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कहानी

सफर में
मनोज कुमार पांडेय


सफर में हूँ। दिन किस तरह गुजर गया पता ही नहीं चला। दिन भर ताश का खेल जमा। बीच बीच में चाय और सिगरेट चलती रही। मेरे पास सिगरेट था और सुजॉय दा की थर्मस में चाय। दोपहर के समय जब कई लोग सो रहे थे, मैने 'जूलियस फूचिक' की मशहूर किताब 'फाँसी के तख्ते से' पढ़ी। एक स्तब्ध कर देने वाली किताब। उस हर युवा को जो व्यवस्था से लड़ते हुये दुनिया को बदलने का सपना लेकर जी रहा है यह किताब जरूर पढ़नी चाहिये।

शाम चार बजे एक आदमी मेरा जूता और नकवी की चप्पल लेकर चलती ट्रेन से नीचे कूद गया, हम लोगों के सामने ही। ओह, कितने खतरनाक तरीके से कूदा था वो। उसे कितनी चोट लग सकती थी। उसकी जान जा सकती थी। बाकी लोग उसे कोस रहे हैं मगर मैं कुछ भी सोच-समझ नहीं पा रहा हूँ। मेरा सीना धड़-धड़ कर रहा है। लग रहा है जैसे मैं भी उस आदमी के साथ नीचे कूद गया हूँ। आखिर वो कौन सी स्थितियाँ हैं जिनके चलते एक 40-42 साल का आदमी चलती ट्रेन से एक मामूली जूते के लिए कूद जाता है, उसकी या उसके जैसे बहुत सारे लोगों की स्थितियों का जिम्मेदार कौन है? जो भी हो अपना जूता मैं उस आदमी से वसूल के रहूँगा। कैसे? अभी क्यों बताऊँ, पहले जूता तो वापस मिल जाने दो भाई। हाँ मेरे साथ एक नई बात हुई आज। मुझे उस आदमी पर बिलकुल भी गुस्सा नहीं आया। पता नहीं क्यों, पर ऐसा मेरे साथ पहले कभी नहीं हुआ था
(28.11.2000 - ट्रेन में - रात 11.30 बजे)


अभी-अभी सोकर उठा हूँ। शायद और सोता मगर एक बेहद अजीब सपने ने जगा दिया। सपने में मैने देखा कि 'स्वदेश दीपक के नाटक 'कोर्टमार्शल' के 'रामचंदर' ने फैसला सुनाये जाने के बाद बचाव वकील कै. विकाश राय को गोली मार दी। गोली मारने के पहले रामचंदर ने चीख-चीख कर विकाश राय के ऊपर अपना सबसे बड़ा दुश्मन होने का आरोप लगाया और कहा कि कपूर या वर्मा जैसे लोग कम खतरनाक हैं, क्योंकि वे हमेशा पहचान में बने हैं। इसके सिवा ये मूर्ख और जाहिल लोग हैं पर तुम विकाश राय, तुमने बेहद योजनाबद्ध और शातिर तरीके से हमें बरगलाया है। तुम जैसे लोग हमारे पक्ष में होने का नाटक कर हमारी लड़ाई को कमजोर बना कर रख देते हो और हमें च्च-च्च की झूठी मक्कार आवाजों के सिवा कुछ भी नहीं मिलता। तुम अपने आप को सच और न्याय की लड़ाई का योद्धा कहते हो और बेहद बचकाने ढंग से झूठे भावावेग में चीखते हुए कहते हो कि मुझे फाँसी मिलनी ही चाहिये। तुम्हें यकीन है कि हमें फाँसी ही मिलेगी। पर विकाश राय अब हम तुम्हें पहचान गये हैं। अब हम तुम्हें कुचल कर रख देंगे।

ऐसा ही कुछ था मेरा अभी का सपना। देखा न तुमने कि अपने सपने को अजीब कहकर मैने कोई गलती नहीं की। सच जो भी हो मगर मैं अशांत हो गया हूँ। कहीं रामचंदर सच तो नहीं कह रहा था, या आपने त्रासद अंत ने उसे विक्षिप्त बना दिया था? इनमें से जो भी बात हो, पर अब मुझे तब तक चैन नहीं मिलने वाला, जब तक मैं खुद अपने तरीके से कोर्टमार्शल का कोर्टमार्शल न कर लूँ। क्यों! तुम बताओ - मैं गलत तो नहीं सोच रहा हूँ न?

मैं सोच रहा हूँ कि मुझे उन परिस्थितियों के बारे में स्पष्ट हो जाना चाहिये जिनके तहत मैं दादा के साथ आया। उस समय जबकि मेरा हैदराबाद के लिए 28 की रात का रिजर्वेशन कन्फर्म हो चुका था और मैने मृत्युन्जय के साथ 'लटिया की छोकरी' देखने जाने की बात पक्की की थी। फिर 27 को दिन के 11 बजे अचानक तैयारी क्यों? जबकि मेरा मृत्युन्जय के साथ किया गया वादा टूटा। योगेश विक्रांत को दिया गया आश्वासन टूटा। बेचारा योगेश... जब नाटक के बाद उसने मुझे नहीं पाया होगा तो उसे इस बात का एहसास कितने गहरे तरीके से हुआ होगा कि उसने मेरे साथ कितनी भारी गलती की थी। मैं जानता हूँ कि उसे अपने किये पर कहीं न कहीं पछतावा जरूर है पर इस बात का घमंड भी है कि देखो तुम्हारे बिना भी हमने सब कुछ कर लिया। खैर यह दूसरी बात है, सही बात तो यह है कि 11 बजे मैंने अपना रिजर्वेशन कैंसिल करवाया। अफरातफरी में तेलियरगंज पहुँचा। विनोद को कमरे पर पहुँचने के लिए कहा। रास्ते में सुप्रिया को बताया कि मैं भी चल रहा हूँ मगर प्रतिक्रियास्वरूप उसके चेहरे पर प्रकट हुये भावों को मैं नहीं समझ पाया। जितना कुछ भी किया मैंने पर हुआ यह कि डेलीगेसी पहुँचने वाला मैं पहला व्यक्ति था, प्रणव दा डेढ़ बजे आये। उनके चेहरे और बातों से मुझे लगा कि उन्हें खुशी हुई मेरे आने से, (खुशी तो विक्रांत को भी हुई होती) और मैं सभी लोगों के साथ शाम चार बजे महानगरी एक्सप्रेस पर सवार था।

यह सब क्यों और कैसे हुआ जबकि ऐसा होने की संभावना बिल्कुल नहीं बची थी। मेरे सफर की तैयारियाँ अधूरी पड़ी थीं, फिर भी अचानक! मुझे लगता है कि मुझे दादा के साथ अपने संबंधों की पड़ताल कर लेनी चाहिये। 1 नवंबर 98 को मैं पहली बार दादा से मिला। क्यों? मुझे थियेटर करना था। क्यों करना था? अरे फिल्मों में जाना था भाई, और मैने अखबारों में पढ़ रखा था कि थियेटर एक अच्छा माध्यम है फिल्मों में जाने के लिए। मैने 1 नवंबर से 15 नवंबर तक दादा द्वारा संचालित नाट्य कार्यशाला में हिस्सा लिया। इन पंद्रह दिनों में मैं दादा से बेहद प्रभावित हुआ और गहरे भावनात्मक तरीके से जुड़ गया। अब सोचता हूँ तो लगता है वह समय ही ऐसा था। 94-95 के बेहद भयानक पागल कर देने वाले दौर से मैं किसी तरीके से उबरने की कोशिश में था। 96 में बी.ए. फाइनल की परीक्षाओं से फुर्सत होकर मैं साल भर के लिए गाँव गया और जुलाई 97 में मैं फिर इलाहाबाद लौट आया। जुलाई 97 से नवंबर 98 तक मैं किसी से दोस्ती नहीं कर पाया। क्यों? जबकि मैं लगातार इसकी जरूरत महसूस कर रहा था? मैं कितना अकेला था, उस समय, यह मैं ही जानता था। शायद इसलिये कि कुछ कुंठाओं, हीन भावनाओं और अकेलेपन से पैदा हुई जड़ता का शिकार हो गया था मैं (शायद अब भी कहीं न कहीं मैं वैसा ही हूँ।) तो ऐसे में किसी से जुड़ना कितनी बड़ी बात थी मेरे लिए, चाहे मैं किसी भी तरीके से क्यों न जुड़ता। इसके बाद दादा के साथ लगातार चार राष्ट्रीय नाट्य समारोहों में गया। मतलब यह कि हर टूर पर किसी न किसी छोटी-बड़ी भूमिका में मैं दादा के साथ था, तो ये टूर कैसे छोड़ देता, मैं इसका लोभ संवरण नहीं कर पाया। लेकिन क्या दादा के साथ आने के पीछे यही एक कारण है? नहीं। इसी के समानांतर एक दूसरा भी कारण है, वो यह कि दादा ने मुझसे लगभग 1 महीने पहले कहा था कि मैं भी उनके साथ चलूँगा, तो धीरे-धीरे मानसिक रूप से एक भरी-पूरी यात्रा की तैयारी कर चुका था मैं। ऐन वक्त पर जब दादा ने कहा कि लोग बढ़ गये हैं। और मेरा चलना... तो मैं बेचैन हो उठा। मेरे लिए इलाहाबाद से निकलना उस वक्त बेहद जरूरी था क्योंकि ऐसी हालत में मैं वहाँ कुछ भी नहीं कर सकता था। और कहीं निकलने की इसी बेचैनी में मैंने हैदराबाद का रिजर्वेशन करवा लिया। जब दादा ने दुबारा चलने के लिए कहा तो मुझे लगा कि सफर पर निकलना तो है ही, तो क्यों न साथ ही निकला जाय और शायद यह भी कि इस तरीके से मेरे कुछ रुपये बच जाते, जोकि मेरी इस समय की स्थितियों में कम नहीं होते। हालाँकि यह अलग बात है कि मेरा जूता खो गया और फायदे की बजाय नुकसान ही हुआ मुझे। शायद यह मेरे स्वार्थी व्यवहार की सजा थी। पर यह तो सिर्फ आर्थिक नुकसान की बात है। वैसे मैं फायदे में ही रहा। एक शानदार और अच्छे लोगों की टीम में सफर करने का मौका मुझे मिला और मैं बहुत दिनों के बाद अपने आपको फिर से रचनात्मक ऊर्जा से भरा हुआ पा रहा हूँ।
(29.11.2000 - पूनम लॉज, शोलापुर - 3.45 शाम)


रात के बारह बजे हैं। अभी कुछ घंटे पहले बलवंत गार्गी लिखित नाटक लोहार देखा। प्रस्तुति ठीक ही थी। पर कहीं-कहीं पात्रानुरूप संवाद नहीं थे, इनसे बचा जा सकता था। लोहार की प्रस्तुति देखते हुए मेरे मन में पूरे समय 'यर्मा' और 'मित्रो मरजानी' घूमतीं रहीं। स्त्रियों की लौंगिकता पर इतनी सहज, सशक्त इतनी उद्दाम कोई कृतियाँ फिलहाल मैंने तो नहीं देखी। एक बात और बहुत सुना था मराठी दर्शकों के बारे में। पर क्या ये लोग हुल्लड़बाजी और सीटियाँ बजाने में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों के कस्बाई दर्शकों से किसी मायने में कम थे, दर्शकों में महिलाओं का प्रतिशत 2 या 3 से अधिक नहीं था। क्या सचमुच यहाँ रंगमंच की कोई स्वस्थ परपंरा या संस्कृति है? और अगर जो है उसे ही संस्कृति मानें तो सवाल यह है कि यह क्यों और किसके हित में है? क्या दर्शकों के हित में? क्या रंगमंच के हित में? क्या एक स्वस्थ सुंदर संस्कृति के पक्ष में? नहीं न दोस्त तो फिर ऐसी संस्कृति या परंपरा के क्या मायने। बाजार और व्यावसायिकता की अंधी घुड़दौड़ में फँसकर यहाँ के निर्देशकों ने फूहड़ और सस्ते नाटक दिखाकर अपने ही पाँवों पर कुल्हाड़ी मारी है।

दिन औसत गुजरा। मैं काफी खुश रहा पर काफी बेचैन और मायूस भी। पता नहीं क्यों? मैं खुद भी नहीं जान पा रहा हूँ, पर मेरे भीतर या बाहर कुछ न कुछ घटने वाला जरूर है। यह अच्छा भी होगा, क्योंकि अच्छा या बुरा कुछ भी हो पर नयापन मेरे लिए समय की माँग है। समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। ऐसा मेरे साथ पहली बार हो रहा है कि अपनी बेचैनी को न तो मैं कोई शब्द दे पा रहा हूँ, न ही कोई हरकत। देखना है कब तक ऐसे चलता है। दोपहर का सपना अभी भी आँखों में है, पर अभी तो बस आँखों में नींद है सो विदा लेता हूँ। इंतजार करना, वैसे ही जैसे सुबह के सूरज का इंतजार करती हो।
(29.11.2000 - पूनम लॉज शोलापुर - रात 12.30)


दोपहर के तीन बजे हैं। सुबह से हुतात्मा स्मृति भवन में था। अभी थोड़ी देर पहले ब्रोशर कंपोज करवा कर लाया हूँ। मेरा नाम 'प्रापर्टी इन्चार्ज' के रूप में गया है। वैसे मैंने किया क्या है? शायद कुछ नहीं, साथ आने के सिवा, साथ खाने के सिवा। एक बात बताऊँ मैं तुम्हें, बड़े-बड़े शहरों में बड़े-बड़े लोगों के साथ ऐसी छोटी मोटी घटनायें होती ही रहती हैं। क्यों है न!

सुबह से ही अनजानी खुशी और अनजाने गम के बीच सफर कर रहा हूँ मैं। देखता हूँ इनमें से आखिर में मेरे हाथ क्या लगता है। दोपहर को खाना खाते समय सुजॉय दा ने पूछा, मनोज तुम हमेशा सोचते क्या रहते हो? अब तुम्हीं बताओ क्या बताता मैं। वैसे मैं जो तुम्हें बार-बार संबोधित कर रहा हूँ, तुम्हीं कहो न कि तुम कौन हो, मैं जानता हूँ, तुम हो जरूर यहीं, कहीं मेरे आस-पास मेरी बेचैनी में। तो तुम्हीं साफ-साफ कहो न, नहीं तो निडर होकर सबके सामने तुम्हारे बारे में कुछ कहने में पता नहीं मैं कितनी देर लगाऊँ। गधा हूँ न। मुँह चियारने के सिवा मुझे कुछ आता-वाता नहीं है, लेकिन एक बात बताऊँ मैं तुम्हें, जाने कैसे मेरे बारे में लोगों में तमाम तरह के भ्रम पैदा हो गये हैं।

मैं चुप रहता हूँ। वजह यह कि मैं उतना खुला नहीं हूँ जितना कि होना चाहिये पर तुम्हें बताऊँ लोग क्या समझते हैं, लोग समझते हैं कि मैं बेहद गंभीर किस्म का व्यक्ति हूँ। अभी कुछ दिन पहले कृष्णमोहन को अपनी एक कहानी सुनाई तो कृष्णमोहन ने कहा कि मेरा गद्य शानदार और प्रवाहपूर्ण है? क्या? तुम्हें यकीन नहीं हुआ न, मुझे भी नहीं हुआ पर मैंने ऐसे सिर हिलाया और मुस्कुराया, जैसे उनकी बात दो सौ फीसदी सही हो। कुछ फूल, पत्तियाँ, नदी, पहाड़, भूख, लड़कियाँ प्रेम, घृणा, अस्मिता और बराबरी जैसे शब्दों को कुछ पंक्तियों में लिखता हूँ और लोग उन्हें कविता कहते हैं। हरिश्चंद्र अग्रवाल ने वर्तमान साहित्य के लिए कवितायें माँगी हैं और मैं जानता हूँ कि मैं उन्हें एक दिन दे ही आऊँगा। और तो और अब जो बात मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ उससे तुम्हारा पेट दर्द करने लगेगा हँसते-हँसते। इधर 'नागानंदम्' और 'लटिया की छोकरी' के बाद बहुत से लोगों को भ्रम हो गया है कि मैं एक अच्छा अभिनेता भी हूँ। क्या हुआ जो आज तक श और ज़ आदि का गलत उच्चारण करता हूँ, क्या हुआ जो बकौल दादा मेरी जुबान लटपटाती है। (थैंक्यू सुषमा जी, थैंक्यू योगेश विक्रांत) घर पर लोग सपने देख रहे हैं कि मैं कब दिखाई पड़ता हूँ सीरियलों और फिल्मों में, और यह जानकर तुम्हें जाने कैसा लगेगा कि यह भ्रम मैने खुद ही बनाकर रखा है।

सुबह 'कोटमार्शल' की रिहर्सल देख रहा था। मुझे लग रहा है कि रामचंदर मेरे सपने में सच ही कह रहा था। कोर्टमार्शल व्यवस्था के पक्ष में लिखा गया एक बेहद क्रूर और शातिर नाटक है। भले ही यह स्वदेश दीपक से गलती से ही क्यों न हुआ हो, पर एक लेखक को सावधान होना चाहिये। और एक नाटक लेखक को तो बेहद सावधान। क्या यह हिन्दी रंगमंच की बिडंबना नहीं है कि कोर्टमार्शल जैसा नाटक जनपक्षधर और व्यवस्था से विद्रोह करने वाला माना जाता रहा है और मजे की बात तो यह है कि रंजीत कपूर हों या उषा गांगुली, अनिल भौमिक हों या अरविंद गौड़ किसी भी रंग-निर्देशक को यह बातें सूझी ही नहीं।
(30.11.2000 - पूनम लॉज शोलापुर - दोपहर 3.00 बजे)


अभी दोपहर को बहुत जोश में था और एक झटके में 'कोर्टमार्शल' के सभी निर्देशकों के ऊपर दृष्टिहीन होने का आरोप जड़ दिया। इतनी जल्दबाजी अच्छी नहीं होती। फिर भी कुछ चीजें बुरी तरह खटक गई हैं। कपूर की आत्महत्या क्यों? पूरे नाटक के दौरान जो तनाव बनता है उसका एक झटके में स्खलन क्यों? सूरत सिंह का ब्रिगेडियर बनना क्या सिर्फ पार्टी सीन के लिए है? और फिर पार्टी सीन ही क्यों? क्या दर्शकों को रिलैक्स करने के लिए? सूरत सिंह और विकाश राय के चरित्र तमाम तरह के अंतर्विरोधों से भरे हैं। दोनों अपने आपको किसी राबिनहुड से कम नहीं समझते। दोनों के अपने-अपने सामंती घमंड हैं। जिस समय सूरत सिंह अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में दर्शकों को बता रहा होता है। विकाश राय अपने दादा और पिता के जज होने का हवाला देता है और यहाँ तक कि जो लड़ाई उसका भाई एक नक्सलाइट के रूप में लड़ रहा था, वही वह यहाँ लड़ रहा है कि गर्वभरी घोषणा करता है और कपूर जब अपने पारिवारिक संबंधियों के ऊँचे-ऊँचे पदों पर होने की बात सगर्व करता है तब इस बिंदु पर क्या इन तीनों के बीच कोई अंतर दिखाई देता है? कपूर जो जाति व्यवस्था का पक्षधर और खल पात्र है उसका चरित्र इतना विकृत और फिल्मी क्यों? तो दीपक साहब जाति व्यवस्था के उन पक्षधरों को क्या कहेंगे जो ब्राह्मणवादी नैतिकता के मानदंडो पर खरे हैं। जो न शराब पीते हैं न रोज-ब-रोज पत्नी को पीटते हैं, जबकि जाति व्यवस्था के सबसे बड़े पैरोकर हैं। दलित या पिछड़ी जातियों के प्रति जितना क्रूर और अमानवीय व्यावहार प्रचलित नैतिकतावादियों का रहा है उसका दसांश भी कपूर जैसे विकृत और अनैतिक लोगों का नहीं रहा है। विकाश राय जो बचाव वकील है क्या प्रकारांतर से रामचंदर के प्रति कपूर से भी अधिक निर्मम नहीं है? रामचंदर कांड से जो सवर्ण अफसरों के विरुद्ध या कहें कि सवर्ण मानसिकता के विरुद्ध (जो कि अंततः व्यवस्था की ही मानसिकता है - बदले अर्थों और संदर्भों के साथ) सैनिकों में जो गुस्से की लहर है या यों कहें कि दर्शकों में जो गुस्से की एक लहर है, कपूर की आत्महत्या द्वारा क्या वह फुस्स नहीं कर दी जाती है? कि लो भई व्यवस्था में अगर कपूर और वर्मा हैं तो सूरत सिंह और विकाश राय भी। कुल मिलाकर व्यवस्था अच्छी और न्यायपूर्ण है, बस कुछ लोग बुरे हैं जिनके बारे में व्यवस्था अगर कानूनी रूप से कोई फैसला लेने में सक्षम नहीं साबित होती है तो कलात्मक न्याय होता है और कपूर जैसे लोग सजा पा ही जाते हैं। कलात्मक न्याय/ईश्वरीय न्याय! हा-हा-हा, स्वदेश जी क्या ख्याल है? मरने के बाद कपूर और वर्मा की आत्मायें जरूर घनघोर कुंभीपाक नरक में गयी होंगी। है न!

शो सफल रहा पर मैं इस बात को लेकर बेहद मायूस था कि मैं शो का हिस्सा क्यों नहीं था। काश कि मैं एक अच्छा अभिनेता होता। अभी एक घंटे पहले तक मैं भारी तनाव में था। अब बहुत खुश हूँ। क्यों? अरे भाई अब तुमसे कैसा परदा। अभी खाना खाते समय तुमने मुझसे पूछा कि मैं बंद बोतल की तरह उदास क्यों बैठा हूँ, और बोतल खुली फक्क-सारी उदासी उड़ गयी और उसकी जगह महकी हुई हवाओं ने ले ली। तुमने मेरी उदासी छीन ली और खुद उदास हो...। लेकिन यह तो गलत बात है न। मेरे लिए ऐसी खुशी किस काम की जो तुम्हें उदास करके हासिल हो। क्या तुम्हारी दी हुई खुशी तुम्हें वापस कर दूँ मगर कैसे? कैसे वापस करूँ मैं तुम्हें तुम्हारी खुशी? मुझ गधे को लेने के सिवा देना कब आया।

कल से सफर में तन्हा हो जाऊँगा पर इस समय तो तुम्हें अपने भीतर महसूस कर रहा हूँ और चहक रहा हूँ। यकीन नहीं हो रहा है कि इतना सारा तनाव, इतनी सारी जलन इतनी जल्दी कपूर हो गई। ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ। इतना खुश हूँ कि कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ (डर अलग से लग रहा है कि ये खुशी मेरा साथ तो नहीं छोड़ देगी) हँसूँ या रोऊँ, सोऊँ या जागूँ? मगर क्या यह सब कुछ सचमुच मेरे वश में है? नहीं। अब तो मुझे लग रहा है कि जो भी है सब तुम्हारे वश में है।
(30.11.2000 - पूनम लॉज शोलापुर - रात 1.00 बजे)


अभी थोड़ी देर पहले सो कर उठा हूँ। आज रात कोई सपना नहीं आया, जबकि मैं जब सोने जा रहा था तो उस वक्त मुझे लगा था कि आज की रात तो रंग-बिरंगे सपनों की रात होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने मेरे सपनों का खून कर दिया और खुद उनकी जगह ले ली, मगर तुम मेरे सपनों से अलग कहाँ हो। तो ऐसा तो नहीं कि तुमने सोचा कि तुम मेरे पास तभी आओगी जब मैं जाग रहा होऊँगा? इसका क्या मतलब है? मैं तो हर क्षण तुम्हें अपने पास देखना चाहता हूँ। यहीं-कहीं अपने साथ। अपने में शामिल। तुम मुझे बेहद स्वार्थी समझ रही हो न? क्या करूँ! लेकिन मुझे लगता है कि यह मेरा स्वार्थ नहीं है। हाँ, कमजोरी जरूर है। पर यही कमजोरी मुझे कहीं भी कभी भी न टूटने वाली मजबूती देगी। और मैं मजबूत बनना चाहता हूँ। मेरा ये चाहना गलत है क्या? हो तो बता देना।

पूनम लॉज की पाँचवी मंजिल पर अकेला कमरा है यह जिसमें कि मैं हूँ। खिड़कियाँ खोलो तो सामने कबूतरों का रंग-बिरंगा झुंड दिखता है। कितने स्वस्थ और खूबसूरत हैं ये। अगर मैं इनकी गुटरगूँ-गुटरगूँ समझ पाता तो इन कबूतरों के बीच मैं भी एक कबूतर बन जाता। लेकिन क्या यह मुमकिन है। यहाँ तो आदमी होने का वरदान और अभिशाप दोनों साथ-साथ मिला है। आदमी होने का मतलब ही दोनों को साथ-साथ ढोना है।

शोलापुर, एक साफ-सुथरा शहर। अच्छे लोग हैं। ऑटो नहीं है, टैक्सियाँ हैं। औरतें अच्छी-खासी संख्या में छोटे-छोटे स्टाल चलाती दिखती हैं। इलाहाबाद से करीब डेढ़ गुना महँगा शहर। पूनम लॉज की पाँचवी मंजिल का वह कमरा जहाँ मैं रुका था, हमेशा याद आयेगा। लिफ्ट थी पर आम तौर पर मैं सीढ़ियों का ही प्रयोग करता था। मैं तीन दिन यहाँ रुका, अपने क्रियाकलापों को जाना-समझा। फिर कभी शोलापुर आना हुआ तो इसी कमरे में रूकना पसंद करूँगा। कमरे के उत्तर-दक्षिण दोनों तरफ छत है। छत पर खड़े हो जाओ तो पूरा शहर दिखता है पर शहर के दक्षिणी तरफ जो ऊँचे-नीचे खाली मैदानों में पेड़ों के झुरमुट दिखते हैं वे तो बस एक जादुई पेंटिग का आभास देते हैं।

आज से मैं अपने सफर में अकेला हो जाऊँगा। क्या तुम मेरा साथ नहीं दोगी? स्मृतियों में भी नहीं? ऐसा कैसे हो सकता है? मुझे अकेला मत छोड़ना। मुझे अकेलेपन से बेहद डर लगता है। एक खराब बेचैनी मेरे खून में भर जाती है और मुझे लगता है मैं पागल हो जाऊँगा। तो क्या मैं यह यकीन कर लूँ कि तुम मुझे पागल नहीं होने दोगी?
(1.12.2000 - पूनम लॉज - सुबह 7 बजे)


सब गये और तुम भी। तुमने पूछा कि मैं तुम्हे वैसे क्यों देख रहा था, जैसे कि मैं देख रहा था। मैं हँसा और जवाब दिया, कुछ नहीं। अजीब सा जवाब है न। हमने हाथ मिलाये, हाथ हिलाये और अलग हो गये। मैंने अपने हाथों को चूम लिया है। तुम्हें बुरा लगा न! क्या करूँ, तुम जा रही हो तो मुझे भी बहुत बुरा लग रहा है। ट्रेन ने एक लंबी सीटी दी और मेरी बेचैनी चरम पर पहुँच गई। जब ट्रेन चली तो मन हुआ कि दौड़ूँ और दौड़ कर ट्रेन पर चढ़ जाऊँ। किसी तरह से मैने अपने आपको ऐसा करने से रोका। अब थोड़ा सहज हूँ। अभी थोड़ी देर पहले पता किया तो पता चला कि हैदराबाद कि लिए दो ट्रेन हैं - पुणे हैदराबाद पैसेन्जर और मुंबई हैदराबाद एक्सप्रेस। पैसेन्जर शाम चार बजे है तो एक्सप्रेस 11 बजे। अभी तय नहीं किया है कि किससे जाऊँगा। कहीं जाने का मन नहीं है सो तय किया है कि यहीं स्टेशन पर रहूँगा और किताबें पढ़ूँगा। सिद्धेश्वर पीठ खूबसूरत जगह है, फिर जाता मगर वहाँ मंदिर की क्या जरूरत थी। लोग पता नहीं कब इन पीठों और लिंगों के जाल से बाहर निकलेंगे। हालाँकि यह मेरी असहिष्णुता ही कही जायेगी पर मैं क्या करूँ जो किसी मंदिर में घुसते ही मुझे उबकाई सी आने लगती है।

हाँ तो सुबह नहाने और भोजन करने के बाद हम लोग सिद्धेश्वर पीठ गये। दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक। समूचा मंदिर एक झील के केंद्र में स्थित है। मंदिर तक पहुँचने के लिए एक सँकरा सा पुल है। मंदिर प्रांगण में प्रवेश के पहले सबने चप्पल और जूते उतारे, पैर धोये और फिर अंदर। मैं एक भी मंदिर में नहीं घुसा, बस बाहर ही बाहर घूमता रहा। तुमने पूछा कि क्या मैं सचमुच इन सब चीजों मसलन ईश्वर में विश्वास नहीं करता हूँ, मैंने जवाब दिया हाँ। और तब तुमने कहा कि तुम भी नहीं करती हो। खैर कुछ देर तक हम झील के किनारे धीरे-धीरे चलते हुये एक दूसरे के हमसफर रहे। फिर फोटोग्राफी का दौर शुरू हुआ। एक के बाद एक कई सारी तस्वीरें खिंची। कैमरा दादा का है सो तस्वीरें भी दादा की निजी संपत्ति होंगी। पता नहीं दादा को तस्वीरें देने में क्या दिक्कत होती है। कलकत्ता के टूर की बेहद शानदार तस्वीरें। सिर्फ मैं और तुम समानांतर की चित्र प्रदर्शनी के लिए तस्वीरें छाँट रहे थे, तभी मैंने हँसते हुये तुमसे कहा कि मेरा मन तस्वीरें चुराने का हो रहा है। और तुमने तुरंत दादा से कह दिया कि दादा मनोज क्या कह रहा है और दादा वहीं कुर्सी लगाकर बैठ गये, नहीं तो जरूर मैं उस दिन कई तस्वीरें साफ कर देता। और दादा ही क्यों तुमने भी तो जबलपुर में खींची गयी तस्वीरों की कापी आज तक नहीं दी। मैं अकेला आगे निकल आया हूँ और झील के शांत ठंडे जल में पाँव डालकर बैठा हूँ, मछलियाँ पैरों में गुदगुदी कर रही हैं।

सिद्धेश्वर पीठ पर निकलने के पहले बाल सँवारते समय जब अपने आपको आईने में देखा तो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा लगा। मुझे याद आया लटिया की छोकरी, के बाद तुमने कहा था कि नाटक में मैं बहुत क्यूट लग रहा था। मुझे लगा कि आज भी तुम शायद वैसा ही कुछ कहोगी, और तब मैं कहूँगा कि तो क्या हुआ तुम तो हमेशा बहुत क्यूट लगती हो। और तब तुम थोड़ा लजा जाओगी तो मैं कहूँगा कि लजाओ मत, आजकल अक्सर मैं झूठ बोल जाता हूँ। पर रास्ते में तुमने सिर्फ इतना कहा कि मनोज तुम्हारी शर्ट बहुत खूबसूरत लग रही है। तब मैंने कहा तुम्हारी भी, बदलोगी क्या, पर सारी की सारी बातें सोची की सोची रह गईं।
(1.12.2000 - शोलापुर जं. - 1 बजे दोपहर)


गुड बाई शोलापुर। शाम के पाँच बजे हैं। मैं पुणे हैदराबाद पैसेन्जर में बैठ चुका हूँ। स्टेशन पर 'इवान इल्यूविच की मृत्यु' पढ़ी। क्या सच में दुनिया इतनी खोखली है विश्वास नहीं होता। इसी किताब में 'नाच के बाद' प्रेम पर एक शानदार कहानी है। युवा मन की गहरी संवेदनात्मक कोमल अनुभूति से लबालब। 'दो हुस्सार' भी ठीक था पर दो हुस्सार पढ़ते समय 'कज्जाक' क्यों याद आया था?
(1.12.2000 - शोलापुर जं. - शाम 5 बजे)


सुबह के 10 बजे हैं। मैं अभी-अभी हैदराबाद जंक्शन पर उतरा हूँ। रात भर नींद नहीं आई। बगल से आती-जाती हर ट्रेन में तुम्हारा चेहरा देखता रहा हूँ मैं। कुछ अर्धनिद्रा के झोंके भी आये तो मैंने पाया कि मेरी नींद में भी तुम्हीं हो। समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह मुझे क्या हो गया है। मेरा खुद पर कोई जोर ही नहीं बचा है। मैं वैसे ही नाच रहा हूँ जैसे तुम नचा रही हो। स्टेशन पर उतरते ही मैं एक लड़की को तुम समझ कर आवाज दे बैठा। मैं बस उसके कंधे पर हाथ रखने वाला ही था कि वह पलट गई और मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है। मैं जानता हूँ मैं अभी-अभी पिटने से बचा हूँ। मैं अपनी बेचैनी और बेहोशी के गहनतम क्षणों में सोचने की कोशिश कर रहा हूँ कि तुममें ऐसा क्या है जो मैं... ऐसे इस हाल में... कुछ खास तो नहीं दिखता। तुम भी वैसी ही हो जैसी और लड़कियाँ होती हैं। पर मैं जानता हूँ यह पूरा सच नहीं है। सच जरूर इससे कुछ न कुछ अलग है। तुममें कुछ न कुछ खास है जरूर कहीं न कहीं जो मुझे पागल बना रहा है। और तुम हो कि बड़ी आसानी से पलकें झपकाती हुई पूछती हो - मनोज तुम मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो जैसे मुझमें कुछ ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हो। कहीं किसी कहानी का कोई प्लाट...। क्या जवाब दूँ मैं तुम्हें? तुम इतनी नादान तो नहीं कि इतना भी नहीं समझती।

मुझे भूख लग रही है। कल सुबह तुम लोगों के साथ इडली खाई थी इसके बाद से कुछ नहीं खाया। क्यों? बस कुछ खाने को याद ही नहीं आया। बताओ मेरे जैसे पेटू आदमी का क्या हाल किया है तुमने। भूख लगती भी तो कैसे? मैं तो बस इसमें खोया था कि तुम...। उस दिन मैंने तुम्हारी आँखों में आँसू देखे थे। कटकर रह गया था मैं पूछ भी नहीं पाया। पता नहीं तुम सचमुच उदास थी या कोई थियेटर गेम खेल रही थी, या यूँ ही बना रही थी मुझे। यह आँसू मेरे प्रति करूणा के आँसू तो नहीं थे, या फिर कहीं कोई रकीब तो नहीं बैठा है तुम्हारे दिल में, बोलो न, तुम बोलती क्यों नहीं, अगर यह बात है तो मैं तो मारा गया न यहाँ आकर। मेरा खून तो मजाक-मजाक में ही हो गया। पर अभी यह कहाँ तय हुआ कि तुम्हारे दिल में कोई है ही, वैसे क्या मैं? सवाल ही नहीं उठता। जानता हूँ कि तुम्हारी पसंद में कहीं भी शामिल नहीं हूँ मैं। कोशिश भले ही कर सकता हूँ। पर इतनी जल्दी तो कुछ भी नहीं हो सकता न। फिर भी मैं बदलने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा हूँ खुद को भी और अपनी किस्मत को भी। सुनो... क्या तुमने रास्ते में मुझे एक बार भी याद किया था? नहीं किया न! आह मेरी चाहत की नाव किस कठोर चट्टान से जाकर टकराई है। क्या यह भी लिख दूँ कि मैं डूब रहा हूँ और वो तमाशाई है। नहीं-नहीं इतनी निर्मम तो तुम नहीं हो सकती न। पर तुम कितनी क्या हो यह अभी कैसे तय कर लूँ। अभी तो बस मुझे जोरों की भूख लगी है। मैं भोजन करना चाहता हूँ। तो सोचता हूँ कि तुमसे विदा ले लूँ ताकि नये सिरे से मिल सकूँ।
(1.12.2000 - हैदराबाद जं.)


मैं कल लगभग 12 बजे दिन यहाँ पहुँचा। पहुँचने में कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई। नेहा, नयन, नीशू तीनों मेरा चेहरा भूल चुकी थीं, इन तीनों में से कोई भी मुझे पहचान नहीं पाया। क्या पिछले 3-4 सालों में इतना बदल गया हूँ मैं या पिछले तीन-चार दिनों में? मेरे पहुँचने पर भाभी मौसा और इंदू बेहद खुश हुये। भाभी का लड़का आकाश शुरू में मुझे मामा कहता रहा पर भाभी के यह बताने पर कि मैं उसका मामा नहीं चाचा हूँ वो मुझे साशा कहता हैं, और मैंने उसका नाम ही साशा रख दिया है। बहुत ही शांत और खूबसूरत जगह है यह। बस हवाई जहाज का शोर ही शांति भंग करता है, बगल में बेगमपेट हवाई अड्डा है।

आज लगभग 12 बजे मैं मौसा के साथ हैदराबाद घूमने निकला। मौसा ने दो हॉलीडे टिकट लिए और दिन भर टिकट कटाने से फुर्सत पा ली। सबसे पहले हम लोग गोलकोंडा का किला देखने गये। पहली बार इतिहास अपनी समूची ऐतिहासिक भव्यता के साथ मेरे सामने मूर्त था और मैं उसमें सशरीर घुस गया। करीब 15 मीटर ऊँची चारदीवारी, लकड़ी का एक हाथ मोटा दरवाजा, जिसकी ऊँचाई लगभग 7-8 मीटर रही होगी, घुसने के पहले ही एक विराटता का एहसास कराते हैं। दरवाजे पर लोहे की चादर लगी है। जो जंग खा चुकी है। सभी जगहों पर दीवार की ऊँचाई एक जैसी नहीं है। सामान्य जगहों पर दीवार की ऊँचाई मुश्किल से चार मीटर है। दीवार के बगल में गहरी खाई थी जो धीरे-धीरे चुक गयी है। किले की चारदीवारी के अंदर एक भरा पूरा शहर दिखता है। चारदीवारी से मुख्य किला लगभग किलोमीटर भर अंदर है। एक छोटी सी पहाड़ी पर बना यह किला पूरा एक साथ नहीं बना। शुरुआत बहमनी शासकों ने 1300 ई. के आसपास की थी। उसके बाद इस किले पर जिसका भी कब्जा रहा उसने इसमें कुछ न कुछ जोड़ा जरूर। किले का बहुत सारा हिस्सा अब खंडहर हो चुका है। यह भी बता पाना मुश्किल है कि इसका कौन सा हिस्सा किसने बनवाया। किले के शिखर पर मंदिर भी है और मस्जिद भी। यहीं बगल में एक दुकान भी है जहाँ पेप्सी, कोक और अंकल चिप्स बिकते हैं। किले के दक्षिण में उस्मान सागर दिख रहा है, दूर से नदी की तरह लगता है। मौसा कह रहे थे पूरे हैदराबाद में पीने का पानी वहीं से सप्लाई होता है। कई बड़े-बड़े हॉल पहाड़ों के ऐेसे टुकड़ों पर बने हैं कि लगता है बस अभी हवा का एक झोंका आयेगा और ये जमीन पर नजर आयेंगे। मगर ऐसा नहीं है। ये तो तूफान से भी टकराने में सक्षम हैं, नहीं तो अब तक खड़े कैसे होते जबकि 1800 ई. के बाद से बड़े पैमाने पर यहाँ एक भी निर्माण कार्य नहीं हुआ है।

ऐसे पत्थर जिन पर चढ़ना भी जान-जोखिम में डालना है। वहाँ भी दीवाने अपनी मोहब्बत का नाम टीप आये हैं। मैं भी तुम्हारा नाम लिखता ऐसी किसी जगह पर जो अभी कुँवारी होती पर मौसा साथ में हैं, कुछ नहीं हो सकता। मौसा एक अच्छे गाइड की तरह मुझे सारी चीजें दिखला रहे हैं सारी बातें बतला रहे हैं पर वो दोस्त तो नहीं हैं। मेरी इच्छा स्वच्छंद और अराजक होने की हो रही है पर नहीं हो पा रहा हूँ मौसा जो साथ हैं। मुख्य किला पूरी तरह उजाड़ हो चुका है, एकदम खंडहर जैसा। हम अपने इतिहास के साथ कितना बुरा सलूक करते हैं। यहाँ से हम चारमीनार गये। रास्ते में आलीशान मदीना होटल दिखा जिसमें पहले निजाम रहा करता था और शायद अब भी निजाम जैसे लोग ही उसमें आते जाते होंगे।

चारमीनार की ऊँचाई 56 मीटर है। यह एक वर्गाकार चबूतरे पर बनी है जिसकी एक भुजा 30 मीटर की हैं, चारमीनार को बनने में लगभग 3 साल लगे थे। चारमीनार तत्कालीन दक्षिण भारतीय वास्तुकला का एक भव्य नमूना। एक शानदार स्मारक जिसे कि कहते हैं प्लेग की समाप्ति पर बनवाया गया था। बनवाने वाले थे कुतुबशाह कुली, (कन्फर्म नहीं हूँ नोट कर लेना था) अभी कुछ दिन पहले इस पर से कूदकर दो लोगों ने जान दे दी थी, तब से यह बंद है। सिर्फ बाहर से ही देखा जा सकता है। चारमीनार में ऊपर पूर्वी छोर पर मस्जिद है और पश्चिमी छोर पर देवी मंदिर। अब भी कोई क्या मुस्लिम शासकों के ऊपर धर्मांध होने का आरोप लगायेगा? चारमीनार मन को मोहित करने वाला शाहकार जो कि गंदा हो चुका है। धुयें की एक पूरी परत इस पर चढ़ चुकी है। यहीं बगल में है मक्का मस्जिद एक भव्यतम इमारत। मैने यहाँ मन ही मन सजदा किया उनके प्रति जिन्होंने इसे अपने खून-पसीने से इस रूप में खड़ किया होगा। हम अंदर नहीं गये। इस समय वहाँ नमाज चल रही है। सो मौसा दूर ही रहे और साथ-साथ मैं भी। इसके बाद हम लोग आंध्र विधान सभा गये। भवन के सामने गांधी की करीब 10-12 फुट ऊँची विशाल मूर्ति है। यह काले संगमरमर की बनी है। यहीं पर बाहर सरदार पटेल की भी बड़ी सी मूर्ति लगी है। यह भवन भी शानदार है पर क्या यहाँ बैठकर लोग काम भी शानदार करते हैं? बगल में ही सुरूचिपूर्ण प्रेक्षागृह रवींद्र भारती है। यहीं पास में कला भवन भी है। यहाँ जाने का मन था पर मौसा बहुत तेज भागते हैं किसी दिन अकेले ही आऊँगा। और यहीं बगल में है विड़ला मंदिर। एक बहुत छोटी सी पहाड़ी चट्टान पर बना यह मंदिर पूरा का पूरा संगमरमर का बना हुआ है। मंदिर जाने वाली गली के दोनों तरफ दुकानें हैं जहाँ पेप्सी से लेकर गन्ने के रस तक और बालाजी, हनुमान जी से लेकर शाहरुख खान तक के पोस्टर हैं। मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही जूतों को रखने के लिए बॉक्स बने हैं जिनमें जूते-चप्पल रखकर आप टोकन ले सकते हैं। यह सुविधा निःशुल्क हैं। पंडे-पुजारियों का कोई झंझट नहीं दिख रहा है मंदिर साफ सुथरा दिख रहा है। प्रसाद जैसी चीज यहाँ सस्ती है क्योंकि नारियल बहुत सस्ते हैं। भीड़ बहुत ज्यादा है। मैं मौसा के साथ ऊपर चढ़ रहा हूँ, धीरे-धीरे। एक अजीब सी गंध पूरे वातावरण में भरी है। मैने अपने हाथों को अपनी नाक के पास कर लिया है। हमने थोड़ी देर पहले अनन्नास खाये थे, उसकी तेज महक अभी तक हाथों में है। बगल की दीवारों पर किसी देवी या देवता या उनसे जुड़ी पौराणिक घटनाओं के चित्र उत्कीर्ण हैं मौसा हमें उनके बारे में ब्योरेवार बताते चल रहे हैं। उन्हें पता नहीं है कि श्रीमद्भागवत पुराण, गरुण पुराण, विष्णु पुराण और रामचरित मानस जैसी किताबें मेरी कई-कई बार पढ़ी हुई हैं उनकी सारी हवाई कहानियाँ मुझे अभी भी याद हैं, हाँ वक्त के साथ उनके क्रम भले ही भूल गया हूँ। मौसा जी ने कहा कि मैं जय बालाजी बोलता चलूँ। ठीक है बोल रहा हूँ। मैंने बाला का अर्थ लड़की और लड़की का अर्थ तुमसे लिया है और जोर-जोर से बोल रहा हूँ जय बालाजी। मौसा खुश नजरों से मुझे देख रहे हैं। मौसा दीवारों पर खुदे हुऐ देवी-देवताओं के पैर छूते हुये आगे बढ़ रहे हैं। मैं जानबूझकर पिछड़ गया हूँ नहीं तो मुझे भी छूना होता। हाँ बगल के एक शिवलिंग को मैंने भी छू लिया है। भगवान शंकर का लिंग दुनिया भर के नपुंसकों को ताकत दे। मैं और आगे बढ़ रहा हूँ। 7 बज गये हैं। पूरा शहर बिजली की रोशनी में नहाया है। बेहद खूबसूरत नजारा है। मंदिर भी खूबसूरत है। सफेद संगमरमर से बना हुआ एकदम साफ-सफ्फाफ। हम धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी हिस्से में पहुँच गये हैं। मौसा थोड़ा आगे हैं और मेरा इंतजार कर रहे हैं। अंदर बालाजी की बड़ी सी, काली सी मूर्ति है। मुकुट और हाथ सोने के हैं। मौसा ने हमें पाँच का एक सिक्का दिया था दानपेटिका में डालने के लिए, मैने उसे अपनी जेब में रख लिया है। अब हम बाहर आ गये हैं। मुख्य मंदिर से एक मंजिल नीचे बगल में 3-4 बिस्से का एक दालान बना है। हम यहाँ बैठे हुये हैं। मैं बड़ा आराम महसूस कर रहा हूँ। दिन भर का थका हूँ न। हम खड़े हुये। मौसा दक्षिण की तरफ दिखा रहे हैं हुसैन सागर है जिसका नाम आंध्र के धर्मनिरपेक्ष मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने विनायक सागर रख दिया है। हुसैन सागर हैदराबाद और सिकंदराबाद के एन बीचोंबीच स्थित है। पूरब की तरफ सिकंदराबाद और पश्चिम की तरफ हैदराबाद। झील का पानी रात की रोशनी में चमक रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे झील में पानी नहीं रोशनी बह रही हो। अब हम मंदिर से नीचे उतर रहे हैं। मेरी नजर सामने सप्तर्षियों पर पड़ी और तुम याद आ गयीं। (मनमाड़ में हम साथ-साथ सप्तर्षियों को खोज रहे थे और वो वहाँ मिले ही नहीं) मुझे यकीन है तुम भी वहाँ सप्तर्षियों को देख रही होगी।
(3.12.2000 - हैदराबाद - रात 1 बजे)


आज दिन भर घर पर ही रहा। दिन के दो बजे मौसा के साथ मार्केट गया। लौट कर आने पर मौसा के साथ ही उनका दूसरा वाला घर देखने गया। शाम को बगल में बने साईं मंदिर में गया। बेहद आधुनिक रख-रखाव से परिपूर्ण मंदिर। यहाँ पर तेलुगु फिल्मों और सीरियलों की शूटिंग आये दिन होती ही रहती है। उसके बाद हम बेगमपेट हवाई अड्डे की तरफ गये। साशा मेरी गोद में हैं और पिम-पाम चूस रहा है। लौट कर आने पर खाना खाते हुये इ. भारत का सड़ा हुआ सीरियल देखा। बहुत थका हूँ। नींद आ रही है मगर नींद नहीं आ रही है। मौसा है न बड़ी से बड़ी दूरी को बस थोड़ी सी दूरी बोलते हैं और थका देते हैं।। उनकी उम्र 65 से कम नहीं होगी पर इतनी तेज चलते हैं कि मैं बार-बार पिछड़ जाता हूँ। कल कहीं नहीं जाऊँगा। आराम से बैठकर भारत जिंबांबे के बीच चल रहा वनडे मैच देखूँगा। परसों फिर हैदराबाद घूमने निकलूँगा पर अकेले ही। इस तरह तुम्हें साथ ले पाऊँगा न। नहीं तो मौसा के साथ में तो दुर्गा, काली और भगवती ही चलती हैं। मौसा ने मुझे गृहस्थ गीता दिया है पढ़ने के लिए। उसमें एक वाक्य है मूर्खों से कभी नहीं उलझना चाहिये। मौसा उसका अक्षरसः पालन करते हैं। ऐसे में उनसे बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। वह शायद ही कभी यह मानें कि सारे धर्म और धार्मिक पाखंड उन लोगों की देन हैं जो अपने स्वार्थ और प्रभुसत्ता के लिए भोले-भाले लोगों को उल्लू बनाया करते हैं। भाभी बहुत अच्छी हैं, सुंदर भी और सुरुचिपूर्ण भी। बेहद आत्मीयता से पेश आती हैं। रोज नयी नयी तरह की चीजें बनाती हैं जो मेरे लिए बिलकुल नयी हैं। बनाने के पहले मुझसे पूछना भी नहीं भूलती, हालाँकि मैं कुछ बताता नहीं हूँ। नेहा, नयन, नीशू और इंदू चारों से मेरी पहले की तरह घनिष्ठता हो चुकी है। साशा गोद में आता है तो जाने का नाम नहीं लेता है। शुक्रवार को मैने यहाँ से इलाहाबाद के लिए निकलने का प्लान बनाया है इलाहाबाद
जहाँ तुम रहती हो, जहाँ मैं रहता हूँ। जहाँ तुम...।
(4.12.2000 - हैदराबाद - रात 11 बजे)


कल का दिन काफी बोर रहा। सुबह मैच देखा। दोपहर में खाना खाकर सो गया। उठा तो गोर्की का लेख 'संस्कृति के महारथियों आप किसके साथ हैं' पढ़ा। शाम को साशा नयन और नीशू के साथ मार्केट गया, फिर मंदिर। इधर साईं बाबा भी हिंदुओं के अन्य शक्तिशाली देवताओं राम, कृष्ण, शिव, हनुमान, बालाजी, अयप्पा के समकक्ष स्थापित हो गये हैं। कई मंदिरों में कबीर की मूर्तियाँ भी दिखीं। और तो और एक मंदिर में गांधी भी दिखाई दिये। क्या गांधी आप भी...। इधर के मंदिरों में मुख्य मंदिर के प्रवेशद्वार के पास में एक ऊँचा सा प्रकाश स्तंभ होता है। मंदिरों के पास अपनी काफी जमीन है जिन्हें पार्कों की तरह सजाया गया है। इधर के लोग अपने यूपी के लोगों से ज्यादा श्रद्धालु दिखते हैं। शाम के समय मंदिरों में छोटे-मोटे मेले के जैसा माहौल होता है। लग रहा था मौसा हैदराबाद का कोई मंदिर बाकी नहीं रहने देंगे, पर अब तो मैं बहाना बना जाता हूँ। आजकल रोज शाम को अकेले ही निकल जाता हूँ। एकाध सिगरेट पीता हूँ। इधर तली हुई मछलियाँ खूब मिलती हैं सो मछलियाँ खाता हूँ और फिर नई सिगरेट जलाकर धीरे-धीरे कश खींचते हुये एक लंबा घेरा काटकर लौट आता हूँ।

आज अभी बिस्तर पर ही हूँ, लेकिन एक उदासी बिस्तर में ही घर कर गई है आज इन सब से भी अलग हो जाऊँगा पर यह तो होना ही था। दरअसल मुझे मेरी बेचैनी से प्रेम हो गया है। मुझे बार-बार लगता है कि इस बेचैनी के बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है। कभी-कभी तो लगता है कि तुम और कुछ नहीं सिर्फ मेरी बेचैनी हो और यह बेचैनी मेरी रूह का एक हिस्सा है।

हैदराबाद में जो चीजें देखने से बाकी रह गई थीं उनके लिए कल अकेले ही जाने का मन बनाया था पर पूरा दिन बातें करते-करते कब बीत गया कुछ पता ही नहीं चला आज दिन भर फिर मैच देखूँगा। रात की ट्रेन है जो...।

मैं यहाँ घूमने सिर्फ एक दिन निकला, मौसा के साथ, लेकिल उतना मजा नहीं आया, जितना की आना चाहिये था। मुन्ना भैया यहाँ होते तो अच्छा होता। हम दोनों एक दूसरे को और एक दूसरे की आवश्यकताओं को बेहतर तरीके से जानते हैं। पर मैं क्या करूँ जो मेरा भाग्य खराब था। कमरे में नयन पढ़ रही हैं, इंदू पेंटिग बना रही है। मैं रात में देखे गये सपने को याद करने की कोशिश कर रहा हूँ और मुझे सिर्फ तुम्हारी याद आ रही है, पर अब कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा है सिर्फ तुम्हारी यादों में खोये रहने का मन कर रहा है।
(8.12.2000 - हैदराबाद - सुबह 7 बजे)


दिन भर घर पर ही रहा। शाम को मनोज बाजपेयी की फिल्म 'घात' देखी। फिल्म औसत से भी नीचे थी। इसे शूल और प्रहार या शूल और अंकुश जैसी फिल्मों का घालमेल कहा जा सकता है। मगर इससे अच्छा स्वाद तो तभी था जब ये घोल नहीं बना था। मनोज अपनी पहले की फिल्मों से अलग नहीं दिखे हैं। तब्बू बासी लगी हैं। हाँ इरफान जरूर थोड़ा प्रभावित करते हैं पर उनसे भी और बेहतर काम लिया जा सकता था। फिल्म 9.20 पर छूटी और मैं 10 बजे तक घर पहुँचा। भाभी और इंदू ये सोच कर चिंतित हो रही थीं कि कहीं मैं रास्ता न भटक गया होऊँ पर...। जब मैं पहुँचा तो सब लोग खाना खा चुके थे सिर्फ मैं बाकी था। मुझे बहुत अच्छा लगा। सच, भाभी के पास औपचारिकता के लिए कोई जगह नहीं है। भाभी ने गरम-गरम पूड़ियाँ निकालीं और पूरे इसरार के साथ खिलाया, सो मैंने भी खूब छक कर खाया। कुछ देर हम बातें करते रहे, फिर मैं अपने कमरे में आ गया।

तुम सोच रही होगी कि आजकल मैं तुम्हें भूल गया हूँ। क्यों ठीक है न? पर यह सच नहीं है। हाँ यह जरूर है कि आजकल तुम बहुत शांत ढंग से मेरे पास आ रही हो। कोई रात या कोई दिन मैंने पूरी तरह अकेले नहीं काटी। किसी न किसी क्षण आकर तुम दस्तक दे ही गयी हो। वैसे तुम्हारे साथ-साथ मुझे मृत्युंजय, सुशील और विनोद की भी बहुत याद आ रही है। पता नहीं क्यों। इधर तुम हो कि लगातार मेरी आँखों में नाचती रहती हो। और तुम्हें मैं तुमसे दूर कहीं किसी और जगह खोजा करता हूँ। पर कभी न कभी तो मैं तुम्हे खोज ही लूँगा। बिलकुल वैसे ही जैसे मैं चाहता हूँ। इतना यकीन है मुझे तुम पर भी और अपने आप पर पर भी। कल निकलने का मन बनाया था पर निकल नहीं सका। वजह, बस और कुछ नहीं... मेरा बैग गायब था। सब ढूँढ़ते रहे पर मिला ही नहीं। कल फिर मौसा के साथ ही हैदराबाद निकलूँगा। अभी बस इतना ही क्योंकि नींद आ रही है और नींद में सपने आते हैं और सपनों में तुम आती हो।
(9.12.2000 - हैदराबाद - रात 12.30)


सुबह का सात बजा है और मैं अभी थोड़ी देर पहले ही उठा हूँ। कल शाम को जब मैं लौटा तो बुरी तरीके से थक चुका था और सो गया। मैने तुमसे लौटकर मिलने की बात की थी और और मिलता भी, अगर तुम पूरे समय मेरे साथ-साथ ही न रही होती तो। अब बताओ तुम्हें सालारजंग म्यूजियम कैसा लगा? चिड़ियाघर में मजा आया कि नहीं? लुंबिनी गार्डेन में नाचते हुये पानी के साथ नाचने का मन हुआ कि नहीं?

पेट भर मसाला डोसा खाने के बाद हम लगभग 10 बजे सुबह सालार जंग म्यूजियम के लिए निकले। पर वहाँ पहुँचते-पहुँचते 12 बज गये। इस म्यूजियम को आकार देने का श्रेय सालारजंग तृतीय को है। यह सालारजंग के पूर्वजों, उनके द्वारा इस्तेमाल की गयी वस्तुओं और उनके द्वारा संग्रहीत संग्रहों से प्रारंभ होता है फिर तो आप अंदर जाते चले जाइये और खोते चले जायेंगे। यहाँ घड़ियों का जो संग्रह है, यहाँ बर्तनों के जो संग्रह हैं यहाँ हथियारों का जो संग्रह है, पर ऐसे तो नहीं गिनाया जा सकता न। ऐसे तो दो पेज बस संग्रहों को गिनाने में ही चला जायेगा। मैं तो बस क्या कहूँ - सब कुछ इतना अद्भुत और नया है मेरे लिए कि मै खुद को अपने भावों को आकार देने में असमर्थ पा रहा हूँ। एक इटैलियन मूर्ति तो लग रहा था जैसे तुम्हें देखते हुये बनायी गयी हो। तुम उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी सालों में इटली तो नहीं गयी थी न!

सच बताऊँ तो यहाँ इस सवाल का कोई जवाब नहीं होगा कि तुम्हें क्या अच्छा लग रहा है। यहाँ पर ऐसा कुछ नहीं है जो अपने आप से तुम्हें बाँध न ले, अपने साथ-साथ एक नयी दुनिया की सैर न कराये। एक फ्रेंच पेटिंग तो ऐसी थी कि... उसमें लोग कबूतरों को दाना चुगा रहे थे। इसकी खूबी यह है कि तुम दूर से देखो तो लोग दो-दो के जोड़े में नजर आयेंगे, थोड़ा और पास आओ तो तीन-तीन के समूह में एकदम पास से देखो तो लोग चार-चार के ग्रुप में दिखायी देते हैं। है न अद्भुत! मेरा तो मन हुआ कि थोड़ा और पास जाऊँ और उसी पेंटिंग का एक हिस्सा बन जाऊँ।

यहाँ सब कुछ ऐसे ही जादुई है बस उन्हें बार-बार देखने की जरूरत है कि उनका जादू तुम्हारी समझ में आ जाय। पर ध्यान रहे यह जादू कोई गाइड दिखा या समझा नहीं सकता। एक हॉल जिसमें गलीचे ही गलीचे थे। कितने खूबसूरत, कितनी बारीक मेहनत के फल। मैंने नजरें बचाकर कइयों को छू लिया। अद्भुत! श्रम इतना महीना और मखमली भी हो सकता है पहली बार जाना। काश मैं उनमें से एक तुम्हें भेंट कर सकता। मैंने कई मूर्तियों को पूरी सावधानी के साथ छुआ यह देखने के लिए कि कहीं वे जीवित तो नहीं है और मैं तुम्हें बताऊँ मेरा शक कितना सही निकला। सारी की सारी मूर्तियाँ जीवित हैं। वे तुमसे बहुत सारी बातें करना चाहती हैं। शर्त सिर्फ यह है जब तुम उनके पास जाओ तो अपनी घड़ी उतार कर जाओ। उन मूर्तियों की परियों सरीखी दुनिया में समय मापने का यह पैमाना नहीं चलता या यों कहें तो गलत नहीं होगा कि उनकी दुनिया में समय आकर थम जाता है। आइन्स्टीन आप कहाँ हो? इस पर आप का सापेक्षिकता का सिद्धांत क्या कहता है? यहाँ दुनिया भर के शोर-सराबे जहमतें, जान-जोखिम, भविष्य की चिंतायें, वासनाएँ सब अपना अस्तित्व खो देते हैं। यहाँ तो सिर्फ तुम होते हो और मूर्तियाँ होती हैं।

एक मूर्ति तो बस क्या बताऊँ... उसमें एक मूर्तिकार था जो मुग्ध होकर अपनी ही गढ़ी हुई एक स्त्री मूर्ति को देख रहा था। मगर क्या सिर्फ इतना ही था उस मूर्ति में? कलाकार खुद चकित है, मुग्ध है, अपनी ही कला के आगे कातर है, बेसुध सा खोया-खोया सा। गौतम कहीं तुम इसी को समाधि तो नहीं कहते हो? महावीर तुम कहाँ हो? क्या यही कैवल्य है? पूरी दुनिया को छोड़कर किसी से ऐसे जुड़ जाना कि पूरी दुनिया का आभास ही न रहे। कपिल कहीं यह पुरुष और प्रकृति का संयोग तो नहीं है? ऐसा ही कुछ तुमने भी तो नहीं देखा था? अगर यही मुक्ति, कैवल्य या समाधि है तो मैं हजार मन से इसकी कामना करता हूँ। साथी संजय कहाँ हो, देखो कि कला अपने कलाकार से कितनी बड़ी होती है। अपनी ही रचना के आगे रचनाकार कितना दीन दिखाई देता है। रचना अपने रचनाकर को कितना बड़ा बना देती है आकर देखो न। वो मूर्ति मुझे भुलाये नहीं भूल रही है बार-बार याद आ रहा है अपनी कला के कदमों में पड़ा कलाकर। मेरी समृतियाँ मेरा साथ छोड़ चुकी हैं। मुझे कुछ याद नहीं है, उस मूर्ति के सिवा, उस मूर्तिकार के सिवा। मेरी महान रचना तुम कब आओगी मेरी आँखों के सामने कि मैं तुम्हें वैसे ही देख सकूँ जैसे कि वह कलाकार अपनी साकार कला को देख रहा था। मेरी महान रचना आओ कि मुझे तुम्हारा इंतजार है, आओ कि मुझे कलाकार बना दो, आओ कि मुझे इनसान बना दो। आओ कि मैं भी तुम्हारे उस कलाकार की तरह मुग्ध होना सीख सकूँ। जीवन में एक बार भी मुग्धता का वैसा क्षण आ जाय तो अपना सारा जीवन उस पर वार दूँ। तुम जो मुझे हमेशा याद आती हो, बेचैन करती हो, मेरे लिए मेरी आँखों में सपने पैदा करती हो, एक बार भी मुझे उस कलाकार की तरह मुग्ध कर सको तो फिर तुम मुझे मिलो या न मिलो क्या फर्क पड़ता है। क्षणभर में ही इतना पा लेना कि सब कुछ मिल जाए, कुछ भी पाना शेष न बचे और फिर वह क्षण क्या कभी खत्म हो सकता है? नहीं! उस क्षण का कोई अंत नहीं, वह तो अनश्वर है। बस एक बार ऐसे ही तुम मेरी आँखों में आ जाओ। आओगी न? जो कुछ भी हो वो मूर्तियुगल मेरे लिये अब तक सबसे जरूरी सपना बन गयी है। सपने को साकार करोगी न तुम, मेरी कला!

म्यूजियम से निकलकर हम चिड़ियाघर गये। वहाँ हमें मिले जेब्रा, सफेद धारीदार बाघ, चीता, शेर, तेंदुआ, दरियायी घोड़ा, गैंडा, घोड़ा, हिरण, बारहसिंघे, कछुये, हाथियों के झुंड, लोमड़ी, भेड़िये, सियार, उल्लू चमगादड़, साही के अतिरिक्त और भी अनेक रंग-रंग के जीव-जंतु, पशु-पक्षी। हिरणों और कुछ पक्षियों को छोड़ दें तो किसी के ऊपर जीवन की कोई रौनक नहीं दिखाई दी। सब के सब मुर्दे, बेचैन और बेरौनक। लेकिन थोड़ा मजा आया उल्लुओं और चमगादड़ों के साथ। लोमड़ी जितने बड़े-बड़े उल्लू और उतने ही बड़े-बड़े उल्टे लटके चमगादड़। अँधेरे में उनकी घूरती आँखें अजीब सी लग रहीं थीं। आगे मरचिरैया मिली। कितना खूबसूरत पक्षी पर कितना दुर्भाग्यशाली जिसके बारे में आज भी भारतीय गाँवों में अफवाह है कि वह दरवाजे पर बोल दे तो कयामत आ जाती है। लोग उसे देखते ही हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं। बेचारा मरचिरैया! आगे सब फीका-फीका सा है, मरा-मरा सा। कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। आगे हम हाईकोर्ट गये। हाईकोर्ट पत्थर की बनी तिमंजिला इमारत है, बिल्कुल पुरानी भव्यता और शैली में बनी। नया बना हिस्सा नौमंजिला है। अंदर एक हनुमान नामक बंदर का मंदिर भी है, जहाँ मौसा हमें ले गये। हैदराबाद में मैं सिर्फ एक चीज से परेशान हूँ वो है मंदिर। मौसा तो खैर मौसा ही हैं। हर शाम साशा की जिद अलग। साशा पिम-पाम साशा मंदिर।

हाईकोर्ट के बाद हम लुंबिनी गार्डेन गये जहाँ पानी फिल्मी गीतों की धुन पर कोरस करता है। एक बेहद दिलचस्प और मनमोहक नजारा । जब हम पहुँचे तो पानी हुआ-हुआ मैं मस्त, की धुन पर मस्त होकर थिरक रहा था। आगे हम पार्क की तरफ गये। अब तक अँधेरा हो चुका है सो चारों तरफ विज्ञान बिजली बन कर रोशन है। यहीं बगल में है हुसैन सागर। हुसैन सागर के बीचोबीच गौतम बुद्ध की विशाल प्रस्तरमूर्ति है। यह मूर्ति जब सागर के बीचोबीच स्थापित करने के लिए ले जायी जा रही थी तो नाव पलट गई थी और नाव पर सवार सभी लोग मारे गये थे। तीन साल तक मूर्तिमान बुद्ध हुसैन सागर की गहराइयों में समाधिस्थ रहे। फिर शासन ने उनकी समाधि तोड़ी और लाकर सागर के बीचोबीच खड़ा कर दिया। किनारे से वहाँ जाने का 25 रुपया किराया है। इसी किराये में वो तुम्हें 2 घंटे तक झील की सैर भी करायेंगे। पर वहाँ जाने का न तो समय है, न ही मन। वहाँ जाकर मौसा की आध्यात्मिक चर्चा कौन सुनेगा...। अब हम लौट रहे हैं। मैं अकेला थोड़ी देर येरागड्डा में रुका। एक सिगरेट पी। मछली खाई, फिर एक सिगरेट पी और लौट आया। और अब भाभी हैं, भूख है, भोजन है, थकान है, नींद है, सपने हैं और तुम हो।
(11.12.2000 - हैदराबाद - सुबह 7 बजे)


यह हैदराबाद जंक्शन है। रात के 10 बजे हैं। मैं अपनी आँखों में आँसू लिये लौट रहा हूँ। हैदराबाद में बिताये गये मेरे ये दस दिन कब गुजर गये कुछ पता ही नही चला, मौसा और उनकी बातें, भाभी की ममता, प्यारी बहना इंदू का प्यार जताना, नेहा, नयन और नीशू की शरारतें, साशा का मंदिर और पिम-पाम क्या इतनी जल्दी भूल जायेगा। नयन रोज लड़ती थी कि आप कब जाओगे पर आते समय मायूस थी। बुलाने पर भी पास नहीं आई, दूर खड़ी रो रही थी। भाभी और मौसा को छोड़ सभी ट्रेन मिस होने की कामना कर रहे थे। और मेरा साशा तो मेरी गोद में था। कितनी मुश्किल से उतारा था उसे मैंने अपनी गोद से। वो आज रोते-रोते ही सोया होगा। मौसा आये थे स्टेशन तक छोड़ने। पूरे रास्ते दुनिया, व्यावहारिकता, पढ़ाई, भगवान, सहयोग ब्राह्मण, नौकरी, धर्म-कर्म, सदाचार और भी न जाने क्या-क्या समझाते रहे और मैं चुपचाप सुनता रहा। पर क्या मैं सचमुच उनकी बातें सुन रहा था? मुझे तो अपना प्यारा इलाहाबाद याद आ रहा था। जहाँ तुम रहती हो। मुझे तो मेरे आते समय साशा का रोना याद आ रहा था।
(11.12.2000 - हैदराबाद जं. - रात 10 बजे)


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हिंदी समय में मनोज कुमार पांडेय की रचनाएँ