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कहानी

राजू भाई डॉट कॉम
राकेश मिश्र


यदि यह सारा समय एक मैदान था, तो मान लीजिए कि राजू भाई एक फुटबॉल थे, जिसे हर कोई अपने हिसाब से ठोकरें मारकर 'गोल' करने की जुगत में था। मजे की बात तो यह है कि इसमें से कोई खिलाड़ी कहीं सशरीर दिखता नहीं था ओर जो सशरीर राजू भाई के इर्द-गिर्द उपस्थित थे, वे कहीं से भी खिलाड़ी नहीं लगते थे। वैसे मैदान में अदृश्य ठोकरों से उछलती गेंद पर एकाध किक लगा देने का लोभ यदि वे संवरण नहीं कर पाएँ, तो भी उन्हें इस विचित्र खेल से अलग रखा जाए, इसके समर्थन में कई महत्वपूर्ण दलीलें हैं।

इन दलीलों में सर्वाधिक मौजूँ दलील तो यह है कि राजू भाई की जिंदगी का खुद एक गोल था और भाई! यदि इस समय के मैदान में आपको किसी निश्चित गोल में जाना है तो आपकी जिंदगी गोल मतलब फुटबॉल सरीखी होगी ही!

अब इसे विडंबना कहिए या संयोग, अपने शुरुआती दिनों राजू भाई खुद फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे और अपने विश्वविद्यालय की टीम से जब अपने बाइचुंग भूटिया सरीखे बलिष्ठ पैरों में फुटबॉल को नचाते हुए बिजली की तेजी से प्रतिपक्षी टीम पर टूटते थे तो दर्शकों में, जिनमें निःसंदेह लड़कियों की भी एक बड़ी संख्या होती थी, के सीनों पर बिजलियाँ गिर जाती थीं।

वैसे असल बिजली तो राजू भाई के हाथों में थी। हाथों में, मतलब उँगलियों में। ये उँगलियाँ जब उनके पाठ्यक्रम यानी फाइन आर्ट्स की पढ़ाई के दौरान कैनवास पर चलती थीं, तो न जाने उसकी चमक से कितने दृश्य बनते-बिगड़ते थे। पेड़, नदी, पहाड़, औरत, बच्चे, घर, मकान, कब्रिस्तान, क्या कुछ नहीं बनाया, राजू भाई ने कैनवास पर। खुद जैसे जादू भाई के मूड का आईना था। रंगों की भाषा पढ़ने वाले उस खास दिन, राजू भाई किस रंग का इस्तेमाल सबसे ज्यादा कर रहे हैं। इससें उनके मूड को भी पढ़ लेते थे। वैसे पीला उनके मूड का स्थायी रंग था।

मिलने-जुलने वाले यकीन नहीं कर सकते थे कि जीवन और उसकी रागात्मकता को इतने शायराना अंदाज में फैज और गालिब की छौंक के साथ परोसनेवाले राजू भाई खुद इतना उबला और बेस्वाद-सा कुछ खाते होंगे। उनको नजदीक से मानने वाले जरूर जानते थे इस राज को, लेकिन यह उबला ओर बेस्वाद जो राजू भाई के लिए था, वह उन सबों के लिए जबर्दस्त स्वाद पैदा करता, क्योंकि जब उनकी बिजली भरी उँगलियाँ उनकी ब्लैक एंड व्हाइट शामों में दिल को मुट्ठियों में भींचने की-सी पीड़ा से गिटार पर नाचतीं और उसी तड़प से जब कोई नज्म कोई गजल या कोई गीत उनके गले से निकलता तो सुनने वालों की शाम रंगीन हो उठती। अवसाद को गहरा बनाने के लिए किसी-किसी शाम को राजू भाई ग्रीन लेबल का भी सेवन करते जिससे संगी-साथियों का दिल भी ग्रीन-गार्डन हो उठता।

वैसे राजू भाई से उनकी ऐसी स्थिति पर अलग से कोई कुछ कहता नहीं था।, लेकिन अल्कोहलिक उत्तेजना, गजलों, नज्मों में आवाज की गहराई, कंपन और पीले, धूसर रंगों के निरंतर इस्तेमाल से जो दुख का कॉकटेल बनता था, उसके असर से लोग इस असर में थे कि कहीं कोई दुख है जरूर, जो राजू भाई को गहरे मथता है। इसका कोई तात्कालिक कारण नहीं था, इसलिए कोई तात्कालिक निदान भी नहीं। थोड़ा व्याकरण का सहारा लें तो दुख राजू भाई का स्थायी भाव था, और उनके सारे काम कर्म संचारी। जिस तरह दुनिया में करोड़ों आदमी बिना किसी ठोस और मुकम्मल कारणों के निरंतर सुखी और प्रसन्न रहते हैं, वैसे ही राजू भाई भी इन्हीं आधारों पर दुखी थे।

लेकिन ऐसे ही दुखी कब तक रहा जा सकता? यदि दुख है संसार में तो उसका कारण भी होगा। तकरीबन ढाई हजार वर्ष पूर्व तथागत के इस उद्धरण को समूची दुनिया नहीं काट पायी तो राजू भाई क्या चीज थे? अपने भीतर जहाँ तक वे जा सकते थे, गये, अपने को जितना मथ सकते थे, मथा और अंततः मक्खन की तरह का जो निष्कर्ष निकला वह भले ही तर्कों की ऊष्मा से पिघल जाए लेकिन यह था तो ठोस ही। उस ठोस को भाववाचक संज्ञा में लिखें तो 'उपेक्षा'। किससे उपेक्षा, भाई?

राजू भाई के पिता अच्छे सरकारी अधिकारी थे। खाने-पीने रहने-सहने से लेकर पहनने-ओढ़ने तक का जो अंदाज था उनका उसमें कहीं से भी उनके उपेक्षित होने की झलक नहीं मिलती थी। फिलहाल भी उनके खेल, उनकी कला, और उनकी आदतों का जो फैन क्लब था वह भी उनके ठोस कारण को कोई ठोस धरातल दिलवा पाने में अक्षम था। लेकिन राजू भाई अपने निष्कर्ष पर एकदम अडिग रहे। अपने ठोस निष्कर्ष के पीछे उनकी एक ठोस दलील थी कि घर में वे छोटे भाई थे और पारिवारिक लोकतंत्र को अकसर उनके बड़े भाई-बहन तानाशाही में बदल लेते थे। वे लोग जिन कपड़ों को पसंद करते थे, राजू भाई को वही पहनना पड़ता था, वे जिन मिठाइयों की जिद करते राजू भाई को वही खाना होता, वे जिन ब्रांड्स की जिद करते राजू भाई को घर में वही देखकर खुश होना पड़ता। राजू भाई इस अलोकतांत्रिक रवैये के खिलाफ जिब डैडी जाँच आयोग से शिकायत करते तो उन सबों के कई दल हो जाते और एक-दूसरे की बातों को काटते हुए भी एक ही एजेंडे पर इस तरह तैनात हो जाते कि उनकी समस्या कोई समस्या ही नहीं लगती। और हर बार उन सबों को क्लीन चिट मिल जाने से राजू भाई के अंदर के रंग बदरंग होते गये, जिसका नतीजा पेटिंग में एब्सट्रक्ट के उनके प्रयोगों में पीले, धूसर मटमैले, भूरे या ऐसे ही किन्हीं रंगों में देखा जा सकता था, उनका गुस्सा फुटबॉल के मैदान में देखा जा सकता था, जब एक ही शॉट में गेंद आधा मैदान पार कर लेती।

'तो तुम्हारे उदास दिखने का यही कारण है?' एक निहायत शर्मीली और भोली-सी दिखने वाली लड़की ने इस तरह पूछा जैसे यदि राजू भाई ने हाँ कहा तो वह खिलखिला पड़ेगी। उसके इस तरह खिलखिला पड़ने की आशंका से ही राजू भाई थोड़े विचलित हो गये और सायास लहजे को बदलते हुए होठों को थोड़ा तिरछा करके कहा, 'पता नहीं।' उनके 'पता नहीं' कहने मात्र से वह लड़की शरमा गयी और रूठ जाने का अभिनय-सा करने लगी। दरअसल यह 'पता नहीं' शब्द लड़की का तकिया कलाम था, जिसे वह वक्त-बे-वक्त, तुम्हारा नाम क्या है से लेकर आज मौसम कैसा है तक के जवाब में दुहराया-तिहराया करती। वैसे यह उसकी आदत थी या अदा इसका जवाब वह ज्यादा तर्कसंगत दे सकती थी - पता नहीं।

यह 'पता नहीं' लड़की जिसका नाम अनीता त्रिपाठी और पता नयी दिल्ली का था, राजू भाई को कब अपने दुख के निदान के रूप में नजर आने लगी, खुद उनको भी पता नहीं चला। वैसे राजू भाई को विकल्पों की कमी नहीं थी। बोल्ड एंड ब्यूटीफुल की तमाम समाजशास्त्रीय परिभाषाओं को भी मात करने वाली कई लड़कियों के वे टॉम क्रूज थे, लेकिन बहुमत के साजिशाना रवैये ने जो उनका रुझान अल्पमत की ओर बनाया था, शायद उसी के प्रभाव के कारण वे इस अल्पचर्चित लड़की पर रीझ गये। उनके इस बहुप्रतीक्षित फैसले की भनक भी उनके सप्ताहांत के सहयात्रियों को तब लगी जब उन्होंने एक शाम वाकई ग्रीन लेबल पी और दिल को निचोड़ने वाली किसी नज्म या गजल की जगह जावेद अख्तर का लिखा और नुसरत फतेह अली का नया - 'आपसे मिलके हम कुछ बदल-से गये' - वाला गीत पूरे तरन्नुम में गाया और विशेष आग्रह पर गुलजार का लिखा नग्मा 'एक ही ख्वाब कई बार देखा है मैंने/कि तुमने साड़ी में उड़स ली हैं घर की चाबियाँ/और चली आयी हो बस मेरा हाथ पकड़ के' पूरी भाव-प्रवणता और अद्भुत चित्रात्मकता के साथ सुनाया तो सुनने वालों की निगाह राजू भाई की हाल की बनायी पेंटिंग्स पर गयी। चटक लाल और नीले, हरे और गुलाबी रंगों की बहुतायत ने सारा भेद खोल दिया और उन्होंने आश्वस्ति की साँस ली, चलो देर से ही सही सिद्धार्थ 'बुद्ध' तो हुए।

'राजू, अब तुम क्या करोगे?' यह सवाल अचानक जब अनीता ने पूछा तो राजू भाई अचानक असहज हो उठे। हालाँकि उनके दिमाग में 'पता नहीं' वाला जवाब आया लेकिन वह जानते थे यह सवाल इस जवाब के लिए नहीं पूछा गया था। फाइनल इयर्स के पेपर खत्म हो चुके थे और उनके तमाम यार-दोस्त, संगी साथी आपस में यह सवाल करते हुए कुछ-न-कुछ कर रहे थे। कोई किसी एजेंसी के लिए अप्लाई कर रहा था तो कोई मुंबई जाकर सेट डिजाइनिंग में संघर्ष के मनसूबे बाँध रहा था। अपने सीनियर्स के पते, अपने नाते रिश्तेदारों के कांटेक्ट्स तलाशे जा रहे थे। पोर्टफोलियो बनवाने की आपाधापी थी। कैंपेन तैयार किये जा रहे थे। हर कोई बेहद डरा हुआ, आतंकित और आशंकित था। लेकिन अपने अंदर के किसी अँधेरे कोने में पड़े आत्म-विश्वास को इस तरह उन्होंने खींचकर बाहर निकाल लिया था कि उन्हें खुद भी हैरानी होती कि ऐसी चीज उनके पास भी थी? कभी भयानक आतंकित होते कि जैसे वह आत्म-विश्वास ही है न? लेकिन इन सबके बावजूद वे काफी व्यस्त थे। उनमें तेज इच्छा होती कि अभी वे तेज आवाज में रातभर गाएँ या शाम को शराब पिएँ, घाट पर घूमें, नाव पर गंगा में देर तक भटकें, या उस पार जाकर रेत पर पिकनिक मनाएँ, घरौंदे बनाएँ या और भी वो सबकुछ करें जो राजू भाई उन दिनों कर रहे थे। लेकिन उनमें ऐसा कर पाने की न तो हिम्मत थी और न उत्साह।

उत्साह से लबरेज तो राजू भाई भी नहीं थे। हालाँकि वे वही कर रहे थे जो चाह रहे थे या जैसा उन्होंने अब तक किया था। धारा में बहने से ज्यादा धारा को मोड़ लेने का जुमला उनके सीने में पैबस्त था। राजू भाई आजकल अपने मिलने-जुलने वालों से एब्सट्रक्ट के नये प्रयोगों के बारे में बात करते थे। प्रेम जोसुआ के 'मुद्रा' अल्बम पर अपनी आलोचनात्मक राय जाहिर करते हुए या कोई ताजा पढ़ी नज्म की खूबसूरती पर सामने वाले की राय जानना चाहते। सामने वाला जल्द ही उनके रवैये से घबरा जाता और इधर-उधर की बात करते हुए कट लेने की कोशिश करता। राजू भाई ज्यादा से ज्यादा समय अनीता के साथ बिताने की कोशिश करते लेकिन पिछले कुछ दिनों से उन्हें महसूस हो रहा था कि वह उनके साथ चलने की बजाय घिसट रही है। राजू भाई अपने सबसे रूमानी क्षणों को शिद्दत से रिकॉल करते और फिर स्थितियों को रिवर्स करने की कोशिश करते थे। उन्हें लगता अनीता के दिमाग में फारवर्ड का कोई बटन दब गया।

'अनु, हमारे घर का रंग क्या होगा? गुलाबी कैसा रहेगा?'

'लेकिन घर होगा कहाँ? दिल्ली में बना सकते हैं?'

'अनु, मुझे लगता है कभी-कभी कि जैसे हम तुम किसी छोटे से द्वीप पर रहेंगे जहाँ हमारे तुम्हारे सिवा और कोई न होगा। एक छोटा-सा मगर खूबसूरत-सा घर होगा हमारा। छोटे-छोटे प्यारे से दो बच्चे होंगे हमारे। जिनका नाम ही हम ऐसा रखेंगे जो अपने नाम के कारण ही अलग से पहचाने जाएँगे। और... और...'

'और हम हवा पीएँगे और धूप खाएँगे, क्यों?' अनीता की आवाज में अजिजी स्पष्ट थी।

राजू भाई को लगा जैसे खीर खाते-खाते दाँतों के बीच कंकड़ आ गया हो। बातें ठीक नदी के बीच में हो रही थीं। मल्लाह की असावधानी या यूँ ही करवट बदलने से नाव एक तेज हिचकोला ले बैठी और अनीता को एक झटका-सा लगा लेकिन राजू भाई ने महसूस किया कि उनका हाथ निस्पंद पड़ा रहा गया। कोई और क्षण होता तो इसी बहाने अनीता को झटके से खींचकर सीने से लगा लेते और कानों में शरारत से कहते, 'अरे अभी गिर जाती तो मेरा क्या होता?' और अनीता हल्के से मुस्कुराकर कहती, 'पता नहीं।' और उस क्षण लगता राजू भाई को कि वे दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति हैं। लेकिन एब्सट्रक्ट के नये प्रयोगों से गुजर रहे राजू भाई को एब्सट्रक्ट में कही गयी बात का यथार्थ इतना कड़वा लगा कि उन्होंने बस झुककर गंगा के पानी को मुँह में भर लिया। काफी देर तक पानी को मुँह में ही रखे रहे। नाव धीरे-धीरे किनारे की ओर आ रही थी और राजू भाई का मन बीच लहरों में भँवर का चक्कर काट रहा था। किनारे आते-आते उन्होंने मुँह के पानी को एक आवाज के साथ पुनः गंगा को समर्पित किया। कूदकर नाव से उतरे और हाथ का सहारा देकर अनीता को उतारा। अनीता को स्थिति एकदम से नागवार लग रह थी। उसके लिहाज से उसकी प्रतिक्रिया गलत नहीं थी। आखिर जिंदगी के यथार्थ को राजू समझना क्यों नहीं चाह रहा है! रास्ते में चलते हुए उसने राजू का हाथ धीरे-से दबाकर कहा, 'राजू, इसमें नाराज होने की क्या बात है? आखिर तुम अब करना क्या चाहते हो?'

राजू भाई की आवाज भर्रा उठी, 'मैं वह सब एकदम नहीं करना चाहता जो और लोग कर रहे हैं। अनु, मैं कुछ नया करना चाहता हूँ। मैं एब्सट्रक्ट के बारे में सोचता हूँ। मैं रंगों में ऊर्जा, गति और प्रकाश के नये शेड्स के बारे में सोचता हूँ। मैं यह भी सोचता हूँ कि मेरी कला आम व्यक्तियों के पास कैसे पहुँचे! कोई किताब... कोई रिसर्च।' बोलते-बोलते राजू भाई हाँफने-से लग गये। वे वाकई नहीं जानते थे कि वे करना क्या चाह रहे थे। या फिर कई चीजें थीं जिन्हें वे करना चाह रहे थे, लेकिन उसे व्यक्त नहीं कर पा रहे थे। उन्हें लगा कि अनीता को समझना चाहिए कि वे क्या करना चाहते थे, लेकिन पर्याप्त रोशनी न होने के बावजूद उन्हें लगा जैसे अनीता समझ रही हो कि उन्हें कुछ नहीं करना है।

अगले दो-तीन दिन अनीता काफी व्यस्त रही। बस एक बार राजू भाई से मिलने आयी थी। अपना पोर्टफोलियो दिखाने। राजू भाई ने देखा, प्रशंसा की, वह आश्वस्त हुई और अगले दिन राजू भाई के दिल में हूक उठाती हुई छुक-छुक करती रेलगाड़ी उसे लेकर दिल्ली चली गयी। दिल्ली वह पहले भी जाती थी। घर था उसका वहाँ, लेकिन हर बार उसका जाना लौटकर आने के लिए था। जाने क्यों राजू भाई को इस बार लग रहा था। उसका चले जाना, उनको छोड़कर चले जाना है।

कई दिनों तक राजू भाई एब्सट्रक्ट में उलझे रहे, लेकिन उनके सारे रंग तो बेरंग हो चले थे। वे ब्रश उठाकर कैनवास पर चलाते और पाते कि पूरा कैनवास आड़ी-तिरछी रेखाओं से भर गया है। बहुत तेज रोशनी की कोई कल्पना करते और तस्वीर का रंग ऐसा होता, जैसे बादल घिरे हों आकाश में। एक अजब-सी बेचैनी उन्हें घेरे रहती। शराब पीते तो दो-तीन पेग के बाद मितली आने लगती, गिटार बजाते तो द्रुत की जगह विलंबित बज जाता, कोई गजल गाते तो खुद ही उन्हें लगता कि जैसे कवि-सम्मेलन में कविता पढ़ रहे हों। वे कुछ तोड़ना-फोड़ना चाहते थे। खासकर गिटार बजाते हुए तो उसे जमीन पर दे मारने का मन करता था, लेकिन वे ऐसा एकदम से नहीं कर सकते थे यह गिटार अनीता ने ही उन्हें 24 वें जन्मदिन पर दिया था और उसके पीछे लिखा था - 'स्वीट राजू के लिए।' राजू भाई उसे पढ़ते, 'स्वीट' होने की कोशिश करते और बेचैनी के कारण निहायत कर्कश हो जाते। उन्हें क्या चाहिए था, वे ठीक-ठीक बता नहीं पाते, सोच भी नहीं पाते।

थोड़े दिन बाद अनीता की चिट्ठी आयी। चिट्ठी उत्साह और उम्मीदों से लबरेज थी। दिल्ली जाते ही उसे वहाँ पिताजी के सहयोग और भाग-दौड़ से एक बड़ी एडवर्टाइजिंग एजेंसी में विजुअलाइजर की नौकरी मिल गयी थी। पत्र के तीन चौथाई हिससे तक में एजेंसी के उसके अनुभवों का रोमांचक वर्णन था और अंतिम तीन हिस्से में उनके बारे में दो-तीन पंक्तियों की चिंता जाहिर थी कि वे अपने बारे में क्या सोच रहे हैं। न हो तो वे दिल्ली चले आएँ, यहाँ कुछ-न-कुछ हो जाएगा। पत्र पढ़कर राजू भाई चौराहे पर जूता खाया-सा महसूस कर रहे थे। समूचे पत्र में उन्होंने सूँघने की काशिश की, वह जाकर उनके बिना कितनी दुखी है लेकिन समूचे पत्र में खुशी की ऐसी खनक... ओह! उस दिन शाम को उन्होंने खूब शराब पी और साथ बैठे लोगों को मजाज की वह नज्म गाकर सुनायी कि 'ऐ गमे दिल क्या करूँ/ऐ वहशते दिल क्या करूँ।' खासकर वो पंक्तियाँ कि 'जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ/इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ/एक दो का जिक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ।' तो सुनने वालों को लगा जैसे सचमुच राजू भाई के अंदर कुछ नुच रहा है, चिथ रहा है। राजू भाई ने पत्र का जवाब नहीं दिया। इन दिनों वे सुरेंद्र वर्मा का उपन्यास 'मुझे चाँद चाहिए' पढ़ रहे थे। उसके अंदर लगातार नायक हर्ष का कद बड़ा हो रहा था और उसकी नजर में अनीता वर्षा वशिष्ठ के पंख लगाकर चाँद की ओर उड़ रही थी। अपनी नियति उन्हें हर्ष की तरह ही मुंबई में समुद्र के किनारे किसी लावारिस लाश की तरह विष्ठा पर पड़ी दिख रही थी। इस चित्र में हर्ष की जगह खुद को देखने मात्र से उनके रोएँ सिहर उठे और सायास उन्होंने इस समूचे खोल से बाहर आने का निश्चय किया, उनका यह डर तो उस समय और भी गहरा हो गया जब एक पत्र में अनीता ने अपने प्रमोशन की बात लिखते हुए मुंबई जाने की बात कही थी और उन्हें भी वहीं बुला रही थी।

राजू भाई बनारस से निकलना चाहते थे, इस जड़ता को तोड़ने के लिए उन्हें एक गति चाहिए थी, जो अपेक्षाकृत ज्यादा गतिशील शहर में ही मिल सकती थी, लेकिन अभी दिल्ली जाने में उन्हें अपनी हेठी लगती थी। उसके देखते-देखते समय इतनी तेजी से बदला था और लगातार बदल रहा था कि वे सिर्फ दीदे फाड़कर या मुँह बाकर देख भर सकते थे। जिन एब्सट्रक्ट को आत्मा की गहराइयों पर यथार्थ के मिश्रण से नये प्रयोगों की बात वे सोचते थे, वे ऐसे-ऐसे रूपों में बाजार में दिखते थे कि सहसा भरोसा ही नहीं होता। उनसे महज एक साल सीनियर रमेश अक्कड़ जो समूची फैकल्टी में फ्रेस्टू के नाम से विख्यात था, ने अपने फ्रस्ट्रेशन के दिनों और उसकी अनुभूतियों को अभिनय के साथ जोड़कर क्लोरोमिंट का ऐसा ऐड कैंपेन तैयार किया था जो कहीं भी किसी भी फ्रस्ट्रेटेड या हताश व्यक्ति को हताशा के अभिनय करने जैसा बोध करा देता। इस विज्ञापन श्रृंखला में दो बेरोजगार लड़के अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग संदर्भों में हताशा की बात करते हैं और निदान के रूप में क्लोरोमिंट खाते हैं।

'हम लोग इस बेंच पर क्यों बैठे हैं?'

'क्योंकि 1925 ई में नगरपालिका ने यह बेंच यहीं बनायी थी।' पहले का स्वर और कातर हो उठता है - 'ले रहे हो?'

'नहीं, दे रहा हूँ - क्लोरोमिंट।'

राजू भाई को लगता वो भी किसी दिन अपने गिटार के साथ किसी शराब, किसी बीयर के ऐड हो जाएँगे और फैज, गालिब और मजाज की तमाम नज्में किसी विज्ञापन के जिंगल। और एक दिन जब उन्होंने देखा कि एक ब्रेसियर के विज्ञापन में एक उन्मादी और जोश से भरी लड़की यह गिफ्ट देने वाले के कान में अपना अनुभव बताते हुए कह रही है, 'पता नहीं।' उसके पता नहीं कहने का अंदाज इतना जाना-पहचाना था कि राजू भाई के हाथ से ग्लास छूटकर गिर गया।

बाद में पता चला जैसा कि उन्हें अंदेशा हो ही गया था यह विज्ञापन अन्नी जैक्लिन ने बनाया था। अनीता त्रिपाठी अब एक बड़ी मल्टीनेशनल एजेंसी में चीफ विजुअलाइजर थी। विज्ञापन जगत की सारी हस्तियाँ उसकी मौलिक और अनछुए दृश्य योजना से प्रभावित थी। और कई बड़ी योजना एजेंसियाँ उसे अपने यहाँ रखना चाहती थीं।

राजू भाई को याद आ रहा था कि एक बार उन्होंने अनीता से उसके जन्मदिन पर कहा था, 'अनु, जानती हो वॉन गॉग अपनी प्रेमिका के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता था। एक बार उसके जन्मदिन पर उसने उससे पूछा, तुम्हें तोहफे में क्या चाहिए? वह लड़की वॉनगॉग से कतई प्रेम नहीं करती थी, उसकी नजर में वह दीवाना पागल या सनकी जैसा कुछ था। उसने कहा - 'मैं तुम्हारे कान चाहती हूँ।' और जानती हो अनु, उस दिन शाम को पार्टी में वह सचमुच अपना कटा हुआ कान लेकर पहुँच गया। तुम भी बोलो - क्या चाहिए तुम्हें?' तनिक झुँझलाकर कहा था अनीता ने, 'हमको नहीं पता' और दाँतों से कान हल्के से काट खाया था। इस विज्ञापन को देखते हुए भी उनके कानों में हल्का-सा दर्द हुआ, काट खाने जैसा नहीं, पिघले सीसा जैसा। आखिर तुमने माँग ही लिया वॉन गॉग से उनका कान... अन्नी! राजू भाई हल्के से बुदबुदाये थे।

राजू भाई के अंदर कोई निश्चय धीरे-धीरे आकार ले रहा था, और इससे पहले कि इसमें कोई बदलाव आए, राजू भाई ने अपने बाहर ढेर सारे बदलाव किये। एक ठोस निर्णय के साथ उन्होंने बनारस छोड़ा और दिल्ली की राह ली।

दिल्ली में उनसे मिलने वाले राजू भाई को देखकर हैरान थे। ऊपर से नीचे तक बिल्कुल बदले रूप में थे वे। जिंदगी में पैसा कैसे कमाया जाता है और पैसों की कितनी अहमियत होती है जिंदगी में, उनकी बातचीत का मुख्य स्वर होता। शेरो-शायरी का लहजा छूटा नहीं था लेकिन उनके अल्फाज जरूर बदल गये थे। उनके चयन में 'आँख की आखिरी हद तक है बिसाते हस्ती, इस दुनिया में रहना है तो बहुत होशियारी से रहना होगा! से लेकर गमे रोजगार ने दीवाना बना रखा है, तक के शेर शामिल थे। बाजार और बाजार में बिकने वाली हर चीज से उन्हें बेपनाह आकर्षण हो रहा था। अकसर एक जुमला वे अपने आस-पास के लोगों को सुनाते, 'मैं इतना कमाना चाहता हूँ कि कोई चीज यदि मुझे पसंद आ जाए तो इसलिए मुझे मायूस न होना पड़े कि उसे लेने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं।' हालाँकि कोई-कोई उनसे पूछना चाहता था कि क्या सबकुछ... लेकिन उनके तेवर देखकर पूछता न था। पिता सरकारी अधिकारी थे, देर से ही सही लेकिन सीधे रास्ते पर बेटे को आते देख उन्होंने भी कोताही नहीं बरती। कई एजेंसियों में उन्होंने उनके लिए सिफारिश रखी लेकिन कहीं भी उनका मन नहीं लगा। एजेंसी में वे फोटोग्राफी से लेकर विजुअलाइजिंग तक का सारा काम खुद करने की जल्दी में होते। लिहाजा किसी भी एजेंसी में देर तक टिक पाना उनके लिए मुश्किल होता।

वे जल्दी से जल्दी बड़ा होना चाहते थे, अपनी किसी उपलब्धि के लिए नहीं, किसी को छोटा दिखाने का जुनून उन पर एकदम से तारी हो चुका था। बहुत पहले जिन लोगों ने उन्हें देखा था, उन्हें अभी देखकर आतंकित हो उठते। वे क्या पाना चाहते थे, वे क्या बनना चाहते थे, वे क्या खरीदना चाहते थे, कुल मिलाकर वे क्या साबित करना चाहते थे, इन सबों का यदि ठीक-ठीक विश्लेषण किया जाता तो एक अंतहीन दौड़ में उनके दौड़ने और हाँफने की स्थिति पर सिर्फ डरा जा सकता था।

राजू भाई की चर्चा में कोई किताब न थी, महँगी घड़ियाँ थीं, कोई एब्सट्रक्ट नहीं था; डयूक का शर्ट और रेबेन का चश्मा था, वुडलैंड के जूते थे, लिमेन की जीन्स थी। उनको कैनवास के लिए रंगों की जरूरत नहीं थी; उनके चेहरे और शरीर के लिए तमाम क्रीम और लोशन्स थे, यदि उनकी चीजों पर कोई प्रशंसात्मक या ईर्ष्यात्मक निगाह डालता तो जैसे उनके अंदर बन रहे एक अदृश्य कुतुबमीनार में एक ईंट और जड़ जाती।

वे अपने जानने-पहचानने वालों में तेज, धूर्त और काइयाँ की छवि बनाना चाहते थे जो पैसों के लिए कुछ भी कर सकता था। यह उनके दिल की आवाज नहीं थी। अपनी इस छवि को पुष्ट करने के लिए उन्होंने अपने परिचितों का बहुत थोड़े लाभ के लिए या अपने नुकसान की शर्त पर भी नुकसान करने की कोशिश की। किसी दोस्त, किसी संबंध का उनके लिए कोई मतलब न था।

'राजू! मुझे कुछ पैसे चाहिए यार...'

'पैसे कहाँ हैं? पेड़ पर तो फलते नहीं?'

'लेकिन मुझे एकदम से जरूरत है...'

'तो अपनी वो सी. डी. मुझे क्यों नहीं बेच देते?'

'...अपना कंप्यूटर रख जाओ...'

'...अपनी घड़ी छोड़ जाओ...'

मतलब, बेमतलब, जरूरी, गैर-जरूरी तमाम चीजें राजू भाई खरीदते गये।

उन्होंने अनीता के भाई से दोस्ती गाँठ ली थी और एक दिन जब उसने अपनी व्यावसायिक मंदी का रोना रोते हुए कुछ पैसों का बंदोबस्त करने को कहा तो जैसे उनके अंदर बैठे प्रेत ने जोरदार ठहाका लगाया। राजू भाई ने तुरंत उसे पैसे दे दिये और थोड़े दिनों बाद उसका टेप उठा लाये। बड़ी बोरियत होती है... अकेले, ला कुछ दिन मैं सुनता हूँ इसे। उन्हें पता था... कि यह सिस्टम अनीता ने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था... उनके अंदर के कुतुबमीनार ने जैसे अपना बुर्ज पूरा किया हो...

लेकिन इस कुतुबमीनार को खड़ा रखने के लिए ठोस जमीन तो चाहिए थी। यह सारी ईंट तो वे अपने पिताजी के पैसों से खरीद रहे थे जो वे उनके सेटल होने की शर्त और उनकी योजनाओं पर दे रहे थे... अब उन्हें महसूस हो रहा था कि यदि जल्दी ही नींव में कंक्रीट न डाली गयी तो यह कुतुबमीनार तो अब गिरी ही गिरी और वो यह भी जानते थे कि यह मीनार गिरेगी तो सीधे उनके अस्तित्व पर ही। किसी भी कीमत पर उन्हें इसे बचाना था... बचाये रखना था।

उन्होंने अपनी पूरी संभावनाओें को टटोला लेकिन उन्हें एकदम ठीक-ठीक पता नहीं चल पा रहा था कि उन्हें शुरू कहाँ से करना चाहिए। 'राजू, तुम अपनी एक एजेंसी क्यों नहीं खोल लेते...' उनके इर्द-गिर्द अब सलाह देने वालों का जमावड़ा था। ये तमाम लोग पैसा बनाना चाहते थे, कुतुबमीनार सबके अंदर निर्माणाधीन थी, सबको रात को सपने में उनके पंख निकल आते थे जिस पर न जाने कहाँ-कहाँ उड़ते थे।

'लेकिन भाई...' राजू भाई आशंकित थे।

'लेकिन क्या, तू खोल तो सही इतनी अच्छी इमेजिनेशन पावर है तेरे पास, मार्केट में छा जाएगा तू...'

'मार्केट में छा जाएगा' इन शब्दों में ही कुछ ऐसा खुमार था जो धीरे-धीरे राजू भाई पर छाने लगा। देखते ही देखते 20 गुणे 40 वर्गफुट के एक ऑफिसनुमा कमरे के बाहर 'इमेजिनेशन' का बोर्ड लग गया। ऑफिस की साज-सज्जा और तड़क-भड़क पर ज्यादा ध्यान दिया गया... आखिर धंधा ही शोबिज का था लेकिन क्लाइंट? क्लाइंट कहाँ से आएँगे...?

'आएँगे यार... तुम एक अपना आर्टिकल छपवा फेमिना में... प्रेस कन्सल्टेंट की मार्फत...' वह भी हुआ लेकिन दो-चार ग्राहकों के अलावा कोई चान्स नहीं। लेकिन अभी भी राजू भाई को 'इमेजिनेशन' के उस दफ्तर में अपनी इमेजिनेटिव आँखों से लगता है, विज्ञापनों की चकाचौंध दुनिया... बिपाशा बसु, इंद्राणी बैनर्जी... अर्जुन रामपाल... पेप्सी-कोक... ऋतिक... ऐसा और न जाने क्या क्या...!

लेकिन उनके पास जो क्लाइंट आये थे... वे अपना विजिटिंग कार्ड, वेडिंग कार्ड या किसी सस्ती कंपनी का ब्रोशर बनाने के थे... उन्होंने उत्साह से वो सारे काम भी किये, लेकिन 'छतरी खुलेगी भी तो आकाश कैसे हो पाएगी' ...यह सवाल दिनोंदिन उनके आगे फैलता रहा। ऑफिस के खर्चे, मोबाइल फोन बिल... रेंट... आवागमन... राजू भाई की कई गैर-जरूरी और कई जरूरी चीजें भी यहाँ से वहाँ हो गयीं। हर चीज जाने पर एक ईंट जैसे खिसकती-सी मालूम होती, लेकिन नींव बचाने की शर्त पर गुंबदों की चिंता कौन करता है

दो-चार क्लाइंट्स के बाद यह काम भी राजू भाई को डूबता-सा लगा। उनके चारों ओर भूसे का पहाड़ था और उनकी स्थिति उन्हें सूई की-सी लग रही थी। उन्होंने गौर किया, उनके आसपास के लोग भी सूई ही थे लेकिन कपड़ों के ढेर पर चलने की कोशिश करते हुए।

राजू भाई धीरे-धीरे भूसे के ढेर से निकलने की कोशिश करते रहे, लेकिन जिस ट्रैक पर अब वह आना चाहते थे, वहाँ पहले से हजारों सूइयाँ दौड़ रही थीं। उन्हें कोई उपाय न सूझता था कि आखिर कैसे साबित किया जाए कि उनमें ज्यादा तेज धार है... उनकी नोक ज्यादा नुकीली है...

'यार राजू, तू गाता बहुत बढ़िया है यार! अपने क्लाइंट्स को क्यों नहीं दिखाता अपनी यह कला...।'

वैसे राजू भाई अब गाते बहुत कम थे। हालाँकि उनको पहले सुनने वालों के अनुसार वह उनका चौथाई भी नहीं होता... खुद राजू भाई को भी यह लगता... लेकिन वो अब भी इन तमाम लोगों से अलग हैं... यह अहसास उनको गाते हुए लगता... वो आवाज में गहराई लाने के लिए अनीता के साथ के क्षणों को गजलों की पंक्तियों से जोड़ने की कोशिश करते और पाते कि सुर टूट गया है। हालाँकि उनके आसपास बैठे लोगों को सुर-ताल से ज्यादा जरूरी वाह-वाह लगता।

राजू भाई ने अपने दो क्लाइंट को शाम साथ बैठने पर राजी कर लिया। उनका एक दोस्त भी उनके साथ रहेगा, जो दो-तीन पेग के बाद गाने की फरमाइश करेगा... थोड़ी ना-नुकुर के बाद... वे गाना शुरू करेंगे... और जब जम जाएगा तो... 'ऐ दिल' चल रहा था कि गड़बड़ हो गयी। दोस्त के इसरार करने पर राजू भई ने गिटार उठाया और जगजीत सिंह की गजल छेड़ी... 'ठुकराओ या कि प्यार करो' ...लेकिन क्लाइंट को दो पेग में नशा हो गया... पिछली डीलिंग में उसका हजारों रुपयों का नुकसान हो चुका था। दूसरे पेग ने जख्म को ताजा कर दिया, वह बड़बड़ाने-सा लगा... गुप्ता... साला हरामजादा... मेरा पैसा लेकर... भाग... दूसरे क्लाइंट का भी काफी पैसा शेयर मार्केट में फैला था जिसके डूब जाने का अंदेशा उसे सताने लगा... लड़खड़ाती उसकी आवाज आयी... बैन... इस बार... पारिख... मंदी... मादर...'

राजू भाई को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उन्होंने गिटार पर जोर से हाथ मारा... बड़े बेआबरू होकर... गालिब की गजल जोर से गानी चाही लेकिन वहाँ से सिर्फ भाँय-भाँय जैसी आवाज आयी। उनका दोस्त दोनों क्लाइंट को शांत करा रहा था। आवाज और हाथ सँभालने की कोशिश में गिटार का एक तार टूट गया... लेकिन उन्होंने देखा तब तक दोनों शांत बैठकर उन्हें सुनने की कोशिश में हैं... अब तार ठीक करने का वक्त नहीं था, उन्होंने लपककर हारमोनियम उठा लिया... गुलाम अली की नज्म... ये बातें झूठी बातें हैं... ये लोगों ने फैलायी हैं... लेकिन तब तक उनमें से एक फिर बहक चुका था। ...झूठी बातें हैं... मादर... तुमने हाँ तुमने मेरा डुबाया... पैसा...। राजू भाई पर जैसे एक जुनून छा गया था। उनकी उँगलियाँ ताबड़तोड़ बिना सुरताल के हारमेनियम पर चलती रहीं, एक भयानक शोर जैसा समूचे माहौल में था। उनकी उँगलियों से खून निकलने लगा, उन्होंने हारमोनियम को धकेल तबला उठा लिया... धिं... दिग्गा... ताक... डिग्गा... ढा... ढा... रिंग... रिंग...। एक उन्माद, एक पागलपन था। राजू भाई बेतहाशा पीट रहे थे... फिर खड़े हाकर गले में ढोल बजाकर नाचने लगे... धिधिंग... धिधिंग... उसके बाद...

उसके बाद राजू भाई गायब हो गये। उन्हें फिर किसी ने नहीं देखा। बहुत तफतीश या दरयाफ्त करने पर पता चला कि राजू भाई अब सिर्फ 'डॉट कॉम' पर पाये जाते हैं... 'पता नहीं' उनकी बेबसाइट का नाम है और अब कोई भी उनसे मिलने का ख्वाहिशमंद, उनका खैरख्वाह उनसे संपर्क करने की कोशिश करता है, तब इस साइट के खुलते ही पहले गिटार, फिर हारमोनियम... फिर तबला... फिर ढोलक की आवाजें आने लगती हैं... धीरे-धीरे ये आवाजें एकदम से शोर में बदल जाती हैं... यह शोर इतना भयानक और कानफाड़ू होने लगता है... कि घबराकर साइट बंद कर देनी पड़ती है।


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