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कहानी

मैं गिरवी, मेरा तन गिरवी
आबिदा रहमान

अनुवाद - ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल


सूरज देवता आज ग़ज़बनाक हो रहा था। वो भी ईंटों के इस शहर पर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। इस पर जब लू चलती तो सालों से झुलसे हुए वजूद मज़ीद झुलस जाते। लेकिन मजाल है कि उनके काम के धर्म में जो ज़रा भी फ़र्क़ आया हो। साँचा गीली मिट्टी के गोले से भरता जाता और ईंटों की तादाद बढ़ती चली जाती। एक लम्हे को तो यूँ लगता कि जैसे इन सबको एक दूसरे से तो क्या, ख़ुद से से भी कोई ताल्लुक़ ना हो।

दिलबर ने बैलगाड़ी कच्ची ईंटों से भरी और बैलों को हाँकते हुए चलती गाड़ी में भागते हुए चढ़ा। चाचा गुलज़ार जो अभी अभी गारा बना कर हटा था, सर पर बाँधे रूमाल का कोना जो उस की आँखों के सामने लटकने लगा था उसे बाँधने लगा और पास से गुज़रते बैलगाड़ी में बैठे दिलबर को उसने आवाज़ लगाई वए दिलबरे इत्ते ज़ोर से ना खिच बीलां नों।

अच्छा चाचा दिलबर ने हँसते हुए कहा। बैलगाड़ी पर लगे घूँघरों की आवाज़ फ़िज़ा में गूँज रही थी।

ईंटें बनाते बनाते कर्मो को अचानक फिर से खाँसी का दौरा शुरू हो गया। उसे अध मोह-ए-कर के खाँसी ने एक लम्हे को जो जान छोड़ी तो उसने साँचा दूर फेंका। अपने दाएँ तरफ़ ज़ोर से थूका। अपने इर्द-गिर्द नज़र डाली। ईंटों की क़तारें दूर तक चली गई थीं जो वो सुबह से बनाता रहा था। चंद गज़ के फ़ासले पर तीन अधनंगे बच्चे सगरी को ईंटें पकड़ा रहे थे जो वो पहले से बनी कच्ची ईंटों की दीवार पर धरती जा रही थी। सोचों में गुम कर्मो की नज़र दूर ईंट दर ईंट, आसमान को छूती हुई इमारत पर जा रुकी। उसने एक झुरझुरी ली। पसीना उस के कानों की लोओं से होता हुआ गर्दन तक बह रहा था। वो झुँझला कर उठा और नंगे-पाँव गर्म तपती ज़मीन पर तालाब की जानिब चल पड़ा।

सोचों में गुम चलते चलते सगरी के पास से गुज़रते हुए वो एक लम्हे को ठटका। तेज़ी से ईंट पर ईंट रखते हुए उस के कानों में पीतल के बाले भी इसी तेज़ी से लरज़ते हुए उस के गालों को छू रहे थे। कर्मो के लबों पर एक तल्ख़ सी मुस्कुराहट आई और वो तालाब की जानिब तेज़ तेज़-क़दम लेने लगा।

अरे ओ कर्मो, की होया, तेरे मुँह तय बारह क्यों वजदे। अरे सब ठीक आँ ना? बशीरे ने गधों को तालाब की तरफ़ हाँकते हुए दूर से आते हुए कर्मो से पूछा।

अरे कझ नहीं यार होना किया है...! कर्मो तालाब के किनारे बैठ कर कली करने लगा। मुँह पर पानी के छुपाके मारे और तालाब से हट कर कच्ची मिट्टी के गारे के पास बैठ गया। बशीरा भी इस के क़रीब आ बैठा। दूर ख़लाओं में जाने कर्मो क्या ढूँढ़ता रहा। चंद लम्हे ख़ामोशी रही फिर कर्मो बोला।

यार बशीरे इसां तूं अच्छी तय ए चिमनियां ईं ...उऩ्हां दे सीणां उच्च जो कुछ जल्दा होगा... जो पकदा होगा... उऩ्हां नों कम अज़ कम स्याह गाड़े धोवें दी सूरत उगलते सकदयां ना... आकाश दे हवाले कर के ख़ुद को हल्कातय करसकदयां...!

कहता तू तो ठीक है कर्मो मेरे यार पर इसां की पई करें। अपनीतय जिंदगी ऐट का साँचा ही रहा भाई... ना उधर को जा पावें ना उधर को...! बशीरा अपनी खुरदुरी हथेलियों से सुर्ख़ आँखों को मिलते हुए बोला।

बेल की बड़ी सी आवाज़ ने ख़ामोशी को तोड़ा। चिमनी फ़िज़ा में काले स्याह बादल फूँकती रही। कर्मो पर एक दफ़ा फिर से खाँसी का दौरा पड़ा। वो मुसलसल खाँसता रहा। उसने गारे के पास थूकते हुए कहा यार बशीरे इन भट्टियाँ ने तय ख़ुदा दी क़स्मे साडी पालन देवी ज़िम्मेदारी ले रखी एतय इसां नों मारन देवी।

पर ये बता कर्मो तो इज इतना उदास क्यों ए? बशीरा जो उठकर तालाब के पास चला गया था, पाँव पानी में डालते हुए पूछने लगा। काफ़ी देर तक कर्मो ने कोई जवाब नहीं दिया।

चिमनी धुआँ उगलती रही। पास ही से गधों की आवाज़ आती रही।

कदी कदीतय इस जिंदगी तूँ वी जी उकता जाँदा यारा। सारी हयाती इक जैसे ही हालात रहे। सारा सारा दिन गजर जांदा ए अट्टां बनाते बनाते कर्मो आह भर कर ख़ामोश हो गया फिर बोला अरे बशीरे सच्च बता क्या तेरा दम नहीं घटदा उधर...? पीढ़ियों से इसां उधर। पहले बाप दादा... फिर हम... अगे से हमारी औलाद... कर्मो ने खाँसते हुए बलग़म दूर फेंका जिसमें कुछ दिन से सुर्ख़ी भी थी।

ओ यारा घटदाहे दम मेरा, दम क्यों नईं घट दा... पर जावां वीतय किधरों जावां आख़िर...!

बशीरे ने वहीं से बैठे-बैठे जवाब दिया।

अरे ख़वतों ज्यूँ काम कर दे इसां पूरा दिनतय मुनाफ़ा सारा ओ कमीना मालिक ख़ुद ले जांदा... ओ बशीरे किया इसां मुनाफ़ा दे हक़दार नईं...! उस की नज़रें चौदह साला मनीरे पर थीं जो अपने नाज़ुक हाथों में कोयला लिए आग में झोंक रहा था।

मैनों याद है अच्छी तरह बशीरे में सोला साल दा बच्चा होसां। अब्बा भट्टियाँ तय कम कर दे कर दे दमे दा मरीज़ बन गया। हर वक़्त इस दा साँस बंद हिन्दा सी। इक दिन ओस दी तबईत बहुत ई कोई बिगड़ गई। मैं घबरा गयाँ। पले एक धेला नईं जो दवा लाया ओसां या अबे लुई डाक्टर नों लानदा। जा कर मालिक तूं पेशगी तनख़्वाह दा तक़ाज़ा किया।

दिए थे फ़ीर ओस ने...? ओतय बड़ा कमीना बंदा ए बशीरे ने पूछा अरे ज़लील किरण दूँ बाद दिए। ओही सूदतय चुका रियों इज दिन तक यारा... उधार ख़त्म ही नहीं हो रिया...! कर्मो दुख से बोला।

बंदा करे तो क्या करे। अपनी तय हयाती पर ही लानत होई। कर्मो बशीरे की आँखों की नमी हलक़ में उतरी।

इसां तय मालिक दे क़ैदी आँ बशीरे... ना ज़रूर तां पूरी होवें तय ना मालिक तूँ पेशगी तनखा हाँ लेना बंद हवीं... ना ई अधारां पई चुकीं ...अपनी जिंदगी, अपनी अजादी गिरवी हुए मालिक दे कोल।

सूरज ग़ुरूब होने को था। उस की ज़र्द किरनें उफ़ुक़ पर फैल गईं थीं। कर्मो उठ खाँसते हुए अपने बेटे मनीरे की तरफ़ चल पड़ा जो कोयले की कालिख से अटे कपड़े पहने ज़ख़्मी हाथों से भट्टियों में कोयला डाल रहा था। जाने किस आसीब से बचाने को मनीरे के गले में एक बड़ा तावीज़ झोल रहा था।

मनीरे के पास पहुँचते पहुँचते कर्मो को एक दफ़ा फिर से खाँसी का दौरा शुरू हो गया। खाँसी शदीद होती चली गई। खाँसते खाँसते सीना पकड़ कर वो नीचे गिर पड़ा। मुनीरा भाग कर बाप की तरफ़ आया। मुनीरा जो गधों की जानिब मुड़ गया था वो भी दौड़ता हुआ आया... डूबते सूरज के साथ उस की आँखें भी ग़ुरूब हो रही थीं...! कर्मो की सुबह तलूअ नहीं हुई... नसल दर नसल अपनी आज़ादी गिरवी रखने वाले के कफ़न दफ़न के लिए चौदह साला मनीरे ने मालिक के घर की तरफ़ दौड़ लगा दी... एक और ज़िंदगी... एक और आज़ादी गिरवी रखने के लिए...!


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