाकार किसी पूर्व निर्धारित अर्थ को भाषा नहीं देता बल्कि भाषा के जरिए भाषा की अपनी प्रकृति के निर्देशानुसार उसी में अर्थ की तलाश करता है। इसलिए कथा भी यथार्थ तक पहुँचने की एक विशिष्ट प्रणाली है जो अपने तरीके से यथार्थ की अलग रचना करती है - इस विशिष्ट प्रणाली का अनुभव या बोध पाठक तक संप्रेषित करना ही कथाकार के लिए अपेक्षित है क्योंकि उसके और पाठक के लिए वह प्रणाली ही अधिक महत्वपूर्ण है, वही यथार्थ का स्वरूप निर्धारित करती है। इसलिए कथा में स्थूल घटनाओं या ब्यौरों की विश्वसनीयता साहित्यगत यथार्थ की विश्वसनीयता की कसौटी नहीं है क्योंकि कथा साहित्येत्तर घटनाओं का बोध नहीं बल्कि भाषा के एक विशिष्ट सर्जनात्मक प्रकार के माध्यम से कथात्मक यथार्थ का बोध है। अतः वाह्य यथार्थ की तब तक कथा में कोई जगह नहीं है जब तक वह उसके किसी आंतरिक प्रयोजन को पूरा नहीं करता है। फैंटेसी जैसी विधियाँ इस बात का प्रमाण है, जिसमें स्थूल घटनाओं की विश्वसनीयता का तो अतिक्रमण किया जा सकता है पर भाषिक विश्वसनीयता का नहीं।

इसलिए कथा-भाषा के विविध रूप और शैलियाँ यथार्थ की रचना की विविध शैलियाँ या प्रणालियाँ है। इन विविध शैलियों के माध्यम से यथार्थ का जो स्वरूप उजागर होता है, उनमें भी भिन्नताएँ होती है। ये भिन्नताएँ सतहीं नहीं होती बल्कि वे भाषा की एक गहरी संरचना को अभिव्यक्त करती है। स्पष्ट है कि ठीक यही बात भाषा में यथार्थ की रचना और उसके संप्रेषण के विविध रूपों के बारे में कही जा सकती है। इसलिए उन्हें किसी साहित्येत्तर यथार्थ की उपज मात्र मानना गलत होगा क्योंकि इनके बदले जाने पर भी उनमें निहित दृष्टि और यथार्थ का बोध अप्रांसगिक नहीं हो जाता। आश्चर्य नहीं कि स्वयं कार्ल मार्क्स के सामने कठिनाई थी कि परिस्थितियों के बदल जाने पर भी ग्रीक महाकाव्य कलात्मक आनंद क्यों देते हैं। स्पष्टतः यह गुण भाषा के अपने स्वभाव और विशिष्ट सर्जनात्मक गुणों की वजह से है।

लेकिन भाषा की अपनी प्रकृति की वजह से ही कथा लेखक या कहें सर्जनात्मक गद्य लेखक के सम्मुख कई समस्याएँ पैदा हो जाती है। भाषा का एक निश्चित सार्वजनिक अर्थ होता है और गद्य इस अर्थ को संगति में व्यक्त करता है। इधर कथा-गद्य की विवषता यह है कि उसे वाक्यों के संगतिमूलक संसर्ग पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसका साहित्यिक परिणाम यह होता है कि वाक्यों की इस संशक्ति के कारण इनके माध्यम में रचे जा रहे यथार्थ में भी एक संगति या क्रम-व्यवस्था रच जाती है। स्पष्ट है कि यह क्रम-व्यवस्था देशगत और कालगत होती है, जबकि अनुभूति या रचना के क्षण देश और काल की सीमाओं की अयथार्थता में ही संभव है। इस दबाब की ही वजह से कथा-गद्य में लाक्षणिकता का विकास हुआ, जिसने तार्किक गद्य से इसे अलग कर दिया। यह वस्तुतः आधुनिक कथा-भाषा का आविर्भाव था। लेकिन यह लाक्षणिकता भी कविता की कोटि तक नहीं पहुँच सकती - क्योंकि अंततः इसे वाक्य संगति या कहें संसर्गमूलक होना ही पड़ता है।

तो संशय नहीं, जब संष्लिश्ट यथार्थ की रचना और संप्रेषण का प्रश्न आता है तो कथा-भाषा के सामने समस्याएँ पैदा हो जाती है। डेविड लाज ने कथा की समस्याओं पर विचार करते हुए यही निष्कर्ष निकाला कि "कथा की केंद्रीय समस्या यह है कि कोई भी यथार्थ अब इकहरा नहीं है।" अतः सब कुछ को एक साथ व्यक्त कर पाना आधुनिक कथा-भाषा की प्रमुख चुनौती है। यथार्थ के इस रूप को ही अज्ञेय ने 'क्रमहीन सहवर्तिता' कहा है।

आश्चर्य नहीं कि ऐसी स्थिति में कथा-भाषा काव्य भाषा के पास आई। इसने रूपकात्मकता को विकसित करने की चेष्टा की। शब्दों के पुनराव के माध्यम से काव्यात्मक संष्लिश्ट यथार्थ को रचने का प्रयास किया। पश्चिम में मार्सेल प्रूस्त ने उपन्यास को एक स्मृति की तरह परिभाषित किया तथा उसके लिए रूपक विधान को आवश्यक माना। इधर हिंदी में प्रेमचंद और रेणु के बीच इसी संदर्भ में हम फर्क देख सकते हैं। प्रेमचंद में वृत्तांत की शैली ज्यादा है, रूपकात्मकता कम जबकि रेणु में चित्रण शैली अधिक है। वे पूरे गाँव को एक संष्लिश्ट अनुभव की तरह रचते हैं, जो रूपकात्मक भाषा में ही संभव है। वस्तुतः ये यथार्थ के प्रति दो एप्रोच है जो भाषा के जरिए रची जा सकती है। यहाँ कथा भाषा की कुछ समस्याओं का समाधान हो जाता है। उधर अज्ञेय की कथा-भाषा में भी रूपकात्मकता का यह गुण है तथा वह शब्दों के पुनराव से एक काव्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है -

"दोपहर में, उस घर के सूने आँगन में, पैर रखते ही मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, असंपृष्य किंतु फिर भी बोझिल और प्रकंपमय और घना सा फैल रहा था।" (रोज कहानी से)

यह संपृक्त विधान रेणु में भी दिखाई देता है, पर जरा दूसरे रूप में। नृत्यमय गद्य तो है ही पर संगीत लहरी भी है यहाँ। और संगीत भी कैसा? - लोक संगीत, आँचल का नाद, अटखेलियाँ खेलता हुआ -

डा डिग्गा, डा डिग्गा।

संथाल टोला में दो दिनों से दिन रात मादल बजता रहता है। डा डिग्गा, डा डिग्गा। औरतें गाती हैं, नाचती हैं - झुमुर झुमुर। दरखास्त नामंजूर हो गई। जमींदार जमीन छीन लेगा। कोठी के जंगल में, जामुन और गूलर में बहुत फल लगे हैं इस बार। जंगली सुअर के बच्चे भी बिलबिल कर रहे हैं। हल के फाल को तीर बनाओ। लोहा महँगा है। रे। हाय रे हाय डिग्गा, डा डिग्गा...।

रिंग रिंग ता धिन ता

डा डिग्गा, डा डिग्गा।" (मैला आँचल, 5)

तो यही है आधुनिक हिंदी कथा-भाषा का एक विशिष्ट स्वरूप। सर्जनात्मक, अर्थसघन... विराट। विन्यास का हठ नहीं है, भाषा बोलियों में अंतर्क्रिया है, शब्दों का संकेत ही नहीं, अनुमान भी है, शब्द नृत्य है, ध्वनि है... और क्यों न हों -

"न भाषा का शिकंजा, न भाव का। दोनों किसी कोड के नियमों मे बंध कर नहीं रह सकते। जिसे बढ़ाना है, वैसी कोई भी चीज शिकंजे में कसी नहीं रह सकती। शिकंजे में कस दोगे तो वह नहीं बढ़ेगी, लुंज रह जाएगी। हम उसी को सुंदरता मानने लग जाएँ तो बात दूसरी, पर दुनिया की स्पर्धा और दौड़ में वह कहीं की नहीं रह सकती। जैसे चीनी स्त्रियों के पैर। हिंदी भाषा-भाषियों और भाषा लेखकों को यह सत्य, पूरे हर्श से और बिना ईर्ष्या के माना लेना और अपना लेना चाहिए। भाषा का और दुनिया का हित इसी में है।" (जैनेंद्र कुमार, परख, भूमिका से)

निष्कर्षतः, 20वीं सदी के आरंभिक दशकों में हिंदी की आधुनिक कथा भाषा का स्वरूप उभर कर आ चुका था। उन दशकों के भारतीय यथार्थ, स्वतंत्रता एवं जनतंत्र के सपनों के अनुरूप यह भाषा बनती गई एवं इसमें हिंदी में कथा कहने की नई शैली ने जन्म लिया। इसकी उत्प्रेरक शक्ति से महान विधाओं - उपन्यास एव कहानी - ने आधुनिक पाठक के मन से, पुरा कथाओं को धीरे-धीरे धुँधला दिया, और आधुनिक मनुष्य की कथा कही।

संदर्भ

1. अज्ञेय : सामाजिक यथार्थ और कथा-भाषा की समस्याएँ, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

2. गोपाल राय : फणीश्वरनाथ रेणु और मैला आँचल, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1993

3. गोपीचंद नारंग : संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र (उर्दू से अनुवाद - देवेश), साहित्य एकेडमी, दिल्ली, 2000

4. परमानंद श्रीवास्तव : उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1976

5. रामस्वरूप चतुर्वेदी : हिंदी गद्य : विन्यास और विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996

6. रामस्वरूप चतुर्वेदी : हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1992

7. रामदरश मिश्र : हिंदी उपन्यास : एक अंतर्यात्रा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1982

8. Lodge, David : Language of Fiction: Essay in Criticism and Verbal Analysis of English Novel, Routledge & Kegan Paul, London, 1970

9. Lodge, David (ed.) : Modern Criticism and Theory: A Reader, London, Longman, 1991


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हिंदी समय में सर्वेश सिंह की रचनाएँ