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कविता

मैं खो गया हू
बोधिसत्व


वे बड़े फालतू लोग थे..
उनके तो नाम भी अजीब निरर्थक से थे...
किसी का नाम भगतिन था तो
किसी का ब्रह्म नारायण
किसी का बिट्टन .......
इनमे से किसी ने बचाया डूबने से

किसी ने खोने से
किसी ने गिरने से।
ब्रह्म नारायण ने
मुझे विन्ध्याचल की पहाडियों में
खो जाने से बचाया।

अपने मुंडन के बाद मैं
पता नहीं कैसे चला जा रहा था पहाड़ियों की ओर
मुझे तो पता भी हीं था कि मैं भटक गया हूँ...
वे ब्रह्म नारायण थे मेरे पिता के बाल सखा
जिन्होंने मुझे देखा गलत दिशा में जाते

दौड़ पड़े नंगे पैर
और ले आए वापस
वे न होते उस दिन तो मुझे खा जाता
कोई जानवर
या गिर पड़ता मैं किसी खाईं में।

एक बार तो डूब ही रहा था गाँव के सायफन में
खेतों को सींचने के लिए चमकता हुआ पानी
जाता था घर के बहुत पास से
सायफन पड़ता था घर के एकदम पिछवारे
उसी के तल में चमक रही थी एक दुअन्नी
जिसे पाने के लिए मैं उतर गया पानी में
दुअन्नी को मुट्ठी में बाँध कर मैं डूब रहा था

कि आ गए नन्हकू भगत
उन्होंने देख लिया मुझे डूबते
और निकाल लिया बाहर

बच गया एक बार फिर ।
फिर मैं खो गया था माघ मेले की अपार भीड़ में
बैठा था भूले - भटके शिविर में
नाम भी नहीं बता पा रहा था किसी को
कि मेरे गाँव की भगतिन ने देख लिया मुझे
झपट लिया मुझे उस खेमे में आकर
ले आई मां के पास टेंट में
जो घंटे भर से खोज रही ती मुझे जहाँ-तहाँ बिललाती।।

थोड़ा और बड़ा हुआ तो
खो गया इलाहाबाद के एलनगंज मुहल्ले में
बीमार ताई को देखने आई थी माँ
तो साथ आ गया था मैं भी

निकला था मलाई बरफ लेने एक रुपए लेकर

और भटक गया रास्ता
थक गया था खोज कर पर
नहीं मिल रहा चाचा का घर
वह तो सामने के फ्लैट में रहने वाली एक भली सी लड़की ने देखा
मुझे चौराहे की भीड़ में सुबकते
ले आई घर किसी को बताया भी नहीं कि
मैं खो गया था....नाम था उसका सरिता

उसकी माँ उसे बिट्टन बुलाती थी
तब वह बारहवीं में पढ़ती थी
के.पी. इंटर कॉलेज के किसी गणित के अध्यापक की बेटी थी।
बचा लिया गया ऐसे ही कितनी बार

मरने से ....खोने से .....डूबने से।

पिछले कई सालों से खो गया हूँ मैं कहीं
डूब रहा हूँ कहीं
नहीं आ पा रहे मुझ तक ब्रह्म नारायाण

सुनता हूँ वे घर छोड़ कर भाग गए कहीं
भगतिन का कुछ पता नहीं चल रहा

उसे डुबो दिया उसके पड़ोसियों ने ताल में

एक बिस्वा खेत के लिए,
सरिता भी न जाने कहाँ है
भगत का वह उबारने वाला हाथ कट गया कहीं।
वे बड़े मामूली लोग थे
उनके तो नाम भी अजीब निरर्थक से थे

जिन्हों ने बचाया मुझे डूबने से
खोने से
मरने से।


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