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युद्ध
प्रतिभा कटियार

अनुक्रम

अनुक्रम अध्याय 1     आगे

जीवन जैसा वो है उसे वैसा स्वीकार करने से बड़ी आपदा कोई नहीं। हालाँकि हर समझदार व्यक्ति यही सलाह देता है कि जीवन के सत्य को स्वीकार करो। शांति तभी संभव है। तो भाई, शांति नहीं चाहिए। आप समझदार, ज्ञानी लोग अपनी शांति अपने पास ही रख लो। हम तो मूरख, अज्ञानी ही भले। क्योंकि जीवन जैसा वो है वैसा मुझे स्वीकार नहीं। संभवतः यही वजह है कि युद्ध मुझे पसंद हैं। प्रतिरोध पसंद हैं।

युद्ध वो नहीं जो सीमा पर लड़े जाते हैं। युद्ध वो जो अपने भीतर लड़े जाते हैं। जिसमें किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पिता या किसी का प्रेमी शहीद नहीं होते बल्कि जिसमें हर पल हम खुद घायल होते हैं और अक्सर शहीद होने से खुद को बचा लेते हैं।

जाने क्यों लड़ती रहती हूँ हर पल। किससे लड़ती रहती हूँ आखिर। खुद से ही शायद । अपनी ही शांति को खुरचते हुए राहत पाती हूँ। भीतर की तड़प, बेचैनी, उनसे बाहर आने की जिद, जो जैसा है उसे वैसा स्वीकार न करने की जिद जीवन में होने के संकेत हैं। जितना भीषण युद्ध उतना सघन जीवन।

pratibhakatiyar।blogspot।in


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