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कहानी

पूर्वज
श्रीकांत दुबे


एक ऊँची चिमनी हमारी खिड़की और छत से साफ दिखती थी। उसके ऊपर से भूरा धुआँ निकल कर आसमान पर फैलता रहता था। फैलने के बाद धुएँ का रंग गुलाबी हो जाता। माँ बताती है कि घर से आते जाते यह गुलाबी आसमान एकदम सामने दिखता था। जिन दिनों वहाँ काम लगातार होता, हरेक घर पर चिमनी से उड़े कार्बन की बारीक पर्त जम जाती थी। दिन भर में चेहरे पर इतनी गर्द चिपक जाती कि शाम को मुँह धोने पर पानी के छपके मटमैले काले रंग के होते थे।

सरकार बाबू लावारिस थे।

उन्हें अपना गाँव छोड़े तब तक बारह वर्ष हो गए थे। इन वर्षों के दौरान वे बचपन के अंतिम छोर से उछल कर किशोरवय को पार करते अपनी जवानी में आ चुके थे। इसके बाद जब उनसे शहर छूटा तो सबसे पहले वे अपने गाँव की खोज में निकले। चूँकि आते वक्त वे गाँव से पश्चिम की ओर चले थे, इसलिए वापसी में सूरज के उगने से अनुमान लगा कर पूरब की ओर बढ़े। वे अपनी याददाश्त, और दूरी और समय के लंबे अंतरालों पर मिलती मानव संरचनाओं से पूछताछ के जरिए मदद लेते रहे। और इस तरह एक रोज अपने गाँव की सीमा तक पहुँचने में सफल भी हुए। लेकिन वहाँ अपने किसी परिजन को न पाकर उन्हें बहुत निराशा हुई। पुरखों के घर की कोई शिनाख्त तक नहीं बची थी। उसकी जगह गोरे बच्चों और अंग्रेजनों से सजी खूबसूरत कालोनी बस गई थी। बचपन में वे आम और पपीते के जिस बगीचे में खेलते थे, उसकी जगह छोटी घास और फूलों से भरे एक सुंदर पार्क ने ले ली थी। जूट और धान से हरे रहने वाले खेत ऊँची चारदीवारी से घिरे हुए थे, जिसके भीतर दैत्याकार ऊँचाई की बेढब इमारतें बाहर की ओर घूरती थीं।

चहारदीवारी के विशाल दरवाजों में आते जाते गोरे अफसरों से बच कर सरकार बाबू ने वहाँ तैनात देशी दरबानों से कुछ जानकारियाँ लीं। लेकिन अपनी नौकरी, पेट, परिवार और जान की दुहाई देते हुए वे इतना ही बता सके कि गाँवों के सभी बाशिंदे कहीं और चले गए।

कलकत्ता और कालीकट से बढ़ते निर्यात के साथ पूरे बंगाल में अंग्रेजों की जमात बढ़ती गई। इसलिए उनके परिवारों के बसने की जगहें खोजी गईं। जहाँ जहाँ अंग्रेजी सेनाएँ अथवा व्यापार के लिए रेलमार्ग थे, उन्हें अधिग्रहीत करके वहीं के बाशिंदों से नए मुहल्ले बनवाए गए। मुहल्लों के बसने के साथ खपरैल और झोपड़ियाँ उजड़ती रहीं। लोगों का पलायन भी जारी रहा। और जो स्वदेशी आखिर तक बचे थे वहाँ, उन्हें नौकर, दरबान या सफाईकर्मियों के तौर पर रख लिया गया।

अपने घर परिवार की अज्ञात स्थितियों को जान कर सरकार बाबू को जमीन से लेकर आसमान तक सब कुछ पराया दिखने लगा - सिवाय उस बच्चे के जो उस वक्त उनके कंधे पर बैठा था और जमीन और आसमान के बीच कहीं नहीं दिख रहा था। बच्चे के साथ चलते हुए उनके कदम वापस मुड़े और वे पश्चिमोत्तर दिशा में चलने लगे।

श्रेय बच्चे की सहनशीलता को जाय कि सरकार बाबू से मिली हिफाजत को, इस बात में दुविधा है, लेकिन लगभग साल भर की पदयात्रा के दौरान नौ साल के उस बच्चे का कुछ भी बुरा नहीं हुआ। लड़का पूरे ग्यारह माह तक जंगल जंगल, बंजर बंजर, चलते हुए किसी अनजान सफर के तमाम मंजर देखता रहा। तब जाकर उसे दिखीं कुछ झुग्गियाँ, मतलब मकान। लड़के का चेहरा जो कभी गोरा था, धूल, थकान, अचरज और सफर की निरंतरता से एकदम बुझ सा गया था। धोने के लिए सरकार बाबू उसे पास की किसी बावड़ी तक ले गए। बच्चे का चेहरा धोते हुए पानी में उन्हें अपना प्रतिबिंब भी दिख गया। उनका गेहुंआ रूप तब तक विद्रूप हो चुका था। लेकिन उसे कई तरह से धो पोंछ कर वे कुछ बेहतर दिखने लगे।

लड़का भूखा था। और वे भी। इसलिए पतले बाँस और सरकंडों की मदद से उन्होंने कुछ बंसियाँ बनाईं। और थोड़े ही समय में ठीक ठाक तादाद में मछलियाँ जुटा लीं। बगुले सी तेज आँखों के साथ बंसी की हरकतों में उलझे हुए उन्हें इसकी खबर तक न रही कि उनका बदतर से बेहतर हो आया रूप क्या क्या जादू कर चुका है। यह बात उन्हें तब मालूम हुई, जब उनकी गेहुंवा मूरत ने एक साँवली सूरत का सामना किया। साँवली उन पर यूँ मोह गई थी कि शर्म के मारे कई दिनों तक किसी से कुछ न बोली। और सरकार बाबू जो उसके रंग पर फिदा हुए, तो जिंदगी भर उसे साँवली ही बुलाते आए।

सरकार बाबू अपनी बलिष्ठ देह और दिमागी समृद्धि के प्रयोग से बहुतों की बिगड़ी बनाए। और अनेक गैर जरूरी बनावटों को तोड़े भी। मेरे गाँव के सबसे गहरे चार कुएँ उन्हीं के खोदे हुए थे। पागल हाथी या शातिर चीते तेंदुओं को उन्होंने कई बार सबक सिखाया और बाँस या लाठियों से ही धराशायी कर दिया था। साँपों के लिए तो वे इतने खतरनाक थे कि उन्हें देखते ही पकड़ लेते थे, मारने के लिए लाठी डंडे बाद में खोजते थे। और न मिले तो भी कोई बात नहीं, पटक पटक कर मार देते।

इस तरह से गाँव की जिंदगी को आमूल प्रभावित कर देने वाले सरकार बाबू स्थायी रूप से वहीं रह गए। और सबके चहेते बन गए। गोकुल के कन्हैया सरीखे। और उनकी राधा हुई साँवली। राधा को कान्हा संग रास रचाने में कोई खास लुकाछिपी भी नहीं करनी पड़ी। लेकिन उसे शर्म बहुत आती थी। कुछ इतनी, कि जब वह सिवान पर बनाए गए सरकार बाबू के घर में घुसी तो फिर बाहर कभी न दिखी। लड़का भी सरकार बाबू के हैरतअंगेज कारनामे खामोशी से देखता और उम्र के समानुपात में बढ़ता रहा। वह साँवली को माई कहने लगा और सरकार बाबू तो पहले से उसके कक्का थे।

अब आगे उन लोगों की बात जिन्हें कहानी कहने के लिए मैं अपना पूर्वज मानता हूँ। और मैं उनकी वंश परंपरा की अगली चौथी पीढ़ी में हूँ। मतलब कहानी मेरे परदादा और परदादी की।

परदादा सौभाग्य या दुर्भाग्य से लगभग नियत रही उस परंपरा की अगली कड़ी के रूप में थे, जिसमें मेरे पुरखे इकलौती संतानों के रूप में बचते थे। खाने पीने को लेकर वे आला दर्जे के लापरवाह से लेकर अव्वल दर्जे के शौकीन तक सब कुछ थे। दिन पर दिन, कई दिन बीत जाते, उन्हें खाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। और इसके उलट जो कभी जी कर दिया तो रात गए अँधेरे से भी झाड़ झंखाड़ खँगाल कर तीतर बटेर निकाल लाते। लेकिन अकसर तो जो कुछ भी परस दिया जाय, चुपचाप खा लेते थे। लंबे समय से ऐसा ही चल रहा था।

एक रोज खाते खाते थाली खाली हो गई, लेकिन उन्हें डकार नहीं आई। तिरछी हथेली से पोछ कर उन्होंने थाली को साफ और चिकना कर दिया, फिर भी भूख खत्म नहीं हुई। पूरे गाँव की हालत यही थी। जायका बदलने वाले तीतर बटेर हर किसी की खोज बन गए। उस घटना की बीती शाम परदादा ने कई झाड़ियाँ भी खँगाली थीं, लेकिन पहली बार कुछ साथ नहीं आया था। ये सभी छोटे परिंदे और जानवर या तो पकड़ कर मार दिए गए थे अथवा लंबे सूखे के कारण खत्म होती झाड़ियों से घने जंगलों में चले गए थे।

अपने पेट के अधूरेपन से परदादा को, बच्चों और पत्नी की भूख का एहसास हुआ। फिर वे सभी के चेहरे देख कर भीतर तक दहल गए। अकाल के इस खौफनाक दृश्य में अपने ही सामने पत्नी बच्चों का तड़पना असह्‌य था। और दूर दूर तक कोई विकल्प भी नहीं। लेकिन विकल्प खोजना अनिवार्य भी था। उस शाम भी वे रोज की तरह शौच को निकले लेकिन पिछले दिनों की तरह वापस नहीं आए। उनके साथ जाने वाली इकलौती कीमती चीज वह लोटा था, जिसकी पूरी धारिता में पानी भर कर वे शौच के लिए जाते थे। लोटा एक ऐसी धातु का बना था, जिसके कम आयतन का वजन भी बहुत अधिक होता है। लोग उस धातु को अतार्किक रूप से 'फूल' कहते थे। शायद उन्हें किसी छोटे लेकिन बहुत भारी फूल के बारे में पता हो।

परदादा गाँव से पूरब की ओर गए थे - अरहर, मसूर के सूखते खेतों के पूरब, सूखी नदी पार के जंगल के पूरब - और बाद में यह सोच लिया गया कि वे पूरे देश के पूरब चले गए थे। दूसरे किसी देश यानी परदेश में। फिर कुछ इसी से मिलते जुलते तरीकों से उनके पीछे कई लोग गए। और लंबे समय तक जाते भी रहे। चूँकि वे परदेश में भूख और गरीबी के विकल्प खोजने जाते, इसलिए त्रस्त परिवारों को उनकी वापसी का बेसब्री से इंतजार होता था। उन्हें लौटने में जितनी देर होती, परिवार बाहरी तौर पर उतने ही उद्विग्न दिखते थे। लेकिन भीतर उसी अनुपात में एक खुशी भी संचित रहती जो धन और समृद्धि बढ़ने की उम्मीद से उपजती थी। इस तरह से परदेश एक खुशनुमा सपना बना गया। भूख बीमारियाँ, दर्द और मौतों से जूझते हुए लोग उसके हकीकत बनने का इंतजार करते थे।

मेरे दादा तब तक एक बहन के गुजर जाने के बाद तीन भाइयों के बीच थे। और यूँ खून और नस्ल के आगे न बढ़ने का डर, जो हमारे खानदान पर हमेशा बना रहता था, लगभग खत्म हो गया था। लेकिन परदादा के जाने के बाद ऐसा नहीं रहा। परदादी, दादा और उनके भाइयों के साथ - पेड़ के नाम पर काँटों में बदल गई - झरबेरियाँ खोजने लगीं। उन पर उगे एक एक फल पर उछलते झपटते, धूप और लू में कुम्हलाते हुए वे जीते रहे। इसी बीच गाँव के कुछ घरों से चूहों के गिरने और तड़प कर मर जाने की खबर फैली। और लोग खबर की तेजी से ही घरों को छोड़ कर भागने लगे। यह एक महामारी के आने की सूचना थी। महामारी थी 'प्लेग' । लोग इसे 'ताऊन' और 'हैया' भी कहते थे। परदादी, दादा, और उनके भाई जिन चीजों को जरूरी समझे, गठरियों में समेट गाँव से बाहर आ गए। औरों की तरह वे भी एक बगीचे में रुके; जो एक बड़े से जंगल से जुड़ा था।

लेकिन उनके जल्दी से भागने में भी शायद देर हो चुकी थी। पहले, दादा के एक, और फिर दूसरे भाई के भी जिस्म तड़पने लगे। दादा को उनसे दूर कर परदादी ने बचा लिया। और यह उस पत्थरदिल समझदारी की बदौलत संभव हुआ, जिसके तहत दादा के भाइयों की देह बगीचे में कई दिन तक सड़ती रही। किसी बगीचे में जब एक की मौत होती, तो उसके बाद वहाँ मौतों का सिलसिला सा चल उठता। इसलिए लोग फौरन दूसरे बगीचों में चले जाते। भाइयों की मौत के बाद दादा और परदादी ने भी ऐसा ही किया।

इस तरह फिर से दादा अकेले बचे अपनी पीढ़ी में। दो बेटे खोकर परदादी भी जैसे टूट सी गईं। लेकिन यह टूटना कुछ ऐसा था कि बची जिंदगियाँ बचाने के लिए परदादी ने अपनी सामर्थ्य का कतरा कतरा जोड़ लिया। प्रवास जारी रहा और महीनों तक चला। इस बीच काँटों के बीच से झरबेरियाँ भी खत्म हो चुकी थीं। लोग बरगद के गोदे और कच्चे आम खाकर जीते रहे। और उससे भी अधिक लोग मरते रहे। कुछ ऐसे ही चित्र देश के मानचित्र के विभिन्न हिस्सों में उग आए थे। यह बात सांख्यिकी और भौगोलिक आँकड़ों में आज भी दर्ज है कि बीती सदी के शुरुआती दो दशकों में देश की जनसंख्या वृद्धि में भारी गिरावट आई थी।

खैर, जैसे तैसे वापसी के दिन करीब आए। अरसे बाद एक अच्छी बारिश हुई। जमीन पर सूखे पड़े तिनके नमी से फूल कर हरिया गए। लोग अपने घरों की ओर बढ़े, जिनसे इतना दूर आ गए थे कि बार बार रास्ता भटक जाते। परिवारों की गाड़ियाँ जो रास्ता छोड़ ऊबड़ खाबड़ सतहों पर रेंगने लगी थीं, अपने तमाम हिस्से खोकर फिर पटरी पर आने लगीं।

इस दर्दनाक हादसे को भूल पाना नामुमकिन था। इसलिए ऐसी कोई कोशिश करने के बजाय लोग नए सिरे से जीने की होड़ करने लगे। परदादी, दादा की परवरिश की जिद ठाने रहीं।

इसके बाद बहुत कुछ बदला।

बदला क्या, कुछ न कुछ तो होना ही था, सो यह सब भी हुआ। दादा के पास बपौती के तौर पर पर्याप्त जमीन थी। इस बीच खेत कुछ फसलें भी देने लगे थे। दादा ने देर देर तक फावड़े चलाए। बदरंग मिट्टी से रंग बिरंगे और विभिन्न स्वाद संरचनाओं वाली सब्जियाँ और फल उगाए। परदादी क्षमता भर बोझ उठा कर उन्हें आसपास के कई गाँवों में दूसरी जरूरी चीजों से बदल कर बेचती रहीं। यह क्रम अगले कुछेक वर्षों तक चला, जिसके दौरान दादा और परदादी के संयुक्त श्रम से उनके पास आगामी कुछ महीनों के लिए अनाज इकट्ठा रहने लगा। घर के सामने मवेशी बँधने लगे। तीज त्यौहारों पर पकवानों की गंध से आस पड़ोस तक महक जाने लगी थी।

यह परिवार की समृद्धि के दिन थे।

सो इसकी चर्चा पूरे गाँव में फैलने लगी। कहीं असंतोष तो कहीं किसी में जलन के रूप में भी। घर बाहर, अलाव, खेत और नातेदारियों तक में बात पहुँची। और यह अच्छी रिश्तेदारियाँ बनने के सबसे उपयुक्त हालात होते थे। दादा के लिए जो उस विशेष उम्र से गुजर रहे थे, जिसमें सीने और भुजाओं में एक अतिरिक्त तनाव महसूस होता है, कई रिश्ते आने लगे। बेटे की माँ और परिवार की मालकिन होने का परदादी का आत्मगौरव भी अपने चरम को छूने लगा। उन्होंने जिसे अपने बेटे की दुलहन चुना, वह मेरी दादी थी। परदादी की आँखें खानदान की अगली पीढ़ी की उम्मीद से चमकने लगीं। उन्होंने उस रस्म को, जिसमें औरतें अगली पीढ़ी यानी बहू को घर की सारी जिम्मेदारियाँ सौंप कर अपने सबसे कीमती गहने आदि सुपुर्द करती हैं, पूरा किया। उसके बाद खुद बाहर के बरामदे में रहने लगीं और भीतर का कमरा दादी का हो गया। घर में दादी के आने की खुशी अगले कुछ वर्षों तक धीरे धीरे खर्च होती रही।

इस खर्च होती खुशी के समानांतर चुपचाप एक मुश्किल भी पनप रही थी। लगातार जीने की जद्दोजहद करते हुए इस ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होगा, और ध्यान देकर भी शायद कुछ नहीं किया जा सकता था। घर का स्थापत्य सदियों पुराना था। और उसे कोशिश करके भी सिर्फ तोड़ा ही जा सकता था। मरम्मत वगैरह तो, खैर, नहीं ही संभव था। इन वर्षों के दौरान घर की खपरैल गिरते हुए आधे तक आ गई थी। मकान का जो हिस्सा बचा था, वह था एक कमरा और उसके बाहर तीन ओर से खुला ओसार। खपरैल के गिरने और गिरते ही जाने के कारण बन गए कई अदृश्य सूराखों से रोशनी अंदर घुसने लगी थी। अँधेरी रातों में भी उन सूराखों से उजाला छनता रहता था। आखिरी दिनों में कमरे की पिछली दीवार के ऊपर से आसमान का एक बड़ा टुकड़ा भी दिखने लगा था। बरसात की कई रातों में एक एक बूँद का टपकना और मौसम के थोड़ा साफ होने पर बादलों के पीछे से ताक झाँक जाते चाँद तारों को दादी ने कमरे में बैठ कर देखा था।

एक बार जब लगातार - दिन और रात - तीन रोज तक जारी रहने के बाद बारिश कुछ देर के लिए थमी थी, और आसमान अभी भी प्रचंड काले बादलों से भरा था, पिछली दीवार का भी गिर जाना तय हो गया। फिर कुछ गठरियाँ बँधीं और घर छोड़ने को मजबूर दादा, दादी और परदादी बाहर निकलने के लिए तैयार हो गए। दीवार पार का पानी दरवाजे की चौखट से ओसार होते हुए आर पार बहने लगा।

घर के संदर्भ में आगे की संभावना यह है कि जल्दी ही उसकी हर दीवार गिर गई होगी। मेरे पुरखों का कहीं, कोई घर नहीं रह गया होगा।

घर गाँव सब छूट गए। यह सब जो छूटे तो कई रोज तक इनकी जगह बगीचे, सड़क और गलियाँ ही मिलीं। और फिर मिला उनकी ही तरह के बेघर तमाम लोगों से भरा एक विस्तृत मैदान। अपने से भी बदतर दशा में लोगों को देख कर परदादी को अपार दुख हुआ। दादा और इसलिए दादी को भी थोड़ा सुकून कि हम ही सबसे निरीह नहीं हैं।

वह शहर था। आज के शहरों से थोड़ा अलग, जहाँ कहानियाँ चुपचाप लिखी जाती हैं और हत्याएँ सरेआम होती हैं। उस वक्त शहर का तिलिस्म कायम हो रहा था। वह पर्याप्त आकर्षक और संभावनाओं से भरा दिखता था। लेकिन दादा, दादी और परदादी का सामना सबसे पहले वहाँ की तमाम मुश्किलों से हुआ। वे थकान और भूख से बेहाल, इनके विकल्प खोजते रहे। समतल भूमि पर सोकर और सादा पानी पीकर नींद और पेट की जरूरतें कई दिनों तक टाली गईं।

दादा का इकलौता कुर्ता दिन में कई बार बारिश और पसीने से भीगता और चटक धूप से सूख जाता। एक अजनबी होने के नाते कोई सीधे उन्हें नौकर के तौर पर भी नहीं रखता था। दिहाड़ी मजदूरी का आलम यह था कि दिन भर खटने के बाद खुद का पेट भर जाय तो बहुत। और यूँ अगर अपना इंतजाम हो भी जाए, तो पीछे जो दो जिंदगियाँ और थीं, वे क्या करतीं। ऐसे में दादा की भटकती नजर व्यापार पर टिकी। खासतौर पर अपने खानदानी पेशे, मतलब सब्जियों के व्यापार की ओर। इसके लिए परिवार ने एक सबसे बड़ा जोखिम उठाया। परदादी और दादी के गहने तथा कीमती बर्तन गठरियों से निकले तथा बेच दिए गए। फिर बाजार के बीच एक चट्टी भर की जमीन किराए पर ली गई। और समीपवर्ती गाँवों से सब्जियाँ मोल आने लगीं। इसके लिए दादा आधी रात के कुछ बाद निकल जाते और दिन उगने तक वापस आ जाते। सब्जियाँ चट्टी पर इकट्ठी होतीं और अपनी अपनी फुरसत मोहलत के अनुसार तीनों की नींद भी वहीं पूरी होती। दादा वहाँ बैठे फुटकर खरीददारों को निबटाते और दादी परदादी सिरों पर बोझ उठा कर घर घर पहुँचा आतीं। छोटी छोटी बाधाओं के बावजूद महीनों तक चले इस क्रम से व्यापार में कुछ बढ़त दिखने लगी।

जोखिम उठाने का नतीजा पक्ष में आया और दादा दादी ने खरीदने बेचने के बीच से मुनाफा कमाना सीख लिया। रहना तो वहीं चट्टी पर और बारिश या तेज धूप में आसपास बने मकानों के छज्जों के नीचे जारी रहा लेकिन खाने पीने को उन्हें वे चीजें भी मिलने लगीं जो अपने खेत खलिहानों में वे कभी नहीं उगा पाए थे। दादा दादी और इसलिए परदादी भी कम तथा अधिक लाभ की तुलना करके लगातार घर मुहल्ले, चट्टियाँ और बाजार बदलते रहे।

इस तरह की दुरूह दिनचर्या वाले लगभग एक वर्ष के बाद वे अपनी फुटपाथ की जिंदगी से ऊपर उठ सके। बेतिया बाजार में अपनी एक गुमटी लग गई। दादा ठोंक बजा कर सस्ते में सौदा खरीदते। दादी परदादी उसे अधिक से अधिक कीमत पर बेचतीं। और दोनों मूल्यों का अंतर लगातार बढ़ते हुए उनकी आँखों में नए नए सपने उगाता। इतना ही नहीं, क्रमशः एक पर एक सपने पूरे भी होते गए। इस सिलसिले में कुछ ही वर्षों में उन्होंने पक्की दुकान से लेकर पक्के मकान तक का सफर पूरा कर लिया। मौके की नजाकत और खरीददारों की बढ़ती माँग के मद्देनजर व्यापार की प्रवृत्ति भी बदलती रही। साबुन, तेल और बिस्कुट जैसी चमकीली आकर्षक चीजों से लेकर कपड़े आदि तक बेचे गए। खरीद फरोख्त के इस सिलसिले के चल निकलने के बाद किसी के पास फुरसत ही न रही कुछ और भी सोच पाने की। दादा को इस पर यकीन हो गया कि अब हर कुछ यहीं संभव है। वह शहर में बैठे बैठे कश्मीरी सेब का स्वाद और चीनी चाय की चुस्कियाँ ले सकते थे, इससे उनका शहर पर विश्वास दृढ़ होता गया। दादा को अब परदेश के सपने कभी नहीं आते थे। दादी को भी। लेकिन परदादी के भीतर थोड़ी सी उम्मीद की लौ हमेशा जलती रही - परदेश से आने वाले किसी सुख ऐश्वर्य के लिए नहीं - परदादा की वापसी के लिए।

बेतिया बाजार के पाँच कमरों वाले उस घर में एक नौकर भी रहने लगा। सिद्धू। बेतिया बाजार की चार दुकानों में चल रहे व्यवसाय में पाँच कारिंदे भी काम करने लगे। जीतन, पियारे, रमायन, महेश और चंदा। सिद्धू बंगाल और जीतन, पियारे तथा रमायन बिहार के किसी गाँव से भाग कर आए थे। महेश और चंदा मेरे पुरखों के गाँव से थे। ये सभी अपने भाग्य को इसलिए कोसते रहते थे कि घरों से आते वक्त न उनके पास कीमती बरतन या गहने थे, न ही वे किसी चोरी छिनैती की हिम्मत कर सके। मिसाल के तौर पर उनके पास महेश और चंदा के ही साथ निकले श्रीचंद और राधे के उदाहरण थे। श्रीचंद ने अपने मवेशी बेच कर, राधे ने कहीं पर सेंध लगा कर पैसे जुटा लिए थे, जिनकी बदौलत पांडे चौक पर दोनों की दुकानें जम चुकी थीं। आगे तो उन दुकानों पर भी कई लड़के नौकर बनाए गए।

खानदान की अगली पीढ़ी को लेकर, परदादी की उम्मीद पूरी हो गई। मेरे पिता के जन्म लेने से बाद में पिता के दो भाई और तीन बहनों का भी जन्म हुआ (जिन्हें कहानी कहने के लिए मैं क्रमशः चाचा और बुआ मानता हूँ। हमारे यहाँ का रिवाज भी यही है।) व्यवसाय और इसलिए दादा दादी की व्यस्तताएँ बढ़ने के साथ परदादी क्रमशः सुस्त और शिथिल होती गईं। उनकी फुरसत का वक्त भी बढ़ता रहा। इसलिए वह अधिकतम समय बच्चों के संग व्यस्त रहतीं और न्यूनतम समय में चुपचाप कुछ गुनती मथती थीं। उनकी सबसे अधिक बातें सिद्धू से होतीं, जिसको वह अक्सर परदादा और गाँव के बारे में बताती थीं। इन बातों को बड़े ध्यान से सुनता था - सोचने समझने की शुरुआत कर रहा उनका बड़ा पोता।

और तब जब दादा दादी ने उन्हें बेकार, बीमार, बेदिमाग और जल्दी ही मर जाने वाली बुढ़िया मान लिया था और धीरे धीरे चलना सीख रहे नवजन्मे भी उन्हें 'पगलिया' जैसे शब्दों से बुलाने लगे थे, परदादी ने घर को छोड़ दिया। साथ में उनके बड़े पोते ने भी। दादा दादी की गालियों के बावजूद दूसरों से ज्यादा परदादी का खयाल रखने वाला सिद्धू भी पीछे से चल पड़ा। परदादी की इच्छा अपने गाँव जाने की थी। परदादा की उम्मीद में। जिसके लिए कई दफा दादा दादी से उनकी जिरह भी हुई और नतीजतन उन्हें बेतरह डाँट पड़ी थी।

शहर से गाँव की लंबी पदयात्रा उनकी जीर्ण देह के लिए संभव नहीं थी और इक्के या गाड़ियों से सफर के लिए घर से कोई रकम नहीं ली गई थी। लिहाजा सफर शुरू होने के तीसरे रोज दिन ढलते ढलते परदादी हाँफती सी बैठ गईं। उनकी साँसें तेज से तेजतर हुई। कुछ देर बाद आँखें बंद हो गईं और आधी रात तक देह की सारी हरकतें बंद हो गईं। सिद्धू ने पास की नदी पर उनका दाह किया और उसे पार करके अपने गाँव की खोज में निकल पड़ा। साथ आठ वर्ष का वह लड़का भी था, जो मेरे पिता थे।

सिद्धू ने जब अपने गाँव की हालत देख कर चलते कदम वापस मोड़े तो, बताया जा चुका है कि उसे जमीन और आसमान के बीच सब कुछ पराया दिखने लगा था। सिवाय उस बच्चे के, जो मेरे पिता थे। वह उस वक्त उसके कंधे पर बैठे थे और धरती और आसमान के बीच कहीं नहीं दिख रहे थे। अंततः सिद्धू ने अपनी नई जिंदगी को नए तरीके से जिस नई जगह से जोड़ा, वह मेरे पुरखों का गाँव था। और वहाँ के लोगों को उन दिनों एक नई बात पता चली थी, किसी ऐसी चीज के बारे में जो उन्हें उनकी बदहाली और पिछड़ेपन से जल्द ही निजात दिला देने वाली थी। इस अद्भुत चीज के चेहरे, रंग और खुशबू आदि के बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता था। पता था तो बस इसका नाम, जो 'सरकार' था। 'सरकार' के बारे में कुछ न जानने की स्थिति इससे जुड़ी अनेक कथाओं के बनने के लिए सर्वथा अनुकूल थी। सो अतिशयोक्तियों से भरी अनेक 'सरकार कथाएँ' प्रचालित हुईं। उस नई जगह पहुँच कर सिद्धू ने इतने और ऐसे ऐसे कारनामे किए कि वे व्यापक स्तर पर वहाँ की कथाओं में वर्णित हुए। ग्रामीणों ने सिद्धू से उन कथाओं का संबंध जोड़ना शुरू कर दिया और यूँ उसका नाम हुआ सरकार बाबू।

दशकों लंबे पारिवारिक प्रवास में हमारे खेतों पर दूसरों का कब्जा हो चुका था। सरकार बाबू की नेकनीयती से भी इतना ही हो सका कि जीने खाने को एक टुकड़ा जमीन मिल गई थी। इतने से घर का खर्च तो शायद ही कभी चल पाया हो, लेकिन सरकार बाबू की सामर्थ्य चुक जाने के बाद मुश्किल और बढ़ गई। घर पर माँ का आना भी हो गया था, सो पिता के लिए अब किसी काम की सख्त जरूरत थी। इसी बीच महीनों लंबी बीमारी के बाद पूरे गाँव के सामने अपनी कीर्तिकथाएँ छोड़ किसी अज्ञात अनिवार्यतावश पिता के कक्का, यानी सरकार बाबू दुनिया से चले गए। और कुछ ही दिनों के बाद पिता की बीमार 'माई' यानी साँवली भी।

कक्का की मृत्यु के बाद रोजगार को लेकर पिता की पशोपेश तकरीबन दो वर्षों तक चलती रही। लेकिन उसके बाद तब दूर हुई, जब गाँव के हर युवा का चेहरा कभी कभी खिला दिखने लगा था। दरअसल शहर को गाँव के नजदीक लाने का एक अभियान सा चला था। इसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि सभी गाँवों के सारे मजदूर मिल कर भी कम पड़ने लगे। शहर से गाँव तक पुख्ता सड़क बनी। फिर उन पर होकर बड़ी बड़ी गाड़ियाँ गाँव तक आईं। ढेर सारे इमारती सामान, फिर लोहे और दूसरी धातुओं की बनी बड़ी बड़ी मशीनें भी।

बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक ने अधिक काम के बदले अधिक मजदूरी उगाई। नतीजतन हमारे पुरखों की जमीनें तेजी से ऊँची चारदीवारी के बीच घिर गईं। चारदीवारी के भीतर ईंट, पत्थर, चूने और धातुओं को जोड़ कर ऐसी आकृतियाँ बनने लगीं, जो किसी की समझ में नहीं आती थीं। गाँव के मिस्त्री, कारीगर और इमारतकार उन्हें देख कर यूँ दंग रह जाते कि हरेक कारीगरी से मीनमेख निकालने की उनकी आदत कहीं बहुत भीतर दबी रह जाती। तेज और व्यापक स्तर पर जारी इस प्रक्रिया की बदौलत कई गोल घेरेदार बने, जो इतनी ऊँचाई तक जाते थे कि एक पर एक कई गाँवों को पार कर वे कोसों दूर से दिखते थे। इस निर्माण के शुरुआती दिनों में आस पास के कई गाँवों के लोग इसे देखने आते। लेकिन बाद में तो दूर दूर से भी सैलानी आने लगे थे।

उद्योग वाली जमीनों पर पिता की भी दावेदारी थी। लेकिन वे क्या कर सकते थे। क्योंकि हमारे पूर्वजों के प्रवास काल में गाँव के कुछ लोगों ने हमारी जमीनों पर कब्जा कर रखा था और लौट आने के बाद पिता की किसी ने नहीं सुनी और उन्हें दादा के बेटे के रूप में स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया। अब इस उद्योग के मालिक, जो खुद मेरे चाचा थे। उन्होंने लोगों को राजी कर - उनके घर के किसी को नौकरी देने और इससे भी न बने तो जमीन का मुआवजा देने के आश्वासन पर - सब कुछ अपने हाथ में कर लिया था।

काँच और डिस्टिलरी उद्योग का यह संयुक्त निर्माण निरंतर तेज रफ्तार काम की बदौलत कुल ढाई वर्षों में पूरा हुआ। लेकिन इसके पूरा होते न होते गाँव ही नहीं, बाहर से आए मजदूरों के समक्ष भी एक नया दृश्य पैदा हो गया। पिता भी उनमें से एक। जहाँ उद्योग खड़ा होने के दिनों में अधिकतम मजदूर मिल कर न्यूनतम मशीनों की मदद से काम करते थे, अब इसके विपरीत बड़ी बड़ी मशीनें कम से कम आदमियों की मदद से काम करने लगीं। वे कम से कम लोग कौन हों, इसके लिए गाँव जवार में तो किसी ने सोचना भी छोड़ दिया और धीरे धीरे राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएँ इसका निर्धारण करने लगीं।

जिस चारदीवारी के अंदर से काँच की खूबसूरत आकृतियों के प्लेट, कटोरे, गिलास, मूर्तियाँ, पारदर्शी दरवाजे खिड़कियाँ, आईने और गाढ़े रंग की बोतलों में भरी कई किस्म की शराबें अलग अलग द्वारों से निकल कर बाजारों में उतरती थीं, उसमें आम आदमी का प्रवेश रोक दिया गया। कारखाने के भीतर सभी काम मशीनें करतीं और आदमी की जरूरत उन्हें विभिन्न निर्देश देने तक की रह गई। इसके लिए प्रतिवर्ष सीमित संख्या में रिक्तियाँ निकलतीं। फिर उन्हें भरने के लिए सर्वाधिक ख्यातिलब्ध संस्थाओं से शिक्षा पाए अभियंता और प्रबंधक नियुक्त किए जाते। आगे के दिनों में तो उनमें भी कम दक्षता के कर्मचारी किन्हीं दूसरे, बेहतर विकल्पों से बदले जाने लगे। इसलिए वहाँ का प्रत्येक कर्मचारी अपने पैर जमाए रखने के लिए उत्पादों को अच्छे से बेहतर, और कीमत को कम से कमतर करने में भरसक सहयोग करता था।

गाँव का हर युवा रोजगार को लेकर पहले की तरह संघर्ष की हालत में आ गया। बल्कि इस बार तो उनके पास खेतों का भी आसरा नहीं था। बहुत सी जमीन तो कारखाने के विस्तार में फँस गई थी और शेष भूमि कारखाने की सहायक नहर से उफन कर आए काले सांद्र रसायन से ऊसर हो गई थी। 'सरकार बाबू' को गाँव से मिला खेत, जिस पर अब पिता का अधिकार था, वह भी इसकी चपेट में आ गया।

जीने की राह खोजने में हर कोई सक्रिय था। इस बीच पिता एक उम्मीद से शहर गए। उस जगह, जिसका नाम कभी बेतिया बाजार था, और जो बदल कर अब 'तीर्थराज नगर' हो चुका था। तीर्थराज मेरे दादा का नाम था - जो वर्षों पहले अतीत हो चुके थे और मृत्यु के समय तक शहर के सबसे बड़े व्यवसायी की ख्यति से आगे बढ़ कर पहले 'उद्योगपति' बन गए थे। उन्होंने शहर के छोर पर 'तीर्थराज टैक्सटाइल्स' स्थापित किया था। 'तीर्थराज टैक्सटाइल्स' का मालिकाना आज भी मेरे बड़े चाचा के हाथों में है। दादा की मृत्यु के बाद छोटे चाचा के नाम पर अधिकृत 'तीर्थराज ग्लास प्रोडक्ट्स एंड डिस्टिलरी' की योजना मेरे गाँव में चालू कर दी गई। बुआ लोग भी कहीं दूर के उद्योगपतियों से ब्याह दी गई थीं।

बड़ी मुश्किलों और इंतजार के बाद पिता अपने भाइयों से मिल सके। वह भी एक ऐसे पागल के रूप में जो खुद को इतने बड़े उद्योगपतियों का भाई कहता है। फिर भी उन्होंने जैसे तैसे अपनी बात रखी। लेकिन वे अपनी पहचान का कोई साक्ष्य उन्हें नहीं दे सके। चाचा के अनुसार, वे सचमुच कभी तीन भाई थे, पर उनकी याददाश्त के पहले ही पागल हो चुकी दादी बड़े भाई को लेकर भाग गई। वे दोनों भूखे प्यासे रह कर जल्दी ही कहीं मर गए। इसलिए ऐसी कोई संभावना ही नहीं बचती।

पिता लौट कर कानून की शरण में गए। लेकिन कचहरी के दलाल और वकीलों के बीच यह और भी हास्यास्पद करार दिया गया। और वे इसे आपस में सुना कर पागलों की भी समझदारी की मिसाल देने लगे। यदि किसी ने तैयार होने का अभिनय भी किया तो इतने बड़े आदमी के खिलाफ मुकदमे की फीस की बात आने पर वे फिर से मजाक बन गए। आखिर में हर ओर से हार कर पिता ने अपनी नियति को ही निष्कर्ष मान लिया।

पिता शहर में ही रह कर म्यूनिसिपल बोर्ड में दैनिक मजदूरी पर काम करने लगे। इस दौरान वे पंद्रह दिनों पर घर आते थे। तब तक अपनी दो बहनों के बाद मेरा भी जन्म हो चुका था। मुझे पिता के आने पर माँ के खुश होने और जाने पर दुखी हो जाने के दिन थोड़े थोड़े याद हैं। लेकिन वह दिन तो मेरी यादों में बहुत खास है, जब मेरे परिवार ने दुबारा गाँव छोड़ा। उसी दिन राम सिंह की माई परदादा का फूल का लोटा बिलखते हुए ले आई थी। और बताया था कि किस तरह उसके ससुर ने नदी पार लुटेरों की जमात के साथ परदादा का रास्ता रोका था। पास में कुछ खास न मिलने पर वे फूल के लोटे को ही छीनने लगे। परदादा ने अंत तक कड़ा प्रतिरोध किया और आखिरकार वह नदी में फेंक दिए गए। घर लाने पर बहू यानी प्रेमसिंह की माई ने लोटे को पहचान लिया लेकिन ससुर के जीते जी उसकी बोलने की हिम्मत न हो सकी।

हम अपने सामानों के बीच लोटे को रख कर शहर को निकल गए। वहाँ 'नदेसर बाग' में रहने लगे। हमारे शहर आने की वजह पिता की नौकरी का मासिक भुगतान पर स्वीकृत हो जाना और बहुत मिन्नतों के बाद एक सरकारी कमरा मिल जाना था। गली मुहल्ले साफ करने का काम जो हमें ठीक से पढ़ा लिखा सकने के लिए चल रहा था, पिता उसे आज भी नहीं छोड़ पाए। हालाँकि मुझे उम्मीद है कि मेरी दूसरी बहन की शादी के बाद वे मेरी बात मान लेंगे और काम करना बंद कर देंगे। रही घर के खर्च की बात, तो बड़े जीजा की सिफारिश से मुझे 'तीर्थराज फार्मास्युटिकल्स' में बतौर सेल्समैन रख लिया गया है। अब कुछ ही दिनों में कई मुश्किलें खत्म हो जाएँगी। लेकिन इसके लिए मुझे एक बात याद रखनी होगी कि बड़े चाचा का छोटा बेटा, जो 'तीर्थराज फार्मास्युटिकल्स' का मालिक है, मेरा भाई कतई नहीं लगता।

और तीर्थराज?

इस नाम का तो कोई मेरा पूर्वज था ही नहीं। सच मानिए तो मुझे आज भी यह सब एक गढ़ी हुई कहानी सा लगता है। और मैं इसे कहानी साबित करने की निरंतर कोशिश भी करता हूँ। लेकिन फूल का लोटा और प्रेम सिंह की माई के बिलखने की याद अकसर सामने आ जाती है और मैं डर जाता हूँ। पर मुझे यकीन है कि एक दिन मैं उस लोटे और उस याद को झूठ साबित कर दूँगा।

लेकिन इसके बदले आपको भी एक वादा करना होगा कि ये बातें आप अपने तक ही रखेंगे। मेरे चाचा या उनके किसी बेटे तक तो बिलकुल नहीं पहुँचें। वर्ना मैं पागल करार दिया जाऊँगा और पागलों के लिए मेरे खानदान में कोई जगह नहीं।


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