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कहानी

गुरुत्वाकर्षण
श्रीकांत दुबे


हवाई जहाज का रंग लाल था। धरती की सतह छोड़ने के वक्त की उसकी रफ्तार से लगता था कि उसमें बैठे लोग उतनी ही रफ्तार से शहर को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। लेकिन जल्द ही रफ्तार के रोमांच को एक हैरतंगेज ऊँचाई ने फीका कर दिया। फिर थोड़ी ही देर में हवाई जहाज अंतरिक्ष की गोद में गायब हो गया। आगे की संभावना यह थी कि जहाज दो सागरों और दसियों देशों के ऊपर से उड़ता हुआ जोहान्सबर्ग नाम के शहर में उतरेगा। उस वक्त अनमोल श्रीवास्तव की घड़ी आठ बजकर इकतालीस मिनट बजा रही थी जब उनके मोबाइल पर एक संदेश आया, 'Reached'। उन्होंने तुरंत ही उसका जवाब भेज दिया था 'Ok. Take care'।

ऐसा होने के बाद, दिनों की एक पखवारे भर वाली किस्त बीत गई, अनमोल श्रीवास्तव फिर से हवाई अड्डे पर थे। वे विमान आने के वक्त से घंटे भर पहले वहाँ पहुँच गए थे और सामने लगे एलसीडी स्क्रीन्स पर उगती उड़ानों की स्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय समाचारों के अलावा रिवर्स फारवर्ड करके अपनी यादों की फिल्मी रील को भी देखे जा रहे थे।

हर हँसी का एक चेहरा होता है जो हँसने वालों की ही तर्ज पर अलग अलग तरह का हो सकता है। मेरा मतलब गोल हँसी, पतली हँसी, साँवली हँसी या फिर एक तिरछी आँख वाली शरारती हँसी, और कोई कोई ऐसी हँसी भी कि जिसे आप देखना तक नहीं चाहते। हँसी के मामले में हमारे भीतर की डिफाल्ट सेटिंग कुछ इस तरह की होती है कि हम किसी भी अजनबी की हँसी के चेहरे के उसकी देह के चेहरे जैसा होने की उम्मीद किए बैठे रहते हैं। यूँ जब कभी यह प्रत्याशित मेल बिगड़ जाता है तो हम एक बेजरूरी, लेकिन घोर निराशा से भर जाते हैं जो ना ना करके भी कम से कम कुछ देर तक मुँह का स्वाद बिगाड़े ही रहती है।

प्रियंवदा सहाय के पास एक खूबसूरत और तार्किक गोलाई वाले चेहरे की हँसी थी, जिस पर आत्मविश्वास की एक स्थायी कलई भी चढ़ी रहती थी। मेरी हँसी मुझे या किसी और को कैसी लगती है मुझे नहीं पता था। लेकिन इसे जानने की ख्वाहिश मेरे भीतर एक अरसे से थी।

वो प्रियंवदा सहाय की हँसी के निरीक्षण वाले ही दिन थे जब एक रोज मैं अपने नितांत फालतू और सोमवार टाइप के समय में एक निहायत ही अजनबी गली से गुजर रहा था। ऐसा करते हुए मुझे एक खयाल यह आया कि मैं अपने किसी दोस्त को यह हिदायत देकर कि वह मेरी हँसी को गौर से देखे और बाद में उसके रंग और आकार के बारे में ठीक ठीक बताए, हँसना शुरू कर दूँ। एक दूसरी तरकीब यह भी सूझी कि मैं किसी सधे हुए फोटोग्राफर, जो कि हँसते हुए मेरे चेहरे से सिर्फ मेरी हँसी के चेहरे की तस्वीर को अलग कर सके, के सामने ऐसा करने के निर्देश के साथ हँसूँ। लेकिन चूँकि इन दोनों ही तरकीबों में मुझे दूसरों पर निर्भर होना पड़ता और मेरा शक्की मिजाज मुझे किसी भी गैर पर भरोसा करने की इजाजत नहीं देता (और अगर इजाजत दे भी दे तो मेरे इस बेतुके सनकीपन का हिस्सेदार होने भर की फुरसत किसे!) इसलिए इन विचारों को गली के सीलन भरे वातावरण में कहीं गुम हो जाना पड़ा। गली चूँकि आगे और भी दूर तक जाती थी इसलिए मेरे जेहन में आगे भी कुछ विचार उगते रहे लेकिन उनमें से ज्यादातर कोई फैंटेसी थे जैसे कि यह कि मैं अनजान बनने की कोशिश के साथ धीरे धीरे प्रियंवदा सहाय के बिलकुल करीब पहुँच जाऊँ और फिर अचानक ही जोर से हँसने लगूँ और मेरी हँसी पर प्रियंवदा सहाय की पहली प्रतिक्रिया के आधार पर ही अपनी हँसी के असल चेहरे का अनुमान लगा लूँ।

यूँ ही आ गया के जैसा एक दिन था वह और मेरे जेहन में उसके किसी भी हिस्से से जुड़ती कोई खास योजना नहीं थी।

वह ठीक दोपहर से एक या डेढ़ घंटे बाद दफ्तर में दाखिल हुई थी। वह मतलब प्रियंवदा सहाय। और दफ्तर में घुसने के ठीक सामने के खालीपन की बगल में बैठे विनोद चौधरी से सहायक संपादक त्रिपाठी जी का केबिन पूछी थी। त्रिपाठी जी अपना नाम पूछे जाने को खुद ही सुन लिए थे और अपनी रीढ़ को और सीधा करके गर्दन को मेज पर रखे पन्नों की दिशा में थोड़ा और झुका लिए थे। उन्होंने चाहा था कि काश उनके हाथ में एक कलम होती (दराज से निकालने का वक्त बिलकुल नहीं था)। ऐसा होने पर वह निश्चित रूप से किसी वाक्य या फिर कुछ शब्दों को एडिट करते। जरूरत और वाक्य विन्यास पर पड़ने वाले उसके असर की परवाह किए बिना भी। बहरहाल, प्रियंवदा सहाय उनके केबिन में घुसी थी और अपना नाम बताया था। त्रिपाठी जी ने नाम के बाद वाले स्वाभाविक सवाल, जो (और काम क्या है) होना था, की जगह उसे बैठ जाने को कहा था। बैठने के बाद उसने बताया था कि वह त्रिपाठी सर के लिखे लगभग सभी लेखों को पढ़ चुकी है और वो सब की सब उसे इतनी अच्छी लगीं कि वह उन्हें अब भी खूब पढ़ा करती है। जिसे सुनने के साथ त्रिपाठी जी इस अंदाज में मुस्कराए जैसे वे प्रियंवदा सहाय के वाक्य में घुली सारी चिकनाई को जैसे का तैसे स्वीकार कर लिए हों। लेकिन आगे उन्होंने जो कहा वो यह था कि जिसकी पचास से भी अधिक चीजें तुम्हारी पैदाइश से पहले ही छप चुकी हों उसके सारे लेखों को तुम कैसे पढ़ सकती हो? इसके बाद प्रियंवदा सहाय के चेहरे की रंगत शायद बदलने ही वाली थी कि त्रिपाठी सर फिर से बोलने लगे, "खैर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और अच्छी बात है जो तुम मुझे अब पढ़ा करती हो, अब बताओ क्या कर सकता हूँ मैं तुम्हारे लिए!" प्रियंवदा सहाय ने पहले से तैयार तरह का का जवाब दिया कि मुझे कोई काम चाहिए। त्रिपाठी सर ने पूछा कि किस तरह का काम, तो प्रियंवदा सहाय का जवाब था कि किसी भी तरह का हो, मैं कर लूँगी।

आगे से प्रियंवदा सहाय दफ्तर आने लगी थी। लेकिन हफ्ते में महज दो से तीन बार। और आने का वक्त लगभग वही जो पहले रोज उसके आने का था, मतलब ठीक दोपहर से एक या डेढ़ घंटे बाद। प्रियंवदा सहाय का दाखिल होना अखबार के दफ्तर में एक हड़बड़ी के दाखिल होने जैसा था जो प्रति हफ्ते दो से तीन बार की दर से करीब दो महीने तक चला था। इन दो महीनों में मेरे जेहन में प्रियंवदा सहाय के बारे में, और पता नहीं क्यों सिर्फ उसी के बारे में कुछ धारणाएँ बन आईं थीं। जैसे यह, कि प्रियंवदा सहाय सदाबहार दिखती है। महीने के अंत और शुरुआत का फर्क उसके चेहरे पर बिलकुल भी नहीं होता (इसकी वजह मुझे यह लगती थी कि वह सिर्फ काम करती है, तयशुदा पगार वाली कोई नौकरी नहीं।) और यह कि उसकी पतली और लंबी सी गर्दन उसकी पीठ के ठीक ऊपर हर वक्त कुछ इस अंदाज में तनी रहती है जैसे वह बुढ़ापे के दिनों में देह में आने वाले झुकाव का अभी से प्रतिरोध कर रही हो। और यह कि उसके दफ्तर में आने और वहाँ से जाने की रफ्तार से लगता है कि उसने अपनी जिंदगी में हरेक दिशा का सफर बहुत तेजी से तय किया होगा।

जिन दिनों में मैं अपने एक जैसे काम के साथ साथ प्रियंवदा सहाय के दफ्तर में दाखिल होने और फिर काम धाम पूरा करके वापस बाहर निकल जाना देखने का इंतजार किया करता था उसी दौरान कुछ ऐसा हुआ कि मैं खुद को उप संपादक उपेंद्र जी का शुक्रगुजार महसूस करने लगा। दरअसल उपेंद्र जी एक दूसरे और हमारे प्रतियोगी अखबार में वरिष्ठ उप संपादक के पद और तनख्वाह में ठीक ठाक अंतर वाली नौकरी जुगाड़ लिए थे और चंद रोज में ही वहाँ नियुक्त हो जाने वाले थे। उपेंद्र जी बिजनेस डेस्क पर थे, और मैं भी। आगे सहायक संपादक त्रिपाठी जी ने उनकी जगह प्रियंवदा सहाय की नियुक्ति पक्की कर दी। मतलब कि प्रियंवदा सहाय भी बिजनेस डेस्क पर, और मैं भी।

इसके एक पक्की खबर में तब्दील होने के अगले दिन प्रियंवदा सहाय ने रोज की दिनचर्या वाली नौकरी पक्की होने की खुशी से भरी मिठाई पूरे बिजनेस डेस्क पर बाँटी और सबसे आखिर में मुझे दिया। मुझे दिए जाने के वक्त डिब्बे में बर्फी के तीन चतुर्भुज बचे थे जिनमें से एक को निकालकर मेरी तरफ बढ़ाते हुए उसने अपनी आँखों के पूरे दायरे से एकबारगी मुझे देखा था। मैंने मिठाई लेते वक्त उसके देखने को अपनी आँखों की काली पुतली भर से देखा था और मेरे दिमाग में हिलाकर रखे फोस्टर्स बीयर के जैसा सनसनाता सा खयाल यह आया था कि काश वो ऐसी नजरों से, कभी कभार ही सही, लेकिन ऐसा होने पर हर बार ही, सिर्फ और सिर्फ मुझे ही देखती! बची हुई दो बर्फियाँ डिब्बे में ही रहीं, जिन्हें वह वापस अपने बैग में रख ली। मुझे इस सोच की वजह से काफी दुख हुआ कि बाद में वह किन्हीं और दो लोगों को वह बर्फियाँ देगी और वैसी ही बड़ी बड़ी, भरपूर आँखों से उन्हें देखते हुए भी, शायद! मेरे मन में एक ग्लानि थी कि क्यों नहीं मैंने बेशर्मी की हद तक जाकर भी उससे बाकी की दो बर्फियाँ माँग और खा लिया था।

मेरी साप्ताहिक छुट्टी सोमवार को होती थी। यह मेरी जिंदगी की इकलौती ऐसी चीज थी जो मुझे दुनिया भर के उन करोड़ों कामकाजी लोगों से अलग करती थी जिनके लिए कि सोमवार काम के लिहाज से हफ्ते का पहला दिन हुआ करता है। प्रियंवदा सहाय की साप्ताहिक छुट्टी तब तक तय नहीं थी (नियुक्ति के बाद के पहले हफ्ते में किसी को छुट्टी नहीं देना दफ्तर का एक अतार्किक सा नियम था)। और एक खास बात यह थी कि मेरे दिल में प्रियंवदा सहाय के लिए कुछ कुछ रहने लगा था। जो दफ्तर से लौटने और वापस दफ्तर पहुँचने के बीच के दौर में तो रहता ही था, सोमवार का खाली खाली सा दिन भी उसी के एहसास से भरा रहता था।

प्रियंवदा सहाय को दिए गए नियुक्तिपत्र में उसका पद "उप संपादक/रिपोर्टर" का था। लगभग डेढ़ साल पहले मिले मेरे नियुक्तिपत्र के अनुसार मेरा पद भी यही था। बिजनेस डेस्क की खबरों के लिए दफ्तर में कोई रिपोर्टर नहीं था। और रिपोर्टर की जगह यूएनआई, पीटीआई, आईएएनएस और रायटर्स जैसी समाचार एजेंसियाँ थीं, जहाँ से खबरों को चुन और पढ़कर हम अपने अखबार के लिए उनका अनुवाद या उसी आशय की खबर को अपनी भाषा में लिखते हुए उन्हें एक नई तासीर देने की कोशिश करते थे। चूँकि ज्यादातर समाचार एजेंसियाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की थीं इसलिए अमूमन हमारे अखबार में बिजनेस से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय खबरें ही छपती थीं, जो कि अखबार के प्रकाशक को ग्लोबलाइजेशन जैसी बातों के हवाले से यह कहकर इतराने का मौका देता था कि हम तो लोकल खबरों पर ध्यान ही नहीं देते। प्रियंवदा सहाय ने अपनी नियुक्ति के बाद के दूसरे दिन ही दफ्तर के इस नितांत निजी मामले में अपना दखल दर्ज कर दिया। और डेस्क इंचार्ज दिनेश चौबे जी को सलाह दे डाली, कि अगर अब तक यहाँ रिपोर्टिंग नहीं होती थी, तो अब तो इसे शुरू ही कर देना चाहिए। इससे हम हर रोज और अखबारों से कुछ अलग देने की कोशिश करेंगे और मार्केट में मजबूत भी होंगे। इसके अलावा राजधानी की बिजनेस हलचलों की खबरें क्षेत्रीय उद्योगपतियों को विज्ञापन देने के लिए भी प्रेरित करेंगी। दिनेश चौबे जी प्रियंवदा सहाय को एकबारगी यह समझाना चाहे कि यहाँ जो होता आ रहा है उससे हटकर कुछ करने का चलन नहीं है। और तुम जो कह रही हो वह एक बड़ा फैसला है और तुम्हें इस बारे में कुछ भी नहीं सोचना चाहिए। लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने प्रियंवदा सहाय को उसकी बात के साथ फिर से सहायक संपादक त्रिपाठी जी तक पहुँचा दिया। वहाँ भी प्रियंवदा सहाय ने अपने वही तर्क रखे और उसमें यह भी जोड़ दिया कि बिजनेस से जुड़ी अच्छी और नई खबरें कैसे और कहाँ से आएँगीं, इसका जिम्मा भी आप मुझ पर डाल सकते हैं। त्रिपाठी जी ने और भी कई सारे तर्क वितर्क किए और फिर प्रियंवदा सहाय की पेशकश को अपने गंभीर चेहरे के साथ खुशी खुशी मान लिया। प्रियंवदा सहाय को उसी रोज रिपोर्टिंग के लिए जाने और कुछ शानदार सा ले आने को भेज दिया गया।

अगली सुबह प्रियंवदा सहाय के नाम के साथ बिजनेस पेज पर जो खबर छपी वह शेयर बाजार के लगातार गोते लगाते जाने वाले दिनों के बीच अचानक ही आने वाले एक सुधार की कवायद करता था। यह देश के तीन सबसे बड़े अर्थशास्त्रियों से की गई बातचीत से निकला निष्कर्ष था, जिसे प्रियंवदा सहाय ने अपने ही तरीके से निकाल कर हेडलाइन बना डाला था। बाजार के बिगड़ते ही जाने की संभावना वाली खबरों से भरे दौर में यह एक अलग खबर थी और अखबार के समूह संपादक खरे जी तक को पसंद आई। यूँ अपनी उस पहली रिपोर्टिंग के साथ साथ प्रियंवदा सहाय अपने नियुक्तिपत्र में पद के सामने लिखे शब्दों में से स्लैश (/) के चिह्न के दूसरी ओर चली गई थी। मतलब कि रिपोर्टर बन गई थी। मैं स्लैश की पहली ही तरफ था और लगभग डेढ़ साल से था। स्लैश के इस और उस ओर होने का सबसे बड़ा फर्क यह था कि इस ओर के लोगों का नाम अखबार के किसी भी पन्ने पर और कभी नहीं छपता था, जबकि उस ओर के लोगों का लगभग हर रोज और उनकी हरेक रिपोर्ट के साथ।

उस दौर की रातों में मेरी रिहाइश के आस पास के सुनसान इलाके के ऊपर तारों, और अकसर के चाँद से सजा आसमान छाया रहता था। लेकिन मेरे जेहन पर प्रियंवदा सहाय। यूँ तब तक मेरे दिमाग में आने वाले उसके ज्यादातर खयालों में मुझे उसकी किस्मत से रश्क हुआ करता था। मुहजले अँधेरे में कभी दो तीन आलू पराठे और चाय, तो कभी राजमा चावल की एक अदद प्लेट की तलाश में अट्टा चौराहे की तरफ बढ़ते, कुछ न कुछ खाते और फिर वापस आते हुए उसकी किस्मत के बरक्स मैं बरबस ही अपने बीते कुछेक वर्षों की कल्पनाएँ करने लगता था।

कल्पनाओं में खासतौर से डेढ़ बरस पहले से तब तक का समय। जो मेरी पत्रकारिता की उस पढ़ाई के दो सालों के अंत के साथ शुरू हुआ था जिसमें कि हमें बताया गया था कि एक पत्रकार का काम रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने जैसा होता है। लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद जब मैं काम धाम के इरादे से मार्केट, यानी कि खबरों के बाजार में उतरा था तो मुझे एहसास हुआ कि उस पाठ में एक भारी सुधार की दरकार थी। क्योंकि पानी पी पाने के लिए खोदे जाने वाले कुओं की जमीन मिलना इस सिलसिले की पहली और सबसे अहम चुनौती थी। यूँ मुझे बस कुछेक महीनों में ही पत्रकारिता से जुड़े छोटे मोटे काम मिलने लगे थे और जो बड़े से शुरू करके छोटे अखबार और पत्रिकाओं के दफ्तरों की लगातार तफरीह के बाद हाथ लगते थे और जिनमें से शुरुआती कई जगहों से मुझे काम के बदले मुद्रा के रूप में कोई भी पारिश्रमिक देने से यह कहकर इनकार कर दिया जाता था कि हम तुमसे काम कराकर तुम्हारे लिए एक अच्छा प्लेटफार्म तैयार कर रहे हैं, जिसकी बदौलत तुम अपने पत्रकारिता के कॅरिअर में जल्दी ही बहुत आगे निकल सकोगे। ऐसे दिलासों पर मुझे पूरा यकीन हुआ करता था और मैं जी जान से लगा हुआ फिर से महानगर के किसी एक कोने से कोई दुर्लभ चीज, जो कि हर बार कोई खबर ही होती थी थी और ज्यादातर दफे उनके अधिकतर हिस्से गलत भी हो जाते थे, निकाल कर ले आने के लिए चला जाता था। कुछेक संपादक, जो कि मेरी इस तरह की लगातार और कई दफा की मेहनतों के बदले किसी भी हालत में चेकबुक की एक अदद पत्ती तक नहीं देने का निश्चय कर चुके होते थे, मुझे भविष्य का सफलतम खोजी पत्रकार साबित कर दिया करते थे। इस तरह कम से कम पूरे एक साल तक चलने वाले इस दौर ने मेरी रगों में महानगर के अलग अलग हिस्सों का पानी और पेशियों में अनगिन ढाबों का बेतुका, और बहुत बार तेज भूख की हालत में बहुत अच्छा भी लगने वाला खाना भर दिया था। यूँ उस पूरे दौर में, जिसमें कि एक ठंड का हरा भरा मौसम भी आया था, मेरे जिस्म से इतना सारा पसीना और इतनी दफा उल्टियाँ और दस्त भी निकले थे कि कहा जा सकता है कि आखिरकार मेरी देह के संघटन में उसी एक साल में कमाई चीजें बच गईं थीं। मतलब की अगर दिमाग में बैठे परंपराओं और भाषा के कचरे और स्कूली ज्ञान को छोड़ दें तो मैं अपने अतीत से पूरी तरह से मुक्त हो चुका था। लंबाई तो उसके पहले के कई सालों से अब तक के ही स्तर पर स्थिर थी, लेकिन चौड़ाई में उल्लेखनीय कमी आ गई थी। जिसकी वजह से कमर और कूल्हे एक समान चौड़ाई वाले हो गए। नतीजतन मेरी पढ़ाई वाले दौर के दो के दोनों जींस सरककर बार बार पैर में के चप्पल के नीचे आकर घिसते हुए फट गए थे। अब तक उनकी जगह भी पैंट और जींस के एक नए जोड़े ने ले ली थी। वह नया जोड़ा क्रमशः मेरी दूसरी और तीसरी कमाई की बदौलत तैयार हो सका था। पहली कमाई का इस्तेमाल इस बाबत इसलिए नहीं किया जा सका था, क्योंकि उसका मेहनताना मुझे तब तक नहीं मिला था। यूँ वह मुझे आज तक भी नहीं मिल सका है। पहली कमाई के उद्देश्य से किया हुआ अपना वह पहला काम मैंने जिस पत्रिका के लिए किया था उसके संपादक बाद के कई महीनों तक यही कहते रहे थे कि भारत और चीन के बीच के व्यापारिक संबंधों पर की गई तुम्हारी कवर स्टोरी पाठकों को बिलकुल भी रास नहीं आई और उस महीने पत्रिका की बिक्री बाकी के किसी भी महीने की तुलना में कम रही और हम फ्रीलांस लेखकों को पत्रिका की साख बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन और पैसे दिया करते हैं, न कि घटाने के लिए। लेकिन यह हालत हर जगह नहीं रही और मैं कम से कम देश के नागरिकों के औसत जीवन स्तर वाली जिंदगी कायम रखने भर की कमाई कर पाने के लायक हो गया था।

आखिरकार मुझे एक बड़े से अखबार में प्रशिक्षार्थी पत्रकार यानी ट्रेनी जर्नलिस्ट की नौकरी मिल गई थी। नियुक्ति के लिए हमें उस अखबार के विशालकाय दफ्तर, जिसका कि विस्तार पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर, शकरपुर और त्रिलोकपुरी जैसे इलाकों में सरकार द्वारा छोड़े गए पार्क की जमीनों से कम से कम दो या तीन गुना ज्यादा था, में एक लिखित परीक्षा और जाँच के न जाने किन मानकों के आधार पर उसे उत्तीर्ण कर लेने के बाद एक साक्षात्कार देना पड़ा। अखबार का नाम पूरे देश में था और उसका दफ्तर भी, जाहिर तौर पर, बहुत बड़ा था और नियुक्ति के बाद की मेरी तनख्वाह किसी भी हालत में दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमाओं के संक्रमण के इलाके में स्थित मेरे एक कमरे के किराए, दोनो वक्त के जैसे तैसे खाने और महीने दो महीने में कोई कपड़ा वगैरह खरीद लेने के लिए जरूरी पैसों से कहीं ज्यादा ही होने वाला था।

मेरे अपने घर वाले छोटे शहर में घर, पड़ोस, और रिश्तेदारियों में बेरोजगार अग्रजों की लंबी फेहरिश्त को नजर में रखते हुए यह मेरे लिए, बेशक, एक बड़ी नौकरी थी। वहाँ से मेरी जिंदगी के पहले और फिलवक्त तक के आखिरी ऐसे दौर की शुरुआत हुई थी जिसमें कि मुझे रोज के आठ घंटों तक कुछ कुछ करने और मौके चुराकर बहुत कुछ नहीं करने का भी पैसा मिलता था। तब से आज तक की मेरी दिनचर्या कुछ ऐसी रही है कि किसी एक हफ्ते के महज दो तीन रोज तक मेरी गतिविधियों पर नजर रखने वाला कोई शख्स यह आसानी से बता सकता है कि पिछले साल अगस्त महीने के तीसरे शुक्रवार को मेरी दिनचर्या क्या थी? बीच में एक थोड़ी सी फेरबदल जरूर हुई थी और बीते अप्रैल में मुझे एक तरक्की देकर उपसंपादक भी बना दिया गया था, और जिसके कि नतीजे के तौर पर मेरी तनख्वाह में भी थोड़ा इजाफा हो गया था, लेकिन इसका मेरी निजी जिंदगी पर कोई खास असर नहीं हुआ और मैं उसी रूटीन में सोता, जागता, ऑफिस जाता, और उतनी ही मात्रा की सक्रियता और आलस्य से घिरा रहता था। तनख्वाह में मिलने वाले अतिरिक्त रुपए मुझे कनाट प्लेस के जनपथ मार्केट से मोलभाव की कला में जरूरी दक्षता नहीं रखने के बावजूद सस्ती दरों और 'सिंपल का सिंपल और स्टाइल का स्टाइल' वाली जींस-टी शर्ट मुहैया करा देने के अतिरिक्त देश के किसी भी बैंक में मेरे इकलौते खाते, जो कि कारपोरेशन बैंक में खुला मेरा सैलरी एकाउंट था, में पड़े रहते थे।

मौसम टहाटह गर्मियों का था और देश के पूर्वोत्तर हिस्से से मानसून के चलने और लगातार पश्चिम की ओर आते जाने की खबरों का छपना शुरू हो गया था। यूँ मानसून के आने और आते ही जाने की खबर हद से हद एक लाइन में ही लिखी होती थी और खबर को जानने के लिए पाठकों को अमूमन उसे पढ़ना भी नहीं पड़ता था। दरअसल वह 'आया सावन झूम के...' जैसे कैप्शन वाली कोई फोटो हुआ करती थी जिसमें तेज हवादार बारिश में भागती-भीगती कोई लड़की, या फिर बारिश के बाद सड़क पर लग आए पानी के जमघट के बीच से पल्लू सँभालते जा रही युवतियों के चित्र हुआ करते थे।

उन दिनों की, अखबार में नहीं छपने वाली, पर सबसे बड़ी खबर यह थी कि प्रियंवदा सहाय तेजी से छाने लगी थी। अगर मैं कहूँ कि मेरे दिलो दिमाग पर, तो यह पहले कही बात का दुहराव होगा, इसलिए इस दफा पूरे दफ्तर पर। दफ्तर में सारे लोग उसे देखते, और देखने के लिए कहीं न कहीं से गुंजाइश जरूर ही निकाल लेते, और दूर दूर से देखते। और दूर से यूँ देखते जैसे एक दूरी पर रखे या चलते फिरते किसी विस्फोटक को देख रहे हों, और जैसे उसके कभी भी फट जाने की एक लगातार संभावना उसके साथ चल रही हो, और इसीलिए उससे अपनी सुरक्षा के मद्देनजर उससे एक दूरी भी अनिवार्य हो। प्रियंवदा सहाय की तब तक की सबसे ज्यादा बातें त्रिपाठी सर से होतीं थीं, उनके खुले दरवाजे वाले केबिन में। त्रिपाठी सर का रुख केबिन के दरवाजे की ओर होता था। लिहाजा वे अपने सामने के तीन चौथाई हिस्सा दफ्तर को देख सकते थे। केबिन चूँकि अर्धपारदर्शी काँच का बना था, इसलिए बाकी के एक चौथाई हिस्से की भी आहटें ली जा सकती थीं। तो प्रियंवदा सहाय से बात करते हुए त्रिपाठी सर यह महसूस कर सकते थे कि उससे बात करने के दौरान उनका केबिन लगभग समूचे दफ्तर के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। और चूँकि इसकी वजह जाहिर तौर पर प्रियंवदा सहाय थीं, इसलिए मुझे लगता है कि उनके मन में कभी न कभी यह बात जरूर आई होगी कि वो भी खुद से बात करती प्रियंवदा सहाय को केबिन के बाहर जाकर, यानि कि प्रियंवदा सहाय के पीछे से देखें।

प्रियंवदा सहाय अपने जीवन में इलेक्ट्रानिक सूचनाओं से भी तेज होना चाहती थी। वह किसी खबर को तैयार कर उसे प्रिंट का कमांड देती और कमांड के प्रिंटर तक पहुँचने से पहले खुद ही वहाँ पहुँच जाती थी। ठीक वहीं मुझे जैसे इस बात पर यकीन था कि जीवन में की हुई मेरी किसी भी जल्दबाजी का दुनिया की गति पर कोई भी असर नहीं होने वाला। अकसर तो यूँ होता था कि प्रिंटर के पास से अपनी खबर वाला पन्ना उठाने की जल्दबाजी में प्रियंवदा सहाय कोई दूसरा ही पन्ना उठा लेती, और कई दफा वह पन्ना मेरी खबर वाला निकल जाता था। इसमें दोनों की खबरों के एक साथ तैयार हो जाने की टाइमिंग पर इसलिए ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि मैं अपनी खबर के प्रिंट का कमांड देने के काफी वक्त बाद उसे लेने जाता था। हाँ, यह बात यकीनन सच थी कि मैं अपने खबर का पन्ना लेने के लिए उसी वक्त जाना पसंद करता था जबकि प्रिंटर के पास पहले से ही प्रियंवदा सहाय की उपस्थिति हो या फिर कुछ ही क्षणों में हो जाने वाली हो। यूँ मेरी खबर वाला पन्ना उठा लेने वाले हरेक मौके पर उसकी अगली हरकत उसे झट से वापस रख देना और तब तक निकल आए खुद उसके पन्ने को लेकर वापस चल देना होता था। जिसके बाद मैं भी उस संभावना की कल्पना के साथ अपने डेस्क की ओर टहलने लगता जिसके मुताबिक वह किसी रोज मेरी खबर वाले पन्ने को बिना कुछ कहे, और मेरी आँखों में मिठाई वाले रोज के जैसी भरपूर आँखों से देखते हुए, मुझे पकड़ा रही होती थी। उम्मीद के बदले हाथ लगने वाली ऐसी हर बार की निराशा का मैं आदी था, लेकिन इसका मेरी उम्मीद से भरी कल्पनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता था।

प्रियंवदा सहाय के लिए कुछ कुछ महसूस करना मुझपर लगातार हावी था ।

उन्हीं दिनों हुई एक सुबह थी वह जब सूरज ने अपने जागने के साथ ही वातावरण को एक अनावश्यक पीले रंग और ढेर सारी उमस से भर दिया था और बिना किसी खबर और आशंका के देश की अर्थव्यवस्था में चुपचाप एक मामूली सा सुधार आ गया था। मतलब कि मैं उन अपेक्षाकृत कंगाली के दिनों में सौ रुपए के उस एक नोट से भी महरूम हो गया था जो कि चिपचिपे मुँह का पसीना पोछने के लिए जेब से निकाली रूमाल के साथ निकला और फिर बीच राह में उसका साथ छोड़कर पैरों के नीचे बिछी जाली से होता हुआ उससे भी नीचे की नाली में जा समाया था। मुझ पर बचपन से जारी उस परंपरा जैसे ज्ञान का असर था जिसके मुताबिक पैसा सिर्फ पैसा होता है और एक के पास से जाने की हरेक स्थिति में किसी न किसी और के पास पहुँच जाता है। लेकिन इस मामले में तय था कि पैसा मेरे पास से जा चुका था और दूसरे किसी के पास नहीं पहुँचने वाला था। पैसे के इस तरह से चले जाने के बाद मैं कुछ मिनटों तक उसकी वापसी कराने वाली किसी युक्ति के अचानक ही अपने दिमाग में उग आने का इंतजार करता रहा, जिसका कि अंत एक मारक निराशा के साथ हुआ।

असल में उस दिन के लिए मेरी पूरी तैयारी थी कि मैं जलती दोपहर और खुलती शाम के बीच के किसी कुम्हलाए से वक्त में प्रियंवदा सहाय को आफिस के पास वाले कैफे काफी डे में, जहाँ कि मैं उससे पहले कभी नहीं गया था, जाने, कुछ देर यूँ ही बैठने और एक काफी पीने की पेशकश करूँगा। पिछले कुछेक रोज में दिखे प्रियंवदा सहाय के चेहरे को यादकर मुझे लगता था कि मेरी पेशकश कम से कम उसे बुरी तो बिलकुल ही नहीं लगेगी। बहरहाल, अनजाने ही चले गए वे सौ रुपए मेरे इस नेक खयाल के अमली चेहरे को भी अपने साथ लेते गए थे। पैसे के मामले में मेरा रिश्ता दफ्तर में सिर्फ सब एडिटर अनुराग तिवारी के साथ, और वो भी सिर्फ जरूरत के वक्त में दो दफा उन्हें पचास और बीस रुपए नोट दे देने का था। यूँ मेरे पास 'देन' की दो बीती घटनाओं के आधार पर 'लेन' की माँग करने का एक अकथित, लेकिन पक्का अधिकार था। लेकिन अनुराग तिवारी से पचास रुपए मिल जाने की सकारात्मक स्थिति में भी मैं 'फिलहाल इन रुपयों की जरूरत...' से जुड़ते अनुराग तिवारी के सवाल का सामना भी नहीं करना चाहता था। मेरे संज्ञान में आस पास के इलाके में कारपोरेशन बैंक का मेरी सैलरी एकाउंट का हिसाब रखने वाली इकलौती ब्रांच नोएडा मोड़ के पास थी, जिसके खुले रहने का समय शाम के चार बजे खतम हो जाता था। बैंक के पास एक एटीएम मशीन भी थी, लेकिन तब तक न तो मेरे पास उसके इस्तेमाल के लिए जरूरी एटीएम कार्ड ही था और न ही एटीएम कार्ड पाने के लिए जरूरी बैंक की फार्मलिटी की समझ। अमूमन मैं तनख्वाह आने के अगले दिन बारह बजे से शुरू होने वाली अपनी शिफ्ट से थोड़ा पहले ही बैंक जाकर एकमुश्त रकम निकाल लेता था जो कि मुझे अपने जैसी दिनचर्या के सहारे महीने के अंत तक ले जाने के लिए काफी हुआ करती थी। वो भी महीने के आखिरी दिन थे और अगले तीसरे रोज ही हमारी तनख्वाह भी आ जाने वाली थी।

उस तीसरे दिन से ठीक पहले वाले रोज प्रियंवदा सहाय ने त्रिपाठी सर से एक और गुजारिश की, और वो गुजारिश थी उस दिन से शुरू होने वाली रिपोर्टिंग में उसके साथ एक सहायक रिपोर्टर के भेजे जाने की। इसके लिए प्रियंवदा सहाय ने जो वजह बताई वो यह थी कि आज से शुरू हो रही बैठक काफी महत्वपूर्ण है। और इसमें शिरकत करने कई देशों से लोग आ रहे हैं, लिहाजा अगर एक ही साथ हम कई लोगों का इंटरव्यू कर लें तो उसका इस्तेमाल अगले कई दिनों तक कर पाएँगे। बैठक में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में देश की भागीदारी बढाने के मसले पर चर्चा के लिए विदेशों, और खासतौर से न्यूजीलैंड के एक व्यापारिक संगठन 'बिजनेस न्यूजीलैंड' से लोगों को आना था।

जहाँ इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े सारे संवाददाता अपने साथ वीडियो और वाइस रिकार्डर लेकर चलते थे, वहीं मेरे अखबार के प्रबंधन ने अपने इतिहास में कभी भी रिपोर्टिंग के लिए इस युक्ति का इस्तेमाल नहीं किया था। और ऐसे में हर बार वह अपने कर्मचारियों की याददास्त के किसी रिकार्डर की तरह अचूक होने का उम्मीद करता था।

यूँ प्रियंवदा सहाय की रोज की रिपोर्टिंग वाला आइडिया इतना हिट हो चुका था कि उसकी एक सहायक रिपोर्टर से जुड़ी यह गुजारिश आसानी से कबूल कर ली जाती, लेकिन त्रिपाठी सर द्वारा इस दफे भी सहमति मिल जाने की एक दूसरी वजह इस माँग का फिर से प्रियंवदा सहाय का होना माना जा सकता है। बहरहाल, प्रियंवदा सहाय को एक सहायक रिपोर्टर दिया गया, और मेरी खुशकिस्मती, कि वह सहायक रिपोर्टर मैं था। यूँ अगर मैं चाहता तो एक जूनियर का सहायक बनाए जाने के त्रिपाठी सर के फैसले पर भीतर ही भीतर खफा हो सकता था और दफ्तर के बाहर की चाय दुकान पर लगने वाली दो चार सहकर्मियों की जमघट में अपने गुस्से को जाहिर भी कर सकता था, लेकिन मामला चूँकि प्रियंवदा सहाय का था इसलिए मैं फिर से एक बार दुखी होने के गुंजाइश के पूरे स्पेस में खुश था।

रिपोर्टिंग के लिए तय किया सफर ऐसा रहा जिसमें मैं खुद को प्रियंवदा सहाय के सामने दबा सहमा महसूस करता रहा। इसकी प्रत्यक्ष वजह यह थी कि मेरी जेब में अपने दफ्तरी काम के शिफ्ट के खत्म होने पर घर वापस होने भर के ही पैसे थे। और रिपोर्टिंग का काम पूरा करने के लिए आफिस आने के बाद भी वापस घर लौटना तो था ही। इसलिए रास्ते में बदली जाने वाली दो बसों में अपने साथ साथ मेरा भी किराया प्रियंवदा सहाय को ही देना पड़ा था और मुझसे औपचारिकता से भरा वाक्य 'अरे आप रहने दीजिए, मैं दे देता हूँ' भी नहीं कहा जा सका था। हालाँकि मुझे इस बात का भरोसा है कि किराए के मेरे द्वारा दिए जाने की स्थिति में भी, आखिरकार मैं प्रियंवदा सहाय के सामने दबा सहमा ही रहा होता। इसके लिए जिम्मेदार चीज मेरा दब्बूपन तो है ही, लेकिन उससे कहीं अहम है प्रियंवदा सहाय का तेज ही नहीं, बल्कि बहुत तेज होना।

हम रिपोर्टिंग के लिए फिक्की के कार्यालय पर गए थे। मैं बैठक की शुरुआत से ही अपने काम को लेकर काफी गंभीर हो गया था। मतलब कि बोले जाने वाले एक एक शब्द को नोटबुक में उतार लेने की कोशिश कर रहा था। कुल मिलाकर ग्यारह लोगों ने अपने वक्तव्य दिए। और उन्हें नोट करने में मैंने अपनी नोटबुक के लगभग आधी तादाद के पन्नों को खर्च कर दिया था। प्रियंवदा सहाय भी कभी कभार कुछ लिख लिया करती थी, लेकिन दस बारह वाक्यों को सुनने के बाद कोई दो चार शब्द। बैठक खत्म होने के बाद प्रियंवदा सहाय पहले से अधिक सक्रिय हो गई और फिक्की और बिजनेस न्यूजीलैंड के कुछ प्रतिनिधियों से बारी बारी अपने चार पाँच सवाल किए, मैं जल्दी जल्दी उसे नोट करता रहा। काम खत्म होने पर हमने अतिथियों के लिए उपलब्ध नाश्ता, मीडिया परसन और रिपोर्टर होने की अजीब सी ठसक के साथ किया और वापस चलने लगे। बाहर दिन शाम की तरफ तेजी से बढ़ रहा था और फिलवक्त उससे कुछ एक घंटे की दूरी पर था। वातावरण हमारे चेहरों पर दिन की गर्मी से भरी हवा के अंतिम झोंके उँड़ेले जा रहा था। बस स्टैंड तक पहुँचने के लिए हमें लगभग चार सौ मीटर का पैदल सफर तय करना पड़ता। जिसका रास्ता काफी चौड़ा और उतना ही सुनसान था। मैंने आडिटोरियम से निकलकर उधर का रुख कर लिया था, और कुछ ही कदम चला था कि प्रियंवदा सहाय ने आवाज दी 'अनमोल! अभी थोड़ा रुककर चलते हैं बस स्टैंड।' यह प्रियंवदा सहाय के मुँह से पहली बार निकला मेरा नाम था, जो पहली बार के जैसा ही लगा। उससे पहले के संबोधनों में हर बार उसने मुझे 'आप' कहा था, और चूँकि उसने उससे पहले मेरे बारे में किसी और से कोई बात नहीं ही की होगी, इसलिए पहले कभी मेरा नाम भी नहीं लिया होगा। प्रियंवदा सहाय मुझे ऐसा बोलकर खुद धीमी रफ्तार से चलती रही। लेकिन मेरी विपरीत दिशा में। मैं तेज चलकर उसके समानांतर पहुँचा और पूछा कि इधर कहाँ! उसने कहा, 'सेंट्रल पार्क'।

यूँ सेंट्रल पार्क में भी सूखी गर्मी के किसी दिन के आखिरी हिस्से में बची रहने वाली, पूरी तरह से पीली धूप फैली हुई थी। लेकिन पार्क में चलती पानी की लगातार फुहारें और ढेर सारी हरियाली की वजह से गर्मी का एहसास औसतन कम था। इधर से उधर जाती पगडंडियों पर मैं प्रियंवदा सहाय के साथ बिना कुछ बोले घूमता जा रहा था। मैं पता नहीं क्यों जितना चुप था, प्रियंवदा सहाय पता नहीं क्यों उतनी ही खुश थी। यूँ चलते चलते वह एक जगह जाकर रुकी और एक ऊँची जमीन की मोटी घास पर बैठ गई। बगल में मैं भी बैठ गया और बहुत जरूरी काम के अलावा हर वक्त खाली रहने वाला मैं वहाँ करने के लिए कुछ खोजने लगा। करने में मैं शायद प्रियंवदा सहाय से उसके बारे में बातचीत ही शुरू करता, लेकिन उससे पहले मेरा ध्यान अपने हाथ में झूलते नोटबुक पर चला गया। मैंने नोटबुक के पन्नों को पलटते हुए कहा कि रिपोर्टिंग में तो इतने सारे नोट्स ले लिए मैंने, लेकिन इनको छोटा कर पाना काफी मुश्किल होगा। आगे बोलने की कमान प्रियंवदा सहाय ने सँभाल ली। उसने कहा कि वो उस जगह पर बोलने के लिए ही बैठे थे, इसलिए कुछ न कुछ और यूँ बहुत कुछ बोलते ही। लेकिन हमें सुनना सिर्फ उतना ही चाहिए जितने का कि हमें काम है। और हमारा काम सिर्फ इतने तक ही नहीं है। हमने जो सुना और लिखा है, अखबार के दफ्तर में जाकर हमें उसमें से वह छाँटना है जो कि हमें छापना है। और वहाँ पर सिर्फ ध्यान इस बात का बरतना है कि छापी जाने वाली चीज पूरी तरह से अतार्किक और झूठ न हो, और उसमें कुछ न कुछ सच्चाई तो जरूर हो। चंद मिनटों में ही मिल गई यह सीख मुझे इतनी व्यावहारिक और सटीक लगी कि मुझे पत्रकारिता के नाम पर की गई दो साल की खर्चीली पढ़ाई की निरर्थकता का बोध होने लगा।

मुझे लगा कि एक अच्छा पत्रकार होने के लिए सिर्फ प्रियंवदा सहाय होना काफी है। यूँ प्रियंवदा सहाय ने दफ्तर के काम धाम से जुड़ी इन बातों को जल्दी से और यह कहकर छोड़ दिया कि वहाँ का काम वहाँ देखेंगे, और फिर यहाँ तो मैं इसलिए चली आई कि यहाँ आना मुझे अच्छा लगता है और मैं पहले भी यहाँ अकसर आती रहती थी। थोड़ी देर तक मेरी चुप्पी का साथ देने के बाद प्रियंवदा सहाय ने पूछा कि तुम इतना चुप क्यों रहते हो! और जवाब का इंतजार किए बगैर बोली कि चलो तुमको आइसक्रीम खिलाती हूँ। जेब की खस्ताहालत के मद्देनजर मैंने एकबारगी इनकार किया, लेकिन आइसक्रीम खाने के लिए प्रियंवदा सहाय की लहक देखकर मुझे खुद के इनकार पर गुस्सा आया, प्रियंवदा सहाय ने मेरे इनकार पर ध्यान नहीं दिया और आइसक्रीम वाले के पास पहुँच कर दो ब्लैक फारेस्ट की फरमाइश कर दी।

रिपोर्टिंग अगले तीन दिनों तक जारी रही। और तीनों ही दिन हम सेंट्रल पार्क में आए। तीनों ही दिन हमने आइसक्रीम खाई। लेकिन उन दिनों में हमारे बीच होने वाली बातों का मुद्दा और लहजा अलग अलग तरह का रहा। यूँ, चौथे दिन के अंत तक आते आते हमारी बातचीत के तरीके इतने बदल गए थे कि अपने परिचय की दुनिया में खूब ज्यादा बोलने के लिए मशहूर प्रियंवदा सहाय मुझसे बहुत कम बोलने लगी थी। और प्रियंवदा सहाय से लगभग कभी नहीं बोलने वाला मैं अकसर ही उससे बातचीत की जुगत में रहने लगा था। तीन दिनों में शहर के मौसम में बहुत तब्दीली आ गई थी और लगभग तीनों ही रोज की दोपहरों में तपती गर्मियों की जगह खूबसूरत सी बारिश ने ले ली थी। उन तीन दिनों में हम भी बदल गए थे, पूरे के पूरे।

चौथे दिन की रिपोर्टिंग से वापसी के वक्त भी हल्की फुहारें जारी थीं, जो कपड़ों में राहत देने वाली एक नमीं भरती जा रही थीं। हमारे भीतर के किसी सूखे कोने में भी शायद ऐसी ही कोई नमी आ गई थी जिसका एहसास हम अपनी साँसों और धड़कनों की घटती बढ़ती तर्ज पर कर रहे थे। हम वापस दफ्तर पहुँचने के लिए एक नीले रंग की बस में चढ़ गए थे।

जब नीले रंग की लगभग भरी सी बस पुराने किले के पास से गुजर रही थी तो प्रियंवदा सहाय मेरे और भी करीब आ गई। थोड़ी ही देर में प्रियंवदा सहाय की बाईं बाँह मेरी दाईं बाँह के ठीक सामने दिखने लगी। लेकिन प्रियंवदा सहाय की बाँह द्वारा मेरी बाँह पर लगातार डाला जा रहा दबाव किसी को नहीं दिख रहा था। प्रियंवदा सहाय दबाव की तीव्रता को घटाते और बढ़ाते हुए मेरी बाँह के साथ धीरे धीरे अपने जिस्म के बाएँ हिस्से का घर्षण करने लगीं। प्रायः चुप ही रहने वाले 'मैं' की चुप्पी उस वक्त इतनी गहरा गई थी कि मुझे देखकर लग सकता था कि मैं कम से कम अगले कई घंटों तक यूँ ही कुछ नहीं बोलूँगा। इस बीच प्रियंवदा सहाय थोड़ा सा उचक कर अपनी हथेलियों का घेरा बनाते हुए मेरे दाएँ कान के करीब पहुँचीं और उसके भीतर से मेरे कान को चूम लिया। बस के ढेर सारे यात्रियों, जो कि हम दोनों को एक साथ बस में चढ़ने के वक्त से ही देखे जा रहे थे, ने यह समझा होगा कि प्रियंवदा सहाय ने मेरे कान में कुछ कहा है, जो संभावित तौर पर 'आई लव यू' या फिर किसी चुटकुले जैसी बात होगी। यूँ मैंने भी कुछ सुना था, जो कि कानों के रास्ते जिस्म के भीतर घुसी कोई आवाज तो बिलकुल ही नहीं थी। और जो था वो कुछ ऐसा था जो प्रियंवदा सहाय के होठों के स्पर्श से पैदा होकर मेरे सीने में चुपचाप एक विस्फोट सा कर गया था, जिसकी गूँज मेरे भीतर देर तक गुनगुनाती रही थी।

सात जून से पंद्रह जून के बीच का दौर यूँ तो एक हफ्ते और एक दिन का दौर था, और एक मंगलवार से शुरू होकर अगले मंगलवार को पार करता हुआ एक अनछुए से बुधवार तक जाता था, लेकिन मुझे यह दौर बहुत ही छोटा लगा था, और उसके बीच आने वाले दिन और रातों में मुझे प्रियंवदा सहाय के साथ गुजारे वक्त से जुड़ी चीजें ही इस कदर याद रहीं थीं कि मेरी याददाश्त की छानबीन करने पर उसमें उन दिनों और रातों से जुड़ी किसी और बात की कोई शिनाख्त शायद ही मिले। अगर बुधवार की सुबह में, यानी कि दफ्तर का काम शुरू करने के वक्त में सहायक संपादक त्रिपाठी जी या फिर डेस्क इनचार्ज दिनेश चौबे मुझसे बीते पूरे हफ्ते में किए काम का ब्यौरा माँगते और फिर मेरे जवाब का इंतजार करते, तो मैं भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि वे मुझे घंटों तक चुपचाप खड़ा पाते, हालाँकि उन दिनों में मैंने अपनी तब तक की नौकरी के किसी भी दौर में किए जाने वाले काम से ज्यादा काम किया था, और मेरी बनाई खबरों में शब्दों का चयन और इस्तेमाल भी काफी सटीक और सधा हुआ हुआ था, ऐसा खुद डेस्क इंचार्ज दिनेश चौबे जी ने भी कई बार माना था।

बुधवार के रोज जलती दोपहर और खुलती शाम के बीच के एक वैसे ही कुम्हलाए से वक्त में प्रियंवदा सहाय ने मुझे अपनी भरपूर आँखों के हल्के से इशारे से बाहर आने का संकेत दिया। मैंने इशारे की कोई प्रतिक्रिया देने की बजाय उसे कुछ देर तक देखते रहकर अपनी सहमति दर्ज कर दी। प्रियंवदा सहाय बाहर की ओर निकल गई, और दस पंद्रह सेकंड के फासले पर मैं भी उसके पीछे हो लिया। प्रियंवदा सहाय ने दफ्तर के गेट से बाहर निकलने के साथ अपनी रफ्तार धीमी कर ली और मुझे अपने साथ हो लेने दिया। दफ्तर की इमारत चौराहे एक कोने पर बनी थी। उसने उसी रफ्तार से पूरे चौराहे को पार किया जिस पर से हमारे पार करने के पूरे दौर में किसी भी और का गुजरना नहीं हुआ था। चौराहे के दूसरे कोने वाली सड़क के शुरू होने के साथ प्रियंवदा सहाय ने मेरा दायां हाथ पकड़ लिया था और लगभग सुनसान सी सड़क से फूटने वाली उस बिलकुल ही सुनसान गली में मुड़ गई थी जिसमें कि कैफे डे नाम का सुनसान रेस्तराँ था। रेस्तराँ में आठ दस लोग थे, मतलब चार पाँच जोड़े। सुनसान माहौल में बैठे हुए वे लोग रेस्तराँ में रखी कोई स्थायी चीजें लग रहे थे और इस बात की पुष्टि सी करते थे कि दुनिया के तमाम हिस्सों और देशों में अरबों लोगों का रहना हो या न हो, यहाँ ये आठ दस लोग तो रहेंगे ही। और इतने लंबे चौंड़े भूगोल पर बनी इस एक छोटी सी दुनिया में एक अलग अंदाज के साथ जिएँगे भी। वे लोग वहाँ वैसे ही पहुँचे हुए थे जैसे पहली बारिश के बाद वाली शाम में सड़कों के लैंप पोस्ट से लेकर घर के सबसे कोने वाले कमरे तक में पतंगे पहुँच जाते हैं, किन्हीं अनजान जगहों से उड़कर, किन्हीं अज्ञात रास्तों से होते हुए। प्रियंवदा सहाय और मैं एक नीची और छोटी सी मेज के दोनों ओर के सोफों पर बैठ गए। प्रियंवदा सहाय ने तब तक तो मेरा हाथ नहीं ही छोड़ा था, सोफे पर बैठने के बाद उसने मेरी हथेली को और भी जब्ती के साथ और दोनों हाथों के बीच पूरा का पूरा कैद कर लिया और मुझे लगातार और इस कदर देखने लगी जैसे मेरी आँखों में कोई एक आकर्षक गहराई हो, और जिसमें वह पूरी की पूरी उतर जाना चाहती हो। चंद मिनटों के बाद वेटर आया, तो प्रियंवदा सहाय ने मीनू कार्ड पर अंग्रेजी में लिखे कोल्ड काफी विथ आइसक्रीम के विकल्प के सामने सही का निशान लगाकर 2 लिख दिया। वेटर के आने के पहले से शुरू हुआ हम दोनों का एक दूसरे को देखते जाना उसके जाने के बाद भी जारी रहा। लेकिन वेटर के जाने के बाद प्रियंवदा सहाय को देखते हुए मेरे जेहन में कोल्ड कॉफी विथ आइसक्रीम के इंतजार ने भी एक हिस्सा ले लिया। इंतजार वाले हिस्से में अचानक खलल डाला प्रियंवदा सहाय के एक छोटे से वाक्य ने, जो कि बिलकुल ही अप्रत्याशित सा लगा था, क्योंकि आस पास के माहौल में हर किसी के चुप रहने से यह धारणा बन आई थी कि जैसे रेस्तराँ में घुसने के बाद चुप हो जाना वहाँ का एक अनिवार्य चलन हो।

प्रियंवदा सहाय ने कहा कि हम जुलाई में शादी कर लेंगे। शायद मेरे चेहरे पर कोई प्रश्नवाचक चिह्न उग आया था अचानक, जिसके जवाब में प्रियंवदा सहाय ने कहा था कि मैं पूछ नहीं, बता रही हूँ। प्रियंवदा सहाय का यह कहना मुझे जितना अजीब लगा, उससे कहीं ज्यादा अच्छा लगा। फैसले लेने में मैं हमेशा से कमजोर और दब्बू था, और जीवन में मेरे किए लगभग हरेक काम के पीछे किसी न किसी और के ही निर्णय थे। यूँ उन चंद दिनों के दरम्यान मेरे अस्तित्व में आए रासायनिक परिवर्तनों की बदौलत मुझे इस बात का पूरा और पक्का एहसास रहने लगा था कि प्रियंवदा सहाय अब मेरी है। कभी कभी तो यह भी लगता था कि वह पूरी की पूरी मेरी है, खासकर तब, जब वह मुझे एकटक देखने लगती थी, अकसर की तरह से कभी कभार। लिहाजा प्रियंवदा सहाय से, और इसीलिए प्रियंवदा सहाय के किसी फैसले से भी असहमत होने का कोई तर्क ही नहीं था मेरे पास। मैंने कोल्ड काफी विथ आइसक्रीम को पूरा का पूरा खतम कर दिया, और प्रियंवदा सहाय ने सिर्फ कोल्ड काफी को। प्रियंवदा सहाय के कप की तली में आइसक्रीम लगभग पूरी की पूरी बची रह गई थी, जिसे उसने मेरी तरफ यह कहकर बढ़ा दिया कि तुम्हें आइसक्रीम बहुत पसंद है, इसे खा लो। रेस्तराँ में हमने इतना वक्त बिता डाला था कि दफ्तर में वापसी के वक्त डेस्क इंचार्ज दिनेश चौबे जी मुझसे पूछ सकते थे कि इतनी देर के लिए कहाँ और क्यों गायब थे? प्रियंवदा सहाय से ऐसे किसी भी सवाल के न पूछे जाने की पक्की संभावना की दो वजहें थीं। पहली यह कि यह कि वह प्रियंवदा सहाय थी, और दूसरी यह कि डेस्क इंचार्ज दिनेश चौबे की जानकारी मुताबिक रेस्तराँ में मुझसे मुलाकात के वक्त में प्रियंवदा सहाय कहीं रिपोर्टिंग कर रही थी।

दफ्तर में मेरी वापसी को चंद मिनट ही हुए थे कि डेस्क इंचार्ज दिनेश चौबे का मोबाइल बज उठा और वे 'हैलो!' और 'बोलो प्रियंवदा' कहकर बात करने लगे। फिर उसके बाद की उनकी बातचीत से 'इससे मुझे क्या मतलब' वाले अभिनय के बावजूद अपना ध्यान हटा पाना तो मुमकिन ही नहीं था, यूँ जो हमने सुना उसका मतलब यह निकाला कि प्रियंवदा सहाय की तबीयत ठीक नहीं है। दिनेश चौबे द्वारा प्रियंवदा सहाय को 'अपना खयाल रखना' वाली हिदायत देकर फोन रखने के कुछ ही मिनटों बाद मुझे फिर से दफ्तर के बाहर निकलना पड़ा। मैंने चाय की दुकान से पाँच रुपए के एक सिक्के को एक एक रुपए के पाँच सिक्कों में तब्दील कर उनमें से एक रुपए की मदद से प्रियंवदा सहाय को फोन किया और उसकी तबीयत और हाल चाल पूछा। प्रियंवदा सहाय ने कहा कि उसकी तबीयत वाकई अच्छी नहीं है और उसकी खराब तबीयत की पुष्टि की प्रतिक्रिया वाले मेरे दूसरे सवाल से पहले ही फिर से बोल उठी, 'अरे मेरे प्यारे उल्लू! तुमसे मिलने के बाद वाकई तबीयत ऐसी हो गई कि काम नहीं करने का मन हो आया। इतना अच्छा फील कर रही हूँ कि इस फीलिंग को किसी घोंचू के इंटरव्यू से बरबाद नहीं करना। लव यू! सी यू! टेक केयर! बाई बाई!'

शादी की बात का मतलब जीवन की लकीर पर एक लंबी सी दूरी प्रियंवदा सहाय के साथ बिताने की बात। मैं इसे लेकर खुश था लेकिन अपने घर वालों, जो कि दूर के शहर आरा में रहते थे, की इस पर होने वाली प्रतिक्रिया से सशंकित भी। यूँ अब तक घर वालों ने मेरी खिलाफत या फिर हक में भी, ऐसा कुछ भी नहीं किया था जिसे कि याद रखा जाता। इसका दूसरा पहलू यह भी था कि मैंने भी घर वालों के लिए कभी ऐसा कुछ नहीं सोचा था। मतलब घर, शहर और नौकरी जैसी चीजों से जुड़े मेरे किसी फैसले या उपलब्धि का घर वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता था, और पिता के धान, गेंहूँ, या गन्ना बेचने और नदी के किनारे वाली, साल में सिर्फ एक ही लेकिन अच्छी फसल देने वाली जमीन खरीदने के फैसलों का मुझ पर भी। यूँ जानकारी दोनों ही पक्षों की गतिविधियों का दोनों ही पक्षों के पास रहा करती थी, लेकिन ऐसा क्यों और किसलिए था, इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं था।

जब मैंने पहले अपनी बहन से, फिर माँ से, और आखिरकार पिता से पहले प्रियंवदा सहाय और फिर उससे शादी करने की बात बताई तो सबने सबसे पहले इनकार किया और बात के अंत तक आते आते घनघोर असहमति व्यक्त करने वाली चुप्पी में चले गए।

घर से बातचीत और मान मनौव्वल का दौर एकाध हफ्ते तक चला, जिसके दौरान प्रियंवदा सहाय बदस्तूर अखबार की रिपोर्टिंग करती रहीं और मैं प्रियंवदा सहाय के लिए घर से हुई अपनी बातचीत की। अखबार में दी गई प्रियंवदा सहाय की हरेक रिपोर्ट हरेक अगले दिन अखबार में छपने के साथ लाखों लोगों के सामने जाती था, लेकिन मेरी रिपोर्टिंग सुनकर प्रियंवदा सहाय चुप हो जाती थी। यूँ मैं हर बार की उसकी चुप्पी देखकर थोड़ा आस्वस्त हो जाता था क्योंकि मुझे यकीन था इस मसले पर जारी प्रियंवदा सहाय की चुप्पी किसी ऐसे फैसले के साथ टूटेगी जो सारी उलझनों को निर्मूल कर देगा।

एक रात पिता ने फोन किया और कहा कि अगर तुमने जात और कुल और खानदान को अनदेखा कर ऐसा कोई फैसला लिया तो फिर आगे घर से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं होगा। और अगर तुम यह सोचते हो कि घर ने तुम्हारे लिए क्या किया, और वास्ता रखने का फायदा क्या है, तो बेटा याद रखना कि हमने भी जिंदगी में कुछ कमाया है और एक ठीक ठाक जायदाद का मालिक भी हूँ। पिता की बातें सुनते हुए उस रोज मैं चुप था।

अगली सुबह मैंने फिर से प्रियंवदा सहाय से इस बात की रिपोर्टिंग की। प्रियंवदा सहाय ने तुरंत मुझसे घर का फोन नंबर लिया, पिता जी को फोन किया और अपने छोटे से परिचय, जिसमें कि सिर्फ उसका नाम ही शामिल था, के साथ शादी के बाद की पार्टी की तारीख इक्कीस जुलाई बताया। पिता ने पता नहीं क्या क्या कह लेने के बाद कही हुई सारी बातों की व्यर्थता का बोध होने पर एकदम से चुप हो जाने के ठीक पहले शायद शादी की तारीख भी जानना चाहा था, जिस पर कि प्रियंवदा सहाय ने कहा था कि अगर तब तक आप का मन बदल जाए तो इक्कीस जुलाई से पहले ही पार्टी होने की जगह पूछ लीजिएगा। पार्टी में मेरे घर वाले आ रहे हैं, और शादी में सिर्फ वही लोग हैं जिनकी शादी होनी है। नमस्ते।

घर ने मेरे लिए भले ही कभी कुछ नहीं किया था, लेकिन प्रियंवदा सहाय के इस कारनामे से मैं बुरी तरह डर गया। इससे पहले खुद मैंने भी कभी पिता से ऐसे लहजे में बात कर पाने के बारे में नहीं सोचा था, और मेरी जिंदगी में दाखिल होकर इतने ही वक्त में प्रियंवदा सहाय ने ये क्या कर डाला था। लेकिन 'नमस्ते' कहकर फोन रख देने के तुरंत बाद प्रियंवदा सहाय का और भी गंभीर हो जाना मेरे उफनते से सीने से डर के झाग को सोख लिया और धीरे धीरे मुझे फिर से यकीन हो गया कि उसने जो कुछ भी किया है, वह पर्याप्त सोच समझ के बाद का ही नतीजा होगा। आगे प्रियंवदा सहाय ने मुझे आश्वस्त किया कि फिक्र मत करो, यूँ तो हमें घर और जायदाद की शायद कभी भी जरूरत नहीं होगी, और अगर खुदा न खास्ते कभी हो भी गई तो उनको तो झुकना ही पड़ेगा। वर्ना कोर्ट कचहरी किसलिए बने हैं।

नौकरी के बाद नौकरी से पहले के सारे दोस्तों से मेरा वास्ता पूरा का पूरा खत्म हो चुका था। यूँ राजधानी में किए पत्रकारिता के कोर्स के दौरान मेरा कोई ऐसा दोस्त बना भी नहीं था जिससे कि बार बार का, और खासतौर पर बिना किसी वजह के मिलना हो। और जिन कुछेक लोगों से मैं अपनी जान पहचान को गहरा दिखाता था वो भी ऐसे ही लोग थे जो मुफ्त के एसएमएस वाले स्कीम का पूरा पूरा लाभ उठा सकने के मकसद से कभी कभार मेरे फ्री इनकमिंग और पीली रौशनी के स्क्रीन वाले मोबाइल पर चुटकुले या फिर दोस्ती, यारी के जज्बाती संदेश भेज दिया करते थे। मेरे असल दोस्तों की जो खेप थी, वो मेरी जिंदगी में, और अगर छोटे शहर से राजधानी तक आने को आगे आना कहा जा सके, तो भूगोल पर भी काफी पीछे छूट चुकी थी। और दोस्तों की वह खेप कस्बे के ठाकुर भवानी प्रताप सिंह इंटर कालेज और फिर डिस्ट्रिक्ट डिग्री कालेज की पढ़ाई के दौरान तैयार हुई थी। अगर मैं दोस्तों की उस खेप की गिनती दस बताऊँ, तो यकीनन उसमें से नौ अभी उसी शहर या आस पास के गावों में रहते हैं, और अगर बीस बताऊँ तो उसमें से उन्नीस अब भी वहीं हैं। यूँ यह फेहरिश्त शायद इससे अधिक लंबी नहीं हो सकती, लेकिन ऐसी हरेक लिस्ट में एक की गड़बड़ी पैदा करने वाला शख्स, बेशक, सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ। और इस मामले में बिलकुल अकेला सा मैं जब कभी सालों बाद उस छोटे शहर में जाता हूँ, और लगभग हरेक बार अचानक ही उनमें से किसी न किसी के सामने पड़ जाता हूँ, तो मेरे सामने तुरंत ही 'मेरी प्रतिक्रिया क्या हो?' का सवाल साक्षात आ खड़ा होता है। और वे भी कुछ क्षणों के लिए असहज हो जाने के बाद वक्त एक लंबे और गुमनाम से दौर में हमारे दरम्यान भर आए अपरिचय का फायदा उठाते हुए आगे भी खुद को अपरिचित ही दिखाते रह जाते हैं। इनमें 'बंटी', 'उमा', 'हरिराम', 'मंटू', 'छोटे बड़े' और 'छोटे छोटे' और वह 'अविनाश' भी शामिल है जो भाषा के साथ तोड़ मरोड़ करते रहने के शगल वाले अपने दादा के असर में आकर खुद का नाम 'अविनाशी' बताया करता था। नामों की यह लिस्ट उन लोगों की है जिनसे न सिर्फ हमारा हर रोज का साथ रहता था, बल्कि अपने मष्तिष्क के सीमित दायरे में ही हम भविष्य में भी साथ साथ रहने और साथ साथ शानो-शौकत वाली बड़ी नौकरियाँ करने की योजनाएँ भी बनाया करते थे। मुझ पर भी एक खुमार था डॉक्टर बनने का, जोकि लोगों के कहने के मुताबिक खूब सारी पढ़ाई करके ही मुमकिन हो सकता था, और मैं कई बार के अकेलेपन में उस खूब सारी पढ़ाई की योजनाएँ भी बनाया करता था, लेकिन इस बात का ठीक ठीक पता नहीं था कि पढ़ाई किस तरीके से और उससे भी ज्यादा कि किस चीज की? जिंदगी फिर भी 'मुकद्दर का सिकंदर' लगा करती थी, मैं खुद को अमिताभ बच्चन समझता, और उमा मुझे विनोद खन्ना लगता था, 'रोते हुए.. आए हैं सब.. हँसता हुआ जो जाएगा..' गाने के लिए एक मोटरसाइकिल की दरकार थी।

समूचे का लब्बोलुआब यह कि पिता और प्रियंवदा सहाय के बीच का उस रोज का संवाद, दोस्तों यारों तक से खाली चल रही जिंदगी से पिता और परिवार जैसी चीज को भी अलग कर दिया। मतलब अरबों लोगों से भरी, और भरती ही जा रही दुनिया में मेरे लिए सिर्फ एक प्रियंवदा सहाय। हमारी शादी के फैसले ने प्रियंवदा सहाय के सामने भी दुश्वारियाँ खड़ीं की और उनका चेहरा भी मेरी मुश्किलों के जैसा ही था। मतलब कि वैसी ही दूरी पर बसे शहर धनबाद में बसते उसके परिवार ने भी, जिसमें कि उसकी माँ, पिता और एक छोटा भाई रहते थे, प्रियंवदा सहाय से अपने रिश्ते खतम कर लिए। इस तरह से वैसी ही भरी और भरती जा रही दुनिया में प्रियंवदा सहाय के लिए भी सिर्फ और सिर्फ मैं, या फिर कम से कम मुझे तो यही लगता था। 'दुनिया में मेरे लिए सिर्फ और सिर्फ प्रियंवदा सहाय का बोध' मेरी खुद की हालत की दयनीयता का एहसास तो करा सकता था, लेकिन 'प्रियंवदा सहाय के लिए दुनिया में सिर्फ और सिर्फ मैं' का बोध उस दुखद एहसास की पूरी जगह में एक सुकून भर देता था। मैं खुश रहता था।

शादी हो गई। शादी में दोनों की मर्जी के सिवाय बाकी हरेक की मर्जी का नहीं होना शामिल रहा। शादी के नाम पर हमने कचहरी में कुछ कागजों पर दस्तखत किए। और साथ में एक और शख्स ने भी, जिसे कि हमारे वकील ने सौ अतिरिक्त रुपए लेकर मुहैया कराया था, और जिसने कि 'वह हमें पिछले अनेक वर्षों से जानने के साथ हमारे सुखद और सफल वैवाहिक जीवन की शुभकामनाओं' के वाक्य को प्रमाणित किया था। शादी के बाद कोई पार्टी नहीं हुई। शादी से पहले, शादी के बाद एक पार्टी करने का फैसला भी प्रियंवदा सहाय का था, जिसे कि शादी के तुरंत बाद खुद उसी ने बदल भी दिया। यूँ शादी से पहले शादी के बाद की पार्टी के लिए प्रियंवदा सहाय ने कुछ पैसों का बंदोबस्त कर रखा था, जिसे कि उसने पार्टी नहीं करने के फैसले के अगले ही रोज अपनी जान पहचान वाले किसी सुनार की दुकान पर जाकर न जाने कितने ग्राम के सोने की चेन और एक अँगूठी में तब्दील करा लिया। अपने छोटे से कमरे का एक अहम कोना घेर रहे एक बड़े से सूट केस में उसने सोने की और भी जमात कर रखी थी। सोने की वह जमात भी अलग अलग तरह के गहनों के रूप में ही थी और उन्हें देखकर मुझे एक बात यह पता चली कि प्रियंवदा सहाय को सोने से प्यार है, हालाँकि मुझे यह अब तक नहीं पता कि उसे और किस किस चीज से प्यार है? मुझसे उसे प्यार है, इसकी भी मुझे जानकारी तो है ही, काफी हद तक यकीन भी है।

तीन महीने तक हम प्रियंवदा सहाय के पांडव नगर वाले एक कमरे में रहे। उसके बाद प्रियंवदा सहाय ने कारपोरेशन बैंक के मेरे सैलरी एकाउंट और सिटी, आईसीआईसीआई, और एक्सिस बैंकों के अपने खातों के इतिहास, वर्तमान और भविष्य की समीक्षा करने के बाद सभी की मदद से ग्रेटर नोएडा के एक अपार्टमेंट में दो बेडरूम और एक हाल वाला फ्लैट बुक करा लिया। हम उसमें रहने लगे, और अपना घर होने के नाम पर हर महीने अपनी तनख्वाह का आधे से ज्यादा हिस्सा फ्लैट की कीमत चुकाने के लिए बनी किस्तों में जाता देखते रहे। यूँ शादी के बाद के उन तीन महीनों में और भी बहुत कुछ बदला था। जैसे यह कि त्रिपाठी सर से गुजारिश कर प्रियंवदा सहाय ने हम दोनों की साप्ताहिक छुट्टी शुक्रवार को करा ली और हम हरेक शुक्रवार को साथ साथ वीथ्रीएस शापिंग माल में जाने लगे थे। और मैं डेढ़ दो सौ रुपए की कीमत वाले एक नीले और एक काही रंग की जींस और काले और धानी रंग के दो शर्ट और एक गुलाबी टी शर्ट की जगह 'कुटांस' और 'कैंटाबिल' के जींस और 'फर्स्ट क्लास' के शर्ट और टी शर्ट पहनने लगा था और 'स्पाइकर' और 'लिवाइस' के जींस, प्रोवोग के शर्ट और एडीडास के जूतों के बारे में लोगों से सुनकर काफी कुछ समझने भी लगा था। प्रियंवदा सहाय को भी मैं फुरसत के थोड़े थोड़े वक्त में 'एली 18', 'रेवलान' और 'लैकमे' के नेल पालिश, 'ईवा', 'लोमानी' और 'फा' के डीओडोरंट, 'डॅव, 'आइरिश स्प्रिंग', 'लिरिल', 'आइवरी' और 'लामाँदे' के फेयरनेस सोप आदि के इस्तेमाल या फिर उनके विज्ञापन पढ़ने में व्यस्त देख लिया करता था। उन तीन महीनों में और भी कई तब्दीलियाँ आईं, लेकिन उनका पूरा का पूरा वास्ता प्रियंवदा सहाय से ही रहा। मुझ तक सिर्फ कभी कभार ही, और उनका कोई एक छोटा सा असर भर आता था, जो कि प्रियंवदा सहाय के साथ रहने की वजह से होता था, शायद।

यूँ तो दफ्तर में पहले भी मीटिंग्स हुआ करती थीं, लेकिन उसमें ट्रेनी और सब एडिटर तक के ओहदों वालों की शिरकत बिलकुल भी जरूरी नहीं थी, और सीनियर सब और डेस्क इंचार्ज भी कभी कभार ही जाया करते थे उसमें। लेकिन त्रिपाठी सर की अतिरिक्त, और हर वक्त की मेहरबानियों, जिन पर कि हमारी शादी की बात का भी कोई फर्क नहीं पड़ा था, की बदौलत प्रियंवदा सहाय का वास्ता समूह संपादक खरे जी से भी रहने लगा था। लिहाजा उनकी मीटिंग्स में भी प्रियंवदा सहाय की उपस्थिति जरूरी करार दी गई थी। प्रियंवदा सहाय को जल्द ही सीनियर सब एडिटर का ओहदा भी दे दिया गया, और उसका तबादला कम काम होने के लिहाज से फीचर डेस्क पर कर दिया गया। फीचर डेस्क से जीतेंद्र कुमार को बिजनेस डेस्क पर भेज दिया गया और बिजनेस डेस्क पर एक और लड़की की नियुक्ति कर ली गई जिसे कि आते साथ ही नियुक्तिपत्र में लिखे उसके पद 'सब एडिटर/रिपोर्टर' में से स्लैश के चिह्न के उस ओर भेज दिया गया, यानि कि रिपोर्टर बना दिया गया। उसका नाम कावेरी मित्तल था और वह 'सिंबायसिस इंस्टीट्यूट' से पत्राचार माध्यम से एमबीए की छात्रा थी और अंग्रेजी इतना तेज बोलती थी कि हिंदी मीडिया उसकी महज इतनी सी अदा पर अपना न जाने क्या क्या लुटा सकता था।

समूह संपादक खरे जी की मीटिंग्स में शिरकत शुरू करने के चंद हफ्ते बाद ही प्रियंवदा सहाय का उनके साथ बाहर आना जाना भी होने लगा। यह आना जाना पहले तो ऑल इंडिया रेडियो या किसी टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाले, खरे जी और किसी बड़े मंत्री या राजनेता, किसी नामचीन खिलाड़ी, या फिर कभी कभार किसी सेलिब्रिटी के बीच के साक्षात्कार के लिए हुआ करता था, जिनमें प्रियंवदा सहाय का काम साक्षात्कार के अहम हिस्सों को अपने अखबार के लिए जुटाना और खरे जी के नाम से बाई लाइन छपने वाली खबर बनाना हुआ करता था। मतलब कि खरे जी के नाम से छपने वाली लगभग सभी खबरें प्रियंवदा सहाय की लिखी होती थीं। मंगलवार के संपादकीय पृष्ठ पर अहम कब्जा खरे जी का ही होता था, इसलिए सोमवार के दिन और रात में प्रियंवदा सहाय की व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती थी। उसी दौरान खरे जी का नंदीग्राम के दिन ब दिन बिगड़ते जा रहे हालात पर 'एक्लूसिव सीरियल रिपोर्टिंग' की लगभग एक हफ्ते की योजना बनी। जाहिर तौर पर उनके साथ प्रियंवदा सहाय का भी जाना हुआ। अखबार के दफ्तर से खरे साहब तक पहुँचने की हरेक कोशिश प्रियंवदा सहाय से ही होकर जाने लगी। मतलब कि प्रियंवदा सहाय से ही पता चलता था कि खरे साहब अभी नाश्ते, लंच, स्नैक्स, डिनर, टायलेट, बाथरूम, मार्निंग वाक, या फिर बैठे बैठे अचानक उठ जाने की एक रोज की कोशिश में खिंच आई कमर की नस की फीजियोथेरेपी कराने में व्यस्त हैं। और आज की रिपोर्ट की बात, तो कुछ देर इंतजार करिए, मैं अभी भेजती हूँ। और, ठीक है गाजियाबाद के लिए निकलने वाला पहला इश्यू किसी और खबर के साथ निकाल दीजिए, बाकी को बस दस मिनट और रोक दीजिए, बस अभी टाइप ही कर रही हूँ। इस बीच प्रियंवदा सहाय की बात कभी कभार फीचर डेस्क के इंचार्ज अनंत अंजुम जी से भी हो जाया करती थी, जिसमें 'कल मेरे नाम से जो फीचर निकला था, उसमें प्रूफ की कई सारी गलतियाँ रह गईं थी। सर मैं इतना गलत भी तो नहीं लिखती। तो प्लीज इस पर थोड़ा ध्यान दीजिएगा।' जैसी बातें हुआ करती थीं।

खरे साहब, (यानी कि प्रियंवदा सहाय भी) 'एक्सक्लूसिव सीरियल रिपोर्टिंग' से वापस आ गए। लेकिन मीटिंग्स, बदस्तूर प्रियंवदा सहाय की आफिसचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनी रहीं। कभी कभार तो साप्ताहिक छुट्टी के दिनों में भी उन्हें मीटिंग ज्वाइन करना होता था। यह सब होता था खरे जी की वजह से जो कि अपने संपादकीय कार्यकाल के लगभग हरेक दौर में ऐसी गैर दफ्तरीय मीटिंग्स के आदी रहे थे और वो भी अलग अलग लोगों के साथ, जोकि उस दौर में उपस्थित रहे हों। फिलवक्त उस जगह पर प्रियंवदा सहाय की उपस्थिति रहती थी।

मेरी जिंदगी महीने के आखिरी कार्यकारी दिन में मिलने वाले एकमुश्त रुपयों यानी कि तनख्वाह के इंतजार की चक्रीयता और प्रियंवदा सहाय के इधर से आने और उधर की ओर चले जाने को एक सनातन मौन के साथ देखते जाने में बीत रही थी। जिंदगी प्रियंवदा सहाय की भी बीत रही थी लेकिन उसमें अब कुछ अजीब अजीब से सवालों की उपस्थिति रहने लगी थी। सवाल, जैसे कि इतने घटिया स्वाद के बावजूद बीयर में ऐसा क्या होता है कि उस पर लोग जान छिड़कते हैं? और यह कि देर से घर पहुँचने को लेकर, कभी कभार के ही सही, मेरे अधपूरे वाक्य वाले सवाल के जवाब में आज किस खबर को जिम्मेदार ठहराया जाय? इनमें से पहले सवाल के जवाब के लिए वह ऐसे हरेक मौके पर अपने ना नुकुर की दो एक आवृत्तियों के बाद एकाध पैग चढ़ा लेती थीं और दूसरी उलझन के निपटान के लिए अनंत सर को महज उस रोज छपने वाले फीचर पृष्ठ के लिए कोई भी एक शीर्षक एसएमएस कर देती थीं, जो कि अगली सुबह बाईलाइन प्रियंवदा सहाय के नाम के साथ देश भर में पाठकों के लिए जाहिर हो जाता था।

हकीकत, जिसकी खबर प्रियंवदा सहाय के हिसाब से मुझे नहीं थी, से मैं उससे अच्छी तरह से वाकिफ था। इसकी वजह यह थी कि प्रियंवदा सहाय के एक्सक्लूसिव सीरियल रिपोर्टिंग के दौरान ही मुझे फीचर डेस्क का, और खास तौर पर प्रियंवदा सहाय की अनुपस्थिति में उसके नाम के लिए किया जाने वाला काम सौंप दिया गया था। अनंत जी, शीर्षक वाले प्रियंवदा सहाय के एसएमएस को हर बार जैसे का तैसे मेरे मोबाइल पर फारवर्ड कर देते थे। मैं उसका फीचर बनाकर अंत में एक कोने में टाइप कर देता था 'प्रियंवदा सहाय'। कई बार की सुबहों में अपने बाई लाइन वाला फीचर देखकर प्रियंवदा सहाय इसलिए चहक उठती थी कि फीचर में आए शब्दों का चयन भी बिलकुल प्रियंवदा सहाय के ही तरीके का होता था।

अपनी नजरों में प्रियंवदा सहाय पहले की ही तरह शातिर और साफ थी। और मैं उसकी इतनी सारी असलियत जानकर भी उसके साथ रहते हुए हफ्तों से बढ़ते हुए महीनों का सफर बिताए जा रहा था। दोनों के बीच किसी भी तरह का घोषित तनाव नहीं था, और किसी एक की वजह से किसी दूसरे को कोई परेशानी है, हमारे दरम्यान ऐसी कोई बात भी जाहिर नहीं हुई थी। हाँ, हम बातें लगभग नहीं के बराबर करते थे और आपस में लगभग नहीं बात करना हमारे लिए एक आदत की तरह हो गई थी। मुझे कई बार ऐसा महसूस होता था कि फुरसत, और खासतौर पर छुट्टियों के दिन में दोनों के बीच कभी भी कोई बात शुरू हो जाने की कई बार की प्रबल संभावनाओं से बचने के लिए प्रियंवदा सहाय तुरंत ही किसी मीटिंग का प्रावधान कर लेती थी, और मुझे सिर्फ अपने लेट से लौटने की सूचना देकर निकल जाती थी। अब हम वीथ्रीएस माल नहीं जाते थे, और मेरी छुट्टी का दिन दो लोगों की रिहाइश के लिहाज से जरूरत से थोड़ा ज्यादा ही बड़े घर की सफाई और सजावट में लग जाता था। घर के दो बेडरूम में से एक प्रियंवदा सहाय का था और दूसरा हम दोनों का। मैं हम दोनों के बेडरूम वाले कमरे में ही अपने साजो सामान के साथ रहता था और प्रियंवदा सहाय अपने मूड के हिसाब से कभी भी किसी भी कमरे में आ और जा और रह सकती थी। यूँ प्रियंवदा सहाय नहीं बोलने की हमारी आदत के बीच थोड़ी थोड़ी संभावनाएँ निकालकर मुझे कभी कभार कुछ कुछ सिखा दिया करती थी। मैं उसके कुछ सिखाने के दौरान नहीं बोलने की आदत को कभी कभार भूलने सा लगता, लेकिन वह सीख के लिए इतने कम शब्दों का इस्तेमाल करती थी कि हमारी आदत जैसे की तैसे बनी ही रहती। प्रियंवदा सहाय की सीखों में जींस को कमर से नीचे और शार्ट शर्ट को पैंट से बाहर पहनने के निर्देश, कपड़े मोड़ने और उनकी इस्तरी करने का तरीका, किसी रोज किसी से तोहफे मिले फूलदान को रखने की सही जगह, और घर के किसी भी कोने में इकट्ठे कूड़े को सिर्फ और सिर्फ डस्टबिन में ही डालने जैसी बातें शामिल रहती थीं। मैं प्रियंवदा सहाय की ऐसी हरेक सीख को तहे दिल से लेता था और उसे दुबारा ऐसी शिकायत का मौका न मिले, ऐसी कोशिश करता था।

आपस में 'नहीं के बराबर बोलने' की हमारी आदत से हम दोनों को कोई नुकसान था, ऐसा मैं इसलिए नहीं कह सकता कि इसमें प्रियंवदा सहाय की सहमति शामिल थी, और प्रियंवदा सहाय के किसी भी फैसले या ख्वाहिश में किसी घाटे की बात छुपी हो, ऐसा मैं मान ही नहीं सकता। लेकिन हमारी इस आदत का फायदा एक दूरसंचार कंपनी को जरूर होता था, जिससे कि हम दोनों के मोबाईल फोन जुड़े थे। कई बार, जो बात मुझसे घर आकर भी कही जा सकती हो, उसे प्रियंवदा सहाय घर आने के अपने रास्ते में से ही मेरे मोबाइल पर एसएमएस कर देती थीं।

'नहीं के बराबर बोलने' की आदत के जारीपन के दौरान एक गलती हो गई थी। मुझसे नहीं, प्रियंवदा सहाय से। प्रियंवदा सहाय से इसलिए कि वह हरेक संभावना को लेकर इतनी सजग रहती थी कि मुझे यकीन था कि हम दोनों से जुड़ी किसी बात में अगर चैकन्नेपन की दरकार हो, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी प्रियंवदा सहाय की ही होगी। तो प्रियंवदा सहाय की उस गलती की वजह उसकी एक दूसरी गलती को भी कहा जा सकता है, जिसमें कि उसने उस रात की मीटिंग में साढ़े चार साल की एजिंग वाली वाइन पी ली थी। वाइन को खुलकर चढ़ा लेने की वजह शायद प्रियंवदा सहाय के पास पहले से रहा वह ज्ञान, या फिर पहले के एकाध प्याले का तजुर्बा भी था, जिसके मुताबिक वाइन में सिर्फ एक मीठा सा नशा भर होता है, और उसे पीने के बाद मुँह से किसी तरह की महक तो बिलकुल भी नहीं आती। घर आने के रास्ते में ही प्रियंवदा सहाय ने मुझे एसएमएस कर दिया था कि आज का डिनर हम साथ करेंगे। वह किसी अच्छे होटल से खाना ले आई थी और उसने खूब जमकर खाया भी था। खाना खतम होने के बाद हाथ धोने की रस्म को भी भूलते हुए वह मुझसे लिपट गई थी, और महीनों बाद एकदम से मदहोश होकर शरारतें करने लगी थी। प्यार के उन अंतरंग क्षणों को लंबा खींचते जाने की कोशिश में वह मुझसे एक क्षण के लिए भी और एक सूत की भी दूरी बर्दाश्त करने के मूड में न थी। अंत में पहले मैंने ही उठकर कपड़े पहने और उसकी नग्नता को कंबल से ढँक दिया, वह मदहोश सी सोती रही। अगली सुबह फिर से प्रियंवदा सहाय को अगले दिन और शाम, और शायद एक हिस्सा रात गए वाली मीटिंग के लिए भी तैयारियाँ करनी थीं, सो वह फिर से व्यस्त हो गई। अगले दो तीन रोज ऐसी ही व्यस्तताओं के साथ बीत गए और उसके जेहन से उस रात की बातें दूर ही रहीं। प्रियंवदा सहाय ने शादी के बाद कई दफे यह बात कही थी कि वह कम से कम अगले कई सालों तक कोई बच्चा नहीं चाहती और फिलहाल पूरी स्वतंत्रता के साथ और खुलकर जीना चाहती है। उससे पहले ऐसे हरेक वाकए पर वह ऐसी किसी चूक की गुंजाइश के लिए सावधान रहती थी, और वक्त रहते को गर्भ निरोधक टैबलेट ले लेती थी।

लगभग दो हफ्तों के बाद उसने अपने पेट के निचले हिस्से में कुछ महसूस किया, फिर डॉक्टर ने भी उस बात की पुष्टि कर दी। प्रियंवदा सहाय मुश्किलों में घिर गई। मीटिंग्स से लौटते वक्त उसका चेहरा तनाव और उलझन की लकीरों से भरा दिखने लगा। मुझे पता था कि यह सब उसके चिड़चिड़े हालत में होने के संकेत थे, इसलिए मैं उससे कभी कभार वाली कोई कोई बातें भी एक अतिरिक्त सावधानी के साथ बोलने लगा, और भरसक उसका खयाल भी रखने लगा।

प्रियंवदा सहाय के दोस्तों की फेहरिश्त काफी बड़ी थी। लेकिन उसमें महिलाओं की तादाद लगभग नहीं के बराबर थी। और इस उलझन को वह किसी पुरुष दोस्त के साथ बिलकुल भी नहीं बाँट सकती थी। लिहाजा वह उसकी मजबूरी ही थी जब उसने पहली बार मुझसे इस मुद्दे पर कुछ कहा। कुछ का पूरा मतलब यही था कि अब इससे बचने का एक रास्ता गर्भपात ही है, लेकिन पता नहीं क्यों उस एक नन्हीं सी जान के बारे में सोचने लगी हूँ, जो मेरे ऐसा कर देने से दुनिया में आएगी ही नहीं। और फिर कभी न कभी तो ऐसा होना ही है, सो चलो वह कभी थोड़ा पहले ही सही।

प्रियंवदा सहाय अब अपना खयाल कुछ ज्यादा ही रखती थी। उसमें मेरा योगदान भी पहले से बहुत ज्यादा रहता था। जब तक यह बात हम दोनों के बीच तक थी, प्रियंवदा सहाय की दिनचर्या थोड़े बहुत हेर फेर के बावजूद वैसे ही चलती रही। और जो हेर फेर हुआ वो महज यह था कि वह छुट्टी के दिन पूरा पूरा आराम करती थी और रातों में थोड़ा पहले ही लौट आती थी। लेकिन मीटिंग्स में पहले की ही तरह, जाया करती थी।

यूँ लगभग तीन महीने गुजरे। उन तीन महीनों के बाद प्रियंवदा सहाय का जिस्म थोड़ा भरता हुआ सा दिखने लगा। लेकिन अभी तक उसके पेट का उभार स्पष्ट नहीं था, जो कि एकबारगी दिख जाने पर अगले कई महीनों तक उभरते ही जाने वाला था।

वह मेरे और प्रियंवदा सहाय के रिश्ते के लिहाज से एक संक्रमण का समय था, जिसमें मुझे उसके भीतर कोई आमूल बदलाव आ जाने की उम्मीद रहने लगी थी। मुझे लगता था कि उसके जिस्म में धीरे धीरे आ रहा भौतिक भारीपन जिंदगी के दूसरे सभी हिस्सों में जारी उसकी तूफानी रफ्तार को भी नियंत्रित कर देगा। लेकिन प्रियंवदा सहाय की सक्रियता का सीधा रिश्ता जैसे उसकी रगों में न जाने कितने किलोमीटर प्रति घंटे की चाल से भागते खून से था। सितंबर माह की कोई शुरुआती तारीख थी वह जब एक शाम में प्रियंवदा सहाय समूह संपादक खरे जी के साथ मीटिंग करके निकली। मीटिंग से निकलती प्रियंवदा सहाय की चाल उस रोज फिर से कुछ बदली हुई थी, और अगर वह अपने तन और सेहत की सामान्य स्थितियों में होती तो उसके पैर हर अगले कदम पर थोड़ा सा उछल जाने की कोशिश में दिखते। मेरे लिए यह समझ लेना आसान था कि प्रियंवदा सहाय को ओहदे में एक और तरक्की या फिर ऐसा ही कुछ और मिला है। बाद में पता चला कि माह के अंत में खरे जी का प्रधानमंत्री के साथ दक्षिण अफ्रीका के दौरे में मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर जाना तय हुआ है, जिसके लिए सहयोगी पत्रकार का कार्यभार पहले के कई दौरों की ही तरह प्रियंवदा सहाय को ही सँभालना है। दौरा सितंबर महीने के अंत से शुरू होकर अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक जाता था। यात्रा का कार्यक्रम मिलने के बाद से ढेर सारी तैयारियाँ हुईं।

इस बार, साथ साथ की हमारी जिंदगी के शुरू होने के बाद शायद पहली बार, प्रियंवदा सहाय अपने कामों में मेरा सहयोग लेने लगी। बल्कि इस दफा उसके सफर की लगभग सारी तैयारियाँ मैंने पूरी कीं। तैयारियों में कई बार उसे बाजारों में खरीदारियों के लिए ले जाना, आस पास से ऑटो और रिक्शों को बुलाकर उन पर उसके बैठने में हल्के सहारे देना, और अकसर की छोटी मोटी खरीदारियों के सारे काम खुद ही कर देना आदि शामिल थे।

खरे साहब प्रधानमंत्री आवास से ही प्रधानमंत्री के साथ आने और आगे के सफर में जाने वाले थे, और प्रियंवदा सहाय और मीडिया के दूसरे सभी सहायक पत्रकारों को अलग से आना था, जहाज में अलग श्रेणी में बैठकर वहाँ तक जाना था, और जोहान्सबर्ग में पूर्वनिर्धारित गेस्ट हाउस में ठहरने के बाद प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों में पूरी टीम के साथ शामिल होना था। मैं प्रियंवदा सहाय को छोड़ने के लिए एअरपोर्ट आया। काउंटर पर अपने पहचान पत्र, पासपोर्ट और टिकट की जाँच के बाद वह अंदर जाने लगी। अंदर जाते हुए उसने कई बार मुझे मुड़कर देखा, मुझे मुड़ने जरूरत इसलिए नहीं थी कि उसके वेटिंग हाल के और अंदर वाले दरवाजे में घुस जाने तक मेरा रुख उसी की ओर था। मैं एअरपोर्ट से बाहर आया और जहाज के रनवे के समानानंतर बनी दीवार से दूर बाहर की तरफ टहलता रहा। धीमी रफ्तार से टहलते हुए मेरा जिस्म भी जैसे प्रियंवदा सहाय की तरह भारी हो आया हो। मेरी आँखों के सामने सड़क, पेड़ों पर फैली हरियाली, और जहाज के रनवे से बाहर की दीवार के सफेद रंग में से सभी को धुँधलाती हुई प्रियंवदा सहाय की ही तस्वीर झलक रही थी। और उसमें भी खासकर उसकी पहले से भारी हो आई देह, जिसे बीते कुछेक रोज में मैंने कई बार अपने हाथों से टेक दी थी। और जिस टेक देने में मेरे हाथों की छुवन को प्रियंवदा सहाय ने एक जादुई तरीके के स्वीकार किया था, और कई बार अपने पूरे भार को मेरी बाँहों में छोड़कर कुछ क्षणों के लिए स्वतंत्र हो गई थी, और यूँ उसने उतनी बार इस बिना वजह की लंबाई और चौड़ाई वाले जिस्म में जमा थोड़ी बहुत ताकत को कोई सार्थकता दी थी। मैं ऐसे और भी कई मौके चाहता था, और हर रोज, और हो सके तो हर पल चाहता था। लेकिन एक दूरी थी। पंद्रह दिनों के लंबे वक्त की दूरी। प्रियंवदा सहाय से लगातार दूर होने की दूरी। मैंने टहलने की अपनी मद्धम रफ्तार के बीच ही प्रियंवदा सहाय को 'Pahunchte Hi Khabar Karna' का एसएमएस भेज दिया था । कुछ ही मिनटों में उसने जवाब भेजा 'Love You'।

जवाब के थोड़े ही वक्त बाद रनवे की ओर से एक आवाज उठी और चंद लमहों में ही लाल रंग की जहाज दूर हवा में ऊपर की ओर उठने लगी।

मैंने कुछ रातें और उनके बाद आने वाले दिन दफ्तर जाने और काम करने के अलावा प्रियंवदा सहाय की यादों और उसके इंतजार के साथ बिताया। प्रियंवदा सहाय की वापसी में अभी लगभग दस दिन बाकी थे कि एक रोज उसका फोन आ गया। फोन के साथ उसकी वापसी की खबर भी। साथ साथ खबर यह भी कि कावेरी मित्तल आज की रात जोहान्सबर्ग जा रही है। खबर का स्पष्टीकरण यह था कि वह प्रियंवदा सहाय की जगह लेने जा रही थी। त्रिपाठी जी और दफ्तर के दूसरे बड़े नामों को प्रियंवदा सहाय की वापसी की वजह उसके अस्वस्थ होने को बताया गया था, हालाँकि प्रियंवदा सहाय इससे कतई सहमत नहीं थी। और प्रियंवदा सहाय को वापसी की वजह से पहले वापसी की खबर ही दी गई थी और वजह का स्पष्टीकरण उसे बाद में मिला।

प्रियंवदा सहाय की वापसी की फ्लाइट जोहान्सबर्ग से देर रात गए खुलने और नई दिल्ली के हवाई अड्डे पर अगली सुबह तड़के पहुँचने वाली थी। मैंने सारी रात सुबह और फ्लाइट आने के इंतजार के साथ बिताई, कई सारे बुरे सपने देखकर जिनमें से ज्यादातर में फ्लाइट के न जाने किन किन वजहों से देर होते जाने, कुछ कुछ में किसी हवाई दुर्घटना की शिकार हो जाने, और सबसे कम तादाद में लेकिन सबसे लंबे वक्त तक चलने वाले वे सपने शामिल थे जिनमें कि फ्लाइट के हवाइअड्डे पर आ जाने के बावजूद प्रियंवदा सहाय का आना ही नहीं होता था, या फिर सामने से मेरी ही ओर चलते चले आने के बावजूद मेरे पास तक नहीं पहुँच पाना भी होता था। एअरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था का आतंक मेरे सपनों तक में था, जिसकी वजह से प्रियंवदा सहाय से मिलने की बेताबी में भी मैं उसकी ओर बढ़ नहीं सकता था। सपने में मुझे वर्दियों वाले सिक्योरिटी गार्ड तो नहीं दिखे, लेकिन हवाई सफर से आए हुओं को लेने आने वालों के लिए बनाई सुरक्षा लकीर का एहसास मुझे, और सपने में मेरी तरह के और जितने भी प्रतीक्षार्थी थे उन सभी को था।

मैं हवाईअड्डे पर वक्त से काफी पहले पहुँच गया। और हवाइअड्डे पर पहुँचने के ऐवज में हवाईअड्डे के विकास के लिए वहाँ जाने वाले हर शख्स से लिए जा रहे दो सौ रुपए, और अपने आगंतुक के इंतजार में प्रतीक्षालय में बैठ पाने के लिए पचास रुपए की रकम चुकाकर प्रियंवदा सहाय का इंतजार करने लगा।

प्रियंवदा सहाय फ्लाइट के आने के वक्त के चंद मिनटों बाद ही मेरे सामने आ गई और असल में बनी सुरक्षा सीमा से उसके बाहर निकलते ही मैंने बाएँ हाथ से उसका बैग थाम लिया और उसके आधे जिस्म को अपने दाएँ हाथ के घेरे में लेकर बाहर की तरफ जाने लगा। आगे घर जाने के अपने सफर के लिए प्रियंवदा सहाय ने एक आटो बुक करने की इच्छा की और अंदर बैठते ही मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया, और मैंने उसके माथे पर अपना हाथ। यमुना ब्रिज की वनवे सड़क पर गुजरते हुए मेरे हाथ प्रियंवदा सहाय के गालों की तरफ फिर गए, जहाँ आँसुओं की नमी बिखरी हुई थी। मैंने एकबारगी झुककर उसका चेहरा देखा और उसकी आँखों को बंद पाया। आगे मेरा हाथ देर तक उसके चेहरे पर घूमता रहा, वहाँ बिखरी नमीं को सुखाने की कोशिश में। कुछ देर तक उसकी आँखों और मेरे हाथ के बीच प्रतियोग भी चला, वो बहती जा रहीं थीं और मेरा हाथ उनकी नमी को सोखता जाता था, आखिरकार आँखें थम गईं और मेरे हाथ में प्रियंवदा सहाय का सूखा सा चेहरा रह गया।

हमारे फ्लैट की कीमत की किस्तें अपनी शुरुआत से लेकर अगले सात सालों तक कटने वाली थीं। उनमें से तीन साल हम गुजार चुके हैं और बाकी के चार साल अभी भी बचे हैं। इस दौरान सीनियर सब एडिटर के ओहदे तक पहुँच चुकी प्रियंवदा सहाय की तरक्की और तनख्वाह को दफ्तर की शब्दावली में कहें तो, 'फ्रीज' कर दिया गया है, और उसे फिर से बिजनेस डेस्क पर लाकर स्लैश के चिह्न के इस ओर कर दिया गया है। बाकी के चार सालों के बारे में कहें तो उनमें हमें अपनी नौकरी खोने का खतरा पैदा करने वाली किसी भी संभावना को दूर से ही भाँपकर उससे किसी भी तरीके से और किसी भी शर्त अपने पास नहीं आने देना है। मतलब कि मुझे दिनेश चौबे जी की हरेक बात, जिसमें कि एक साल में एक प्रमोशन के बाद के तीन या चार या पाँच सालों में एक भी प्रमोशन नहीं मिलने और बार बार की 'चार साल हो गए काम करते हुए और अभी तक तुम्हें यह नहीं पता कि अध्यात्म के फीचर में अंग्रेजी के शब्द बिलकुल भी नहीं जाने चाहिए' जैसी बातें शामिल होंगी, को उनके ही तरीके से सुनना और हरेक बार मानना भी पड़ेगा।

बहरहाल, इन तमाम शिकवे शिकायतों के अलावा हमारी जिंदगी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी अब प्यार की है। हमारे 'हम' के दायरे में अब एक और शख्स की उपस्थिति रहती है, लगभग हर वक्त। उसका नाम हमने गिन्नी रखा है। प्रियंवदा सहाय को अब भी सोने से प्यार है, और गिन्नी वाकई सोने जैसी लगती है। हम दोनों उसकी दिलोजान से हिफाजत करते और उसे चाहते हैं। और उसके खा पीकर सो जाने के बाद प्रियंवदा सहाय लगभग हर रोज मुझे मिठाई वाले रोज की तरह भरपूर आँखों से देखती हुई कई कई बार 'आई लव यू' कहती है। यूँ इससे पहले मेरे लिए अपना प्यार बयाँ करने को प्रियंवदा सहाय हिंदी और उर्दू के कई जुमले भी आजमा चुकी है, लेकिन प्यार के सघन क्षणों में जब हम कुछ भी न बोलने की स्थिति में हों और कुछ बोलना अनिवार्य भी हो, 'आई लव यू' से अच्छा कोई वाक्य शायद उसे अब तक नहीं मिला।


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हिंदी समय में श्रीकांत दुबे की रचनाएँ



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