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कहानी

गुरु-मंत्र
सुदर्शन


1

आधी रात के समय नवयुवक एकनाथ ने बहुत धीरे से अपने मकान का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। गली, बाजार, गाँव - सब सुनसान और अंधकारमय थे। एकनाथ ने एक क्षण के लिए ठहरकर अपने घर की तरफ देखा, अपने बूढ़े बाबा और निर्बल दादी का खयाल किया, अपने मित्र - बन्‍धुओं के विषय में सोचा और उसकी आँखों में पानी आ गया। मगर यह निर्बलता कुछ ही क्षणों के लिए थी, जैसे कभी-कभी पंछी पर खोलते समय रुक जाता है। एकाएक उसने आँसू पोंछ डाले और जल्‍दी-जल्‍दी पाँव उठाता हुआ गाँव से बाहर चला गया। पिंजरे में दाना-पानी सब कुछ था, परन्‍तु पंछी ने किसी की भी परवाह न की और उड़ गया। चारों ओर अँधेरा था। दूर काले वृक्षों की काली छाया तले कुत्‍तों और गीदड़ों के रोने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। घर में बूढ़े बाबा और दादी का वात्‍सल्‍य बेसुध पड़ा था, मगर एकनाथ सम्‍पूर्ण दृढ़ता से झाड़ियों में उछलता हुआ, गड्ढों में गिरता हुआ, पत्‍थरों से ठोकरें खाता हुआ आगे चला जाता था और उसे इस बात की जरा भी चिन्‍ता न थी कि मार्ग भयानक है और रात के अँधेरे में कई बलाएँ छिपी हो सकती हैं।

प्रात:काल जब दो बूढ़ों के हृदय-विदारक आर्तनाद से पैठन गाँव में कुहराम मचा हुआ था, वह कई कोस की यात्रा समाप्‍त कर चुका और एक नदी के किनारे बैठा अपने पाँव धो रहा था, जिन्‍हें जंगल के काँटों ने लहूलुहान कर दिया था। उसकी देह रतजगी यात्रा से थककर चूर-चूर हो रही थी। परन्‍तु उसके विचार आशा के आकाश में उड़े चले जाते थे और उन्‍हें रोकने की शक्ति पृथ्‍वी की किसी भी वस्‍तु में न थी। थोड़ी देर बाद वह उठा और अपने गाँव की तरफ मुँह करके खड़ा हो गया। इस समय वह अपने घर की दशा पर चिन्‍तन कर रहा था और अपनी आन्‍तरिक आँखों से वहाँ के दृश्‍य देख रहा था। हम अपना घर छोड़ सकते हैं, परन्‍तु उसकी स्‍मृति को भूलना आसान नहीं।

इतने में एक मुसाफिर घोड़े पर सवार उधर से गुजरा और एकनाथ के पास पहुँचकर रुक गया। एकनाथ ने दोनों हाथ बाँधकर अभिवादन किया। मुसाफिर ने आशीर्वाद दिया और पूछा - "कहाँ जाओगे, भैया?"

एकनाथ ने अपने गाँव की ओर पीठ मोड़ ली और अपने सम्‍मुख फैले हुए विस्‍तृत जंगल की तरफ उँगली उठाकर उत्‍तर दिया - "बड़ी दूर!"

मुसाफिर - "मगर फिर भी कहाँ?"

एकनाथ - "श्रीगुरुजी के चरणों में।"

मुसाफिर घोड़े से उतर आया और एकनाथ के कंधे पर स्‍नेह से अपना हाथ रखकर बोला - "तुम्‍हारा गुरु कौन है?"

एकनाथ - "पण्डित जनार्दन पन्‍त।"

यह कहकर एकनाथ ने दोनों हाथ बाँधकर नम्रता से सिर झुका लिया जैसे वह इस समय भी गुरु के सामने खड़ा था।

मुसाफिर को नवयुवक की श्रद्धा पर आश्‍चर्य हुआ - "कौन जनार्दन पन्‍त? क्‍या वही तो नहीं जो देवगढ़ के दीवान हैं?"

एकनाथ - "जी हाँ, वही महात्‍मा जिनके सदृश दूसरा आत्‍मसंयमी आज सारे भारतवर्ष में नहीं है। क्‍या आपने उनके दर्शन किए हैं?"

यह कहकर उसने मुसाफिर की ओर बड़ी उत्‍सुकता से देखा।

मुसाफिर - "हाँ, कई बार दर्शन किए हैं, परंतु वे तो किसी को गुरु-मंत्र नहीं देते, न मैंने उनके यहाँ कोई शिष्‍य देखा है। मुझे आश्‍चर्य है कि उन्‍होंने तुम्‍हें कैसे चेला बना लिया।"

एकनाथ - (उदास होकर) "उन्‍होंने मुझे चेला नहीं बनाया।"

मुसाफिर - "अरे!"

एकनाथ - "मगर मैंने उनको गुरु बना लिया। अब जाकर श्रीचरणों में लेट जाता हूँ। देखूँगा कैसे कृपा नहीं करते?"

मुसाफिर - "तुम्‍हारी आयु थोड़ी है अभी।"

एकनाथ - "समझदार के लिए थोड़ी भी बहुत है।"

मुसाफिर - " क्‍या तुम्‍हें संसार का अनुभव है?"

एकनाथ - "गुरुजी की कृपादृष्टि से अनुभव भी हो जाएगा।"

मुसाफिर - "यह मार्ग बड़ा विकट है।"

एकनाथ - "साहस हो तो सारे काम बन जाते हैं।"

मुसाफिर ने हँसकर कहा - "मगर बेटा! देवगढ़ तक कैसे पहुँचोगे? बड़ी दूर है यहाँ से।"

एकनाथ - "जिनके दिल को लगी हो, उनके लिए दूरी कोई चीज नहीं है।"

मुसाफिर - "कोई घोड़ा क्‍यों नहीं ले लेते?"

एकनाथ - "गुरुजी के पास नंगे पाँव ही जाना ठीक है।"

मुसाफिर ने यह बातें सुनीं तो बड़ा खुश हुआ। उसने दुनिया देखी थी, मगर ऐसा नवयुवक उसकी आँखों से आज तक न गुजरा था। यह नवयुवक न था, श्रद्धा और पुरुषार्थ की जीती-जागती मूर्ति था। उसने एकनाथ को प्रेम से देखा और घोड़े पर सवार होकर चल दिया।

 

2

कितने कष्‍ट सहकर, कितने संकट झेलकर एकनाथ देवगढ़ पहुँचा, इसका अनुमान करना आसान नहीं। परन्‍तु देवगढ़ पहुँचकर उसको वह सारे कष्‍ट भूल गए। प्‍यासा हरिण जल की खोज में कितना भागता है, कैसे घबराता है, उसका शरीर थककर पसीना-पसीना हो जाता है, परन्‍तु जल के समीप पहुँचकर उसकी सारी थकान जाती रहती है, वहाँ जाकर उसका कुम्‍हलाया हुआ हृदय-कमल देखते-देखते खिल उठता है। एकनाथ की भी यही दशा थी। वह अब गुरुजी की नगरी में आ पहुँचा था। वह स्‍वर्गीय स्‍वप्‍नों की पुण्‍यभूमि में आ गया था, जिसके लिए उसकी आँखें तरसती थीं।

तीसरे पहर का समय था, एकनाथ पण्डित जनार्दन पन्‍त की सेवा में उपस्थित हुआ। उस समय पण्डितजी सरकारी कागज देखने में तन्‍मय हो रहे थे। एकनाथ चुपचाप एक कोने में खड़ा हो गया और भक्त-भाव से उनकी ओर देखने लगा। यही वह व्‍यक्ति है जो संसार और संसार के व्‍यवहार में रहते हुए भी संसार से बाहर है, जो गृहस्‍थ होते हुए भी अपने युग का सबसे बड़ा भक्‍त है, जो देवगढ़ का दीवान भी है, सूरमा सिपाही भी है, सेनापति भी है और पण्डित भी है। यही वह राजभक्‍त है, जिसका हिन्‍दू-मुसलमान दोनों सम्‍मान करते हैं, जिसके सामने सिर उठाने की बादशाह को भी मजाल नहीं। एकनाथ गदगद हो गया। उसकी आँखों में पानी भर आया।

सहसा पण्डितजी ने सिर उठाया और एकनाथ की तरफ देखा। एकनाथ के शरीर में बिजली की लहर-सी दौड़ गई। यह तो वही मुसाफिर थे जो उसे अपने गाँव के पास मिले थे, जो हँस-हँसकर बातें कर रहे थे, जिनकी आँखों में मन को मोहने वाली शक्ति भरी थी। एकनाथ दौड़कर आगे बढ़ा और पण्डितजी के चरणों से लिपट गया। इस समय उसके आँसू पण्डितजी के पाँव पर गिर रहे थे। मगर यह आँसू साधारण आँसू न थे। एकनाथ का प्रेम था, जो अपने गुरु के श्रीचरणों पर निछावर हो रहा था। यह उसकी श्रद्धा थी जो अपने देवता को रिझाने के लिए हृदय-गृह से चली थी।

पण्डितजी ने उसे पाँव से उठाया और उद्दण्‍ड से उद्दण्‍ड पुरुष को भी बस में कर लेने वाले ढंग से मुस्‍कराकर कहा - "आखिर तुम यहाँ आ गए? मगर बहुत कष्‍ट हुआ होगा?"

एकनाथ ने उनके पाँव की तरफ देखते हुए उत्‍तर दिया - "श्रीचरणों के दर्शन करके सारा कष्‍ट भूल गया।"

पण्डितजी - "तो अब क्‍या इच्‍छा है?"

एकनाथ - "भगवान् सब कुछ जानते हैं, अपने मुँह से क्‍या कहूँ?"

पण्डितजी - "गुरु-मंत्र चाहते हो क्‍या?"

एकनाथ - "यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा स्‍वप्‍न है।"

पण्डितजी - "मैं साधारण गृहस्‍थी हूँ, मुझसे तुम्‍हारा कल्‍याण क्‍या होगा? किसी परमहंस के पाँव क्‍यों नही पकड़ते? बेड़ा पार हो जाए।"

एकनाथ - "मैंने इस युग का सबसे बड़ा परमहंस पा लिया, अब और कहाँ जाऊँ? आप गृहस्‍थी हैं, परंतु आपकी पदवी साधु-संन्‍यासियों से भी ऊँची है।"

पण्डितजी - "यह तुम्‍हारी श्रद्धा है। मैं तो राजा का एक मामूली नौकर हूँ।" एकनाथ - " मगर मेरे लिए तो आप राजाओं के भी राजा हैं।"

यह कहकर एकनाथ फिर झुका और पण्डितजी के पाँव में लेट गया। पण्डितजी निरुत्‍तर हो गए। विनय और श्रद्धा के सामने तर्क की बोली पेश नहीं जाती। देवगढ़ के दीवान साहब एक साधारण ग्रामीण नवयुवक के सामने चुप थे और न जानते थे कि उसे कैसे समझाएँ। कुछ सोचकर उन्‍होंने उसे उठाया और गंभीरता से कहा - "हमें गुरु-मंत्र देने में आपत्ति नहीं, परन्‍तु पहले तुम्‍हें सिद्ध करना होगा कि तुम इसके अधिकारी हो। कहो, परीक्षा के लिए तैयार हो?"

एकनाथ ने सिर झुकाकर उत्‍तर दिया - "जी हाँ! बड़ी खुशी से।"

यह कहकर उसने गुरु के पाँव तले से मिट्टी उठाई और माथे पर मल ली, मानो यह मिट्टी न थी, चंदन का बुरादा था।

 

3

तीन वर्ष बीत गए। एकनाथ ने गुरुजी की सेवा में दिन-रात एक कर दिया। ऐसी लगन से किसी बिके हुए दास ने भी अपने स्‍वामी की सेवा न की होगी। वह उनके कपड़े धोता था, उनके लिए धान कूटता था, पानी भरता था, बाल-बच्‍चों को खिलाता था और इतना ही नहीं उनके दफ्तर का सारा काम अपने हाथ से करता था। दीवान साहब अब हिसाब आदि बहुत कम देखते थे, सारा स्‍याह-सफ़ेद एकनाथ के हाथ में था। रियासत के लोग इसकी ईश्‍वरदत्‍त योग्‍यता और कार्यपटुता देखकर वाह-वाह करते थे, यहाँ तक कि राजा भी उसकी प्रशंसा करता था। मगर एकनाथ को इस पर तनिक भी अभिमान न था। वह समझता था, गुरुजी परीक्षा ले रहे हैं। पास हो गया तो जन्‍म-मरण के फंदे से मुक्‍त जा जाऊँगा।

प्रात:काल था, पण्डितजी अपने मंदिर में बैठे ईश्‍वर का भजन कर रहे थे और एकनाथ बाहर खड़ा था कि कोई विघ्‍न न डाल दे। इतने में घोड़ों की टापों का शब्‍द सुनाई दिया। एकनाथ डर गया। उसे भय हुआ कि कहीं इससे गुरुजी की समाधि न खुल जाए। उनका ध्‍यान टूट गया तो क्‍या जवाब दूँगा। वह जल्‍दी से बाहर निकला कि सवार को रोक दे। पर वह सवार कोई साधारण सवार न था। वह शाही सवार था, जो राजा का खास परवाना लेकर आया था। एकनाथ ने आगे बढ़कर कहा - "गुरुजी ईश्‍वर का भजन कर रहे हैं। नीचे उतर आओ।"

सवार घोड़े से नीचे उतर आया और जेब से एक मुहर वाला लिफ़ाफ़ा निकालकर बोला - "यह शाही परवाना है। अभी दीवान साहब के पास पहुँचा दो।" एकनाथ ने लिफ़ाफ़ा ले लिया और उत्‍तर दिया - "वह तो समाधि में हैं।"

सवार - "कोई बात नहीं। जाकर समाधि से उठा दो।"

एकनाथ - "यह असम्‍भव है। (थोड़ी देर बाद) क्‍या बहुत जरूरी काम है?"

सवार - "अब मैं तुमसे क्‍या कहूँ? जरूरी है या नहीं। राजा साहब का हुक्‍म है। इसी समय पहुँचाओ। मैं पागल न था जो तुम पर ज़ोर देता।"

एकनाथ ने लिफाफे को उलट-पलटकर देखा और कहा - "मगर ऐसी कौन-सी बात है, जो जरा भी प्रतीक्षा नहीं कर सकते?"

सवार - "भैया! मेरा कर्तव्‍य आज्ञा पालन करना है। तुम जाकर सूचना देते हो या मैं खुद जाऊँ? हर हालत में यह परवाना अभी उनके पास पहुँच जाना चाहिए। जरा-सी देर भी रियासत को बर्बाद कर देगी।"

एकनाथ - "मगर इस समय तो उनके पास कोई भी नहीं जा सकता, यहाँ तक कि स्‍वयं राजा साहब आ जाएँ तो उनको भी आगे न बढ़ने दूँ। गुरुजी ईश्‍वर के ध्‍यान में है।"

सवार ने कुछ सोचकर धीरे से कहा - "तो तुम्‍हें साफ ही कहना पड़ेगा। शहर पर किसी दुश्‍मन ने हमला किया है। राजा साहब यह परवाना भेजकर अपने कर्त्‍तव्‍य से निवृत्‍त हो गए। शहर बचे या बरबाद हो, उनकी बला से और किसी को इसकी फिक्र ही नहीं। ले-देकर एक दीवान साहब हैं, जिनको शहर की हिफाजत का खयाल है और जिनके इशारे पर सिपाही मर-मिटने को तैयार हैं। अब यह तुम खुद ही सोच लो कि उनको इस वक्‍त सूचना देना मुनासिब है या नहीं। मगर मैं इतना कहे देता हूँ कि उनको सूचना न हुई तो दुश्‍मन किले की ईंट से ईंट बजा देंगे।"

यह कहकर सवार चला गया, मगर उसके शब्‍द एकनाथ के कानों में उसी तरह गूँज रहे थे। उसने परवाना गुरुजी के कागज़ों पर रख दिया और घुटनों पर सिर रखकर सोचने लगा कि क्‍या करना चाहिए? उठाऊँ या न उठाऊँ? ध्‍यान में हैं। जो राजाओं का भी राजा है, उसके दरबार में हैं। कहीं अप्रसन्‍न न हो जाएँ, क्रोध में न आ जाएँ। सब किए-कराए पर पानी फिर जाएगा। एक दिन कहते थे, भगवान् अपने भक्‍तों का काम स्‍वयं कर देते हैं। कहेंगे, यह बात तुझे कैसे भूल गई? लज्जित हो जाऊँगा, उत्‍तर न दे सकूँगा, उनके सामने सिर उठाने के योग्‍य न रहूँगा। तो ठीक है, मुझे चुप रहना चाहिए, देखूँ परमात्‍मा क्‍या करता है।

एकनाथ निश्चित हो गया और इधर-उधर टहलने लगा। मगर चिन्‍ता शहद की मक्‍खी के समान है। इसे जितना हटाओ उतना ही और चिमटती है। एकनाथ को फिर इसी चिन्‍ता ने आ घेरा। कहीं वैरी निकट न आ पहुँचा हो, राजा ने जब ही जरूरी परवाना भेजा है। ऐसा न हो, मैं यहाँ मंदिर के द्वार पर बैठा रहूँ और गढ़ पर दुश्‍मन का अधिकार हो जाए। उस समय गुरुजी के मन की क्‍या अवस्‍था होगी? बहुत नाराज होंगे। कहेंगे, तुझे इतना भी विवेक नहीं कि समय-कुसमय ही पहचान सके। हम समाधि में बैठे रहे, उधर शहर की सफाई हो गई। इसका उत्‍तरदाता केवल तू है, जिसने ऐसी मूर्खता की। एकनाथ असमंजस में पड़ गया। कभी सोचता उठा देना चाहिए, इस समय यही धर्म है। कभी सोचता, नहीं उठाना चाहिए, समाधि में हैं। वह दोनों तरफ देखता था, परन्‍तु उसे दोनों तरफ अंधकार दिखाई देता था। प्रकाश कहीं भी न था। वह घबराहट की दशा में इधर-उधर फिर रहा था। ऐसी दशा उसकी आज तक कभी न हुई थी। अपने चारों तरफ काले नागों को फुंकारें मारते देखकर भी उसका विवेक नष्‍ट न होता। मगर इस समय...।

वह बहुत व्‍याकुल था। उसके मस्तिष्‍क से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। उसके मुँह का रंग एक-एक क्षण में बदलता था, जैसे वह उसके जीवन-मरण का प्रश्‍न हो। इस समय उसे कौन बचा सकता है? इस निराशा के भार से उसे कौन निकाल सकता है? सिवाय गुरुजी के और कोई नहीं। और गुरुजी... उसने उनकी ओर देखा। वह अभी तक आँखें बंद किए ध्‍यान में बैठे थे। एकनाथ भूमि पर गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोया, मगर इससे क्‍या होता था? समय बहुत तेज़ी से बढ़ा चला जाता था।

इतने में दुर्ग के बाहर दुश्‍मन की तोपें गर्जने लगीं। एकनाथ का पीला मुँह और भी पीला हो गया। अब सोचने का अवसर न था, काम करने का समय था। एक क्षण में इधर या उधर। एकनाथ ने अपने धड़कते हुए दिल पर हाथ रखा, अपनी तर्कशक्ति को एकत्रित किया, एक मिनट के लिए सिर झुकाया और निश्‍चय कर लिया।

थोड़ी देर के बाद वह गुरुजी की जंगी पोशाक पहने उनके जंगी घोड़े पर सवार था और देवगढ़ की वीर सेना उसके पीछे "हर-हर महादेव" करती हुई दुर्ग से निकल रही थी। एकनाथ लड़ा और विजयी हुआ और दुश्‍मन को भगाकर वापस आ गया। परन्‍तु, उस समय यह किसी को भी पता न था कि यह एकनाथ है, पन्‍तजी नहीं है। एकनाथ ने घोड़ा अश्‍वशाला में बाँध दिया और कवच उतारकर दीवार के साथ लटका दिया और अपने वासंती रंग के वस्‍त्र पहनकर चुपचाप अपने स्‍थान पर बैठ गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

 

4

थोड़ी देर बाद गुरुजी की समाधि खुली और वह बाहर निकले। वहाँ हर एक के मुँह पर इसी घटना का बखान था। लोग कहते थे, आज दीवान साहब ने कमाल किया, उनकी तलवार ऐसी चलती थी जैसे कैंची कपड़े पर चलती है। दुश्‍मन कैसे घमण्‍ड से आया था, मानो देवगढ़ में सिपाही नहीं रहते, पशु-पक्षी रहते हैं। मगर दीवान साहब ने उसके दाँत खट्टे कर दिए।

दीवान साहब को आश्‍चर्य हो रहा था कि यह कहते क्‍या हैं? कौन आया? किसने आक्रमण किया? किसने दाँत खट्टे किए? इनको किसी भी बात का ज्ञान न था। आश्‍चर्यचकित हो आगे बढ़ रहे थे कि एक स्‍थान पर कुछ आदमी बातें करते दिखाई दिए। दीवान साहब उनके पीछे खड़े हो गए और सुनने लगे।

एक आदमी कह रहा था - "आज तो दीवान साहब की चुस्‍ती-चालाकी देखने योग्‍य थी।"

दूसरा - "हम उनसे छोटे हैं, परन्‍तु हममें वह जोश नाम को नहीं। अद्भुत आदमी हैं।"

तीसरा - "आदमीᢽ! वाह भाई वाह!! उन्‍हें आदमी कौन कहता है। वह तो कोई ऋषि हैं। पापी प्राणियों में यह शक्ति कहाँ! जवानी, बुढ़ापा सब उनके वश में हैं। चाहे बूढ़े बन जाएँ, चाहे जवान बन जाएँ।"

चौथा मुसलमान था, वह गंभीरता से बोला - "जरूर-जरूर, बड़े बहादुर हैं। आज तो बिलकुल नौजवान मालूम होते थे, वह बुढ़ापा कहीं नजर न आता था।"

तीसरा - "और भैया! हम तो देख रहे थे। दुश्‍मन उनको देखते ही किंकर्तव्‍यविमूढ़ ही जाते थे, जैसे किसी ने मंत्र पढ़कर उनकी संज्ञा छीन ली हो।"

चौथा - "आँखों से आग बरसती थी। सिद्ध पुरुष महात्‍माओं के यही लक्षण हैं। जिसकी तरफ देख लें वही वश में हो जाता है। कुछ करना चाहे तब भी नहीं कर सकता।"

दूसरा - "और उनका घोड़ा कैसा उड़ता चला जाता था, यह शायद आपने नहीं देखा।"

तीसरा - "खूब देखा, दो ही घण्‍टे में दुश्‍मन मैदान छोड़ भागा। किस घमण्‍ड से आया था, मानो विजय निश्चित है।"

चौथा - "अब कभी इस तरफ देखने का भी साहस न करेगा।"

पहला - "समझता होगा, बादशाह विलासप्रिय है, जाते ही विजय हो जाएगी, यह पता न था कि पन्‍तजी का सामना है। कैसा भागा!"

दूसरा - "अच्‍छी शिक्षा मिली। आजीवन स्‍मरण रखेगा।"

पाँचवाँ - "परन्‍तु एक और बात सुनी है, सुनकर बुद्धि चकराती है। बड़ी अद्भुत बात है।"

पहला - "वह क्‍या?"

पाँचवाँ - "कुछ लोगों का कहना है, जब वह दुश्‍मन से लड़ रहे थे, उसी समय वह अपने मंदिर में भी बैठे थे।"

दूसरा - "हाँ-हाँ! सुना तो हमने भी है।"

तीसरा - "परन्‍तु एक ही समय में दो स्‍थानों पर! यहाँ भी, वहाँ भी! अचरज होता है।"

चौथा - "भाई, जिसकी पीठ पर परमेश्‍वर का हाथ हो, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं। भगवान जो चाहे कर दे, उसका हाथ कौन पकड़ सकता है? वह चाहे तो तुम अभी आकाश में भी उड़ने लगो, हम मुँह देखते रह जाएँगे। प्रभु की लीला है।"

पाँचवाँ - "और क्‍या?"

पहला - "यह दीवान साहब नहीं, नगर-रक्षक देवता है।" सहसा एक आदमी ने पीछे मुड़कर देखा और दूसरे को दिखाया। सब दंग रह गए। यह क्‍या? दीवान साहब चले जा रहे हैं। एक बोला - "लो यह भी लो। हममें से किसी का रूप धारण करके खड़े थे, अब अपने रूप में जा रहे हैं। हमने तो पहले ही कह दिया था कि यह महात्‍मा जो चाहें सो कर सकते हैं।"

अब दीवान साहब सब कुछ समझ गए। यह काम एकनाथ ही का है, किसी दूसरे का नहीं। उसी ने हमारे वस्‍त्र पहने और दुश्‍मन को हराकर लौट आया। यह बालक कितना वीर है! कितना समझदार!! राजा का परवाना आया होगा, हम समाधि में थे, हमें नहीं उठाया, स्‍वयं लड़ने चला गया। कोई मूर्ख होता तो कहता, शहर लुटता है तो लुटे, हमें क्‍या? बैठे गुरु की आज्ञा का पालन कर रहे हैं। उन्‍होंने मंदिर में पहुँचते ही एकनाथ को गले से लगा लिया और कहा - "तूने मेरी लाज रख ली।"

एकनाथ बार-बार उनके चरणों में गिरता था, कहता था - "आप मुझे लज्जित कर रहे हैं। मैंने तो कुछ भी नहीं किया।"

पण्डितजी ने उसे स्‍नेहपूर्ण दृष्टि से देखा और कहा - "तुम्‍हारी वीरता की लोग भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, मुझे यह पता न था कि तुम तलवार के भी धनी हो।"

एकनाथ - "यह सब आपकी कृपा है, वरना मेरी भुजाओं में ऐसा बल कभी न था।"

पण्डितजी - "लोगों को संदेह भी न हुआ कि यह तुम हो, मैं नहीं हूँ।"

एकनाथ - "और वास्‍तव में यह आप ही का प्रताप है, नहीं तो मैं किस योग्‍य था? मुझे केवल इतना स्‍मरण है कि मैंने आपके वस्‍त्र पहने और घोड़े पर सवार हुआ। इसके बाद क्‍या हुआ, इसका मुझे जरा भी ज्ञान नहीं। मुझे ऐसा मालूम होता था जैसे कोई दैवी शक्ति मुझे उड़ाए लिए जाती है, जैसे मैं अपने आपे में न था। अवश्‍यमेव आप ही की सत्‍ता मेरे हाथ में आ गई थी। अन्‍यथा यह विजय असम्‍भव थी। शरीर मेरा था, चेतना आपकी थी।"

पण्डितजी - "लोग अब तक यही समझते हैं कि यह मैं ही था।"

एकनाथ - "स्‍वयं मेरी भी यही धारणा है। आपने मुझे एकमात्र अपना साधन बनाया था।"

इस श्रद्धा को देखकर पण्डितजी की आँखें सजल हो गईं। थोड़ी देर बाद बोले - "वत्‍स! अब मैं बूढ़ा हो गया। इस पन में यह राज्‍य कार्य करना बड़ा कठिन है। मैं चाहता हूँ, अब चार दिन विश्राम करूँ। दीवान की पदवी तुम सँभालो तो मुझे छुट्टी मिले। आज की घटना ने मेरी आँखें खोल दी हैं। मुझे विश्‍वास हो गया है कि यह काम तुम खूब सँभालोगे। राजा साहब को भी आपत्ति न होगी। मेरा जाकर दो शब्‍द कह देना ही काफ़ी है, वे स्‍वीकार कर लेंगे। कहो तो अभी जाऊँ"

एकनाथ की आँखों में आँसू आ गए। उसने दोनों हाथ बाँध लिए, जैसे कोई भूल हो गई हो। वह भूमि पर मुँह के बल गिर पड़ा और नम्रता से बोला - "मुझे कुछ नहीं चाहिए। केवल आपके चरणों में पड़ा रहूँ, मेरे लिए यही सब कुछ है।"

पण्डितजी एकनाथ का अभीष्‍ट समझ गए, परन्‍तु चुप रहे।

अभी एक परीक्षा बाकी थी।

 

5

और कुछ दिनों बाद उसका समय भी आ गया।

प्रात:काल था, एकनाथ पण्डितजी के स्‍नान के लिए पानी भर रहा था। इतने में पण्डितजी खड़ाऊँ पहने हुए आए और मुसकराकर बोले - "बेटा एकनाथ! कल नववर्षारम्‍भ है। इस वर्ष का हिसाब-किताब तैयार कर लो। समय थोड़ा है, केवल आज का दिन और आज की रात। परन्‍तु तुम्‍हारे जैसे योग्‍य आदमी के लिए यह कठिन नहीं।"

एकनाथ ने पानी का घड़ा हाथ से रख दिया।

पण्डितजी - "राजा साहब कल हिसाब देखेंगे। तैयार हो जाएगा या नहीं? यदि न हो सके तो मैं कर लूँ।"

एकनाथ - (धीरे से) "मैं कर लूँगा।"

पण्डितजी - "तो जाओ, आरम्‍भ कर दो। समय बहुत कम है।"

एकनाथ दफ्तर में पहुँचा और हिसाब-किताब देखने लगा। काम साधारण न था, सारे वर्ष का हिसाब था। और वह भी किसी साहूकार का नहीं, एक रियासत का। परन्‍तु एकनाथ के दिल में जरा भी घबराहट न थी, न मुँह पर चिन्‍ता के चिह्न थे। उसने किताबों के ढेर सामने रख लिए और पालथी मारकर बैठ गया। सूरज आकाश में धीरे-धीरे ऊँचा उठा और सिर पर पहुँच गया। मगर एकनाथ उसी तरह बैठा हिसाब देखता रहा। संध्‍या हो गई, पर एकनाथ को पता भी न था। नौकर आकर शमादान जला गया, एकनाथ काम में लगा रहा। उसे खाने-पीने की सुध न थी, न सोने की इच्‍छा थी। खयाल यह था, किसी प्रकार काम समाप्‍त हो जाए।

आधी रात बीत गई, एकनाथ ने सारा काम समाप्‍त कर लिया। सब कुछ ठीक था, केवल एक पैसे का फर्क था। एकनाथ के तेवर बदल गए। सोचने लगा, जरा-सी भूल ने सारा काम चौपट कर दिया। उसने रकमों को दूसरी बार जमा किया। फिर वही फर्क। फिर हिसाब किया। पर फर्क फिर भी न निकला। एक पैसे का अन्‍तर ज्‍यों-का-त्‍यों था। एकनाथ घबरा गया। रात आधी से भी अधिक जा चुकी थी। चारों ओर सन्‍नाटा था। लोग अपने-अपने घरों में सुख-चैन की नींद सो रहे थे, मगर एकनाथ शमादान के सामने बैठा था और सोचता था कि पैसे का फर्क कहाँ है?

पिछले पहर पण्डित जनार्दन की आँख खुली। खिड़की से देखा, दफ्तर में अभी तक प्रकाश है। समझ गए, एकनाथ जाग रहा है। वह धीरे से उठे और बाहर चले आए। दफ्तर के बाहर चौकीदार भी ऊँघ रहा था, केवल एकनाथ जागता था। पण्डितजी ने धीरे से कहा - "एकनाथ?"

मगर एकनाथ ने कोई उत्‍तर न दिया, अपना हिसाब करता रहा।

पण्डितजी ने फिर पुकारकर कहा - "एकनाथ!"

एकनाथ ने कुछ नहीं सुना।

पण्डितजी और आगे बढ़े और जरा ऊँची आवाज से बोले - "एकनाथ!"

मगर फिर जवाब में वही सन्‍नाटा था, जैसे एकनाथ जागता न था, सोता था।

पण्डितजी को अचरज हुआ। वह और आगे बढ़े और शमादान के सामने इस प्रकार खड़े हो गए कि उनके शरीर की छाया पुस्‍तक पर पड़ती थी। मगर एकनाथ को अब भी मालूम न हुआ। उसके लिए पुस्‍तक के अक्षर उसी तरह साफ और रोशन थे। वह हिसाब में तन्‍मय हो रहा था। उसे दीन-दुनिया की सुध न थी। इसी तरह आधा घण्‍टा बीत गया।

सहसा एकनाथ को अपनी भूल का पता लगा। उसने खुशी से सिर हिलाया और हिसाब ठीक करके पुस्तकें बन्‍द कर दीं। इसके बाद उसने दोनों हाथ मिलाकर सिर से ऊपर उठाए और जँभाई लेने लगा। इतने में उसने चकित होकर देखा, पण्डितजी सामने खड़े हैं। वह घबराकर आगे बढ़ा और उनके पाँव में झुक गया।

पण्डितजी ने पूछा - "हिसाब-किताब हो गया?"

एकनाथ - "जी हाँ, हो गया। आप कैसे आए?"

पण्डितजी - "हम यहाँ बड़ी देर से खड़े हैं।"

एकनाथ चौंक पड़ा।

पण्डितजी - "हमने तुम्‍हें कई बार बुलाया, मगर क्‍या जानें तुम कहाँ थे?"

एकनाथ - "मैंने एक भी आवाज नहीं सुनी।"

पण्डितजी - "हमारी छाया से पुस्‍तक पर अँधेरा हो गया, तुम्‍हें इसका ज्ञान न हुआ?"

एकनाथ - (हाथ बाँधकर) "अब क्‍या कहूँ, मुझे सन्‍देह तक न हुआ कि कोई इस कमरे में खड़ा है। इस समय मेरी दुनिया केवल यह पुस्‍तक थी।"

पण्डितजी खड़े थे, बैठ गए और एकनाथ के मुँह की ओर देखकर बोले - "प्रात:काल से इसी भाँति बैठे थे क्‍या?"

एकनाथ - "जी हाँ, इसी भाँति।"

पण्डितजी - "कुछ खाया-पिया भी नहीं?"

एकनाथ - "जी नहीं।"

पण्डितजी - "नींद भी नहीं आई?"

एकनाथ - "जरा भी नहीं।"

पण्डितजी - "इस समय क्‍या कर रहे हो?"

एकनाथ - "एक पैसे का फर्क पड़ता था, उसे निकाल रहा था। बड़ी कठिनाई से पता चला।"

पण्डितजी - "एक पैसे के लिए इतना परिश्रम क्‍यों किया? मामूली बात थी।"

एकनाथ - "मैंने सोचा, आखिर भूल है। चाहे एक पैसे की हो, चाहे एक लाख की।"

पण्डितजी का चेहरा चमकने लगा। वह गम्‍भीरता से बोले - "वत्‍स! तुने मुझे प्रसन्‍न कर दिया। मेरी परीक्षा बड़ी कठिन थी। बड़े- बड़े साधु-सन्‍त भी कदाचित् इसमें सफल न होते, परन्‍तु तू सबमें उत्‍तीर्ण हो गया। तूने काले कोसों की यात्रा की और सिद्ध कर दिया कि तेरा हृदय श्रद्धा का सागर है। तूने सिद्ध कर दिया कि तुझमें सेवा-भाव है। तूने युद्ध-क्षेत्र में विजय प्राप्‍त की, जो इस बात का प्रमाण है कि तू वीरात्‍मा है और तुझे मृत्‍यु का भय नहीं। और फिर दीवान की पदवी को ठुकरा दिया। कोई लोभी ऐसे अवसर पर फूला न समाता। वह त्‍याग-भाव कितना पवित्र, कितना महान है। परन्‍तु मैंने तुझे उस समय भी गुरु-मंत्र न दिया, क्‍योंकि अभी एक परीक्षा बाकी थी। आज वह भी समाप्‍त हो गई। मैं देखना चाहता था कि तुझमें एकाग्रता है या नहीं, जिसके बिना ईश्‍वर भक्ति के मार्ग पर दो पग चलना भी असम्‍भव है। मैं आया, मैंने तुझे आवाजें दीं, मैंने तेरा प्रकाश रोक लिया, परन्‍तु तुझे मालूम भी न हुआ। यह थी एकाग्रता की पराकाष्‍ठा। अब मैं तुझे गुरु-मंत्र देने को तैयार हूँ। मुझे तेरे जैसे शिष्‍य पर गर्व है।"

इस समय एकनाथ के चेहरे पर ऐसा तेज था जो इस मृत्‍युलोक में कभी-कभी दिखाई देता है। आज उसका वर्षों का परिश्रम सफल हुआ है, आज वह परीक्षा में उत्‍तीर्ण हुआ है। उसने वहीं भूमि पर गिरकर घुटने टेक दिए।

पण्डितजी ने फिर कहा - "और मुझे यह भी आशा है कि जिस प्रकार तूने आज एक पैसे की भूल के लिए अपना इतना समय खर्च किया है, उसी प्रकार भक्ति मार्ग पर चलते हुए भी तू इस नियम को स्‍मरण रखेगा और छोटी-से-छोटी बुराई की भी अवहेलना न करेगा। अब जा, आराम कर। कल मैं तुझे प्रकाश, पवित्रता और अमर जीवन के सन्‍मार्ग पर चलने का उपदेश दूँगा।"

एकनाथ का चेहरा और भी चमकने लगा।


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