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कहानी

रोने की आवाज
सुरेंद्र प्रकाश


सामने वाली कुर्सी पर बैठा अभी अभी वो गा रहा था। मगर अब कुर्सी की सीट पर उस के जिस्म के दबाव का निशान ही बाकी है। कितना अच्छा गाता है वो... मुझे मगरिबी मौसीकी और शाइरी से कुछ ऐसी दिलचस्पी तो नहीं है। मगर वो कम-बख्त गाता ही कुछ इस तरह है कि मैं खो सा जाता हूँ। वो गाता रहा और मैं सोचता रहा। क्या फूल दरख्त के साए तले वाकई आजाद है?

वो अब जा चुका है। जिन सुरों में वो गा रहा था वो अपनी गूँज भी खो चुके हैं। मग अलफाज से में अभी तक उलझा हुआ हूँ।

"फ्लावर अंडर ट्री इज फ़्री" "Flower Under Tree Is Free"

इस से एक बात जरूर साबित होती है कि अलफाज की उम्र सर से लंबी होती है। शाम, जब वो मुझसे मिला खासा नशे में था। तालिब-इल्मों के एक गिरोह ने दिन में उसे घेर लिया था, वो उसके मालिक के गीत उससे सुनते रहे और शराब पीते पिलाते रहे। मेरे कंधे पर अपना दायाँ हाथ रखते हुए उसने मुझे सारे दिन का किस्सा सुनाया। और फिर कहने लगा। घर से जब निकला था तो मेरे जहन में ये फितूर था कि सारी दुनिया पैदल घूम कर अपना हम-शक्ल तलाश करूँगा। आठ बरस होने को आए मुझे दूसरों के हम-शक्ल तो मिलते रहे मगर अपना हम-शक्ल अब तक नहीं मिला।

"क्या कहें, तुम्हें कोई मेरा हम-शक्ल मिला?" मैंने मुसकरा कर पूछा।

"हाँ! सिकेंडी नीविया में!" उसने मेरी तरफ देखे बगैर और अपने जहन पर जोर दिए बगैर जवाब दिया।

रात गए तक हम सड़कों पर मारे मारे फिरते रहे। जब थक गए तो घर का रुख किया। वो कमरे में दाखिल हुआ, कुर्सी पर बैठा, दो एक मिनट इधर उधर की बातें करता रहा फिर उसने एकदम अपना मख्सूस गीत गाना शुरू कर दिया।

मैं ने पूछा। "इस गीत में जो अलफाज हैं उनके मानी क्या हैं?"

"मानी कोई साथ नहीं देता, सिर्फ अलफाज देता है। देता भी क्या है बस उन पर अपने मानी की महर सब्त कर देता है। और हम उनमें से अपने मानी तलाश करते हैं!" उसने जवाब दिया। कुर्सी पर से उठते हुए उसने कमरे की बे-तरतीबी का जायजा लिया और फिर अचानक बोल उठा। "तुम शादी क्यूँ नहीं कर लेते अच्छे खासे मामूली आदमी हो।" मैं बौखला सा गया।

"बात दरअसल ये है।" मैंने उसके करीब होते हुए कहा। "हमारी बिल्डिंग के ऊपर वाली मंजिल में एक दशनू बाबू रहते हैं। वो इस बिल्डिंग के मालिक भी हैं। हम सब उनके किराएदार हैं। बहुत साल पहले जब वो बिलकुल मामूली आदमी थे तो उन्होंने एक लड़की से शादी की थी। जिसका नाम सरस्वती है। फिर अचानक दशनू बाबू एक मालदार औरत लक्ष्मी से टकरा गए। तब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने लक्ष्मी से अपना दूसरा ब्याह रचा लिया। अब लक्ष्मी और दशनू दोनों आराम से जिंदगी बसर करते हैं। और बे-चारी सरस्वती रात रात-भर सीढ़ियों में बैठी रोती रहती है। इसी हंगामे की वजह से मैं अभी तक तय नहीं कर पाया कि मुझे किसी सरस्वती से शादी करनी चाहिए थी या किसी लक्ष्मी से!"

उसने मेरे चेहरे की तरफ गौर से देखा, उसकी आँखों के सुर्ख डोरे उसके चेहरे को खौफनाक बना रहे थे। फिर उसने एकदम से "गुड नाइट!" कहा और तेजी से सीढ़ियाँ उतर गया। अपनी इसी तरह की हरकतों और बातों की वजह से वो कभी कभी मुझे गोश्त-पोस्त के आदमी की बजाए कोई खयाल लगता है जो समुद्र पार से यहाँ आ गया हो।

जिस इमारत के एक कमरे में मैं रहता हूँ। उस के सब कमरों की दीवारें कहीं न कहीं, जैसे-तैसे एक दूसरे से मुश्तर्क हैं। जिसकी वजह से एक कमरे के अंदर की आवाज या खामोशी दूसरे में मुंतकिल होती रहती है। मैं सोचता हूँ, मेरी आवाज या खामोशी या फिर चंद लम्हे पहले मेरे कमरे में गूँजने वाली उस के गाने की आवाज भी जरूर कहीं न कहीं पहुँची होगी।

बाहर शायद रात ने सुबह की तरफ अपना सफर शुरू कर दिया है। इर्द-गिर्द के सब घरों की बत्तियाँ बुझ गई हैं। हर तरफ अँधेरा है। और खामोशी दीमक की तरह हर तरफ आहिस्ता-आहिस्ता रेंगे जा रही है। मैं दरवाजे की चटखी चढ़ा कर और मद्धम बत्ती जला कर अपने बिस्तर पर लेट गया हूँ।

मद्धम रोशनी में सफेद चादर में लिपटा हुआ अपना जिस्म मुझे कफन में लिपटी हुई लाश की तरह लगता है। तन्हाई, तारीकी और खामोशी में ऐसा खयाल खौफ-जदा कर ही देता है। जैसे ख्वाब में बुलंदी से गिरते हुए आदमी का जिस्म और जहन सुन्न हो जाते हैं। ऐसी ही मेरी कैफियत है। धीरे धीरे मैं नीचे गिर रहा हूँ और फिर अचानक मुझे लगता है मैं अपने जिस्म में वापस आ गया हूँ।

बाहर से किसी के रोने की आवाज आ रही है शायद सरस्वती और लक्ष्मी में फिर झगड़ा हुआ है और सरस्वती के रोने की आवाज सीढ़ी, सीढ़ी उतर कर नीचे मेरे कमरे के दरवाजे तक आ गई है, मगर ये तो किसी बच्चे के रोने की आवाज है! मैं महसूस करता हूँ... ठीक है पड़ोस वालों का बच्चा अचानक भूख की वजह से रोने लग गया होगा। और उसकी माँ बदस्तूर नींद में बे-खबर सो रही होगी या फिर शायद ऐसा भी तो हो सकता है कि वो मर गई हो और बच्चा बिलख बिलख के रो रहा हो। आवाज आहिस्ता-आहिस्ता करीब होकर वाजेह होती जा रही है। फिर मुझे लगता है कि एक बच्चा मेरे ही पहलू में पड़ा रो रहा है। और कफन में लिपटी मेरी लाश में कोई हरकत नहीं हो रही।

अगर दरख्त तहजीब की अलामत है तो हम उस के साए में रोते हुए आजाद फूल हैं। मेरे जहन में अचानक उसके अलफाज के मानी खिल उठे हैं जिनके सर वो अपने साथ ले गया था।

बच्चा बदस्तूर रो रहा है। धीरे धीरे उसकी आवाज में दर्द और दुख की लहरें शामिल होती जा रही हैं। जैसे उसे पता चल गया हो कि उसकी माँ मर गई है। मगर उसे ये किसने बताया होगा? उसके बाप ने? मगर वो तो बदस्तूर सो रहा है। क्यूँ कि उसकी आवाज में उसके बाप की आवाज अभी शामिल नहीं हुई। ये तो हर किसी को आप ही पता चल जाता है कि उसकी माँ मर गई है। मुझे नहीं पता चल गया था! ...बच्चे के रोने की आवाज मेरी आवाज से कितनी मिलती जुलती है...!

फिर उसके अलफाज मेरे कान में गूँजने लगे। अच्छे खासे मामूली आदमी हो। मैं वाकई मामूली आदमी हूँ। हर सुबह अपने घर से तैयार हो कर निकलता हूँ। दरवाजा बंद करते हुए हमेशा हमेशा के लिए अल-विदा कहता हूँ। सूरज की तरफ मुँह करके दिन-भर भागता रहता हूँ और रात होने पर अपने आप को घर के दरवाजे पे खड़ा पाता हूँ।

सुबह सबसे पहले सारस की तरह उड़ता हवा में उस इमारत तक जाता हूँ। जहाँ एक औरत खूबसूरत के बन में गिलास टाप के मेज पर अपनी सफेद मर्मरी बाँहें फैलाए घूमने वाली कुर्सी पर बैठी रहती है। वो अपने सफेद बालों को हर-रोज खिजाब से रंग कर आती है। मेज पर फैली हुई उस की बाँहें। इस तरह लगती हैं कि जैसे किसी औरत की बरहना टाँगें हों।

केबिन के इर्द गिर्द से कई सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ती हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मैं उस केबिन के शीशों में से अक्सर झाँकता हूँ और सोचता हूँ कि अगर वो वाकई अपनी नंगी टाँगें मेज पर फैलाए हुए है तो...! सीढ़ियाँ जहाँ से शुरू होती हैं। वहाँ दाहिने तरफ एक बड़ी सी अलमारी लगी हुई है। जिसमें छोटे छोटे बैंक के लॉकरों जैसे कई खाने बने हुए हैं जिनमें हर आदमी अपनी जाती चीजें रख सकता है। मगर मैं हर-रोज अपनी जात ही को इस में बंद कर के सीढ़ियाँ चढ़ जाता हूँ। और फिर शाम को जाते हुए दोबारा उसे निकाल लेता हूँ। बाहर थियेटर वालों की गाड़ी खड़ी रहती है। उसका ड्राइवर मुझे आँखों के इशारे से बैठने के लिए कहता है और मैं शहर के जदीद-तरीन थियेटर में पहुँचा दिया जाता हूँ। जिसका पिंडाल बिलकुल सर्कस के पिंडाल के जैसा है। मैं उस थियेटर में पिछले अठारह बरस से एक ही रोल अदा कर रहा हूँ। स्टेज बिलकुल व्यस्त में है। और मेरा पहला मेक-अप उतार कर अगली दर, का मेक-अप और लिबास पहना दिया जाता है। मुकालमे सब बैकग्रांउंड से होते हैं। मुझे सिर्फ लिलीपुट वालों की मार खाने का किरदार अदा करना होता है। उनके नन्हें नन्हें सुइयों जैसे भाले मेरे जिस्म में चुभते हैं। उनके कमानों से निकले हुए छोटे छोटे तीर मेरे जिस्म में पेवस्त हो जाते हैं। मेरे मुसामों से खून की बूँदें पसीने की तरह निकलती हैं। मुझमें खूबी बस यही है कि मैं तकलीफ का इजहार नहीं करता इस लिए इतने बरसों से ये सब चल रहा है। यहाँ से मुझे मिलता कुछ भी नहीं ये तो महिज हाबी के तौर पर है। फिर जब शो खत्म हो जाता है तो मुझे एक स्ट्रेचर पर लिटा कर एक बाथरूम में ले जाते हैं। जहाँ अल्कोहल से भरे हुए टब में मुझे डाल दिया जाता है। अल्कोहल मेरे जख्मों में टीसें पैदा करती है। फिर एकदम एक खुनकी की लहर मेरे जिस्म में दौड़ जाती है और मैं ताजा-दम हो कर घर की तरफ बढ़ता हूँ।

एक दिन अजीब तमाशा हुआ। जब उस इमारत के दरवाजे बंद होने का वक्त आया तब मैं पेशाबखाने में था। मेरे पीछे धूप से दरवाजा बंद-ए-हवा में घबरा कर जोर जोर से दरवाजा पीटने लगा तब एक आदमी ने आकर दरवाजा खोला। मैं इस तसव्वुर से ही इस कदर घबरा गया था कि अगर मुझे सारी रात उस पेशाबखाने में बंद रहना पड़ता तो मेरी क्या हालत होती। घबराहट में चलते वक्त मैंने उस केबिन की तरफ भी ध्यान ना दिया कि आया वो औरत चली गई है या नहीं। और न ही उस लॉकर में रक्खी हुई अपनी जात ही निकालने का खयाल आया। बाहर थियेटर की गाड़ी का ड्राइवर हॉर्न पर हॉर्न बजाए जा रहा था। मैं भागता हुआ गाड़ी में बैठा और गाड़ी चल दी।

मैं बहुत परेशान था कि आज मैं अपनी जात के बगैर अपना रोल कैसे अदा कर पाऊँगा। मगर मेरी हैरानी की इंतिहा ना रही जब मैंने देखा कि उस दिन शो खत्म होने पर भीड़ अपनी कुर्सियों से उठ कर मेरी तरफ लपकी और मेरी अदाकारी को इतना कुदरती बताया कि मैं खुद भी हैरान रह गया।

तब से मैंने अपनी जात को उस लाकर ही मैं पड़ा रहने दिया है।

हवा के एक झोंके ने खिड़की के पट को जोर से पटख दिया है। मैं फिर अपने कमरे के माहौल की खुशबू महसूस करने लगा हूँ... सीढ़ियों पर बैठी हुई सरस्वती की सिसकियों की आवाज रोते हुए बच्चे की कर्बनाक आवाज में अब एक और आदमी की आवाज भी शामिल हो गई है। शायद बच्चे का बाप भी जाग गया है। वो अपनी बीवी की लाश और बिलखते हुए बच्चे को देख कर जब्त न कर सका।

एक अच्छे पड़ोसी के नाते मेरा फर्ज है कि उनके सुख, दुख में हिस्सा बँटाऊँ, क्यूँकि हम सब एक ही दरख्त के साए तले खुले हुए आजाद फूल हैं।

मेरा जी चाहता है कि, मैं अपने कमरे की चारों दीवारों में से एक एक ईंट उखाड़ कर इर्द-गिर्द के कमरों में झाँक कर उन्हें सोते हुए या रोते हुए देखूँ। क्यूँ कि दोनों ही हालतों में आदमी बेबसी की हालत में होता है। मगर मैं भी कितना कमीना आदमी हूँ लोगों को बेबसी की हालत में देखने के शौक में सारे कमरे की दीवारें उखाड़ देना चाहता हूँ।

मैंने फिर अपने आप को उठकर उनके कमरों में जाकर उनके रोने की वजह दरियाफ्त करने पर आमादा किया। रोने की आवाजें अब काफी बुलंद हो चुकी थीं। और उनकी वजह से कमरे में बंद रहना मुमकिन न था। मैंने वही कफन जैसी सफेद चादर अपने गिर्द लपेटी और सियाह स्लीपर पहन कर दरवाजे की तरफ बढ़ा। ज्यूँ ही मैंने दरवाजे की चटखनी की तरफ हाथ बढ़ाया कि बाहर से किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी, मैंने झट से दरवाजा खोल दिया।

सीढ़ियों में बैठ कर रोने वाली सरस्वती, बिलख बिलख कर रोने वाला बच्चा, मरी हुई औरत और उसका मजबूर खाविंद चारों बाहर खड़े थे। चारों ने यक जबान मुझसे पूछा -

"क्या बात है आप इतनी देर से रो रहे हैं? एक अच्छे पड़ोसी के नाते हमने अपना फर्ज समझा कि...!"


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