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कहानी

ज़र्द पत्तों का बन!
आबिदा रहमान

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


एक तंग-ओ-तारीक गली के एक कोठरीनुमा घर में कि जहाँ सालों से कभी धूप नहीं पड़ी थी, मासूम सिद्दीक़ा की लाश मिली थी। सिद्दीक़ा जिसे ज़्यादती के बाद-ए-क़त्ल कर दिया गया था और टीवी, रेडियो पर हमेशा की तरह बड़े ज़ोर-ओ-शोर से ख़बर जारी थी। अख़बार में तसवीर के साथ शहा सुर्ख़ी दी गई थी कि गवर्नर और वज़ीर-ए-आला ने सिद्दीक़ा के क़तल की शदीद मुज़म्मत करते हुए कहा है कि क़ातिलों को जल्द ही गिरफ़्तार कर के सज़ा दी जाएगी।

सर ताहिर की क्लास में बच्चों के साथ ज़्यादती और क़तल पर बात हो रही थी। बकवास है सब सर, कोई क़ातिल नहीं पकड़ा जाएगा कोई सज़ा नहीं दी जाएगी। हमेशा ऐसा ही होता है। असावर ने ग़ुस्से से कहा।

बात सिद्दीक़ा के क़तल की हो रही थी कि ना जाने कैसे हलाल-ओ-हराम की जानिब मुड़ गई। बहस काफ़ी संजीदा थी लेकिन हराम नसल पर बात करते हुए एक शरारती ग्रुप ने जो हँसना शुरू कर दिया तो वहाज ने एकदम से क्लास छोड़ दी और क्लास में एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई।

वहाज, सनोबर के दरख़्तों में दूर तक चलता चला गया। सोचों में गुम्मा से असावर और जमशेद की आवाज़ें भी ना आएँ जो उसे बुलाते हुए चले आ रहे थे। जमशेद ने आगे बढ़कर उसे रोका। वो ख़ाली ख़ाली नज़रों से उसे देखने लगा। ख़ामोशी से वो तीनों ज़र्द खुश्क पत्तों से भरे लॉन की जानिब बढ़कर बैंच पर बैठ गए।

क्या हो जाता है तुम्हें? जमशेद ने पूछा।

पता नहीं। वहाज ने दूसरी तरफ़ देखते हुए कहा।

कुछ देर ख़ामोशी रही और फिर वहाज इन दोनों को वहीं छोड़कर हॉस्टल की तरफ़ चल पड़ा।

अपने कमरे की बड़ी सी खिड़की से वहाज लम्हे लम्हे में दरख़्तों से ज़र्द पत्तों को गिरते हुए देखता रहा। एकदम से उसके चारों तरफ़ ख़िज़ाँ छा गई। नमी उसकी आँखों में तैरने लगी। उसने एकदम से पर्दे खींच लिए और बैड पर लेट कर तकिया आँखों पर रख लिया।

वहाज यूँ ही कैंटीन की तरफ़ मुड़ने लगा कि सर ताहिर की आवाज़ आई। वो रुक गया।

मेरा भी चाय का मूड था। चलो अच्छा हुआ तुम मिल गए, कुछ गपशप ही हो जाएगी। सर ताहिर ने कहा।

काउंटर पर चाय का कहते हुए कोने वाली मेज़ पर खिड़की के पास दोनों बैठ गए।

उधर उधर की बातें करते हुए सर ने कहा, मेरी हमेशा से आदत है वहाज कि मेरे स्टूडेंट्स मेरे दोस्त होते हैं और मैं उनसे दुनिया जहाँ की बातें करता हूँ।

जवाब में वहाज बड़ी मुश्किल से मुस्कुराते हुए खिड़की से बाहर देखने लगा, जहाँ ख़िज़ाँ की बारिश छमछम बरसने लगी।

सर बारिश से दरख़्त, पौधे, इमारतें सब कुछ धुल जाता है... साफ़ हो जाता है... कोई दाग़, कोई धब्बा... बाक़ी नहीं रहता? क्या वाक़ई ये सारे दाग़ धो देती है सर...? उसकी नज़रें सर ताहिर के चेहरे का अहाता किए हुए थीं।

कल क्लास क्यों छोड़ दी थी? सर ताहिर ने चाय का कप उठाते हुए पूछा जो कुछ ही देर पहले बैरा रखकर गया था।

वहाज काफ़ी देर चुप-चाप दरख़्तों पर लरज़ते ज़र्द पत्तों को तकता रहा, फिर सोचों में गुम बोला, सर, ज़र्द पत्तों की मंज़िल बस ख़ाक होती है? पाँव में रौंद दिया जाना...?

ख़ाक से तो नई ज़िंदगी फूटती है वहाज।

मैं सात साल का था सर। दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा था, खेल खेल में हमारी लड़ाई हो गई। दिलबर ने मुझे चीख़ते हुए कहा था, तुम हरामी हो, तुम्हें अब्दुल चाचा ने कचरे के ढेर से उठाया था। मैं ये लफ़्ज़ सुनकर हैरान हुआ था। मुझे उसके मानी मालूम नहीं थे। दिलबर की बात सुनकर सारे बच्चे ज़ोर ज़ोर से क़हक़हे लगाने लगे। लेकिन फिर ये अक्सर होने लगा कि जब हमारी लड़ाई होती तो मुझे हरामी कहा जाता। मैं नहीं जानता था कि हरामी किसे कहते हैं लेकिन इन लड़कों की नज़रों की नागवारियत और तम्सख़र मुझे एहसास दिलाता था कि मैं वो नहीं कि जो वो हैं... आख़िर में क्या हूँ जो वो नहीं हैं...?

किसी अनजानी सी तकलीफ़ ने मेरे अंदर घर कर लिया था सर।

वहाज चुप हो गया। सर ताहिर की नज़रें वहाज के उदास चेहरे पर थीं। कुछ देर ख़ामोशी रही और वहाज दुबारा बोलने लगा, मैंने एक दिन बाबा से पूछ लिया, बाबा हरामी किसको कहते हैं? बाबा तो हैरत के मारे कुछ बोल ही ना सके। बस मुझे देखते रहे। मेरे दुबारा पूछने पर कहने लगे हरामी कुछ नहीं होता बेटा, और जो कुछ नहीं होता इस पर नहीं सोचा करते, बाबा ने वापिस अपना काम शुरू कर दिया।

तो मैं कुछ नहीं हूँ, मेरे दिल में ख़्याल आया।

बार-बार मुझे हरामी कहा जाने लगा तो मैंने बाबा को तंग करना शुरू कर दिया मुझे बताओ बाबा, मैं हरामी कैसे हूँ? क्या वाक़ई तुमने मुझे कचरे से उठाया था? बाबा को मुझे बताना पड़ा कि हाँ मुझे उसने रात के अँधेरे में कचरे से उठाया था जहाँ क़रीब ही कुत्ते भोंक रहे थे।

वहाज ख़ामोश हो गया। एक गहरी ख़ामोशी छा गई। बारिश की आवाज़ अंदर तक आ रही थी... चाय ठंडी यख़ हो चुकी थी... वहाज की आँखों में नमी तैरने लगी... उसने एक ठंडी साँस ली...!

इतने बरस बीत गए सर लेकिन मुझे उसके बाद से अपना आप ग़लाज़त का ढेर लगता है... इक नागवारियत सी मेरी नथनों में घुस रही है... मेरे दिमाग़ को जलाए दे रही है... दूर तक एक गाढ़ा अँधेरा... जहाँ हाथ को हाथ सुझाई ना दे... इक तवील ख़ामोशी... इक सुकूत... ऐसा कि अपने दिल की धड़कन गूँज बन कर सुनाई देती है...।

वहाज ने सर झुका लिया। बाहर से बारिश की हल्की हल्की आवाज़ आती रही। सर ताहिर उसे गहरी नज़रों से देखते रहे।

मैं बड़ा होता गया, ग़लाज़त मेरे साथ बड़ी होती गई... इतनी बड़ी सर कि ...मैं अपनी ग़लाज़त में छिप गया... हरामी था... हरामी ही रहा...! वहाज ने पलकें उठाते हुए कहा।

वहाज! हरामी तो समाज की वो बंधनें हैं जिससे हराम सोचें निकलती हैं जो गुनाह की राह हैं... जिससे तम्सख़र निकलता है... जिससे बदबू... ग़लाज़त निकलती है। वहाज ने सर की तरफ़ देखा।

हाँ वहाज! रवैय्ये हराम होते हैं, इनसान भला कैसे हराम हो सकता है? हरामी तो समाज है! पूरे मुआशरे की रगों में हराम ख़ून दौड़ रहा है। पूरा सिस्टम ही हरामी है। दफ़्तरों को ही ले लू, पूरे दिन में दो घंटों के लिए आकर चाय का दौर चलाने वाले, तुम क्या समझते हो हलाली हैं? भूख, अफ़्लास, ग़ुर्बत, बेरोज़गारी से तंग आकर जिस मुआशरे में इनसान अपनी औलाद को बेचता है, क़तल करता है, क्या ये सिस्टम हरामी नहीं? हरामी मुआशरा नहीं? सर ताहिर बड़े पुरसुकून अंदाज़ में बोल रहे थे और वहाज सुनता रहा।

वहाज तुम बताओ! आए दिन जब नन्हीं बच्चियों के साथ ज़्यादती की जाती है, उन्हें क़तल कर दिया जाता है, तुम्हारा क्या ख़्याल है कि वो एक फ़र्द या... वो चंद अफ़राद ही नफ़सियाती मरीज़ हैं? भूख, ग़ुर्बत, दौलत का ये ग़ैर मुतवाज़िन मुआशरा जहाँ एक तरफ़ कुत्तों की तरह कचरे के ढेर पर रिज़्क़ तलाश किया जाता है और दूसरी तरफ़ कुत्तों को भी आला ख़ुराक दी जाती है, क्या ये सब एक हराम मुआशरे की निशानी नहीं? ज़ुलम, जबर, ग़ुर्बत, भूख, इस्तिहसाल ने पूरे मुआशरे को नफ़सियाती मरीज़ बना दिया है, सर इस सब पर कभी सोचा ही नहीं था वहाज ने कहा।

सोचो बेटा, सोचो... यूँ तो हमारे मुआशरे में ही ये सब हो रहा है लेकिन... ये भी सोचो कि एक ज़मीन पर... एक ही मुल्क में... क्यों कुछ हिस्से सरमाया-दारी निज़ाम की हरामकारी का शिकार हैं? वहाज ने सर ताहिर का हाथ पकड़ा तो इन्होंने वहाज का हाथ दबाते हुए कहा, वहाज तुम जाने किस हलाल-ओ-हराम के चक्कर में पड़े हो... अपने इर्द-गिर्द देखो सब बावले हो गए हैं। जब तक ये बीमारियाँ ख़त्म नहीं होंगी तब तक हम तंदरुस्त कैसे हो सकते हैं?

असावर जो ना जाने कब से वहाँ आकर खड़ी हो गई थी, वहाज के हाथ पर हाथ रखते हुए बोली, शहर के मुज़ाफ़ात में एक और बच्ची की लाश मिली है...!


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