डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

तक्षशिला में आग
राकेश मिश्र


उफ ! एडवर्ड सईद कहाँ से आ गए? संवेदना तो यायावरी ही है।

हुड़ी बाबा! किसी मोटर बाइक की अविश्वसनीय रफ्तार को बताने वाला यह विज्ञापन जैसे हमेशा प्रणयकांत की उपस्थिति के बैकग्राउंड में बज रहा था। वैसे इस शहर में प्रणयकांत मोटर बाइक पर नहीं आए थे, वे भी लगभग वैसे ही आए थे, जैसे इस शहर में दशकों पहले गांधीजी आए थे, मतलब रेलगाड़ी से। वह भी जमशेदपुर से बनारस, फिर दिल्ली होते हुए। उनके यहाँ आने का कोई विशेष कारण नहीं था, और न ही उन्होंने तय कर रखा था कि जब तक पूँजीवाद का नाश नहीं हो जाएगा वे वापस दिल्ली नहीं जाएँगे, बल्कि दिल्ली में वे उस स्थिति में पहुँच गए थे, जहाँ लोग उनको भागते भूत नजर आने लगे थे, अपनी लँगोटी बचाएँ या दूसरों की लँगोटी पर नजर गड़ाएँ। उनके कुछ मित्र ही वर्तमान रह गए थे, और निकट भविष्य में वह भी भूतपूर्व में बदलें, प्रणयकांत ने इसके पहले ही अपने आप के लिए दिल्ली प्रवास को भूतकाल कर लिया। वैसे नट शेल में वे अपना भविष्य बनाने ही यहाँ आए थे। हिंदी के कल्पनातीत और जादुई विस्तार के लिए भारत सरकार ने देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित किया था, जिसके पहले अंतरराष्ट्रीय लगा हुआ था, और उसमें 'अहिंसा, स्त्री विमर्श' जैसे उत्तर-आधुनिक पाठ्यक्रम चलाए जाने की घोषणा थी। अखबार की नौकरी छोड़कर प्रतिदिन मात्र अखबार पढ़ने का ही काम करते हुए प्रणयकांत को अंतरराष्ट्रीय और अहिंसा में गजब जादुई यथार्थवाद दिखा जो निश्चय ही मात्रा अनुप्रास के संयोग से नहीं बनता। उन्हें अपने ऊपर कोफ्त हुई कि इतिहास के विद्यार्थी होते हुए भी उनका ध्यान इस महत्वपूर्ण और आम सूचना पर क्यों नहीं गया था कि आखिर गांधीजी दिल्ली में आंदोलन कर अंग्रेजों को क्यों नहीं भगा रहे थे, उन्हें इस शहर में 'भारत छोड़ो आंदोलन' करने की सलाह किसने दी। दरअसल इतिहास के इस महत्वपूर्ण सवाल को वह भूगोल के व्यूप्वाइंट से सोच रहे थे कि आखिर यह अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय यहाँ क्यों बनाया गया है। खैर यदि बनाया गया है, तो उनसे पूछकर तो नहीं बनाया जा सकता था, इसलिए प्रणयकांत को यहीं आना पड़ा।

यहाँ प्रणयकांत दिल्लीवाले समझे जा रहे थे, जबकि दिल्ली में वे कतई दिल्ली के नहीं थे, वहाँ वे बिहारी जैसी कोई चीज थे, जिसके फुल फॉर्म को उनके उत्साही मित्र बॉर्न इंटलेक्चुअल, हार्ड-लेबरर एंड रिवोलूशनरी आइडेंटिटी कहते थे। यहाँ का चौखटा प्रणयकांत के लिए छोटा पड़ रहा था। दिल्ली में जितनी देर उनको मुनिरका से मुखर्जी नगर जाने में लगती था, उतनी देर में वे इस शहर के तीन चक्कर लगा आते थे। दिल्ली में अपने जिस बनारसीपन के कारण उनको महसूस होता था कि जमाने की दौड़ में वे कच्छप गति के शिकार हो जाएँगे और कमबख्त वहाँ के खरगोशों ने नींद न लेने की कसम खा रखी थी, वहाँ बनारसी अंदाज अब उनकी छवि में गजब का कंट्रास्ट पैदा कर रहा था। उनकी चाल, उनकी ढाल, उनकी आवाज उनकी अदा - हुड़ी बाबा। दिल्ली छोड़ते ही उनमें दिल्ली बुरी तरह घुस आयी थी, और अब वे एन.आर.डी. मतलब नॉन-रेसीडेंट दिल्ली की हैसियत से, दिल्ली में उनके सामने गुजर चुकी महत्वहीन सूचनाओं और जानकारियों के एकमात्र वारिस हो गए थे। उन्होंने समय काटने के लिए वहाँ एन.एस.डी. के नाटक देखे थे, बोरियत मिटाने प्रेस क्लब में दारूबाजी की थी जिसमें संयोग से उनके टेबल पर कई चर्चित पत्रकार बैठे थे। पैसे न रहने पर कथाकार उदयप्रकाश के लिखे के प्रूफ देखे थे, और इसी दौरान उनसे निकटता बढ़ी थी। ये सब बातें, जो दिल्ली की सड़कें नापते निहायत महत्वहीन और फटीचर किस्म की थीं, वर्धा आते ही जैसे चमकदार रंगीन मोतियों की शक्ल में बदल गयीं। शहर बदलने से जैसे जीवन ही बदल गया हो।

दरअसल बदलाव उनके जीवन की माँग थी। दिल्ली में लगभग ठस हो चुके जीवन में यदि बदलाव नहीं होता तो प्रणयकांत का समूचा जीवन किसी अद्वितीय करुण कविता में बदल जाता। उन दिनों जो वे महसूस कर रहे थे उसे यदि थोड़े से में कहा जाए, तो दिन एक कड़वा अवसाद लेकर उनके आस्वाद पर हावी हो जाता। जैसे वे कल्पना करते थे कि एक दिन सूरज के साथ ही उठेंगे वे भी, ऊब को बहाएँगे कुल्ले में, तौलिये से पोंछ देंगे सारी हताशा, और आईने के सामने खड़े होकर करीने से सँवारेंगे बाल और जिंदगी बिल्कुल बालों की सीध की तरह सीधी चलने लगेगी। लेकिन ये लगभग कविता की बातें थीं और कविता जिंदगी नहीं हुआ करती, इसका इल्म प्रणयकांत को बनारस में ही हो गया था।

बनारस में इल्म के साथ-साथ प्रणयकांत को और भी बहुत कुछ हुआ था, और दिल्ली में उनकी दुर्दशा का महत्वपूर्ण कारण इस बहुत कुछ का नहीं होना भी था। वह बहुत कुछ छायावाद के समय से ही भारतीय मानस की उलझन रहा है। 'अपने उर का भार किसके उर में डालूँ मैं' की तर्ज पर प्रणयकांत दिल्ली में अपने भार तले दुबले हुए जा रहे थे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने दिल्ली में भारमुक्त होने की कोशिश ही न की हो, लेकिन वहाँ सबकुछ इतना मुक्त था कि जल्द ही प्रणयकांत मुक्तावस्था में पहुँच गए। अनेक पत्रकार मित्रों की सोहबत में फूल, चिड़िया, झरना या ऐसी ही किसी खूबसूरत उपमा की हकदार लड़कियों की असलियत उन्होंने देखी। ये वो लड़कियाँ थीं जिनसे बिना परिचय के नाम पूछने तक में प्रणयकांत को पसीना आ सकता था। बर्फ-सी उजली, चाकू की तरह तेज इन लड़कियों को ऐसी अंग्रेजी आती थी कि उतने में प्रणयकांत कब से अपने वर्नाक्यूलर अखबार की नौकरी को लात मारकर पत्रकार इन रियल सेंस हो चुके होते। लेकिन ये प्रणयकांत की ही अधम आँखें थीं, जिन्होंने उन उजली चमकदार तेज लड़कियों को हजार-हजार, पाँच-पाँच सौ में बिकते देखा, और एक रात तो हद हो गयी। जब नॉनवेज खाने की आशा में वे अपने मित्र के यहाँ अप्रत्याशित पहुँच गए, तो जिंदा नॉनवेज ने आशंकित होकर पूछा - ये भी रहेंगे क्या? रेट बढ़ जाएगा। सुनते ही प्रणयकांत की साँसें चढ़ गयीं और धड़कन बढ़ गयी। चढ़ती साँसों और बढ़ती धड़कन के साथ ही वो लगभग हाँफते हुए अपने कमरे में लौटे और धम्म से बिस्तर पर गिर पड़े। इस घटना के कई दिनों बाद तक प्रणयकांत को डीटीसी की सीएनजी बसों में चढ़ने वाली हरेक लड़की पूछती दिखने लगती थी कि ये भी रहेंगे क्या, रेट बढ़ जाएगा। उनको हरेक लड़की की पीठ पर रेट चिपका नजर आने लगा था। एक हजार, पाँच सौ, पंद्रह सौ...। लगभग इन्हीं निष्कर्षों के साथ उन्हें दिल्ली छोड़नी पड़ी थी कि उनका भार हल्का करने वाली लड़कियों का युग समाप्त हो गया है। अब जेब का भार हल्का करने वाली लड़कियों का ही युग है। हम हॉब्सबॉम के 'एज ऑफ एक्स्ट्रीम्स' में पहुँच गए हैं। पहुँच क्या गए हैं, पार कर गए हैं।

'एज ऑफ एक्स्ट्रीम्स' अपने समय के प्रख्यात इतिहासकार हॉब्सबॉम की किताब थी, जिसका मुखपृष्ठ ही अपने समय को अभिव्यक्त कर देता था। इस मुखपृष्ठ के चित्र में दुनिया को अपने तीखे व्यंग्य और अपनी निश्छल सरलता से स्तब्ध और हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने वाला सर्वकालिक महान फिल्मकार चार्ली चैप्लिन दुनिया के सबसे क्रूर और हिंसक तानाशाह हिटलर के गेटअप में खड़ा था, और भारीपन की सटीक प्रतीक पृथ्वी हलकेपन के सटीक प्रतीक बैलून पर खुदी हुई उसके पाँव पर उछल रही थी। वर्धा में प्रणयकांत चार्ली चैप्लिन थे, जो दिल्ली के हिटलर के गेटअप में दिख रहे थे और जो चीज उनके पैरों पर उछल रही थी, वह ऋषि यानी भूमि से भी भारी थी, मतलब ज्ञान। यह वह ज्ञान नहीं था, जिसे पाने के लिए प्राचीन काल में ऋषि मुनि वनों, कन्दराओं की खाक छानते फिरते थे और जिसके आधुनिक संस्करण तमाम लाइब्रेरियों में दीमक या ऐसे ही किसी किताबी कीड़े में तब्दील हो गए थे। बदलते समय में ज्ञान एक उत्पादित वस्तु थी जिसे थोड़ा भी कॉमनसेंस रखने वाला कीमियागर आसानी से उत्पादित कर सकता था। जो पद्धति स्कॉलरों की दुनिया में हाई कल्चर के रूप में इंटरडिसिप्लिनरी के रूप में सामने आयी थी, मतलब 'अंतर आनुशासनिक स्वरूप' में वह अपने पॉप संस्करण में खासा गैर अनुशासनिक थी। दिल्ली रहते कुछ ही दिनों में प्रणयकांत को पता था कि ज्ञान वह नहीं जो गहरे पानी पैठकर पाया जाए, ज्ञान वह है जो विभिन्न पानियों को आपस में मिलाकर मिक्सचर तैयार कर दे। आप कुछ भी पढ़िए और उसको किसी से भी जोड़ दीजिए। जितनी कुशलता से आप उसे एक-दूसरे से जोड़ पाएँगे, आप उतने बड़े कद के विद्वान माने जाएँगे। मतलब ज्ञान अब सोना, चाँदी या लोहा जैसी धातु नहीं, वह अब काँसा, पीतल, स्टील जैसी यौगिक थी। और इस यौगिक का योग यानी गुणनफल गणित में प्रणयकांत को मास्टरी नहीं तो ट्रेनी की हैसियत तो हासिल थी ही।

अपनी इसी हासिल हैसियत से प्रणयकांत बहैसियत भविष्य का स्कॉलर माने जाने लगे। लोग उनको पैरों पर उछलते ज्ञान को जब तक समझ पाते, तोल पाते, वह एक नपे-तुले शॉट से एक सीधी निशाने पर जा लगी। यह निशाना एक अदृश्य शीतल पेय था, जिसे एक खूबसूरत शालीन-सी लड़की पीने की मानसिक तैयारी में थी। जिसके बाद वह उस शीतल पेय के विज्ञापन में रानी मुखर्जी की तर्ज पर कह सके, अजी हिम्मत हो तो खुल के बोलिए, मैं खूबसूरत हूँ, सेक्सी हूँ, आप मुझ पर मरते हैं।

 

कह दो बेनडिक्ट एंडरसन से यह भी इमेजिंड कम्युनिटी ही है :

प्रणयकांत और इस खूबसूरत शालीन-सी लड़की सोनल स्वर्णरेखा में उतनी ही समानता थी, जितनी प्रणयकांत और गांधीजी में - मतलब यह भी ट्रेन से ही यहाँ आयी थी, और दिल्ली से ही।

अपने जीवन और भविष्य के बारे में सोचते हुए यह लड़की अकसर अपनी कानी उँगली के नाखून चबाती थी, और दिल्ली रहते हुए उसकी उँगलियों में नाखून ही नहीं बच रहे थे। नाखून के साथ-साथ इस लड़की का खून भी काफी जल चुका था। क्योंकि अपनी पाँच बहनों में खुद को उनका आदर्श समझने की भूल और अपने एकमात्र भाई की मृत्यु के बाद अपने आप को बाप का बेटा मानने की जिद पर यह लड़की भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती थी।

युवावस्था की अपनी तमाम लड़कीपनी चाहतों को आई.ए.एस., पी.सी.एस. जैसे कोड-वर्ड में झोंक देने वाली यह लड़की अपने तीसरे प्रयास में अपने सारे नाखून चबा बैठी। पहले प्रयास में जहाँ इसने पी.टी. पास किया, दूसरे में मेन्स और तीसरे में जबकि इंटरव्यू क्लियर हो जाना था, यह पी.टी. भी नहीं पास कर पायी और तिलिस्म फिर अपनी जगह कायम हो गया। एक आहपन, एक टूटा सपना, एक नाउम्मीद जिद, अपने परिवेश से दुखी यह लड़की भी ऐसी ही स्थिति में नाखून बढ़ाने के ख्याल से वर्धा आयी थी। आयी क्या थी, भेजी गयी थी। 'जाओ बेटा नयी जगह है, नये लोग और नये विषय से फिर कोई नया रास्ता दिखेगा' - अपने पूज्य पिता के इस आप्त वचन को शिरोधार्य कर आयी इस लड़की को यहाँ अपने खून और नाखून बढ़ने देने के पर्याप्त अवसर थे।

तिलिस्म भेदने के सूत्र रटंती दौर में उसने विशिष्ट कहलाने लायक सामान्य ज्ञान हासिल कर लिया था और नोट्स लिखने के अपने भगीरथ प्रयास से भाषा पर उनको परीक्षोपयोगी अधिकार हासिल था ही। अपने इसी अधिकार के कारण वह प्रणयकांत के साथ बैठी साधिकार कोल्ड ड्रिंक्स पी रही थी। वह पहली ही बैठक थी, लेकिन वातावरण में कोल्डड्रिंक्स का प्रभाव नहीं था। यानी बातचीत काफी गरमागरम हो रही थी।

'अच्छा, तो तुम महिला अधिकारों की समर्थक हो या नहीं?'

'हाँ, क्यों नहीं? लेकिन महिला अधिकार की भी अपनी मर्यादा होनी चाहिए। यह नहीं कि अधिकारों की बात करते-करते हम उच्छृंखल हो जाएँ।'

प्रणयकांत थोड़े अचरज में थे। दिल्ली में जे.एन.यू. के गंगा ढाबा की बातचीत जब कभी महिला अधिकारों पर आती तो निष्कर्ष यही होता कि महिला अधिकार तब तक अधिकार नहीं माना जाएगा जब तक किसी नग्न स्त्री से कोई पूछने वाला बचा होगा कि वह इस अवस्था में क्यों है। महिलाओं से क्यों, कैसे और कब का सवाल जब तक पुरुष वर्ग से आता रहेगा, तब तक महिलाओं के अधिकार की बात बेमानी है। यहाँ तो बात ही उल्टी हो रही थी। अधिकारों की बात प्रणयकांत उठा रहे थे, और मर्यादा का सवाल लड़की यानी सोनल उठा रही थी। लेकिन थोड़ी ही देर में प्रणयकांत इस निष्कर्ष पर पहुँच गए कि इस किस्म का कोई भी सवाल या ऐसी कोई भी बहस लड़की के लिए आई.ए.एस., पी.सी.एस. में पूछे गए निबंधात्मक प्रश्नों के जवाब देने जैसा था। और इस जवाब में एक बैलेंस तो होना ही चाहिए।

इस बहस और बातचीत का वास्तविक बैलेन्स प्रणयकांत को और थोड़ी देर बाद समझ में आ गया, जब लड़की इन बहसों को छोड़कर अपने घर-परिवार पर आ गयी। पहली ही मुलाकात में घर-परिवार। लेकिन जल्द ही लड़की ने अपने घर का पूरा चित्र खींचकर रख दिया। बिहार के एक छोटे-से शहर में प्राध्यापक पिता। पाँच बहनें। पाँचों बहनें पढ़ने-लिखने में जहीन, मेहनती। पिता भी प्राध्यापकीय चेतना के कारण 'बेटियाँ ही मेरे बेटे हैं' के हिमायती। लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई में कोई कोताही नहीं।

'कोताही तो छोड़ दो, उन्होंने हमेशा बढ़-चढ़कर किया है। वरना तुम तो जानते हो बिहार में मेरी उम्र की लड़कियाँ अभी दो-चार बच्चों की माँ होती हैं। लेकिन पिताजी हमेशा मुझसे ही पूछते हैं, तुम्हारा क्या सोचना है बेटा? तुम क्या चाहती हो?'

'लेकिन ऐसा तो हरेक माँ-बाप करते ही हैं। बल्कि करना ही चाहिए।'

'कहना आसान है, लेकिन ऐसा होता कहाँ है मेरे पिताजी तो...' कहते-कहते सोनल की आवाज जैसे भर्रा गयी। प्रणयकांत ने लक्ष्य किया, दो बूँद आँसू भी उसकी आँखों में आ गए थे।

ठीक उसी क्षण प्रणयकांत ने उसकी आँखों में झाँका। यह वही झाँकना था जब प्रणयकांत को किसी सूखे हुए कुएँ, बावड़ी की जगह एक बहती नदी दिखाई दी। देखते-ही-देखते वह नदी प्रणयकांत के भीतर भी बहने लगी। उस नदी की धार में प्रणयकांत ने खुद को डूबता पाया। रेस्टोरेंट में शोर था, लेकिन प्रणयकांत को सबकुछ शांत महसूस हो रहा था, उस शांति में कोमल, निश्चल और शांत सोनल का चेहरा... प्रणयकांत की आँखें जैसे मुँद गयीं।

'क्या हुआ, कहाँ खो गए?'

'नहीं बस यूँ ही। चलो चला जाए।'

दोनों बाहर आ गए। प्रणयकांत इस बात पर तय थे कि लड़कियाँ इस तरह के मामले में काफी संवेदनशील होती हैं। उनके प्रति आपके मन में कोई भाव आया नहीं कि वे पूरा पाठ विखंडित कर लेती हैं। आँखों की एक कौंध या एक चमक ही उनके लिए पर्याप्त होती है, फिर यहाँ तो एक समूची नदी बहने जैसा भाव था। प्रणयकांत ने जबर्दस्ती उन चमकदार लाइटों को बुझाया। वे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि पहली ही मुलाकात में उनकी छवि किसी चिर-वियोगी से टक्कर ले। उन्होंने अपने आपको एकदम सहज बनाते हुए विश्वविद्यालय की स्थिति, वर्धा के मौसम, स्त्री-विमर्श के आधुनिक आयाम और न जाने किन-किन विषयों पर बातचीत शुरू कर दी, लेकिन यह प्रणयकांत को ही महसूस हो रहा था कि वे सिर्फ आवाज कर रहे हैं, कुछ बोल रहे हैं। रास्ता उन्हें अनावश्यक लंबा लग रहा था और उन्हें अपना बोलना और अनावश्यक। इस सबसे अनावश्यक उन्हें सोनल की तटस्थ दृष्टि लग रही थी। क्या वाकई इस लड़की ने उनकी आँखों में कुछ पढ़ लिया?

हॉस्टल आने पर प्रणयकांत ने लड़की से विदा ली। वह गुडनाइट कहती हुई जाने को मुड़ी। प्रणयकांत देर तक उसे जाते हुए देखते रहे, उस जाती हुई लड़की की पीठ पर कोई रेट नहीं चिपका था। वहाँ सिर्फ चमक थी या वह एकदम स्याह थी, प्रणयकांत इस पर ठीक-ठीक कोई राय नहीं कायम कर सके।

राय कायम करना आसान भी नहीं था। सिर्फ उस लड़की के बारे में क्यों, इन दिनों प्रणयकांत के आसपास जो भी चीजें घटित हो रही थीं, वो सब इसी तरह की तेज चमक और घनघोर स्याह की शक्ल में थीं। इतना बड़ा विश्वविद्यालय अपनी निर्माण प्रक्रिया के आरंभिक चरण में था, और उतनी ही छोटी चीजें विश्वविद्यालय में घटित हो रही थीं। विश्वविद्यालय का कुलपति अपनी अवधारणाओं में इतना अत्याधुनिक था कि उसे विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों के चलाए जाने पर सख्त आपत्ति थी। उसके अनुसार इस विश्वविद्यालय का एकमात्र उपयोग शोध-कार्यों के लिए उचित था। और उसकी इस अवधारणा को मूर्त रूप में साकार करने के लिए उनके सर्वशोधक चेले-चपेटे, इसकी जड़ों तक फैल गए थे। विश्वविद्यालय में योग्यतानुसार फकत चपरासियों और क्लर्कों की भर्ती होती थी, इसके अलावा बड़े पदों पर कुलपति का कृपापात्र होना ही सबसे बड़ी योग्यता थी। यह कुलपति साहित्यिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा झंडाबरदार था, और इसका सबसे सार्थक उपयोग उसे सांप्रदायिकता के बहाने किसी पार्टी और विचारधारा को गरियाने में लगता। अपने मातहतों के सामने वह आर.एस.एस. और कम्युनिस्टों को एक साथ धारा-प्रवाह गालियाँ देता, और वे तमाम लोग 'जी हाँ-जी हाँ' का ऐसा समवेत उच्चारण करते कि विश्वविद्यालय की नींव के पत्थर पलभर तक काँप उठते। विश्वविद्यालय का उपवित्ताधिकारी एक बी.ए. पास क्लर्क था, जो पचासों जगह क्लर्की करता हुआ कलम और नाक एक साथ रगड़ता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा था और उसकी नजर में यहाँ के तमाम विद्यार्थी पढ़ाई से जी चुरानेवाले, सरकार और अपने माँ-बाप के पैसों पर ऐश करनेवाले अय्याश थे, जिसके लिए कोई भी फंड सैंक्शन करना इस महान विश्वविद्यालय की महान परंपरा से खिलवाड़ करना था।

इस विश्वविद्यालय और इसके कुलपति की कार्यशैली पर समूचे देश के बौद्धिक हलकों में एक क्षोभ था, जिसके जवाब में इस महान स्वप्नदर्शी और ऐतिहासिक संस्कृति पुरुष का निहायत बेशर्म जवाब था कि यह समय ही संदेह का है। दुनिया में कुछ भी अच्छा काम करने पर लोग संदेह तो करते ही हैं। इसलिए इस कुलपति को अपने तमाम वेगवान उल्लू के पट्ठों पर कोई संदेह नहीं था, खासकर उस ताजादम घोड़े की हिनहिनाहट वाले रौबदार शख्स पर तो बिल्कुल नहीं, जो साहित्य और संस्कृति के बायें पक्ष से सरपट दौड़ता हुआ आया था, और आजकल इस कुलपति का दाहिना हाथ था।

कुलपति के साथ-साथ विश्वविद्यालय के तमाम लोग निष्कर्षों से ज्यादा प्रक्रियाओं के सच पर यकीन करने वाले थे। और उनके तमाम क्रियाकलाप इस लिहाज से किसी महान प्रक्रिया का हिस्सा थे। उन तमाम लोगों को इतिहास से ज्यादा इस बात पर यकीन था कि वे सभी इतिहास में शामिल होने की योग्यता रखते हैं, योग्यता क्या रखते हैं, इतिहास बना ही रहे हैं। उन्हें अपने किए पर गर्व था, अपनी सोच पर नाज था, और अपनी उपलब्धियों पर वे कुछ कहते नहीं थे। यह काम तो इतिहास का है।

इतिहास से इस काम को और सुगम बनाने के लिए विश्वविद्यालय में कई ऐतिहासिक महत्व की योजनाएँ थीं। इन योजनाओं में हिंदी के एक अत्यंत नाजुक मिजाम कवि, जिन्हें वृक्षों, पत्तियों, ओस, चिड़िया और बच्चों पर कविताएँ लिखने में महारत हासिल थी, के नाजुक कंधों पर हिंदी-साहित्य के इतिहास में नदियों पर लिखी कविताओं के चयन पर भारी बोझ था। एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का चित्रकार, जिसे हिंदी साहित्य की घनघोर समझ थी, और जिसके अनुसार 'कामायनी' सेक्स के लिए पत्नी और जीवन-दर्शन तथा भावना संबंधी बातचीत के लिए प्रेमिका की अनिवार्यता को स्थापित करने का अनिवार्य महाकाव्य है, वह प्रख्यात कथाकार निर्मल वर्मा के साहित्य लेखन में उनके कॉफी-मग की भूमिका पर लाखों रुपये के प्रोजेक्ट पर काम करने को उत्सुक था। उसके पास तमाम साहित्यकारों के लोटे, गिलास, थाली, टेबल, लैंप, बिस्तर और कंडोम की लंबी सूची थी, जिसके बिना वह सबकुछ कतई लिखा ही नहीं जा सकता था, जिसे हम आजकल पढ़ते हैं।

इतिहास के ऐसे ही ख्वाबों के बीच प्रणयकांत का वर्तमान था, जिसमें उनके अंदर एक नदी बहने लगी थी। चाय पीते बिस्तर पर सोते हुए अचानक उनके डर का भार बढ़ जाता और वे भारमुक्त होने के लिए बेचैन हो उठते। यह बेचैनी एकांगी नहीं थी। समय की अराजकता, भविष्य की अनिश्चितता, शब्दों का खोखलापन और खुद उनके भटकन की निरर्थकता के बीच के एक गुबार, एक शोर, एक बेचैनी-सी उठती और न जाने उन्हें क्यों लगता कि यह बेचैनी और छार सोनल के अंदर भी उठ रहा है। वे कभी सोनल के शहर नहीं गये थे। उसके परिवार, उसके मित्रों, उसके परिचितों से उनका कोई साबका कभी नहीं पड़ा था। सोनल भी उनके परिवेश से नितांत अपरिचित थी। फिर यह अनजाना एका कैसा और फिर, विश्वविद्यालय के अभिजन, उनके अंदर भी एक ही तरह की खुशी, एक ही जैसी तृप्तता और एक ही जैसी आश्वस्ति कैसे पनप रही थी, जबकि वे भी तो एक-दूसरे के घर-परिवार, दोस्त और परिवेश से नितांत अपरिचित थे। ऐसे ही शायद राष्ट्र बनता है, जिसमें तमाम तरह के लोग रहते हैं।

यदि हैबरमास नहीं होते तो क्या पब्लिक स्फिसर नहीं होता

सोनल धीरे-धीरे खुल रही थी, प्रणयकांत के साथ। ग्लासनोस्त और पेरोस्त्राइका की तरह प्रणयकांत की बंद जिंदगी में उत्सकुता और उदारीकरण की बयार बहने लगी थी। विश्वविद्यालय की कैंटीन अब कई तरह से अकादमिक होती जा रही थी। क्लासरूम के बंद घुटन भरे माहौल में विषयवार पढ़ाई करने की उम्र और जरूरत दोनों से निजात पाए प्रणयकांत के लिए कैंटीन की छत किसी बोधिवृक्ष से कम महत्व नहीं रखती थी। वहाँ बैठे-बैठे चाय की चुस्कियों के बीच वे रोज किसी-न किसी विलक्षण नतीजे पर पहुँचते थे। अपने उन तमाम विलक्षण नतीजों को कलात्मक तरीके से कहने पर उन्हें गजब का संतोष प्राप्त होता। उम्र और रोजगार के भार से आहत प्रणयकांत यूँ तो जीनियस पहले भी थे, परंतु उनकी जिनियसाई बनारस में आठ-दस चाय और दिल्ली में दो-चार पेग दारू के लिए भी महँगी पड़ती थी। परंतु यहाँ तो दुनिया एकदम बदल गयी थी। इतनी बदल गयी थी कि न सिर्फ सोनल, बल्कि उनके कई यार-दोस्त उनको तवज्जो देते हुए सुनने लगे थे। इसी विश्वविद्यालय की कैंटीन के बोधिवृक्ष के नीचे प्रणयकांत को इल्म हुआ कि गांधी जी ने हिंद स्वराज में अपनी भाषा में मर्दवादी रवैया अख्तियार किया है, जो समकालीन स्त्री विमर्शवाले समय में उचित नहीं है। कि इतिहास में उन वंचितों-पीड़ितों के लिए कोई जगह क्यों नहीं है, जो भारतीय समाज और इस राष्ट्र-राज्य के सबसे बड़े हिस्से हैं, कि इतिहास को जिन भाषाओं के माध्यम से जानते हैं, यदि वह एक बड़े हिस्से द्वारा बोली ही नहीं जाती थी, तो उनके द्वारा हम उस समय के तथ्य को जानने के दावा कैसे कर सकते हैं, कि तुलसीदास के रामचरितमानस का गीता प्रेस का संस्करण आज यदि घर-घर में मिल जाता है, तो उसके आधार पर यह तय कैसे किया जा सकता है कि उसकी लोकप्रियता आरंभिक काल से इसी तरह चली आ रही है, कि लगान फिल्म सिर्फ क्रिकेट मैच का खेल नहीं, बल्कि हर उस खेल में सट्टा लगाने की हौसलाअफजाई बाँटती फिल्म है, जिससे हम अब तक नावाकिफ हैं, मसलन शेयर मार्केट।

ये सब नयी बातें नहीं थीं। समकालीन समय के अधिकांश सोचने-समझने वाले इन मुद्दों को जब-जब उठाते रहते थे। यह सिर्फ ज्ञान की कीमियागिरी थी, जिससे प्रणयकांत अपने व्यक्तित्व को चमकाना चाह रहे थे, ताकि वे सोनल की नजर में एक विलक्षण चमक, एक नायाब रोशनी की तरह कौंध जाएँ। वे यह भी जानते थे कि शुद्ध अकादमी की उच्च दुनिया में ये चार कौड़ी के योग्य भी नहीं हैं, लेकिन कभी-कभी उन्हें लगता कि कम-से-कम निर्मल वर्मा के साहित्य में काफी-मग के योगदान से तो ये लाख गुने बेहतर हैं। यदि समकालीन हिंदी परिदृश्य का बौद्धिकवाद ऐसे ही लोगों के हाथों में था, तो धीरे-धीरे प्रणयकांत की छाती को भी फूलने का अधिकार मिलना चाहिए था। छाती जरूर फूलने लगी थी प्रणयकांत की, लेकिन इन विचारों से उतनी ज्यादा नहीं, जितनी इन विचारों का प्रभाव, सोनल पर देखकर। उसकी पढ़ाई-लिखाई का तरीका ही ऐसा था, जिसमें किताबों की बातों को प्रमाण मानना था। हिंदी साहित्य में आई.ए.एस., पी.सी.एस. की कक्षाओं के धाकड़ ओर धुरंधर लेक्चररबाज श्रीयुत बलराम तिवारी उसके आदर्श थे, जो विरुद्धों के सामंजस्य की ऐसी अव्याख्या करते कि बिचारी सोनल का मुँह आश्चर्य से खुला रह जाता। यहाँ तो प्रणयकांत बनारस में कथाकार काशीनाथ सिंह, और दिल्ली में उदय प्रकाश के सान्निध्य में रह आए थे। मंगलेश डबराल और राजेंद्र यादव से उनकी बात और दो से भी ज्यादा बार उन्होंने नामवर सिंह को बोलते सुना। इतने हाई प्रोफाइल के सामने बेचारे बलराम तिवारी भी कहाँ? क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा!

लेकिन प्रणयकांत सोनल को नजरअंदाज नहीं कर रहे थे। वह उनको सखीबाज नहीं समझ लें और कन्नी न काट जाएँ इसलिए वे अपनी बातचीत का स्वर ऐसा रखते जैसे वे सोनल की बातचीत को काफी तवज्जो दे रहे हैं। वे कक्षा में सोनल की बातचीत का हवाला देते हुए सवाल खड़ा करते और सोनल की सोच और उसकी समझ का सम्मान करते दिखने की कोशिश करते। वे सोनल के सेमिनार पेपर्स की तारीफ करते और शिक्षकों के साथ अपने मशविरे में भी सोनल को उसके विचारों समेत लाने की वकालत करते। कुल मिलाकर वे सोनल को अपनी नजरों में महत्वपूर्ण बनाकर खुद उसकी नजर में महत्वपूर्ण होना चाहते थे।

यह तरीका सिर्फ विचारों तक नहीं था, व्यवहार में यह उससे भी ज्यादा था। प्रणयकांत ने अपने अहं को इस्पात की तरह बड़ा और कठोर कर लिया। उस पर चोट ठन-ठन की आवाज के साथ गूँजती, सिर्फ सोनल उसकी प्रत्यास्थता का उपयोग कर उसको झुका सकती थी। उन्होंने सबके लिए अपनी उपलब्धता को एकदम समेट लिया और सोनल के लिए बाजार जाकर फ्रूटी ले आ सकते थे। अपना पर्चा तक लिखना उन्हें भार लगता था, लेकिन यही सोनल कह दे तो पूरी किताब उतारने को तैयार हो जाएँ। बहस में वह एक बार प्रो. नंदकिशोर आचार्य और पुरुषोत्तम अग्रवाल तक की नाराजगी मोल ले सकते थे, लेकिन सोनल यदि किसी बात को सही मानती है, तो प्रणयकांत पराजित।

इस पराजय में ही प्रणयकांत की जीत थी लेकिन यह प्रणयकांत अपने अनुभवों से जानते थे कि वह जीत उनकी घनघोर पराजय होगी। दम साधकर उस घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब वे सोनल की आँखों में, उस तेज चमक और कौंध के बाद का अपना अँधेरा भी उसमें उतार सकें। वह अँधेरा जो अकसर प्रणयकांत की आँखों के आगे हो जाता। भारतीय समाज में क्रांति के रूमान को ऐश के साथ जीने का स्वर्णयुग समाप्त हो गया था। नब्बे के दशक का जो नव सामाजिक यथार्थ था, उसमें अट्ठाईस साल के प्रणयकांत का अहिंसा जैसा विषय पढ़ना घोर शर्मनाक और लगभग डूब मरने जैसी बात थी। उनके तमाम यार दोस्त, जो बनारस, दिल्ली, इलाहाबाद में फैले थे कहीं-न-कहीं अपना जुगाड़ फिट कर चुके थे। उस जुगाड़ में दरोगा होने से लेकर वकालत, पत्रकारिता तक का फैलाव था। विज्ञापन एजेंसियों से लेकर कंप्यूटर प्रोग्रामों तक की दुनिया में उनकी पैठ थी। जिनकी पैठ अब तक नहीं हो पायी थी, वे भी क्लर्क से लेकर कलेक्टर बनने तक की लगातार जोर आजमाइश में लगे थे। बाजार में काम की कमी नहीं थी, लेकिन प्रणयकांत के ज्ञान के लिए बाजार में काम नहीं था।

कंप्यूटर के बारे में वे इतना तक जानते थे कि इसे बनाने वाला ज्वेल कॉर्प अमेरिका द्वारा वियतनाम पर हमले का घोर विरोधी था, और वह अपनी कंपनी इंटेल के अधिकारियों से इस आशय का दस्तखत चाहता था। वह एक्स्ट्राऑर्डिनरी जीनियस था लेकिन उसे उसी इंटेल के एक सेल्स एक्जीक्यूटिव ने मात्र इसलिए कंपनी से निकलवा दिया था कि उसके बाल बढ़े थे और वह कई दिनों तक नहाता नहीं था। लेकिन कंप्यूटर के सामने आते ही प्रणयकांत के आगे सितारे चमकने लगते। लॉग ऑन, लाग ऑउट, ओपन और एग्जिट से ऊपर बढ़ने से उनकी जानकारी इनकार कर देती। माउस पर हाथ रखते ही उनके हाथ में पसीना आने लगता और की-बोर्ड पर नजर दौड़ानी पड़ती। वे दिल से चाहते थे कि सोनल उन्हें बिल्कुल वही जाने, जो वे थे, लेकिन उन्हें हमेशा महसूस हो रहा था कि वह उन्हें वैसा ही जान रही थी, जैसा वे दिख रहे थे।

वैसे प्रणयकांत दिख तो बिल्कुल अजूबा ही रहे थे। कैंटीन में बैठने वाले और छात्र-छात्राओं के बीच एक जबरदस्त सुगबुगाहट थी कि आखिर दोनों में चल क्या रहा है, दोनों ही हमेशा क्या बातें करते रहते हैं, दोनों में से किसकी उम्र अब नैना मिलाने वाली नहीं रह गयी थी। फूको, बाथ, सार्त्र की बातें करते प्रणयकांत अब ज्यादा समय अंत्याक्षरी खेलने में बिता रहे थे, सिनेमा के उन सत्तर के दशक के गानों को गाते हुए प्रणयकांत बिल्कुल तन्मय हो जाते। खासकर - होठ पर लिए हुए दिल की बात हम/जागते रहेंगे और कितनी रात हम/मुख्तसर-सी बात है/तुमसे प्यार है/ या कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है/ कि जैसे तुमको बनाया गया है मेरे लिए - इन पंक्तियों को गाते हुए उन्हें महसूस होता, जैसे उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति, अपनी दुर्निवार अभिव्यक्ति को स्वर दे दिया हो।

अपने यौगिकीय ज्ञान के साथ-साथ प्रणयकांत इन गानों को गाते-गुनगनाते, अंत्याक्षरी खेल में किसी खंभे पर पत्थर से निशाना साधते, अपनी ऐसी छवि निर्मित कर रहे थे, जो ज्ञान के अतिरिक्त बोझ से गुरुगंभीर और बोझ नहीं हो गया है, बल्कि वह एक मस्तमौला जिंदादिल इनसान है, जिसके लिए अस्तित्ववाद पर चर्चा करना भी उतना ही सहज है, जितना देवानंद के स्टाइल पर। अपनी इन तमाम हरकतों और करनी से, जैसे प्रणयकांत ने अपनी उम्र अट्ठाईस से सत्रह की कर ली थी, वे उसी तन्मयता, मुग्धता और मदातिरेक से सोनल को महसूस करना चाहते थे, उनको देखकर लोगों को ऐसा लगने लगा था जैसे वे पहली बार प्लस टू की परीक्षा पास कर विश्वविद्यालय में पढ़ने आए हैं, खासकर लड़कियों से परिचय तो जैसे पहली बार ही हुआ है। लेकिन प्रणयकांत इन तमाम बातों से बिलकुल बेखबर, बेअंदाज, और बेधड़क, लड़कपन कर रहे थे, कभी-कभी तो खुद उन्हें भी लगता जैसे वे 'रोमियो-ज्यूलियट और अँधेरा' वाला वह अबोध किशोर उम्र नायक हो गए हों जो नाजी सैनिकों से अपनी प्रेमिका को बचाता हुआ, तारों, नक्षत्रों और पृथ्वी के प्रति अपनी समस्त जानकारियों को उसे बता देना चाहता हो।

लेकिन प्रणयकांत यह जानते थे कि वे अबोध नहीं हैं, और वे एकाबरगी अपने को भुलावे में रख भी लें, लेकिन सोनल तो एकदम अबोध नहीं थी, वह अपने और प्रणयकांत को लेकर चल रही इस तरह की चर्चाओं के प्रति पूरी तरह जागरूक थी। उसे एकदम अटपटा लग रहा था कि उसे लेकर कैंटीन, पुस्तकालय और स्टॉकरूम में इस तरह की चर्चाएँ हों। लेकिन प्रणयकांत ने उससे सीधे-सीधे कुछ कहा नहीं था इसलिए सीधे-सीधे कोई बात हो नहीं सकती थी। लेकिन उसने धीरे-धीरे अपने आपको प्रणयकांत के लिए अनुपलब्ध बताना शुरू किया। प्रणयकांत उससे जितना अनौपचारिक होते, वह उतना ही औपचारिक होने की कोशिश करती। यदि प्रणयकांत उसे चाय, कॉफी कुछ भी ऑफर करते तो वह धन्यवाद, थैंक्यू कहना नहीं भूलती। प्रणयकांत इन दिनों अकसर उसके साथ हर जगह हो लेने की कोशिश में थे, वह प्रयास से इन कोशिशों को झटका देने की कोशिश करती। यदि दोनों बाजार में मिल जाते तो वह प्रणयकांत के साथ चाय पीने के आग्रह को ठुकराती नहीं बल्कि चाय पीकर कहीं और घूमने-फिरने के प्रस्ताव को शालीनता से मना कर देती थी। यदि प्रणयकांत अकेले न होकर दो-चार मित्रों के साथ होते, तो वह जरूर यहाँ-वहाँ घूम आती थी, इस दौरान प्रणयकांत अकसर उसके साथ-साथ चल रहे होते। कई बार प्रणयकांत ऐसे अवसरों पर हेठी कर जाते। वे कुछ बहाना बनाकर उस झुंड से अलग हो जाने की कोशिश करते, जिसे सोनल बड़े आराम से मान लेती। एक-दो बार की ऐसी कोशिशों के बाद प्रणयकांत को लगा, कम-से-कम इसी बहाने जो भी उसके साथ रहने का, उनको अवसर प्राप्त हो रहा था, उसे जाया किए दे रहे हैं। प्रणयकांत अजीब उलझन और बेचैनी में थे। उनकी इस उलझन और बेचैनी को सोनल समझ रही थी, और समझकर ऐसा व्यवहार कर रही थी, यह बात उन्हें और उलझन में डाल रही थी और बेचैन कर रही थी।

इधर सोनल की उलझन भी जायज थी। पाँच बहनों में वह दूसरे नंबर की थी, उसे प्यार-मुहब्बत के पचड़े से दूर रहकर अपना भविष्य बनाना था, अपने पैरों पर खड़ा होना था। रसायनशास्त्र में स्नातकोत्तर होने के बाद वह तीन बार आई.ए.एस. की परीक्षा दे चुकी थी। वह विशिष्ट थी, क्योंकि वह अपने पिता के लिए बेटा होना चाहती थी। वह महत्वपूर्ण थी, क्योंकि उसने अब तक अपने आपको इस तरह के पचड़ों से दूर रखा था। वह शानदार थी, क्योंकि वह तमाम लड़कों से सहजता से मित्रता कर सकती थी, बिना आँसू बहाये रतजगा किए बिना किसी उलझन के तमाम मुद्दों पर उनसे बातचीत कर सकती थी। वह इतनी साफ थी कि सड़क किनारे प्रणयकांत के साथ चाय पीते हुए कह सकती थी कि शाम सात बजे के बाद किसी लड़के के साथ नहीं घूमना चाहिए, क्योंकि इस समय सेक्स संबंधी आकांक्षाएँ कुछ ज्यादा ही जोर मारने लगती हैं।

वह अपने पिता की आन-बान और शान थी, और यहाँ तो जैसे प्रणयकांत की हरकतों से उनकी शान में कोई नाजायज गुस्ताखी हो रही थी।

'जानते हो प्रणय, मैं हमेशा ऐसे लड़कों को सख्त नापसंद करती हूँ जो हमेशा रूमाल की तरह साथ में अपना दिल पॉकेट में लिए चलते हैं। ऐसे लोगों को हमेशा यही लगता है कि लोग उनको समझ नहीं पाते हैं। अरे भाई कुछ हो आपमें समझने के लिए तब तो समझा जाए।' एक रेस्त्राँ में जब चाय पीते सोनल ने प्रणयकांत से यह कहा तो प्रणयकांत के हाथ से प्याला टूटते-टूटते बचा। लेकिन जल्द ही उन्होंने पैतरा बदलते हुए कहा - 'बिल्कुल ठीक बात है। यह क्या बात हुई कि जहाँ लड़की से कुछ दिनों की दोस्ती हुई नहीं कि साहब को उससे प्यार हो गया। और फिर प्यार-व्यार होता क्या है। जो समय आदमी को अपने और अपने परिवार के बारे में सोचने में लगाना चाहिए, साहबजादे किसी लड़की की आँखों में अपनी जन्नत तलाशने में लगा रहे हैं। अब भला आँखों में जन्नत कहाँ हो सकती है।'

'दोस्ती यह एक मूल्य हो सकता है, एक फीलिंग भी हो सकती है, लेकिन भाई वह प्यार क्या बला है, मुझे तो एकदम समझ में ही नहीं आता है।' कहते हुए सोनल ने अपनी आँखें प्रणयकांत की आँखों में डाल दीं।

प्रणयकांत चुपचाप चाय पीते रहे। उन्हें इल्म था कि यह सब उनके लिए ही कहा जा रहा है, लेकिन इसके जवाब में उन्हें क्या करना चाहिए, यह वे तय नहीं कर पा रहे थे, लेकिन चुप रहने का कोई मतलब नहीं बनता। वे जल्दी से चाय पीकर बाहर आ गए सोनल भी साथ ही थी। रास्ते में चलते हुए दोनों के बीच एक अजीब-सा ठोस चुप्पी छायी हुई थी। धीरे-धीरे लगभग भर्रायी आवाज में प्रणयकांत ने कहना शुरू किया, 'पता नहीं सोनल, तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो, या लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं। लेकिन मैं अपनी स्थिति ठीक-ठीक तुम्हें बताऊँ, मुझे तुम्हारे साथ रहना अच्छा लगता है। तुम्हें देखते हुए मेरी पलकें भारी होने लगती हैं, मेरी आँखें डबडबा जाती हैं, मुझे एक धीमा बुखार-सा महसूस होने लगता है... मैं नहीं जानता कि यह क्यों होता है, लेकिन यदि किसी रोज तुम नहीं मिलती हो, तो मैं बेचैन होकर तुम्हें ढूँढ़ता हूँ। मुझे खुद भी अच्छा नहीं लगता।... कई दिनों से मैं तुम्हें बताना चाह रहा था कि तुम मेरे अंदर धीरे-धीरे एक नदी की तरह बहने लगी हो, कभी एकदम धीर गंभीर, कभी एकदम तेज, उच्छृंखल। मुझे तुमसे हमेशा सच बोलने की इच्छा होती है। आज भी मैं तुमसे सच ही कह रहा हूँ। पता नहीं यह सब सुनने के बाद तुम मुझसे कैसा व्यवहार करो। लेकिन कभी-न-कभी तो यह कहना ही था,' कहते-कहते प्रणयकांत की आवाज में अजीब-सी कातरता आ गयी। यह कैसी काँपती आवाज थी कि सोनल के भी रोएँ सिहर उठे। यह क्या हो गया!

उसने धीरे-से प्रणयकांत का हाथ अपने हाथ में लिया, 'देखो प्रणय! तुम मुझे समझने की कोशिश करो। पता नहीं मेरे किस व्यवहार से तुम्हें ऐसे सोचने का संकेत मिला। तुम एक अच्छे लड़के हो। तुम्हारे ज्ञान, तुम्हारी मेधा की मैं कद्र करती हूँ। यहाँ के शिक्षक भी तुम्हारा सम्मान करते हैं। लेकिन यह ठीक नहीं है, अपने आपको सँभालो... और मुझे भी इस तरह के तनाव से मुक्त करो।'

सोनल का हॉस्टल आ गया था। वह चुपचाप चली गयी। प्रणयकांत के अंदर एक विचित्र किस्म का भाव था। एक ओर तो वह अपना सबकुछ कह लेने के बाद को तनाव से मुक्त पा रहे थे, तो दूसरी ओर सोनल उनके कारण किसी तनाव में आ रही थी, इससे उनका दिल भारी होता जा रहा था। लेकिन उन सबसे अलग तो उस छुअन की अनुभूति थी जो सोनल के उनका हाथ पकड़ने से हुई थी, हालाँकि, सोनल का हाथ पकड़ने के समय उनका हाथ पसीजने लगा था, वह बिल्कुल ठंडा था, लेकिन अभी उन हथेलियों में एक अजीब किस्म की गुदगुदी थी। प्रणयकांत की इच्छा तेज आवाज में कोई गाना गाने की हो रही थी या फफक कर रोने की। लेकिन अपने कमरे में बिस्तर पर सोते हुए उनके प्रिय कवि शमशेर की टूटी हुई, बिखरी हुई की पंक्तियाँ उनके होठों पर थीं।

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है। वह दुकान मैंने खोली है , जहाँ प्वाइजन का लेबल लिए हुए दवाइयाँ हँसती हैं। उसके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है। ... अगर मुझे किसी से ईर्ष्या होती तो मैं दूसरा जन्म बार बार हर घंटे लेता जाता। पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ तुम्हारी बरकत!

हरेक उत्पीड़क अस्मिता किसी उत्पीड़ित अस्मिता की जनक होती है

प्रणयकांत ने नये सिरे से खुद को देखना शुरू किया। वे क्या करने यहाँ आए थे, और क्या कर रहे थे, उन्हें अपना भविष्य बनाना था। जीवन को देखने-समझने और अनुभव लेने के नाम पर उन्होंने अपने कई महत्वपूर्ण वर्ष जाया किए थे। परंतु अब कुछ वर्ष उन्हें अपने जीवन को जीने लायक बनाने में लगाना था। चलो अच्छा हुआ, सोनल ने साफ-साफ कह दिया। प्रणयकांत उसकी साफगोई और रवैये से, थोड़ा आहत जरूर महसूस कर रहे थे, लेकिन उन्हें पता था कि नियति ऐसे ही अपना संकेत भेजा करती है, इधर उन्होंने पोओलो कोएलो की 'अलकेमिस्ट' पढ़ी थी, जिसमें मनुष्य को अपनी नियति पहचानने के लिए विश्वात्मा द्वारा भेजे गए संकेतों की भरमार थी। आवश्यकता उन संकेतों को समझने और उसके अनुसार अपना हौसला बनाकर गंतव्य तक पहुँचने की होती है। उनका गंतव्य सोनल नहीं थी, इसका संकेत उन्हें मिल गया था।

वे अब अपना ज्यादा समय लाइब्रेरी में बिताने लगे। नियमित बैठकर पढ़ने की उनकी आदत छूट चुकी थी, लेकिन वे जबर्दस्ती वहाँ बैठे रहते। वे कंप्यूटर लैब भी जाने लगे थे तथा गाहे-ब-गाहे उसके की-बोर्ड से छेड़छाड़ कर उससे दोस्ती बढ़ाने का प्रयास करते। कक्षाएँ उन्होंने नियमित करनी शुरू कर दीं। और अपने शिक्षकों से विभिन्न अकादेमिक मसलों पर देर तक बात करने की आदत डाली। लोग उनमें आए बदलाव को लक्ष्य कर रहे थे, अब वो गाना गाते, अंत्याक्षरी खेलते या खंभे पर निशाना साधते नहीं दिखते थे। लेकिन ये सारे प्रयास बाहरी थे। लाइब्रेरी में वे पचासों किताब उलट-पुलट जाते, और शायद ही एक चैप्टर भी पढ़ पाते। कंप्यूटर के सामने थोड़े ही देर में उनके सिर में दर्द होने लगता। कक्षाओं में अकसर अपने अध्यापकों या सहपाठियों से बक-बक हो जाती। कैंटीन में वे किसी भी मुद्दे पर कभी-कभी आक्रामक रवैया अख्तियार कर लेते और लगता है जैसे किसी भी बहस को उन्होंने अपना जाती मामला मान लिया हो। चाय पीते तो एक के बाद एक पाँच कप पी जाते। सिगरेट एक से दूसरी जला लेते। उन्होंने अपने सहपाठियों से हँसी-मजाक तक बंद कर दिया था। अकसर हँसते मुस्कुराते और हमेशा नयी बात कहने को उत्सुक प्रणयकांत को जिन लोगों ने पहले देखा था, वे एक अच्छे-भले आदमी के इस करुण बारूदी अंत पर गमगीन थे। हुड़ी बाबा का बैकग्राउंड म्युजिक समाप्त हो चुका था, अब उनके पीछे शूं-शूं... का शोर था, और थोड़ी कल्पनाशीलता का सहारा लें तो, वे हमेशा आग की लपटों के बीच से निकलते दिखाई देते, वह आग जो वे स्वयं लगाते थे।

गम और अफसोस सोनल को भी था। प्रणयकांत के बदलते रुख पर उसने भी अपने आपको अन्य सहपाठियों में व्यस्त करने की कोशिश की। वह पहले भी सबसे हँसते-मुस्कराते मिलती थी। सबसे राय-मशविरा करती थी, अब यह और ज्यादा हो गया। लेकिन मात्र छत्तीस लड़कों की संख्या वाले विश्वविद्यालय में प्रणयकांत से हमेशा 36 की स्थिति बनाए रख पाना मुश्किल था। प्रतिदिन दोनों का एक से अधिक बार आमना-सामना हो जाता था। दोनों अपने भरसक प्रयास से सहज दिखने की कोशिश करते। किसी किताब, किसी लेक्चर या किसी मुद्दे पर प्रणयकांत से वह जानबूझकर चर्चा करने की कोशिश करती। ऐसे अवसर पर प्रणयकांत किसी टेप की तरह चालू हो जाते, और उस स्थिति में जितना वे बता पाते, उसे सिर्फ वही समझते थे। उन्हें देखकर ऐसा लगता जैसे अँधेरे में किसी सुर्ख कोयले, या सुलगते सिगरेट की तरह वे धीमे-धीमे जल रहे हें, सुलग रहे हैं। सोनल को कभी-कभी उनकी ऐसी स्थिति के लिए अफसोस होता और कहीं-न-कहीं उसे अपनी जिम्मेवारी लगती। इसके अलावा इस विश्वविद्यालय में अन्य लड़कों की अपेक्षा प्रणयकांत में उसे अपने स्तर की समझदारी लगती जिससे वह अपनी बौद्धिक जरूरतों को पूरा कर सकती थी। बाकी लोगों से मेल-जोल, राय-मशविरा, हाल-चाल तक तो ठीक था। लेकिन उसके आगे कोई भी बात देर तक कर पाना संभव नहीं था। फिर अहिंसा अध्ययन की पढ़ाई भी ऐसी नहीं थी कि उसे देर तक कमरे में समय दिया जा सके। वह लगातार सोचने-समझने की आदी लड़की थी। शुरुआती दिनों में प्रणयकांत ने उसकी इस आदत को और हवा दी थी। अब उसे भी कुछ खाली-खाली, खोया-खोया सा लग रहा था। खासकर उसकी सहेली स्वाति, जो उससे चार साल छोटी थी, प्रणयकांत को भैया कहती थी और उनसे प्रभावित थी। वह तो इस स्थिति के लिए सीधे सोनल को जिम्मेदार मानती थी। एक स्वाति ही थी, जिससे बातचीत करते समय प्रणयकांत थोड़े सहज होते। वे उसके साथ कभी-कभी बाजार भी चले जाते। स्वाति उनसे जब सोनल के बारे में कई सवाल करती तो प्रणयकांत लाचार हो उठते। वे स्वाति से झगड़ नहीं सकते थे, उसे डाँट नहीं सकते थे, और सोनल के बारे में वे जो कुछ सोच रहे थे, जो कहना चाहते थे, उन्हें लगता था कि स्वाति इसे समझ नहीं पाएगी।

प्रणयकांत विचित्र स्थिति में थे। वे अपने आपको बदलना चाह रहे थे, और बदलने की कोशिश में नष्ट हो रहे थे। उन्हें अहसास था कि यह सब गलत हो रहा है, लेकिन कुछ भी अपने वश में नहीं लगता। उन्हें लगता, जैसे उनके अंदर कोई और है, जो उनसे यह सब करवा रहा है। वे खुद को वैज्ञानिक चेतना का आदमी समझते थे। कार्य कारण की कसौटी पर उन्हें पूरा विश्वास था। फ्रायड को उन्होंने पढ़ रखा था, तो क्या, यह सब मात्र इसलिए हो रहा है, कि उन्होंने बढ़ती उम्र में सेक्स की भावना को दबाया हुआ है। लेकिन उनके कई हमउम्र सहपाठी उनके साथ थे। इसमें से किसी की शादी नहीं हुई थी या अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी के पास कोई अन्य साधन भी नहीं थे, फिर अकेले उनके साथ ही ऐसा क्यों हो रहा था? उन्होंने अपने भीतर झाँककर ईमानदारी से सोनल के बारे में पूछा, आखिर वे सोनल से क्या चाहते हैं? सेक्स? शारीरिक संबंध? हर बार उनको उनके दिल से एक हूक-सी उठती थी। नहीं-नहीं, हरगिज नहीं। वह सिर्फ सोनल के साथ रहना चाहते थे, उससे बातें करना चाहते थे। लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं तो और वे कुछ सोच नहीं पाते थे। यहाँ तक कि सोनल को भी उनसे यह पूछना पड़ा कि आखिर वे उससे चाहते क्या हैं, तो लाख कोशिश के बावजूद वे पता नहीं से आगे नहीं बढ़ पाये।

दरअसल प्रणयकांत इन दिनों अप्रत्याशित हरकत कर रहे थे। एक दिन विश्वविद्यालय से छात्रावास लौटते हुए भरे बाजार में बस को रुकवाकर उन्होंने जोर से पूछा, किसी को भी यदि उनके साथ सिनेमा चलना हो तो वे उसका पूरा खर्च वहन करेंगे। चिलचिलाती धूप, तीन बजे का समय और प्रणयकांत के साथ सिनेमा! कोई तैयार नहीं हुआ। प्रणयकांत अकेले ही बस से उतरकर सिनेमा चले गए। वे सिनेमा क्यों आए थे, इसका उन्हें ठीक-ठीक पता नहीं था। बालकनी में जाने के बजाय उन्होंने नीचे का टिकट कटाया और यूँ ही फिल्म देखने लगे। इंटरवल होते-होते वे बुरी तरह थक चुके थे। अचानक उन्हें अहसास हुआ जैसे ऊपर बालकानी से उन्हें कोई आवाज दे रहा था। चौंककर उन्होंने ऊपर देखा, वहाँ पर स्वाति के साथ सोनल खड़ी थी। वे अवाक् रह गए। गेट कीपर को 20 रुपए देकर वे लगभग दौड़ते हुए बालकनी में पहुँचे। 'यहाँ कैसे?' वे केवल इतना ही पूछ पाए, 'अरे भाई, फिल्म देखने आए हैं,' कहती हुई सोनल खिलखिला पड़ी। स्वाति भी मुस्करा रही थी, 'और तुम वहाँ नीचे की टिकट लेकर क्यों बैठे थे? जब से आयी हूँ, तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ। चलो बैठो।' प्रणयकांत किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह बैठ गए। कब इंटरवल समाप्त हुआ, कब फिल्म शुरू हुई, कब खत्म हो गयी, प्रणयकांत को इसका कोई होश नहीं था। होश सोनल को भी नहीं था। वह प्रणयकांत से बार-बार पूछ रही थी कि आज क्या हो गया है तुम्हें, मुझसे क्या चाहिए? और प्रणयकांत लाख प्रयास के बावजूद सिर्फ 'पता नहीं' कह पा रहे थे। प्रणयकांत ने सोनल का हाथ थाम रखा था। उनकी आवाज बिंध गयी थी। वो लगभग हिचकियाँ ले रहे थे। सोनली को भी विचित्र किस्म की अनुभूति हो रही थी। धीरे से उसने प्रणयकांत के बालों में उँगलियाँ डाल दीं, 'ठीक हो जाएगा बाबू। ऐसा क्यों करते हो? देखो, क्या मैं समझती नहीं? क्या मुझे यह सब ठीक लग रहा है? क्या मेरी इच्छा तुमसे बातचीत की नहीं होती?' प्रणयकांत चुप थे, अवाक् थे। वे लगभग रो रहे थे। अचानक सिनेमा हाल की बत्तियाँ जल उठीं, पहले पर्दे का जादू समाप्त होते ही हॉल का भी जादू समाप्त हो गया था। प्रणयकांत यथार्थ में थे। वे सोनल से आँखें नहीं मिला पा रहे थे। सोनी भी लगभग जबरन मुस्कुराते कुछ बोली, 'चलो फिल्म खत्म हो गयी है। प्रणयकांत, लेकिन तुम इतने इंसेक्योर क्यों हो आखिर?'

अब प्रणयकांत इंसेक्योर नहीं थे। सोनल के हाथों से उन्हें एक गजब आश्वस्ति मिल रही थी। अपने बालों को उन्होंने धीरे-से सहलाया, वहाँ अभी-भी सोनल की उँगलियों का स्पर्श था। एक लाजवाब नशे में प्रणयकांत अपने हॉस्टल पहुँचे। काफी देर तक सोचने के बाद भी उन्हें इस सवाल का कोई माकूल जवाब नहीं मिल पाया कि बिल क्लिंटन-मोनिका लेविंस्की वाले युग में, जहाँ विभिन्न सूचना माध्यमों द्वारा विभिन्न चैनलों और इंटरनेट की विभिन्न साइटों पर सेक्स के आनंद का विश्वव्यापी और सर्वव्यापी शोर हो, जिस युग में सुंदर होना सेक्सी होने का पर्याय हो और दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान का सबसे बड़ा हिस्सा सेक्स को सही बताने में खर्च हो रहा हो, वहां सिर्फ हाथों की पकड़ और बालों में उँगलियों की फिसलन से प्रणयकांत को इतना नशा क्यों होता जा रहा है। बचपन में प्रणयकांत ने अपनी दादी से जादूगरनी की कहानी सुनी थी, जिसमें वह एक बच्चे को मारकर रख लेती थी, और फिर रात में उसे जादू के जोर से जिला कर उसके साथ खेलती थी। सोनल जादूगरनी है क्या? और प्रणयकांत बच्चा? कतई नहीं...।

'तुम बच्चे हो बिल्कुल, देख नहीं रहे हो, विश्वविद्यालय में आजकल क्या हो रहा है?' सोनल ने जब यह कहा तो प्रणयकांत को अपने आसपास की चीजों में गजब का परिवर्तन दिखाई पड़ा। विश्वविद्यालय के कुलपति सरकार और मंत्रालय को कोसते-कोसते विश्वविद्यालय से कोसों दूर चले गए थे। उनके रिटायर होने के बाद भी विश्वविद्यालय का प्रबंधन कोसों दूर यानी दिल्ली से चल रहा था। वर्धा दिल्ली के लिए रिमोट एरिया था। इसलिए विश्वविद्यालय जैसे रिमोट कंट्रोल से चलाया जा रहा था। दिल्ली में विश्वविद्यालय के तीन-सत्ता केंद्र बन गए थे, और उस संयुक्त सत्ता में किसी एक के भी खिसकने से समूचा विश्वविद्यालय भरभराकर गिर सकता था। वर्धा में यदि पानी पीने के लिए फंड की जरूरत होती तो उसके लिए तीन फाइलें दिल्ली दौड़तीं और इसी भागमभाग में उनके साबुत बचने की कोई गारंटी नहीं होती।

विश्वविद्यालय का बी.ए. पास उपवित्ताधिकारी इस सत्ता केंद्र का सबसे प्रमुख स्तंभ था और उसे विश्वविद्यालय में पुस्तकालय के लिए किताब, कुर्सी, मेज, छात्रावास के लिए एक्वागार्ड और वाटर कूलर, विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए जेरॉक्स मशीन की खरीद संबंधी बिलों को पास करना निहायत नागवार गुजर रहा था। कुलपति की अनुपस्थिति में उसने ई.सी. मेंबरों के खास गुट को अपनी दुरभिसंधि में शामिल कर लिया था, और उसकी मार्फत विश्वविद्यालय की अकादमिक समिति से यह सवाल पुछवाया जा रहा था कि छात्रों के लिए आखिर इतने महँगे शिक्षकों और इतनी ज्यादा किताबों की जरूरत क्यों है। निर्वतमान कुलपति का दाहिना हाथ लकवाग्रस्त हो गया था और वह सत्ता केंद्र का सबसे लाचार अंग था। जहाँ महान और स्व योजनाओं पर पलक झपकते लाखों खर्च हो जाते थे, वहाँ अब रेल-यात्रा का बजट पास होने तक में परेशानी थी। छात्रों के कई गुट हो गए थे और वे भी विभ्रम में कभी इस केंद्र तो कभी उस केंद्र के प्रभाव में थे। प्रणयकांत जिस गुट के माने जाते थे, उसमें से अधिकांश लोग प्रणयकांत को सख्त नापसंद करते थे और उनके सबसे धुर विरोधी गुट के लोग प्रणयकांत को इतना आदर देने लगते थे कि खुद उन्हें अपमान जैसा महसूस होने लगता।

शिक्षक, जिन पर इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों को चलाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी थी, उनसे एकदम गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार किया जाता। चूँकि उनके आत्यंतिक रूप से नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही कुलपति रिटायर हो गए थे, विश्वविद्यालय के एक सर्वाधिक अनुभवी और तेजस्वी शिक्षक को छात्रों को गुमराह करनेवाला, सिगरेट पीनेवाला और राजनीति करनेवाला बताकर, उन्हें विश्वविद्यालय से निकाले जाने की पुरजोर कोशिश हो रही थी। हर महीने उन्हें तनख्वाह ऐसे दी जाती, जैसे विश्वविद्यालय किसी धर्मखाते में अपने तमाम पापों से प्रायश्चितस्वरूप यह रकम खर्च कर रहा हो। ये शिक्षक अपने सोचने-समझने और विचारधारात्मक प्रक्रिया से जानते थे, कि शेयर मार्केट में नंगा नाच करने वाली वित्तीय पूँजी के इस खतरनाक समय में विश्वविद्यालय जैसी अनुत्पादक, नाकारा संस्थाओं में पूँजी निवेश का क्या हश्र होता है, वे अपने निष्कर्षों और दलीलों से समूची तीसरी दुनिया में उच्च शिक्षा के प्रति सत्ता तंत्र के रवैये की चर्चा करते, और बातचीत में आश्वस्त करने से ज्यादा आश्वस्त होने की कोशिश करते कि उनके साथ या इस विश्वविद्यालय के साथ जो कुछ हो रहा है वह अप्रत्याशित नहीं है, बल्कि यह उस घोर पूँजीवादी समय की अनिवार्य परिणति है।

विश्वविद्यालय का छद्म गांधीवादी विशेष कर्तव्य अधिकारी, जो 92 में अयोध्या में कार सेवा कर आया था, इस शिक्षक से अपना पट्टीदारी का झगड़ा मानता था और उसको किसी कदर नीचा दिखाने की फिराक में था। इस अधिकारी ने अपने जैसे सोचने-समझने वाले दो-चार लड़कों की एक टीम तैयार कर ली थी, ये लड़के ब्रह्मचर्य के कड़े नियमों पर चलने वाले, किताब को पाठ मानकर ब्रह्ममुहूर्त में जोर-जोर से उसका उच्चरण करनेवाले और लड़कियों को चरित्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानकर उनसे पचास कदम दूर रहने वाले थे। विशेष कर्तव्य अधिकारी की नजर में ये लड़के विशेष थे और वे इन्हीं विशेष साँचों में सबको ढाल देना चाहते थे। चूँकि प्रणयकांत इस तरह के किसी साँचे में फिट ही नहीं हो सकते थे और वे अपने विचारों में उक्त शिक्षक से इत्तेफाक रखते थे, इसलिए वे भी विश्वविद्यालय की इस वर्तमान अवधारणा के लिए खतरनाक थे।

विश्वविद्यालय की मूल अवधारणाओं के सवाल के साथ जब सोनल के कहने पर छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रणयकांत विशेष कर्तव्य अधिकारी से मिले तो वह एकदम से अपना कलेजा निकाल लेने को तत्पर हो गए जैसे सिवा छात्रों के कल्याण के उनके दिल में कुछ दूसरा नहीं। फिर आवाज को थोड़ी दयनीय बनाकर बोले, 'बेटा, मैं कल यहाँ के जिला कलेक्टर चोक्कलिंगम के दफ्तर में गया था। उन्होंने शिकायत भी की थी कि आपके विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएँ आपस में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलते हैं। बेटा, मैं तो शर्म से पानी-पानी हो उठा। इस विश्वविद्यालय की छवि के लिए यह कितना शर्मनाक है, जरा तुम लोग खुद ही सोचकर देखना। वो तो कार्रवाई तक करने की बात कर रहे थे...।'

प्रणयकांत का दिमाग भन्ना गया। एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का विशेष कर्तव्य अधिकारी और इतनी घटिया सोच। वर्धा क्या सचमुच भारत का ही अंग है या कहीं काशी - जो शिव के त्रिशूल पर टिका है - की तरह गांधी की लाठी पर तो नहीं टिका है। एक कलेक्टर हाथ पकड़कर घूमने पर कार्रवाई की धमकी दे रहा था।

अच्छा हुआ प्रणयकांत बच्चे ही थे, और अपने आस-पास की चीजों को नहीं देख रहे थे। उनकी स्थिति देख पाने की थी भी नहीं क्योंकि इन दिनों वे हमेशा खुद को देखा जाता हुआ महसूस कर रहे थे, उन्हें हर वक्त अपनी पीठ पर सोनल की आँखें चिपकी महसूस होती थीं, वे हमेशा क्लोज सर्किट टीवी के अदृश्य कैमरे की जद में थे जहाँ मॉनीटर पर सोनल बैठी थी। भारतीय इतिहास के 70 वें दशक के क्रांतिकारी आवाँगर्द की आत्मा उनके अंदर घुस आयी थी, जो अपने मूल्यों, आदर्शों से समझौता नहीं कर सकता था, जो अपने सिद्धांतों के लिए कुछ भी छोड़ सकता था। हालाँकि सोनल उन्हें ऐसा करने को नहीं कहती थी, लेकिन उन्होंने खुद को प्रस्तुत ही इस तरीके से किया था कि वे सब अपने किए से मुकर नहीं सकते थे। खुद उन्हें महसूस होता था कि वे सोनल की नजर में हीरो हैं। और हीरो किसी तरह तिकड़म भिड़ाकर, तलवे चाटकर, नाक रगड़कर, पैर छूकर कहीं फिट हो जाने वाला चित्र नहीं होता, बल्कि उसे कुछ न कुछ छोड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

कुछ भी कहो सोनू , महाभारत का मूल भाव तो अनृशंस ही है।

सोनल प्रणयकांत के साथ अपने संबंधों में बहुत ऊपर और बहुत नीचे आती-जाती रह रही थी। प्रणयकांत अपनी हर बात उसे बताते थे। जमशेदपुर, बनारस, दिल्ली और यहाँ भी हर वो बात जो अब तक उन्होंने महसूस की थी। वे सोनल को मित्र की हैसियत से पत्र भी लिखते थे, जिसका जवाब उन्हें मौखिक मिल जाता था। कभी-कभी सोनल उन्हें कक्षाओं में कागज की पर्चियाँ लिखा करती जिसमें कभी उनके किसी स्टाइल या कपड़ों की प्रशंसा होती, तो कभी उनकी किसी बात पर नाराजगी और ज्यादातर उसके अपने व्यवहार पर सॉरी फीलिंग। कागज की पर्चियों पर उन ज्यादातर बेनाम और चालू शब्दों ने प्रणयकांत और सोनल के बीच एक ऐसी प्राणवान और जीवंत दुनिया बना दी थी, जो विश्वविद्यालय और समूचे परिदृश्य की दुनिया से बिल्कुल अलग, अलहदा और उनकी निजी थी। दोनों कहीं भी रहें उनके आसपास खुद ही यह दुनिया बन आती। इस दुनिया में दोनों के सपने थे, दोनों की इच्छाएँ थीं, दोनों की पसंद थी। इन सपनों, इच्छाओं और पसंद को शब्द हालाँकि प्रणयकांत ही देते थे लेकिन उन शब्दों के चयन में सोनल की भी सहमति होती थी। प्रणयकांत को तो वह दुनिया इतनी असल लगती थी कि वे उनकी दीवारों को ठोक बजाकर उसका रंग तजवीज कर सकत थे। वे इस दुनिया में पूर्णतः प्रसन्न और आश्वस्त थे। लेकिन इधर कुछ दिनों से उन्हें महसूस हो रहा था, जैसे सोनल इस दुनिया में आकर भी कभी-कभी घबरायी, आतंकित और परेशान रहती थी। बाहर की ठोस और वास्तविक दुनिया में ऐसा जरूर कुछ उसके साथ हो रहा था, जिसकी गूँज इस दुनिया में भी उसे एकदम साफ सुनाई पड़ रही थी। यह जरूर कोई बड़ा धमाका या शोर था, जिससे इस नयी बनी हुई कोमल और खूबसूरत दुनिया के परखच्चे उड़ जाने वाले थे।

'जानते हो प्रणय! मैं कई दिनों से तुम्हें बताना चाह रही थी लेकिन पता नहीं तुम कैसा रिएक्ट करो... मेरी अब सगाई होने वाली है...' थोड़ा अटक और रुककर जब सोनल ने यह कहा तो प्रणयकांत की जैसे साँस अटक गयी और धड़कन रुक गयी।

हालाँकि सोनल ने कभी प्रणयकांत से नहीं कहा था कि वह उनसे प्यार करती है, लेकिन मात्र नहीं कहने से क्या होता है। यह दुनिया तो दोनों की सहमति से बनी थी, जिसमें प्रणयकांत की बोलती गर्म साँसें थीं, उनका चिर उच्छ्वास था, उनकी बेचैनी, उनकी तड़प थी, उसमें किसी तीसरे का प्रवेश निषिद्ध था, यहाँ तो कोई तीसरा मय गाजे-बाजे बारात के साथ दाखिल हो रहा था। 'कौन...? किससे हो रही है...? तुम्हारी शादी की बातचीत चल रही थी, तुमने कभी बताया नहीं।'

'बातचीत नहीं चल रही थी। दरअसल यह लड़का मेरे साथ दिल्ली में कोचिंग करता था। वहीं, जहाँ मैं आई.ए.एस. की तैयारी करती थी। उसने एक-दो बार मुझे प्रपोज भी किया था लेकिन मैंने मना कर दिया था। दरअसल शादी वगैरह के मामले में मैंने कभी सोचा ही नहीं था। मैंने कहा था उससे कि मैं अपने माँ-बाप की मर्जी से ही शादी करूँगी।'

'तो? अब क्या हो गया?'

'अब वह आई.ए.एस. हो गया है। इस बार उसका चयन अंतिम रूप से भारतीय सूचना सेवा के लिए हो गया है। कोचिंग सेंटर से उसने मेरे घर का पता लिया और वहाँ बाबूजी से बात कर आया और तुम तो जानते हो आई.ए.एस. को नकारना किसी भी मध्य वित्त परिवार के लिए कितना मुश्किल होता है।'

'फिर?' प्रणयकांत जैसे धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया में लौट रहे थे।

'फिर क्या बाबूजी-मम्मी के लगातार फोन आ रहे हैं। लड़का उन्हें एकदम पसंद है। बैठे-बिठाए उन्हें आई.ए.एस. दामाद मिल रहा है। वे जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहते हैं।'

'और तुम तुम क्या सोचती हो?'

'मेरे सोचने से क्या होता है? सबका चाहा कहाँ हो पाता है? मैं तो खुद आई.ए.एस. होना चाहती थी, कहाँ हो पायी। मैं किसी और के स्टेटस की छाया नहीं बनी रहना चाहती थी, अपने पैरों पर खड़ी होकर अपने जीवन के बारे में खुद निर्णय करना चाहती थी। लेकिन सब सोचने या चाहने से...' दोनों लाइब्रेरी के बाहर बेंच पर बैठे थे। शाम का झुटपुटा था। हवा में हल्की ठंडक थी। प्रणयकांत की साँसें डूब रही थीं।

'तो तुम... चली जाओगी... हमेशा के लिए... क्यों?'

जवाब में सोनल फूट-फूट कर रोने लगी। उसे किसी आने-जाने वाले की परवाह न थी। हालाँकि वहाँ कोई आ-जा नहीं रहा था, लेकिन सोनल को इस तरह रोते-देखकर प्रणयकांत के होश उड़ गए। सोनल उन्हें एक यथार्थवादी, मजबूत और ठोस लड़की लगती थी, लेकिन उसे इस तरह रोते देखना उन्हें अचंभे में डाल रहा था। एक तरह उन्हें खुशी भी हो रही थी। एक विजय का अहसास भी था, कि आखिर सोनल उन्हीं के लिए रो रही थी।

एक लड़की, जिसका दीवाना एक आई.ए.एस. था, और उससे शादी करने के लिए, उसके पिता की चिरौरी कर रहा था, वह इस घोर जघन्य समय में प्रणयकांत के लिए सार्वजनिक स्थान पर फूट-फूटकर रो रही थी। उस प्रणयकांत के लिए जिनकी वास्तविक कीमत इस बाजार में सौ ग्राम अदरक या पाव भर जीरे से ज्यादा की नहीं थी।

काफी देर तक सोनल रोती रही। प्रणयकांत उसे चुप कराने के प्रयास में खुद भी रुआँसे हो उठे थे। फिर वह उठ खड़ी हुई, 'चलो मुझे होस्टल छोड़ दो। परसों मुझे दिल्ली जाना होगा!'

प्रणयकांत ने सुना, 'मुझे इस दुनिया से बाहर जाने दो। मैं हमेशा-हमेशा के लिए उसे छोड़कर जाना चाहती हूँ।'

एक लंबी साँस छोड़कर वे उठ खड़े हुए। घड़ी में उन्होंने समय देखा। लेकिन जिस समय को वे देखना चाह रहे थे, वह घड़ी में नहीं आ सकता था। उस समय में तमाम कोचिंग सेंटरों में रट्टा मारकर सफल हुए प्रत्याशी हजारों प्रणयकांत को एक साथ लतियाते हुए तमाम सोनलों का हाथ थामे उसके माँ-बाप से चिरंजीवी रहो, सदा खुश रहो का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे थे। सारे पुण्य श्लोक उनके लिए थे, सारी वैदिक गाथाएँ, सारे मंगलगान उन्हीं लायकों के लिए थे। वे सफल थे, वे तमाम खूबसूरत, अच्छी लड़कियों के माँ-बाप के सिर पर चढ़कर उन्हें आदेश दे सकते थे कि वे अपनी लड़कियों को उनसे प्रेम के लिए मजबूर करें। घड़ी के चौखटे से बाहर के इस समय में प्रणयकांत के हिस्से में पुराने हिंदी सिनेमा के मुकेश और मो. रफी के गाए गीत थे, जिसे उन्हें अपनी अकेली सर्द और कठिन रातों में खटारा टू-इन-वन पर सुनना था, या जिंदगी के लंबे, उबाऊ रास्तों में तन्मयता से गुनगुनाना।

सोनल को दिल्ली जाना था। वहाँ भारतीय सूचना सेवा का सफल रंगरूट अपने माँ-बाप के साथ उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। वहाँ उसके माँ-बाप को सोनल को पसंद करने की रस्म निबाहनी थी। सोनल नहीं चाहती थी, लेकिन प्रणयकांत उसे छोड़ने स्टेशन तक आए। ऑटो में बैठते ही दोनों की दुनिया फिर बस गयी थी, लेकिन वहाँ बीच में सोनल ने अपना बैग रख रखा था। लगभग धृष्टता करते हुए प्रणयकांत ने सोनल का हाथ पकड़ रखा था और जब जी.टी. एक्सप्रेस में सोनल सवार हुई तब भी प्रणयकांत को अपनी बनायी दुनिया पर यकीन था और ट्रेन छूटते-छूटते उन्होंने कहा कि वे जब भी अपनी दुनिया से सोनल को आवाज देंगे, वह उसके दिल तक पहुँचेगी और वह रोएगी जरूर। उन्होंने लक्ष्य किया कि यह सुनते ही सोनल रोने लगी थी। रो तो प्रणयकांत भी रहे थे। लौटते हुए उनकी आँखों में, देर तक हिलता हुआ सोनल का हाथ अटक गया था। सोनल का रूमाल उनके पास ही रह गया था और प्रणयकांत को महसूस हो रहा था कि उसके भार से वह दो कदम भी नहीं चल पा रहे हैं। कितनी छोटी चीजें और कितनी छोटी बातें, इतने मजबूत आदमियों को रुला देती हैं। सोनल आएगी नहीं क्या फिर?

तीन दिनों बाद सोनल वापस आ गयी। ये तीन दिन प्रणयकांत के लिए तीन सदियों जितने लंबे थे। हालाँकि इन तीन दिनों में विश्वविद्यालय में बेहद गति से चीजें बदली थीं। बदलते हालात में सत्ता केंद्र का सबसे कमजोर स्तंभ विश्वविद्यालय का अकादमिक अधिकारी अब विश्वविद्यालय में अकादमिक मामलों की घनघोर उपेक्षा में त्रस्त होने लगा था। नये कुलपति की नियुक्ति की चर्चा जोरों पर थीं। उपवित्ताधिकारी विश्वविद्यालय से जुड़े तमाम मामलों पर अपने क्लर्की पेंच चला रहा था। ऐसे में अकादमिक अधिकारी को भविष्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए छात्रों के समर्थन की आवश्यकता थी। दिल्ली से वर्धा आकर उसने यहाँ छात्रसंघ बनाने की अधिसूचना जारी कर दी।

छात्रसंघ बनने की सुगबुगाहट से पहले तो नैतिकवादी गांधीवादियों में इसके विरोध को लेकर जबर्दस्त खलबली मची। अपने परंपरा, ज्ञान और विचारधारा से वे सर्वसम्मति, अथवा सर्वानुमति में यकीन रखने वाले थे। चुनाव का मामला उन्हें गंदी राजनीति का पर्याय लगता था, लेकिन प्रणयकांत और उनके साथियों की समझ कह रही थी कि इस तरह का संघ भविष्य में छात्रों की माँग और उनकी स्थिति की बेहतरी के इस्तेमाल का एक सार्थक मंच हो सकता है। अभी चाहे यह जिसकी जरूरत बनाया जा रहा हो लेकिन भविष्य में इसकी जबर्दस्त जरूरत छात्रों के लिए होनी थी।

प्रणयकांत विरोध करने वाले छात्रों को छात्रसंघ की उपयोगिता-महत्ता बताने की कोशिश करते रहे और उनमें से अधिकांश छात्र यह समझते रहे कि प्रणयकांत अपने को उनसे बड़ा साबित करने के लिए छात्रसंघ का अध्यक्ष बनना चाह रहे थे। प्रणयकांत राजनीति में यकीन रखनेवाले व्यक्ति थे, छात्रसंघ चुनाव में वे खड़ा होना जरूर चाह रहे थे, लेकिन उनके प्रयासों से दिखता था, जैसे वे अपने लिए छात्रसंघ का निर्माण करवा कर, अपनी श्रेष्ठता को वैध और कानूनी बताना चाहते थे।

खैर, चुनाव की तिथियाँ घोषित हो जाने पर वे ऐसा खतरा कतई मोल नहीं ले सकते थे कि प्रणयकांत का उनकी अदा, उनके घमंड और मनमानियों को खुलकर खेलने का मौका मिले। प्रणयकांत के विरुद्ध उन्होंने बहुत सोच-समझकर दिन-रात पढ़ने-लिखने में प्रवृत्त एक लड़के को मैदान में उदार दिया। उस लड़के के मुकाबले में आने से प्रणयकांत चिंतित थे, क्योंकि यह अपने आग्रहों को गांधीजी के आर.एस.एस. की मूल अवधारणा के काफी निकट पाता था। और शहर के अपने मिजाज के कारण विश्वविद्यालय एक बड़े हिस्से में, जिसमें यहाँ के स्थानीय लोग भी शामिल थे, उसके मिजाज के अनुकूल पड़ते थे।

ऐसी स्थिति में भी प्रणयकांत अपना ज्यादा समय सोनल के साथ ही बिताते, जो खुद को उस आई.ए.एस. अधिकारी के माँ-बाप से पसंद करवा आयी थी और अकेली नहीं आयी थी। उसके साथ था एक प्यारा-सा छोटा खूबसूरत स्लिम यंत्र नोकिया का 3310 मोबाइल हैंड सेट, जिसे उस नव-सूचना अधिकारी ने अपनी और उसकी सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए गिफ्ट किया था।

इस छोटे से खूबसूरत स्लिम यंत्र की ताकत से लगभग अनजान और अनभिज्ञ प्रणयकांत सोनल को फिर से अपनी यूनियन में खींच लेने की जद्दोजहद में थे। चूँकि वह दुनिया सोनल की भी थी। इसलिए कभी-कभार सोनल को भी उसमें जाने से कोई गुरेज न था। खासकर, उसे अहसास था कि उसके कारण ही इसका अंत होता है। इसलिए भी वह इस दुनिया को लेकर थोड़ी मायूस थी। प्रणयकांत ने हिसाब लगाकर देख लिया था, छात्रसंघ चुनाव उनके ही बरक्स लड़ा जा रहा था, इसलिए उनके जीतने की संभावना थोड़ी कम थी। उनके मुकाबले सोनल का पब्लिक रिलेशन कहीं ज्यादा बढ़िया था। वह उन तमाम लड़कों से ज्यादा सहज थी, जिन्हें प्रणयकांत अपनी हेठी और अकड़ में अपने बराबर का नहीं समझते थे। सोनल व्यवहारकुशल और खुशमिजाज लड़की थी, जिसका फायदा चुनाव में उसे मिल सकता था। प्रणयकांत ने जब उसके सामने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा, तो पहले तो वह थोड़ी हिचकिचायी, लेकिन अपने व्यक्तित्व को स्वतंत्रतापूर्वक साबित करने का उसके पास यह इकलौता मौका था, इसलिए फिर वह मान गयी। इधर प्रणयकांत के लिए यह त्याग का एक और सुनहरा मौका था, जिसमें सोनल की जीत की स्थिति में, उनका कद सोनल की नजरों में और बढ़ जाना था।

हालाँकि प्रणयकांत ने इसे राजनीतिक जरूरतों के तौर पर ही प्रस्तुत किया, लेकिन विश्वविद्यालय के तमाम छात्रों, कर्मचारियों, सोनल और यहाँ तक कि प्रणयकांत को भी लगता था, जैसे यह प्रेम में उत्तम स्तर का त्याग है। चुनाव जैसे अब भी प्रणयकांत ही लड़ रहे थे। चुनाव की तिथि के नजदीक आते-आते प्रणयकांत को अहसास होता गया कि कोई करिश्मा ही सोनल को जितवा सकता है। प्रणयकांत का नाम सोनल के साथ कुछ इस कदर चिपक-सा गया था कि उसकी स्वतंत्र छवि पर वोट मिलने की गुंजाइश एकदम खत्म हो गयी।

प्रणयकांत अपने चुनिंदा साथियों के साथ बदहवास थे। जिस तरह छात्रसंघ निर्माण में उन्होंने दिलचस्पी ली थी, और इतनी मेहनत, तिकड़म और प्रयास से अपना कद बनाया था, उसे सोनल के चुनाव हारते ही नष्ट हो जाना था। विश्वविद्यालय में नीचे गिर जाने के साथ-साथ उन्हें सोनल की नजरों में भी गिर जाने का भय था, क्योंकि देर-सबेर उसे अहसास हो ही जाना था कि वह उनकी गिरती छवि के कारण ही हारी।

बदहवास प्रणयकांत एक-एक वोट के लिए चिरौरी कर रहे थे। उनका इस तरह चिरौरी करना उनकी छवि के विपरीत था। यह वे अपनी जरूरतों से कर रहे थे, लेकिन सोनल को महसूस हो रहा था, जैसे वे मात्र और मात्र उसके लिए ही इतना कुछ कर रहे हैं। उनके प्रयासों से सोनल अनजाने ही उनकी और उनकी दुनिया में घुलती जा रही थी। इतनी ज्यादा कि अकसर प्रणयकांत की ओर देखते हुए उसकी आँखें भर आतीं। उन आँखों से लगता जैसे कह रही हो - मैं जीतूँ न जीतूँ प्रणय, तुम जीत गए हो। मैं तुम्हें वैसे भी भुला नहीं पाऊँगी।

अंततः सोनल चुनाव जीत गयी, मात्र एक वोट से। सचिव पद पर प्रणयकांत ने जिस प्रत्याशी का समर्थन किया था वह अपनी जमानत भी नहीं बचा पाया। उसे पैनल के अपने लोगों तक ने वोट नहीं दिया था। उसकी इस करारी हार से प्रणयकांत को अपनी वास्तविक स्थिति का अहसास हुआ। प्रणयकांत के एकदम नजदीकी लोगों ने भी सोनल को उसके अपने व्यवहार के लिए वोट दिया था। यदि उसकी जगह प्रणयकांत खड़े होते, तो नतीजा सचिव पद के जैसा ही हो सकता था।

लेकिन सोनल के जीत जाने से प्रणयकांत ने जैसे जग जीत लिया हो। सोनल प्रणयकांत के प्रति कृतज्ञ थी। यदि भविष्य में कभी उसे किसी बड़े सार्वजनिक दायित्व को निभाना पड़े तो वह प्रणयकांत के योगदान को कभी भूल नहीं सकती। और ऐसे ही एक दिन जब अपनी दुनिया में प्रणयकांत ने सोनल का हाथ पकड़ कर कहा, 'तुम मुझे छोड़कर चली जाओगी, सोनू। पता नहीं, मुझे ऐसी लड़की को लेकर इतना रोना क्यों आता है... जो मुझे प्यार तक नहीं करती...।'

तो सोनल एकदम बिफर पड़ी, 'क्या मतलब है, तुम्हारा... ? प्यार नहीं करती हूँ, नहीं करती हूँ तुमसे प्यार... मैं यहाँ भूत के लिए रो रही हूँ...' सोनल हिचकियाँ लेने लगी। उसका समूचा चेहरा आँसुओं से भीग गया। जैसे कि हिमखंड पिघल रहा है, जैसे जाड़े की सुबह में ओस से भीगी पृथ्वी हो। हिम्मत करके प्रणयकांत ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में भर लिया। एक स्निग्ध कोमलता, कातरता, अपराध और इतना अपनापन था कि प्रणयकांत के होठ उसके माथे से छू गए। वहाँ जैसे पहाड़ी से किसी झरने के गिरने की आवाज थी। दूर किसी चिड़िया का अपने घोसले में लौटना था, किसी भँवरे का किसी कमल में बंद हो जाना था। डूबते सूरज की-सी लालिमा और शाम के धुँधले धूप-छाँव में जैसे बिल्कुल अनजानी और अनहोनी-सी घटनाएँ घटित हो गयीं। वे शब्द जैसे प्रणयकांत ने पहली बार किसी ईश्वरीय आदेश की तरह सुने थे। उनके होठों ने जब सोनल के माथे को चूमा था, वह जैसे समूची सृष्टि में पहली बार इतनी पवित्र घटना के रूप में घटित हुई। एक अनजाने भय, सिहरन और अनुराग से वे उसकी आँखों में झाँकते रहे। यह लड़की सचमुच मुझसे प्यार नहीं करती है... उन्होंने कहा।

वे कुछ और कहते या सोनल कुछ और कहती इसके पहले ही पास रखा हुआ मोबाइल बज उठा। वही छोटा-सा, प्यारा-सा स्लिम यंत्र। उसकी आवाज यूँ तो बहुत प्यारी संगीत-सी धुन थी। लेकिन उस वक्त प्रणयकांत को एक धमाके का शोर सुनाई दिया। उस आवाज से सारा जादू, सारा ध्यान, सारी दुनिया जैसे टूटकर बिखर गयी। सोनल भी जैसे हड़बड़ाकर नींद से जागी। मोबाइल उठाकर वह प्रणयकांत से कुछ दूर चली गयी। हालाँकि वह कुछ ही कदम दूर गयी थी, लेकिन प्रणयकांत उससे अपने आपको कोसों दूर महसूस कर रहे थे।

कोसों दूर से सोनल की आवाज जैसे इन तक आ रही थी, 'हाँ, ठीक बाबा। बढ़िया है सब...। हाँ... हाँ... क्यों नहीं? हाँ, करती हूँ न... मिस.. तुमको.. हँ, मैं भी बहुत याद करती हूँ...।'

एक-एक शब्द प्रणयकांत के दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था और वे नगाड़े की तरह घुमड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद सोनल उनके पास आ गयी थी।

'क्या सोच रहे हो?' उसकी आवाज में गजब का सन्नाटा था।

'कुछ नहीं। चला जाए।' प्रणयकांत लगभग तटस्थ होते हुए बोले।

'पूछोगे नहीं किसका फोन था?'

'नहीं। जरूरत नहीं।'

'नहीं। जरूरत है। यह संदीप का फोन था। उसी संदीप का, जिससे मेरी शादी हो रही है। तुम्हें हकीकत समझने का प्रयास करना ही चाहिए।'

सोनल की आवाज में अजीब-सा ठंडापन था। प्रणयकांत ने गौर से उस करामाती यंत्र मोबाइल को देखा। सचमुच अजेय, आक्रामक, चमत्कारी और विध्वंसक है यह यंत्र। मात्र पाँच मिनट में इसने उनकी दुनिया को क्या से क्या बना दिया था। सोनल सिर झुकाए उस खिलौने जैसे लगने वाले यंत्र से खेल रही थी। प्रणयकांत को किसी फिल्म में देखा हुआ दृश्य याद आ रहा था कि कैसे एक खूबसूरत-सी दिखने वाली बार्बी डॉल, अचानक सन्नाटे में खूनी गुड़िया में बदल जाती थी। मोबाइल को गौर से देखते हुए प्रणयकांत सिहर उठे। मन-ही-मन उन्होंने भारतीय सूचना सेवा के उस नये रंगरूट के दिमाग की दाद दी, 'वाह वाह। ऐसे ही तो आप लोगों को खतरनाक नहीं माना जाता है। गिफ्ट भी दिया तो वह भी हथकड़ी।'

उसके बाद उस छोटे से विध्वंसक यंत्र ने प्रणयकांत को कई बार जबर्दस्त पटखनियाँ दीं। कहीं भी, कभी भी, वह अचानक से बज उठता था, प्रणयकांत कहीं सोनल के साथ चाय पी रहे हों, कहीं टहल रहे हों, कहीं खाना खा रहे हों। जो कुछ भी ऐसे समय में वे अपने प्रयास से सृजित करते, उसकी एक आवाज उनका सबकुछ तोड़-फोड़ डालती। प्रणयकांत सोनल के हाथ में मोबाइल देखते ही सिहर उठते। जब भी वह बजता उनके दिल की धड़कन तेज हो जाती। चाहे किसी का फोन हो, उन्हें लगता जैसे संदीप का ही फोन है। सोनल भी कभी-कभी उनके साथ चलती हुई डर जाती, 'कहाँ से बोलूँगी, हॉस्टल से।'

'लेकिन वहाँ तो सड़क का शोर है।'

'अरे बाबा फोन करने आयी थी, घर।'

सोनल को झूठ बोलते देख प्रणयकांत का मन और खट्टा और उदास हो जाता। कई बार मोबाइल बजता देख, सोनल उसे बजता छोड़ जल्दी होस्टल लौटने की जल्दी मचाने लगती। थोड़ी देर बाद वह बजना बंद हो जाता, और वह हॉस्टल पहुँचकर राहत की साँस लेती।

प्रणयकांत कभी-कभी रात को उसके नंबर पर ट्राई करते, वहाँ से एंगेज टोन आने पर उनके दिल में एक हँसी उठती थी, वे आजि,जी खीझ और क्रोध में घंटों कोशिश करते और एक गुबार, एक हताशा भरी साँस के साथ वापस लौटते, 'सोनल इतनी देर तक उससे बातें करती है।'

प्रणयकांत सोनल के सांख्यिकी पहचान में बदल जाने से परेशान थे। वह अब सोनल स्वर्णरेखा जैसी कोई जीती-जागती शख्सियत से ज्यादा 9812556768 हो गयी थी। इन्हीं अंकों के सहारे उस तक पहुँचा जा सकता था। यह अंक इतना जादुई था कि उसके आगे प्रणयकांत को अपने लिखे सारे शब्दों पर अविश्वास होने लगा। उन्होंने फिर से उन्हीं कागजों, उन्हीं पर्चियों का सहारा लेने की कोशिश की। लेकिन उन्हें एकदम महसूस होता जैसे ये शब्द उन अंकों से टकराकर घायल फड़फड़ाते पंछी की तरह तड़पने लगते। विश्वविद्यालय में और एक-दो लोगों के पास यह यंत्र था। सोनल अकसर उन लोगों से आइडिया, एयरटेल, बीपीएल, रिलायंस जैसे कंपनियों पर चर्चा करने लगती थी। वह टॉक टाइम ओर इन कंपनियों की नई स्कीम पर चर्चा करते बिल्कुल तन्मय हो जाती।

प्रणयकांत ऐसे मौकों पर बिल्कुल खामोश होते। इन्हीं मौकों पर क्यों, वे अब अधिकांश समय खामोश रहने लगे थे। अपनी बनायी दुनिया की दीवारों से लगातार टकराते, किसी घायल पंछी की तरह वे दिन-रात तड़फड़ाते रहते। सोनल से वे कुछ कह नहीं सकते थे, क्योंकि उसने कुछ छुपाया नहीं था। उस दुनिया से बाहर वे आ नहीं सकते थे, क्योंकि इससे निकलने का रास्ता उन्हें पता नहीं था।

सोनल उनकी तड़प, उनकी कसक को समझती थी, जिस दुनिया की दीवारों से टकराकर प्रणयकांत लहूलुहान हो रहे थे, उस दीवार में कहीं-न-कहीं उसका भी साझा था। इसलिए कसक उसके अंदर भी उठती थी। एक छटपटाहट उसके अंदर भी कहीं-न-कहीं थी। लेकिन कभी-कभी रोने की और सिसककर कहने की कि मेरे बाद तुम शादी कर लेना, उसके पास कोई रास्ता नहीं था। उसके ऐसा कहने से प्रणयकांत को और पीड़ा होती। उस समय सोनल उन्हें एकदम साधारण लड़की लगने लगती जिसके साथ उन्होंने तीसरे दर्जे का रोमांस किया हो। वे उसे ऐसा कहने या सोचने से मना करते। लेकिन कुछ और कहने-सोचने को प्रेरित भी नहीं कर पाते।

वे शिद्दत से महसूस करना चाह रहे थे कि सोनल से मिलते वक्त भी उन्हें छूटने के रोमांच ने घेर रखा था। तमाम उपन्यासों, प्रेम-कहानियों और कविताओं की तरह का ही उनका यह जीवन भी रहा। कभी-कभी उन्हें विवाह संस्था की अनिवार्यता पर भी संदेह होता, और उन तमाम फिल्मों के दृश्यों को याद कर वे रोमांचित हो उठते, जिसमें विवाह के बाद भी इस तरह की कोई फीलिंग जीवित रह जाती।

सोनल भी कई तरह के निष्कर्षों में एक साथ जी रही थी। प्रणयकांत से उसका संबंध ऐसा कुछ न चाहते हुए बन गया था। कितना रोका था उसने अपने आपको और प्रणयकांत को भी। क्या अब उसके निर्णय में वाकई कोई चूक हो रही थी? क्या सचमुच उसने किसी मूल्य की जगह सुविधाओं और आरामदायक जिंदगी को तवज्जो दी? क्या प्रणयकांत की स्थिति हमेशा विजेता की तरह ही रहेगी, जबकि जीत तो वह रही थी। देखा जाए तो उसकी शादी उसकी मर्जी से ही हो रही थी। कहने को इसे भी प्रेम-विवाह ही कहा जाएगा लेकिन अपने अंदर उसे अपनी मर्जी में वह ताकत, उस स्वतंत्रता, उस जोश का अहसास नहीं हो पाता था। वहाँ प्रणयकांत की वह खामोश उपस्थिति भारी पड़ जाती थी। वह प्रणयकांत की उपस्थिति की कद्र करती थी। आखिर इस शख्स ने उसे रुला दिया था, और वह भी उन कारणों पर जिसे वह निहायत घटिया और तुच्छ समझती थी। वह प्रणयकांत के लिए रोती थी, लेकिन इस बात पर तय थी कि उसे कमजोर या मजबूर लड़की न माना जाए, जो किसी ख्वाब या लालच के आगे हार गयी। वह एक बिल्कुल नये अनुभव और महसूसने के लिए प्रणयकांत की कृतज्ञ थी। लेकिन इसके लिए वह जिंदगी के शानदार, महत्वपूर्ण और चमकदार मौकों को गँवाना नहीं चाहती थी। लेकिन कुछ था जो उसे प्रणयकांत को सौंपना था। लेकिन क्या उसे यह समझ न थी। लगभग इन्हीं दिनों उसने प्रणयकांत से कहा, 'यदि मैं यहाँ नहीं आती और तुमसे नहीं मिलती तो जिंदगी भर इस गुमान में रहती कि मैंने प्रेम विवाह किया है... अपनी पसंद और मर्जी से। अब... अब शायद ऐसा पूरे विश्वास से न कह पाऊँ।'

प्रणयकांत ने देखा, लड़की लगातार अपने नाखून चबाती जा रही थी। वे उसे ऐसा करने से बरजना चाहते थे कि उसने फिर कहा, 'लेकिन इससे तुम यह मत समझ लेना कि कोई जबर्दस्ती मुझे इसमें ढकेल रहा है। मैं तो डरती हूँ बाबा कि कहीं तुम मुझ पर तरस न खाने लग जाओ। संदीप को मैं जानती हूँ। बहुत अच्छा लड़का है। मैं खुश रहूँगी उसके साथ। तुम मिलोगे उससे? यह शादी भी मेरी अपनी च्वाइस ही है।'

प्रणयकांत ने कोई उत्तर नहीं दिया। इसका कोई उत्तर हो भी नहीं सकता था। वे खुद भी सोनल को मजबूर या दया का पात्र नहीं देखना चाहते थे, लेकिन वैसा कहने का कोई मतलब नहीं बनता था। प्रणयकांत महसूस कर रहे थे कि उनके विश्वविद्यालय और उनके समय के अधिकांश प्रश्न अनुत्तरित थे। कई अर्थों में वे प्रश्न थे भी नहीं।

नये कुलपति की नियुक्ति हो गयी थी। उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य बीस वर्षों तक विदेशों में हिंदी की वर्णमाला पढ़ायी थी। साधारण अंग्रेजी और कामचलाऊ हिंदी बोलने वाला यह विदेश पलट शख्स अगले पाँच वर्षों तक, हिंदी के जादुई और कल्पनातीत विस्तार के लिए बनाए गए इस विश्वविद्यालय का नियंता था।

हिंदी के तमाम मठाधीशों ने इतनी सुनहरी मछली को फाँसने के लिए बंसी डाल भी थी। इसमें सबसे मजबूत और लंबी उस धाकड़ गोटीबाज साहित्यकार की थी, जिसके साहित्य का सारा स्रोत उसके साथ रहनेवाले लोटे में था। उसने अपनी दस पॉकेट संस्थाओं से प्रेस विज्ञप्ति जारी करवायी थी कि संयोग से ही ऐसे अवतारी विद्वान पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, जो हिंदी के न होते हुए भी इसके विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं।

विश्वविद्यालय का विशेष कर्तव्य अधिकारी, और अधिक विशेषाधिकारों से युक्त था, और वह इसका उपयोग कर, स्थानीय लेक्चररों को तमाम गुट का विश्वस्तरीय विषय पढ़ाने के लिए आमंत्रित प्रोफेसर के तौर पर बुलाने लगा। देरिदा, फूको, बाथ, इन सबसे अनभिज्ञ ये तमाम लोग जोर-जोर से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की दुहाई दे रहे थे। इसी ने एक कमेटी बना दी थी कि एक हिंदी विश्वविद्यालय में इतनी अंग्रेजी पुस्तकों की खरीद, किसके लाभ के लिए खरीदी गयी थीं।

फ्रैंकफुर्त स्कूल की परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से लगा हुआ अहिंसा एवं शांति अध्ययन के संयोजक मनोजकुमार, जिन्होंने इसका डिजाइन तैयार करने में अपने खून-पसीने से मेहनत की थी, किसी सिफारिश से आया हुआ चिह्नित किए जाने लगे। इस रवैये से आहत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

छात्र अपने भविष्य को लेकर आशंकित थे, प्रतिदिन छात्रावास में उनकी बैठकें हो रही थीं, उनके कोर्स की मान्यता तक का सवाल संदिग्ध था। सोनल छात्रसंघ की अध्यक्ष थी लेकिन उसके अपने सवालों के जवाब देने के दिन भी नजदीक आ रहे थे। उसकी शादी की तारीख तय हो गयी थी। प्रणयकांत अब भी उसके साथ रहने की कोशिश करते। वह कभी-कभी और ज्यादा अपराधबोध में आ जाती। कभी-कभी अनावश्यक रूप से माफी माँगने लगती। उसको ऐसा करते देख प्रणयकांत को और बुरा लगता।

उसे जल्दी ही घर जाना था। दो दिन पहले वह अपने सौंदर्य प्रसाधनों की खरीदारी कर रही थी। प्रणयकांत बुत बने हुए उसके पास खड़े थे। बिंदी, चूड़ी, क्रीम, लोशन्स, काजल, लिपस्टिक, नेलपालिश, सब एक-एक कर वह छाँटती जा रही थी। इसमें से ऐसा कुछ नहीं था, जिसका इस्तेमाल उसे प्रणयकांत के लिए करना था। प्रणयकांत को लग रहा था, जैसे समूची पृथ्वी, समूची प्रकृति में ऐसा कुछ नहीं था जिसका उपयोग उनके लिए होना था। एक हारे हुए अनाड़ी जुआरी की-सी उनकी साँस निकली, जिसे अपने कमजोर पत्तों का पहले से इल्म हो, लेकिन सिर्फ अपनी जिद और दम में वह सारी चालें चलता रहा हो। सोनल के भी दिल में एक कचोट थी, यह देखकर कि इस हारे हुए को उसके मजबूत पत्तों का पता पहले से था।

आखिरकार छात्रों के धैर्य का बाँध टूट चुका था। अपनी जायज माँगों, जिनमें पानी, भोजन जैसी बुनियादी माँगें भी शामिल थीं, को लेकर कई दौर की बातचीत के बाद भी जब कोई नतीजा नहीं दिखा, तो छात्र हड़ताल पर उतर आए। अपनी बात को मनवाने और इस बात को जनता तक ले जाने के लिए छात्रों ने जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष अनशन का मार्ग चुना। पाँच ऐसे छात्र, जो विश्वविद्यालय की अवधारणा को किसी भी कीमत पर बचाना चाह रहे थे प्राण जाने तक अनशन करने को प्रस्तुत थे। विश्वविद्यालय में बवाल की आशंका को देखते हुए तमाम अधिकारी छुट्टी पर चले गए।

जिस दिन सोनल को जाना था उसी दिन से अनशन की घोषणा थी। सोनल सभी लड़कों की सफलता की कामना करते हुए अपना सफल जीवन जीने जा रही थी। स्टेशन पर प्रणयकांत और स्वाति उसे छोड़ने आए थे। आना तो सभी चाहते थे, लेकिन उन्हें हड़ताल की तैयारियाँ करनी थीं।

स्वाति अचानक प्लेटफॉर्म पर प्रणयकांत से लिपटकर फफक पड़ी, 'प्रणय दा! यह क्या हो गया?' सोनल और प्रणयकांत दोनों हैरत और खामोशी से उसे रोते देखते रहे।

'चुप हो जाओ, पगली। क्या हो गया तुझे। ठीक तो हूँ मैं।'

गाड़ी आ गयी थी। सोनल का सारा सामान चढ़ा चुकने के बाद प्रणयकांत ट्रेन से नीचे उतर गये। खिड़की से उन्होंने कहना चाहा, 'ठीक से रहना।' सोनल ने तभी ठीक उसी समय दूसरा वाक्य कहना चाहा। दोनों की आवाजें टकरा गयीं, दोनों की आँखें मिलीं और दोनों मुस्कुरा दिये।

प्रणयकांत जल्दी-जल्दी स्वाति के साथ प्लेटफॉर्म से बाहर आ गये। वहाँ धरना स्थल पर उनके साथी उनका इंतजार कर रहे थे। चलते समय उन्होंने प्लेटफॉर्म पर बोर्ड में लिखे स्टेशन के नाम को पढ़ा और रास्ते में चलते हुए सोचा यदि सोनल आज से दस-पंद्रह वर्षों बाद अपने पति के साथ इस स्टेशन से रात की किसी ट्रेन में गुजरे और अचानक उसकी नींद खुल जाए तो फिर तुरंत ही यह सोचकर सो जाएगी कि यहाँ चाय तो क्या पानी की भी उम्मीद नहीं की जा सकती। इतना उजाड़ भी स्टेशन होता है?

'क्यों स्वाति?'

स्वाति ने पूछा, 'क्या कहा प्रणय दा?' प्रणयकांत इस बात पर तय थे कि वह जो कहना चाहेंगे, उसे स्वाति समझ ही नहीं पाएगी।


End Text   End Text    End Text