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कविता

आस्था की प्रतिध्वनियाँ
श्रीकांत वर्मा


जीवन का तीर्थ बनी जीवन की आस्था।
आँसू के कलश लिए
हम तुम तक आती हैं।
हम तेरी पुत्री हैं, तेरी प्रतिध्वनियाँ हैं।
अपने अनागत को
हम यम के पाशों से वापस ले आने को आतुर हैं।
जीवन का तीर्थ बनी ओ मन की आस्था!
अंधकार में हमने जन्म लिया
और बढ़ीं,
रुइयों-सी हम, दैनिक द्वंद्वों में धुनी गईं।
कष्टों में बटी गईं,
सिसकी बन सुनी गईं,
हम सब विद्रोहिणियाँ कारा में चुनी गईं।
लेकिन कारा हमको
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है!
जन-जन का तीर्थ बनी ओ जन की आस्था!

 

मीरा-सी जहर पिए
हम तुझ तक आती हैं।
हम सब सरिताएँ हैं।
समय की धमनियाँ हैं,
समय की शिराएँ हैं।
समय का हृदय हमको चिर-जीवित रखना है।
इसीलिए हम इतनी तेजी से दौड़ रहीं,
रथ अपने मोड़ रहीं,
पथ पिछले छोड़ रहीं,
परंपरा तोड़ रहीं।
लौ बनकर हम युग के कुहरे को दाग रहीं।
सन्नाटे में ध्वनियाँ बनकर हम जाग रहीं।
जीवन का तीर्थ बनी, जीवन की आस्था।

 


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